सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता फूलों की सोच।
कविता – फूलों की सोच
सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
☆
मधुर महक से भरे
फूलों के गुच्छे
शीतल पवन से
हिलोरें लेते
मानो डालियों पर
झूला डाले
आनंद मगन हो रहे
डालियां उनके कानों में
सुरीली तान छेड़ती
हौले से पूछती हैं
कहां से लाते हो
यह भीनी मादक महक ?
तुम्हारी जड़ों में तो माली
सड़ी गली गोबर
सूखे मरे पत्ते
कीड़ों की खाद
भरता रहता है
तुम पर उन सब का
कोई असर नहीं होता ?
फूल मुस्कुरा उठे
हम इंसान थोड़े ही हैं
जो सर्वश्रेष्ठ को लेकर
निकृष्ट बनाने में माहिर है
हमने तो सीखा है
सदा सुगंध ही सुगंध बिखेरना
मनुष्य बेशक
अपने स्वार्थ के चलते
हमारी अधखिली कलियों को
कुचल मसल डालता है
पर हम भी अपनी
सुगंध बांटने से
पीछे नहीं हटेंगे
वह हमारे गुण चाहे
ना स्वीकारे
हम उसके स्वार्थ
अवगुणों को
कभी नहीं अपनाएंगे
☆
© नरेन्द्र कौर छाबड़ा
संपर्क – सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो. 9325261079
Email- narender.chhabda@gmail.com
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





