श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  व्यंग्य पच्चीसीपर चर्चा।

(१४ जून को लोकार्पित)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०८ ☆

☆ “व्यंग्य पच्चीसी…” लेखक : श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी

लेखक:सुरेश पटवा

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

 मुखौटे उतारती एक बेबाक कृति – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य केवल हास्य उत्पन्न करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यवस्था और समाज के भीतर झाँकने की एक पैनी दृष्टि है।

मैं प्रायः कहता रहा हूं कि व्यंग्यकार को गन्ने का शुगर फ्री रस निकाल कर प्रस्तुत करना आना चाहिए । वह खुद समाज से भिन्न नहीं होता । उसे समाज में रहते हुए उसकी मरम्मत का जिम्मा उठाना पड़ता है। मां की भांति दुलारते पुचकारते हुए समाज सुधार करना व्यंग्य का नैतिक कार्य है।

“व्यंग्य  स्वतंत्र विधा से पहले, एक ‘स्पिरिट’ है जो कहीं भी समाहित हो सकती है।

इन तथ्यों के साथ ” सुरेश पटवा की कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ का मूल्यांकन करना  प्रासंगिक हो जाता है। पटवा एक बहुविध रचनाकार हैं, जिनकी भाषा में सहजता, शैली में चुटीलापन और दृष्टि में जन-सरोकारों की स्पष्टता है।

 एक सजग लेखक का सामाजिक आईना

‘व्यंग्य पच्चीसी’ अपने शीर्षक के अनुरूप पच्चीस विविध व्यंग्य रचनाओं का संग्रह है। यह पुस्तक न केवल पाठक का मनोरंजन करती है, बल्कि उसे आत्ममंथन के लिए बाध्य भी करती है। लेखक का व्यंग्य उपहास नहीं, बल्कि यथार्थ का ‘अनावरण’ है। वे व्यक्ति पर प्रहार करने के बजाय समाज में व्याप्त कुत्सित प्रवृत्तियों, सत्ता के छल-प्रपंच, बौद्धिक पाखंड, और बाजारवाद की विडंबनाओं को बेनकाब करते हैं।

पटवा जी की लेखन प्रक्रिया स्वयं में एक प्रयोग है। वे जिस कृति पर काम करते हैं, उसके प्रतिदिन के लेखन को सार्वजनिक कर बौद्धिक पाठकों के साथ  सतत संवाद स्थापित करते हैं। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और चुटीली है। इस संग्रह की प्रमुख शिल्पगत विशेषता , बुंदेली के स्थानीय प्रयोग, सटीक मुहावरे और ‘आइटम संत’ जैसे स्वनिर्मित शब्दों का  जीवंत प्रयोग है।

 व्यंग्य लेखों में शिल्पगत विविधता है ।।व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्ति का प्रभावपूर्ण उपयोग, रूपकों एवं फैंटेसी के माध्यम से व्यंग्य को धारदार बनाया गया है।

 अभिव्यक्ति में कटाक्ष और शिष्टता का संतुलन है। तीखे प्रहारों के बावजूद भाषा मर्यादित है। व्यक्तिगत आक्षेप या किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध फूहड़ता नहीं है, जो लेखक की परिपक्वता को दर्शाता है। वैचारिक धरातल पर

यह संग्रह समकालीन जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करता है। ‘मोबाइल व्यथा कथा’ और ‘फ़ेस्बुकिया करनी-भरनी’ आज के डिजिटल दौर की विसंगतियों पर  कटाक्ष हैं।

‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ जैसे व्यंग्य लेखों में पुरस्कार-लोलुपता और साहित्यिक परिवेश की विडंबनाओं का यथार्थ चित्रण है।

प्रशासनिक विडंबनाएं उजागर करते व्यंग्य  ‘छिद्दी का बकरी लोन’, ‘भ्रष्टाचार का बुल्डोजर’ और ‘ओम बजटाय नमः’ आदि रचनाएँ सत्ता और दफ्तरों की नौकरशाही मानसिकता पर चोट करती हैं। ‘सभ्य जंगल की सैर’ आधुनिकता और प्रकृति-विमुखता के अंतर्विरोधों को बखूबी रेखांकित करती है।

 

‘व्यंग्य पच्चीसी’ पारंपरिक व्यंग्य-परंपरा का विस्तार है, जिसमें व्यंग्य के ट्रायपॉड परसाई , जोशी और त्यागी जैसे पुरोधाओं की वैचारिक परंपरा की गूँज तो है, किंतु शैली पूर्णतः मौलिक और समकालीन है।

यद्यपि कहीं-कहीं लेखक की विद्वत्ता व्यंग्य की संक्षिप्तता को  प्रभावित करती है, तथापि यह पुस्तक समकालीन व्यंग्य का एक  दस्तावेज़ है।

यह संग्रह सामान्य पाठक के लिए रोचक, चिंतनशील पाठक के लिए गंभीर और नए लेखकों के लिए व्यंग्य की समझ को लेकर एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में  सक्षम है। सुरेश जी की यह कृति सिद्ध करती है कि आज व्यंग्य विधा समाज की चेतना को झकझोरने का  सशक्त माध्यम है।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

(मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से पुरस्कार प्राप्त)

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted