श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२१ ☆
व्यंग्य – भंडारा
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
दीनू दान उड़ा रहा है। चंदू चंदा डकार रहा है। ठेकेदार मुनाफा बटोर रहा है। नेता बजट का श्रेय और बजट का हिस्सा दोनों ले रहा है। अधिकारी कमीशन को प्रशासनिक संस्कार मानकर आत्मसात कर रहा है। जमीन पर कब्जा हो रहा है। जनता मुफ्त प्रसाद की प्रतीक्षा में खड़ी है।
देश में भंडारों की बड़ी परंपरा है। पहले लोग पुण्य कमाने के लिए भंडारे करते थे। अब प्रभाव, प्रभुत्व और प्रायोजन कमाने के लिए करते हैं। पहले कड़ाही में दलिया और खिचड़ी पकती थी, अब कागजों में योजनाएं पकती हैं। पहले पूड़ी सब्जी बंटती थी, अब घोषणाएं, विज्ञापन और सपने बांटे जाते हैं।
भंडारे की शुरुआत हमेशा श्रद्धा से होती है और समापन हिसाब से। श्रद्धालु धन देता है, आयोजक धन्यवाद देता है और बीच का रास्ता धन के चरित्र को बदल देता है। चंदा जब तक दानदाता की जेब में रहता है, धर्म के लिए संकल्प कहलाता है। दान खाते में पहुंचते ही अवसर बन जाता है।
चंदू इसी अवसरवाद का पुरोहित है। वह चंदे को इस कौशल से पचाता है कि आयकर विभाग भी उसके पाचन तंत्र पर शोध करना चाहे। वह पारदर्शिता का इतना बड़ा समर्थक है कि हर सवाल पूछने वाले को आरपार देख लेता है, लेकिन अपने खाते किसी को नहीं दिखाता। उसके अनुसार समाजसेवा में हिसाब मांगना आस्था पर हमला है। वह उदाहरण देता है, प्रतिप्रश्न करता है कि अमुक धर्म या खास ट्रस्ट पर कोई सवाल क्यों नहीं उठा रहे, केवल हमारी आस्था ही क्यों सवाल की परिधि में है।
दीनू सेवा का ब्रांड एंबेसडर है। वह हर फोटो में गरीब के कंधे पर हाथ रखता है और हर सौदे में अपना दूसरा हाथ जेब के भीतर रखता है। उसके चेहरे पर करुणा टपकती है और व्यवहार में गणित। उसे मालूम है कि पांच लाख का दान पचास लाख की प्रतिष्ठा और पांच करोड़ का प्रभाव पैदा कर सकता है। इसलिए वह परोपकार को निवेश की तरह करता है।
नेता जी मंच पर विराजमान हैं। वे जनता को अपना परिवार बताते हैं। यह वही परिवार है जिससे वे चुनाव के बाद उतनी ही दूरी बना लेते हैं जितनी दूरी सुरक्षा घेरा जनता से बनाए रखता है। वे बताते हैं कि विकास गांव गांव पहुंच चुका है। गांव वाले सहमति में सिर हिलाते हैं क्योंकि विकास उनसे मिलने नहीं आया, लेकिन उसका विज्ञापन रोज उनके मोबाइल पर पहुंच जाता है।
अब विकास का अर्थ भी बदल गया है। सड़क टूट जाए तो मरम्मत का बजट विकास है। मरम्मत टूट जाए तो नया टेंडर विकास है। टेंडर रद्द हो जाए तो पुनः स्वीकृति विकास है। काम हो जाए तो वह चमत्कार की श्रेणी में आता है।
ठेकेदार लोकतंत्र का अनसुना जन कवि है। वह सीमेंट में दर्शन और बजरी में संभावना मिलाकर निर्माण करता है। उसकी बनाई सड़कें बरसात आते ही आत्मनिर्भर होकर मिट्टी में विलीन हो जाती हैं। पुल उद्घाटन के समय मजबूत और जांच के समय भावुक पाए जाते हैं। मगर चिंता की कोई बात नहीं। हर दुर्घटना के बाद संवेदना का नया भंडारा शुरू हो जाता है।
अधिकारी व्यवस्था के योगी हैं। वे फाइलों के पद्मासन पर बैठकर निर्णय की साधना करते हैं। उनकी कलम तब तक मौन व्रत में रहती है जब तक उसे समुचित ऊर्जा प्राप्त न हो जाए। इस ऊर्जा के कई नाम हैं, पर जनता इसे सुविधा शुल्क के नाम से पहचानती है।
भंडारे का एक स्वादिष्ट व्यंजन जमीन भी है। जिस भूमि पर स्कूल बनना था, वहां कॉम्प्लेक्स उग आता है। जहां तालाब था, वहां टावर खड़ा हो जाता है। जहां पार्क प्रस्तावित था, वहां प्लॉट बिक जाते हैं। नक्शे बदलते हैं, सीमाएं बदलती हैं, मालिक बदलते हैं, केवल सरकारी रिकॉर्ड अपनी नींद में खर्राटे भरता रहता है।
इस पूरे आयोजन में जनता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण और सबसे नगण्य है। उसी के नाम पर चंदा आता है, उसी के नाम पर बजट आता है, उसी के नाम पर योजनाएं बनती हैं और उसी के नाम पर भाषण दिए जाते हैं। दरअसल पूरा भंडारा ही जनता के नाम पर आयोजित होता है, जनता का , जनता के लिए , जनता के धन से , बस वही जनता भंडारे के स्वादिष्ट भोजन की लाभार्थियों वाली लाइन में कहीं पीछे छूट जाती है।
भंडारा समाप्त होने पर पत्तलें उठ जाती हैं, बैनर उतर जाते हैं, नारे बदल जाते हैं। लेकिन दीनू बना रहता है, चंदू बना रहता है, ठेकेदार बना रहता है, कमीशन बना रहता है। और बने रहते हैं, नेता जी , जो अवसर के अनुसार नई पार्टी में नजर आ सकते हैं। केवल जनता हर बार नए विश्वास के साथ फिर अगले भंडारे की पंक्ति में लग जाती है।
लोकतंत्र की यही सबसे अद्भुत व्यवस्था है। यहां भंडारा जनता के नाम पर होता है, खर्च खजाने से होता है, लाभ प्रभावशालियों को मिलता है और धन्यवाद जनता देती है। फिर अगला भंडारा घोषित होता है। फिर वही श्रद्धा, वही शोर, वही भाषण, वही बजट, वही बंटवारा।
देश का विकास रथ चलता रहता है।
भंडारा भी।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





