श्री हेमंत तारे
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – समतल वृत्त…।)
☆ हेमंत साहित्य # ६९ ☆
समतल वृत्त… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
☆
पहले
एक हाथ थामता है,
और
दूसरा
सीखता है चलना।
फिर,
किसी दिन,
दोनों हाथों के बीच
दूरी नापता रहता है
समय।
बदलता है मौसम,
पर, स्नेह
बदलता नही नाम अपना
तथापि,
बदल जाता है
उच्चारण उसका।
मनुहार,
अब होती है उँगली पकड़कर
यदा- कदा
पर
होती है नियमित
मौन रहकर।
अपेक्षाएँ
छायाओं की तरह
बदलती है कद अपना
और
हो लेती है
लम्बी- नाटी
जब, बह रही हो बयार जैसी
फिर एक दिन
हो जाते हैं पहाड समाप्त
और
पैरों के तले
होती है धरती समतल
जहाँ
हो जाते हैं कद बराबर
तब,
धीमे पड़ते कदमों के पास
तेज़ चलने वाले कदम
अनायास
चल देते हैं आगे
छोड़कर,
सुस्त कदम पीछे
बस
एक वृत्त
चुपचाप होता है पूरा,
और
उसी क्षण
कहीं एक और वृत्त
हो जाता है आरम्भ।
रिश्ते चलते हैं यूँही
बिना घोषणा,
बिना विराम,
और अक्सर
बिना बताए
अपना अर्थ।
रिश्ते
बँधते नही उम्र से,
ये
थमते नही
बंद घडी के हाथों से।
वे बस
समय के वृत्त पर
बदलते रहते हैं जगह अपनी।
शायद,
प्रेम का,
यही
सबसे मौन
पर
शाश्वत रूप है।
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© श्री हेमंत तारे
मो. 8989792935
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






