स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…२।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९७ ☆
☆ – प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
और
जो प्रायमरी का मास्टर है
वो तो है और भी अधिक असहाय।
कोई धनी धोरी नहीं है उसका
उससे ज्यादा रुतबेदार होता है
सिपाही पुलिस का।
जाने उसकी किस्मत में
क्या बदा है,
आज वो गुरू नहीं
सिर्फ गधा है
जिसके ऊपर अनावश्यक
आदेशों और प्रतिबन्धों का
भारी बोझा लदा है।
वो जाता है स्कूल
तपती दोपहर में
या कि फिर तड़के।
थोड़ी सी जगह में बैठकर
उससे कोई दीक्षा नहीं लेता,
वो किसी को शिक्षा नहीं देता।
वो तो बढ़ाता है भीड़ को।
पढ़ाता है वो पचास लड़के।
और आगे चलकर
वही भीड़ नष्ट करने लगती है
प्रजातांत्रिक नीड़ को।
छूटता है स्कूल
तो लगता है जैसे
छूटा हो कोई खिरका,
कोई ठेका नहीं ले सकता क्या
इनकी फिकर का ?
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





