श्री अरुण कुमार दुबे
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “ख़्वाहिशें बेहिश हुई है…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५८ ☆
ख़्वाहिशें बेहिश हुई है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
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ख़्वाब की ताबीर मेरे और पूरी आरज़ू
होश ग़ाफ़िल हो गया है जब वो आया रूबरू
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उम्र की दहलीज पर जब सांझ की दस्तक हुई
ख़्वाहिशें बेहिश हुई है चैन की है ज़ुस्तज़ू
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कब रकम अखबार में कब है मुनादी की गई
प्यार की चर्चा हमारे हो रही है कू-ब-कू
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गिर गया किरदार से इंसान कितना देखिए
है हवस यूँ ज़र ज़मीं की बेच देता आबरू
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दोस्त है गद्दार की पहचान ये सबसे बड़ी
हो वतन को जब ज़रूरत तब नहीं खौले लहू
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अम्न का कैसे मसीहा ज़ह्न नादिर शाह का
हर चमन पे चाहे कब्ज़ा सबका मालिक तू ही तू
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शेर सर्कश का किया है समझा जो जंगल का शेर
सिद्ध ईरानी किये है किस तरह है जंग-जू
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कामयाबी के नहीं इमकान के आसार है
दोगले के घर करोगे अम्न की गर गुफ़्तगू
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अय अरुण ओढ़ी तबस्सुम सच छुपा सकती नहीं
आपकी नाराज़गी आँखें दिखाती सुर्खरू
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© श्री अरुण कुमार दुबे
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





