श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म-स्वीकृति…“।)
अभी अभी # ९३४ ⇒ आलेख – आत्म-स्वीकृति
श्री प्रदीप शर्मा
आत्म, आत्मा का स्थूल स्वरूप है। आत्म-कथा में आत्मा को छोड़कर स्थूल देह का महिमामंडन किया जाता है। केवल स्वामी परमहँस योगानंद की ” योगी की आत्म-कथा (An Autography of a Yogi) ही एक ऐसी आत्मकथा है जिसमें जीवात्मा के साथ परमात्मा का भी विवेचन किया गया है, स्थूल के साथ सूक्ष्म शरीर की व्याख्या की गई है। वहाँ मैं से अधिक आत्म-तत्व की चर्चा की गई है।
मोहनदास करमचंद गाँधी की आत्म-कथा में हम ऐसी आत्म-स्वीकृति पाते हैं, जिन्हें आप स्वीकारोक्ति अथवा कॉन्फेशन कह सकते हैं। अपने गुणों का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन और अवगुणों पर पर्दा ही अधिकतर आत्म-कथा की विषय- वस्तु होती है। ग़रीबी और अभाव का वर्णन इफ़राती से किया जाता है। उपलब्धियों का बखान भी नई नवेली दुल्हन के समान लजाकर किया जाता है। महात्मा-गाँधी की आत्म-कथा का शीर्षक, सत्य के प्रयोग है। जिसका अंग्रेज़ी शीर्षक My Confessions with Truth है। सत्य कोई प्रयोग की वस्तु नहीं, आचरण में उतारने वाली नैतिकता है। आप कुछ भी सोचें करें, नैतिकता की मर्यादा में रहकर करें। प्रयोग का प्रदर्शन अथवा स्वीकारोक्ति नैतिकता के दायरे में नहीं आती। शायद इसीलिए बापू की आत्म-कथा आज भी उनके लिए आत्म-घाती ही सिद्ध हो रही है। कहाँ का महात्मा, राष्ट्रपिता, लंपट कहीं का ! जैसे विशेषण भी उपहार-स्वरूप अनादर सहित प्रेषित किये जाते रहे हैं।।
जब हम आत्म-स्वीकृति की बात करते हैं, तो उसमें आत्म-मंथन भी समाहित है। गुण-दोषों का अवलोकन, अन्तरावलोकन का विषय है, जिसके आधार पर आत्म-शुद्धि संभव है। यह चित्त-शुद्धि का एक सूक्ष्म प्रयास है। आत्म-बल इसी चित्त-शुद्धि की देन है।
आत्म-बल, आत्म-विश्वास का परिष्कृत स्वरूप है, जहाँ स्वयं से अधिक उस सर्व-शक्तिमान पर भरोसा किया जाता है। यह आस्था, विश्वास और समर्पण की वह चरम अवस्था है, जिसे नारद-भक्ति-सूत्र में आत्म-निवेदन की संज्ञा दी गई है।।
आत्म-स्वीकृति स्वयं को, अपने गुण-दोषों सहित पहचानने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। ईश्वर तो हमें हमारे गुण-दोषों सहित स्वीकार कर लेता है लेकिन संसार दोषमुक्त नहीं, दोषयुक्त है। वह आपके दोषों को स्वीकार नहीं करता, केवल गुणों का गाहक है। फलस्वरूप हम अपनी बुराइयों और अवगुणों को छुपा लेते हैं और अच्छाइयों को जग-जाहिर कर देते हैं। और इससे ही हमें मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा और प्रशंसा हासिल होती है। यह सतही अच्छाई ही संसार है, जो आपकी नित्य शुद्ध, बुद्ध आत्मा से कोसों दूर है।
आत्म-स्वीकृति मान्यता प्राप्त धर्म नहीं, सहज, सरल अध्यात्म है, चित्त शुद्धि का एकमात्र ऐसा उपाय है, जहाँ निंदा-स्तुति, छल-कपट के लिए कोई स्थान नहीं। केवल निष्ठा, प्रेम और समर्पण है, जिसके बिना स्वयं का, एवं जगत का वास्तविक कल्याण संभव नहीं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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