डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१
सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
आग लिए तुम बदन में अपने,मुझे जलाने आ जाओ
अपनी रेशम सी ज़ुल्फ़ों में,मुझे सुलाने आ जाओ
=2=
हरियाली चहुँ ओर छा गई,आया देखो सावन
अधरों से रस छलक न जाए, मुझे पिलाने आ जाओ
=3=
लता वृक्ष उपवन मदमाए, झूम उठी अमराई
अपनी बाहों के झूले में, मुझे झुलाने आ जाओ
=4=
पक्षी लगे मारने ताने,दर्द पपीहा बढ़ा रहा
अपनी कोकिल बोली से,मुझे बुलाने आ जाओ
=5=
आ भी जाओ सजनी अब,ये विरह सताये
चंद ख़ुशी की चाह में ‘राजेश’, ग़म को भुलाने आ जाओ ll
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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