सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी…।
रचना संसार # १०४
☆ गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆
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बैरन कोयल कूके प्रियतम,
प्रीति गगरिया छलकाती।
कंगन खनकें नथनी डोले,
सजनी चलती बलखाती।।
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अधर गुलाबी कंपन करते,
कुंतल लट मुख पर आए।
घूँघट पट से झाँके गोरी,
छम-छम पायल झनकाए।।
अल्हड़ यौवन ललचाता मन,
चंचल चितवन शरमाती।
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प्रेम-वलय उर बगिया पलती,
कलियाँ लेतीं अँगड़ाई।
कत्थक करती मोहक मणियाँ,
झूला झूले तरुणाई।।
डाल-डाल मधुमासी डेरा,
चतुर चमेली इतराती।
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करें सुवासित मस्त बयारें,
गुल मकरंद लुटाते हैं।
अठखेली करते भँवरे हैं,
प्रेमिल उर मुस्काते हैं।
मन में निश्छल प्रेम पला है,
कामदेव छवि बहकाती।
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मनभावन गीतों की लड़ियाँ,
रस पीयूष भरी प्याली।
बौराते हैं बौर प्रीति के,
कहती होठों की लाली।।
प्रेम पताका फैली नभ तक,
चूमे माथा लहराती।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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