डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘ग़मे-इश्क और ग़मे-रोज़गार‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३८ ☆
☆ व्यंग्य ☆ ग़मे-इश्क और ग़मे-रोज़गार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
अमूमन आदमी ज़िंदगी में ग़मों से अपना दामन बचाना चाहता है, लेकिन शायरों और गीतकारों के लिए ‘ग़म’, ‘दर्द’ या ‘रंज’ बहुत अज़ीज़ होते हैं। उनकी नज़्मों और गीतों से लगता है कि ज़िंदगी में ग़म न हों तो ज़िंदगी बेरंग और बेलज्जत हो जाए। शायरों और गीतकारों के लिए ग़म ख़ूबसूरत भी है और ज़रूरी भी। हमारे प्रिय गायक मेंहदी हसन का नग़मा है— ‘तुम नहीं, ग़म नहीं, शराब नहीं; ऐसी तनहाई का जवाब नहीं।’ और तलत महमूद का वह मीठा गीत— ‘शुक्रिया अय प्यार तेरा, दिल को कितना ख़ूबसूरत ग़म दिया।’
यह ग़म या दर्द शायरों को बेतरह परेशान करता रहा है। न इसका कारण समझ में आता है न उपचार। प्रमाण के तौर पर ‘ग़ालिब’ को देखें— ‘दिले नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?’
ज़ाहिर है कि यह ग़म या दर्द इश्क से पैदा होने वाला ग़म है, इसका ग़मे-रोज़गार से कोई ताल्लुक़ नहीं है। ग़मे-रोज़गार से उलट यह ग़म सुकून और चैन देने वाला होता है, इसीलिए शायर उससे निजात पाने की ख़्वाहिश नहीं रखता।
हालत यह होती है कि ग़म या दर्द ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा बन जाते हैं। एक फिल्मी गीत का मुलाहिज़ा करें— ‘मुझे ग़म भी उनका अज़ीज़ है, कि उन्हीं की दी हुई चीज़ है; यही ग़म है अब मेरी ज़िंदगी, इसे कैसे दिल से जुदा करूं?’ यानी महबूबा को प्रेमी का दिया हुआ ग़म भी इतना प्यारा है कि उसे दिल से जुदा करना मुश्किल हो जाता है।
एक और गीत है— ‘तुम्हीं ने ग़म की दौलत दी,बड़ा एहसान फ़रमाया, ज़माने भर के आगे हाथ फैलाने कहां जाते?’ यानी, ग़म न हों तो उन्हें हासिल करने के लिए ज़माने के आगे हाथ फैलाने की नौबत आ सकती है।
एक और नायिका ग़मों से मिली समृद्धि से गदगद है— ‘दिल को दिये जो दाग़, जिगर को दिये जो दर्द, इन दौलतों से हमने ख़ज़ाने बना लिये।’ यानी, दूसरों के लिए भले ही ग़म या दर्द तक़लीफदेह हों, नायिका के लिए वे ख़ज़ाने से कम नहीं हैं।
दर्द की स्वाभाविकता के बारे में ‘ग़ालिब’ ने लिखा—‘दिल ही तो है, न संगो-ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यों; रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताये क्यों?’ और, ‘दर्द मिन्नतकशे दवा न हुआ, मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।’
मतलब यह कि मेरे दर्द का अच्छा न होना बेहतर है क्योंकि मुझे दवा का मोहताज नहीं होना पड़ा।
प्रेमी के प्रति नायिका का लगाव इस मयार का है कि नायिका प्रेमी से इल्तिजा करती है कि वह अपने दुख उसे देकर हल्का हो जाए। ‘तुम अपने रंजो ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो।’ और, ‘अगर मुझसे मोहब्बत है, मुझे सब अपने ग़म दे दो।’ वैसे यह समझना मुश्किल है कि ग़मों का स्थानांतरण कैसे हो सकता है। ग़म अगर क़र्ज़-वर्ज़ का है तो बात अलहदा है।
हमारे शायरों ने ज़िंदगी में ग़म को बहुत तरजीह दी। ‘शकील’ साहब ने लिखा— ‘मेरी ज़िंदगी है ज़ालिम, तेरे ग़म से आशकारा। तेरा ग़म है दर हक़ीक़त, मुझे ज़िंदगी से प्यारा।’
एक दिलचस्प थियरी हमारे शायरों ने पेश की है जिस पर आज के औषधि-विशेषज्ञों को तवज्जो देना चाहिए। अनेक शायरों का मत है कि दर्द हद से गुज़र जाए तो ख़ुद ही दवा बन जाता है। ‘ग़ालिब’ ने लिखा—‘इशरते क़तरा है दरया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।’ दूसरी जगह वे लिखते हैं— ‘रंज से ख़ूगर हुआ इंसां तो मिट जाता है रंज, मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गयीं।’
शायर का मक़सद शायद यह है कि दर्द या ग़म के हद से गुजरने पर आदमी उसका आदी हो जाता है, जो बड़ी सीमा तक सच भी है। हरदिल अज़ीज़ गायक तलत महमूद के जिस गीत में ‘ख़ूबसूरत ग़म’ देने के लिए प्यार का शुक्रिया अदा किया गया है उसी में आगे गीतकार कहता है— ‘आंख को आंसू दिये जो मोतियों से कम नहीं, दिल को इतने ग़म दिये कि अब मुझे कोई ग़म नहीं।’
इसी तबियत के एक गीत की पंक्ति है— ‘ये दर्द दवा बन जाएगा, इक दिन जो पुराना हो जाए।’ लेकिन इस गीत के रचने वाले ने यह नहीं बताया कि दर्द से निजात देने वाला वह शुभ दिन कब आएगा।
शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी एक कदम आगे बढ़ जाते हैं। उन्हें उनका दर्द मज़ा देने लगता है— ‘आदत के बाद दर्द भी देने लगा मज़ा, हंस हंस के आह आह किये जा रहा हूं मैं।’
एक दूसरी ग़ज़ल में, जिसे बेगम अख़्तर ने अपना ख़ूबसूरत स्वर दिया, ‘जिगर’ फ़रमाते हैं— ‘तबीयत इन दिनों बेगानए ग़म होती जाती है, मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है।’ यानी ज़िंदगी में ग़म के न रहने से खुशियां भी घटती जाती हैं। गरज़ यह कि ख़ुशियां ग़मों पर ही मुनहसिर हैं।
‘ग़ालिब’ ने लिखा— ‘इश्क से तबीयत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया, दर्द की दवा पायी दर्द बे-दवा पाया।’ यानी इश्क से ज़िंदगी का मज़ा भी मिला और दर्द की दवा और लाइलाज दर्द भी।
प्रेमी के लिए दर्दे-इश्क इतना ज़रूरी है कि सोये दर्द को जगाया जाता है— ‘जाग दर्दे इश्क जाग। दिल को बेक़रार कर, छेड़ के आंसुओं का राग।’
कहने की ज़रूरत नहीं कि यह ग़म और दर्द इश्के-मजाज़ी से पैदा होते हैं, इनका ताल्लुक़ ग़मे-रोज़गार से क़तई नहीं है। ग़मे- रोज़गार से यह ख़ूबसूरत और मीठा-मीठा दर्द हासिल होना मुमकिन नहीं है। ‘ग़ालिब’ ने लिखा कि किसी न किसी ग़म में मुब्तिला होना इंसान की फ़ितरत है—‘ग़मे इश्क गर न होता, ग़मे रोज़गार होता।’
ग़म को पालने-पोसने वाला क्लासिक पात्र मशहूर अंग्रेज़ उपन्यासकार चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस’ में मिस हैविशाम के रूप में मिलता है। मिस हैविशाम का प्रेमी उन्हें धोखा देकर ठीक उस वक्त भाग जाता है जब वे शादी की पूरी तैयारियों के साथ उसका इंतज़ार कर रही थीं। उसके धोखे की ख़बर पाकर मिस हैविशाम ने समय को उसी क्षण पर रोक देने की कोशिश की। घर की घड़ियां उसी क्षण पर रोक दी गयीं, वे जीवन भर शादी की वही पोशाक पहने रहीं, शादी की केक पर मकड़जाले तन गये, एक जूता पैर में और एक मेज़ पर ही रहा। मिस हैविशाम चलता-फिरता म्यूज़ियम बन गयीं। लेकिन उनकी सारी कोशिशों के बावजूद वक्त उनकी बंद मुट्ठी से रिसता गया और धीरे-धीरे वे बूढ़ी हो गयीं।
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© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





