डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘खाप और खूंटा (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४६ ☆
☆ आलेख ☆ खाप और खूंटा (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
हाल ही में हरयाणा की एक खाप पंचायत का ब्यौरा टीवी पर देखा। पंचायत में अन्य निर्णयों के अलावा लड़कियों के आचरण के बारे में कुछ निर्णय लिये गये— कि लड़कियां दुपहिया वाहन पर पीछे बैठते वक्त एक ही तरफ पैर रखें, दोनों तरफ नहीं, छोटे कपड़े न पहनें, मोबाइल का इस्तेमाल न करें, भाग कर शादी न करें, शादी में माता-पिता की सहमति लें, ‘लिव इन’ में न रहें। मर्जी की शादी करने वाले और ‘लिव इन’ में रहने वाले जोड़ों के लिए सामाजिक बहिष्कार की सज़ा निर्धारित की गयी।
ज़हिर है कि पितृसत्तात्मक समाज युवाओं, ख़ास तौर से लड़कियों पर अपनी गिरफ्त ढीली नहीं करना चाहता। हमारा संविधान नागरिकों को जो भी अधिकार दे, ये जाति- पंचायतें और ग्राम-पंचायतें समाज को पुरानी, प्रासंगिकता खो चुकी मान्यताओं में ही जकड़ कर रखना चाहती हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक ताज़ा निर्णय के अनुसार लिव-इन रिश्ता शादी जैसा है। माता-पिता इसमें दख़ल नहीं दे सकते।
आज की लड़कियों को देखकर यह समझना मुश्किल है कि वे कितने संघर्ष और कितनी बाधाओं को लांघ कर वर्तमान स्थिति तक पहुंच पायी हैं। कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या शिक्षा निषेध, विधवा विवाह निषेध, देवदासी प्रथा जैसे जाने कितने सड़े-गले नियम ख़त्म किये गये। इसमें उच्च अंग्रेज़ अधिकारियों और देशी समाज-सुधारकों की बड़ी भूमिका रही, जिन्होंने रूढ़िवादियो के कट्टर विरोध के बाद भी अपने प्रयासों में ढील नहीं आने दी। कहीं पढ़ा कि प्राचीन बंगाल में पति की मृत्यु के बाद विधवा की दुर्गति हो जाती थी। बहुत दिनों तक मांगलिक कार्यों में विधवाओं को शामिल नहीं किया जाता था। विधवा के द्वारा रंगीन वस्त्र पहनना या आभूषण धारण करना भी अनुचित माना जाता था। उससे जीवन भर सफेद सादा वस्त्र धारण करने की अपेक्षा की जाती थी।
कई साल पहले एक अखबार में सती प्रथा पर एक बड़े धर्मगुरु का वक्तव्य पढ़ा था। वे राजस्थान में सती-प्रथा पर प्रतिबंध लगने से दुखी थे। उनका कथन था— ‘जो स्वेच्छयता से सती होना चाहती है उसे रोकना नहीं चाहिए और जो सती नहीं होना चाहती उसे इस कार्य के लिए बाध्य भी नहीं किया जाना चाहिए।— हमारे यहां आत्महत्या करने से पाप होता है, लेकिन सती को ऐसा कोई पाप नहीं लगता और सती होकर वह पति को भी पापों से मुक्त कर देती है।— सच्ची सती वह है जो पतिव्रता धर्म का पालन करे। ऐसा करने वाली स्त्री वस्तुत: पति के जीवन काल में ही सती हो जाती है।’
हमारे समाज में अगर सड़क पर लड़के लड़कियों के साथ गुंडई करें तो उसके लिए अक्सर लड़कियों के आचरण और उनके छोटे कपड़ों को ही दोषी माना जाता है। हमारे यहां लड़के-लड़की की दोस्ती को अस्वाभाविक माना जाता है। इसीलिए लड़की तभी सुरक्षित महसूस करती है जब वह लड़कें को अपना ‘भाई’ बना लेती है या उसकी कलाई पर राखी बांध देती है। लड़के- लड़की की ‘दोस्ती’ को हमेशा सन्देह की नज़र से देखा जाता है।
लड़कियों के ‘शऊर’ और उनकी ‘पवित्रता’ को लेकर इतनी ज़्यादा चौकन्नी और चिन्तित खापों को यह याद दिलाना ज़रूरी लगता है कि हरयाणा में ही एक सन्त विराजते हैं जो दो शिष्याओं पर कृपा बरसाने के जुर्म में 2017 से सज़ा काट रहे हैं और अब तक आठ साल में सत्रह बार पैरोल या फ़र्लो पर जेल से बाहर आ चुके हैं। जब भी जेल से बाहर आते हैं कारों के काफिले में निकलते हैं और बाहर आकर ऑनलाइन प्रवचन और भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। हरयाणा की खापों की लड़कियों के आचरण पर बारीक नज़र रहती है, लेकिन ऐसे सन्तों के बारे में उनकी ज़बान बन्द रहती है। हरयाणा के एक मंत्री जी भी इन सन्त जी के सामने सिर नवाने के साथ चढ़ावा चढ़ा चुके हैं। कारण यह है कि सन्त जी के करोड़ों शिष्य हैं और उनके इशारे पर करोड़ों वोट पार्टी की झोली में गिर सकते हैं।
हमारे देश में धर्मगुरुओं के प्रति शिष्यों की आस्था इतनी ज़बरदस्त रहती है कि गंभीर आरोपों के बाद भी गुरूजी के प्रति शिष्यों की भक्ति में ‘डेंट’ नहीं लगता। दरअसल ज़्यादातर लोगों के लिए ज़िन्दगी में कोई न कोई खूंटा पकड़े रहना ज़रूरी होता है। बिना खूंटे के अपने बूते ज़िन्दगी काटने वाले विरले होते हैं।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






🙏 🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी।