श्री हेमंत तारे
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ये अखाड़ा निराला है…।)
☆ हेमंत साहित्य # ६५ ☆
ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
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ये अखाड़ा निराला है,
ये वही पहलवान हैं,
जिन्हें अखाड़े में उतारा था हमने।
अपने ही हाथों से
अपने ही कंधों पर बिठाया,
फिर ताज भी पहनाया हमने।
मैं अकेला नहीं था,
माशरे के सभी मकीं थे
धर्म की घुट्टी पीकर
सो गये मदहोश,
और उँगली की एक स्याही
वर्षों की खामोशी बन गई।
हम सुनते रहें,
वे हमें सुनाते रहे रामधुन,
कि कहीं जाग ना जायें
हम
सुनकर सिसकियाँ
हमवतनों की
अपनों की.
हम सपनों में भारत गढ़ते रहे,
वे सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे।
मैं ढूँढ़ता रहा
उनकी आँखों में संवेदना।
पर वहाँ तो
कुर्सी का धुआँ था,
जिसने इंसान को ही ओझल कर दिया।
अगर संवेदना होती,
तो कलियाँ न कुचली जातीं।
पुस्तकों से भरे हाथ
ढाल न बनते,
गलियारों में धुआँ न उतरता,
लाठियाँ भविष्य की पीठ पर
इतिहास न लिखतीं।
अस्पतालों की खिड़कियों से
झाँकता हुआ कल,
पट्टियों में लिपटा पूछता रहा—
क्या यही था
उजाले का वादा?
फिर भी सिंहासन मुस्कुराता रहा,
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
अहंकार का मुकुट पहनकर
वह आईनों से भी
नज़रें चुराता रहा।
कौन समझाए उन्हें—
सिंहासन शाश्वत नहीं होते।
सोने की लंका भी
एक दिन राख हुई थी।
समय की मुट्ठी में
हर ताज की धूल लिखी है।
जनता देर से बोलती है,
मगर जब बोलती है,
तो अखाड़े बदल जाते हैं।
ये अखाड़ा निराला है…
यहाँ जीत उसी की नहीं होती
जो सबसे ऊँचा बैठा हो,
जीत अंततः उसी की होती है
जिसे कहते हैं
वोटर।
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© श्री हेमंत तारे
मो. 8989792935
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




