आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण…)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९१ ☆

☆ सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

कहती हैं उज्ज्वल भविष्य पर, शिक्षक ही उपलब्ध नहीं।

जो हैं द्रोणाचार्य, एकलव्यों सा है प्रारब्ध यहीं।।

विश्वमित्र-संदीपनी गायब, राम-कृष्ण होंगे कैसे?

शोषित-पीड़ित शिक्षक जीवन बिता रहा जैसे-तैसे।।

धृतराष्ट्रों के वंशज पैलेट साध निशाना दे मारें।

शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।।

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गुरुकुल पूँजीपति के हाथों बेच, किया है बंटाढार।

सरकारी शालाएँ बंजर, छलें दिखा भोजन उपहार।।

हैं नियुक्ति में घपलेबाजी, ट्रांसफर में नीलामी है।

प्रश्न पत्र बिकते बजार में, जहाँ देखिए खामी है।।

बनें जगद्गुरु लेकिन देख न पाएँ पीढ़ी है लाचार।

शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।

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अन उपयोगी बने पाठ्य क्रम, डिग्री मिलती काम नहीं।

अति खर्चीली शिक्षा जिसका दो कौड़ी भी दाम नहीं।।

पढ़ा विदेशों में निज बच्चे नेता अफसर लूटें देश।

माँगे नवजवान पीढ़ी दो काम, न नोचे जनता केश।।

मत डालो मंदिर में डाका, भेज रहे प्रभु दुत्कारें।

शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(ए२/५ सोमनाथ-जबलपुर एक्सप्रैस)/२७.७.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Hemant Tarey
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उत्तम एवं सामयिक