श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – पीड़ा, जिजीविषा और मैं…
श्री संजय भारद्वाज
पीड़ा और वेदना
तीव्रता से जा मिली
मुझे मथने लगी,
माँ सुनाती थी कहानी
मेंढ़क-मेंढ़की
खौलते पानी में
खदबद सीजने लगे,
उनकी मदद को
दौड़े थे हरि,
मेरे लिए
जिजीविषा बनकर
संग खड़े थे हरि,
तीव्रता हाँफने लगी
वेदना-पीड़ा
मुँह बाएँ खड़ी रहीं,
नकार नहीं सकता, सो
उनका अस्तित्व भी
पलता रहा
पर ‘माइंड ओवर बॉडी’
का सूत्र लिए
जीवनभर मैं
चलता रहा..!
© संजय भारद्वाज
प्रात: 10:11 बजे, बुधवार दि. 11 अक्टूबर 2017
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
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