श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अखंड गहमरी जी द्वारा लिखित “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१२ ☆
☆ “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” – लेखक : श्री अखंड गहमरी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)
लेखक – अखंड गहमरी
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ मुख्य विषय : यात्रा, प्रकृति, संस्कृति, लोकजीवन एवं मानवीय संवेदनाएँ– श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह किताब यात्रा के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का विस्तार, प्राकृतिक सौन्दर्य का सजीव चित्रण, स्थानीय समाज और जीवन-मूल्यों का सजीव परिचय, अनुभव प्रधान एवं संवेदनशील रोचक पठनीय अभिव्यक्ति, यात्रा, संवेदना और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है।
प्रारंभिक पृष्ठों से ही यह किताब स्पष्ट संकेत देती है कि यह केवल पर्यटन-वृत्तांत नहीं, बल्कि अनुभवों, संस्कृतियों और मानवीय संवेदनाओं का संग्रह योग्य दस्तावेज़ है। लेखक ने यात्रा को मनोरंजन या स्थल-दर्शन तक सीमित न मानकर जीवन को समझने का माध्यम माना है। अनुक्रम पर दृष्टि डालने से ही स्पष्ट होता है कि पुस्तक में विभिन्न स्थलों, प्रसंगों और अनुभवों को क्रमबद्ध रूप से स्वतंत्र अध्यायों में अभिव्यक्त किया गया है। यह संरचना पाठक को यात्रा के विविध आयामों से हिस तरह परिचित कराती है, मानो वह स्वयं सहयात्री है।
लेखक की दृष्टि केवल प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रत्येक स्थान के सांस्कृतिक परिवेश, वहाँ के लोगों के जीवन, उनकी परम्पराओं तथा मानवीय संबंधों को भी समान महत्त्व देती है। इसी कारण पुस्तक का स्वर केवल विवरणात्मक न होकर अनुभवात्मक और चिंतनपरक है। लेखक पाठक को यह अनुभव कराता है कि यात्रा का वास्तविक अर्थ बाहरी संसार को देखने के साथ-साथ उन संदर्भों में स्वयं के भीतर झाँकना भी है।
भाषा की दृष्टि से पुस्तक अत्यंत सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय शैली में लिखी हुई है। लेखक अनावश्यक शब्दाडम्बर से बचते हुए सरल शैली में अपने अनुभवों को व्यक्त करता है। वर्णन में दृश्यात्मकता इतनी प्रभावी है कि पाठक स्वयं को यात्रा का सहभागी अनुभव करने लगता है। प्रकृति, पर्वत, मार्ग, स्थानीय वातावरण और जनजीवन के चित्रण में गहमरी जी की संवेदनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है।
पुस्तक के स्पष्ट रूप से पठनीय अंशों में लेखक का यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है— “यात्राएँ मनुष्य को केवल नए स्थानों से नहीं, नए अनुभवों से भी परिचित कराती हैं।” यह वाक्य सम्पूर्ण पुस्तक की मूल चेतना को अभिव्यक्त करता है। लेखक के अनुसार यात्रा का वास्तविक लाभ केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि अनुभवों का विस्तार है। यही अनुभव व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हैं और उसे जीवन के विविध रूपों को समझने की क्षमता प्रदान करते हैं।
इसी तरह उनका उल्लेखनीय कथन है— “प्रकृति के निकट पहुँचकर मनुष्य अपने भीतर की शांति को पहचानने लगता है।” इस विचार में लेखक की प्रकृति-दृष्टि निहित है। प्रकृति यहाँ केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन, आत्मचिंतन और आंतरिक शांति का आधार बनकर उभरती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।
पुस्तक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखक स्थानीय संस्कृति को बाहरी दृष्टि से नहीं, बल्कि आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है। यात्रा के दौरान मिलने वाले लोग, उनकी जीवनशैली, व्यवहार, परम्पराएँ और सामाजिक मूल्य लेखक के वर्णन में स्वाभाविक रूप से समाहित होते हैं। इससे पुस्तक केवल स्थानों का परिचय देने वाली रचना नहीं रह जाती, बल्कि सांस्कृतिक दस्तावेज़ का रूप ग्रहण कर लेती है।
शिल्प की दृष्टि से पुस्तक वर्णनात्मक और संस्मरणात्मक शैली का सफल समन्वय प्रस्तुत करती है। घटनाओं का क्रम स्वाभाविक है तथा प्रत्येक प्रसंग अपने आप में पूर्ण प्रतीत होता है। भाषा में आत्मीय संवाद का गुण है, जिससे पाठक लेखक के अनुभवों से सहज रूप से जुड़ जाता है।
यह कृति यात्रा-साहित्य की उस राहुल सांस्कृतायायन परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें यात्रा केवल स्थानों का भ्रमण नहीं, बल्कि संस्कृति, समाज और जीवन-दृष्टि की खोज है। लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से पाठक को यह विश्वास दिलाता है कि प्रत्येक यात्रा मनुष्य को कुछ नया सिखाती है और उसके व्यक्तित्व को समृद्ध बनाती है।
समग्रतः यह पुस्तक यात्रा, प्रकृति, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का संतुलित एवं प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत करती है। इसकी सरल भाषा, आत्मीय अभिव्यक्ति, अनुभवों की प्रामाणिकता तथा जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण इसे एक पठनीय और संग्रहणीय कृति बनाते हैं। यात्रा-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक केवल जानकारी का स्रोत नहीं, बल्कि संवेदनात्मक अनुभवों की ऐसी यात्रा है जो पाठक को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर के संसार से भी परिचित कराती है।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






