डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है उनकी हाल ही में आये  व्यंग्य संग्रह – ये इश्क़ नहीं आसाँपर उनका आत्मकथ्य)

(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ कुंदन सिंह परिहार जी को उनकी १४वीं पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई।)

यह पुस्तक निम्न ऑनलाइन वेबसाइट्स पर उपलब्ध है :-

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☆ आत्मकथ्य – ये इश्क़ नहीं आसाँ ☆ डॉ कुन्दन सिंह परिहार ☆

यह मेरा सातवां व्यंग्य-संकलन है। अब मेरे कथा-संग्रहों और व्यंग्य-संग्रहों की संख्या बराबर हो गयी, यानी दोनों ही 7-7 हो गये।  कुल पुस्तकों की संख्या 14 हो गयी। 13 पुस्तकों के प्रकाशन के बाद सोचा था कि अब शायद अगली पुस्तक जन्म नहीं लेगी, लेकिन सिद्ध हुआ कि लिखने और न लिखने पर लेखक का वश नहीं होता।

अब रचनाएं पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों को नहीं भेजता क्योंकि अब सारा सिस्टम पूर्व के सिस्टम से भिन्न हो गया है। अब साहित्यिक रचनाओं को पहले जैसा महत्व नहीं दिया जाता। अब  अक्सर लेखक को रचना के प्रकाशन की जानकारी भी नहीं  मिल पाती। इसलिए मेरे जैसे लेखकों के लिए फेसबुक अच्छा साधन है। रचना तुरन्त पाठकों के सामने आ जाती है और पाठकों की प्रतिक्रिया भी मिल जाती है, जो समाचार-पत्रों में नहीं होता। अधिकांश पत्रिकाएं अब अनियमित हैं। रचना के प्रकाशन की कोई समय-सीमा नहीं होती।

व्यंग्य-लेखन एक सामाजिक उपक्रम है। यदि व्यंग्य समाज के लिए नहीं है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। व्यंग्य व्यक्तिगत  शिकवा- शिकायत नहीं है, न ही वह मनोरंजन का साधन है। व्यंग्यकार अन्याय, अनीति के विरुद्ध समाज की पीड़ा को प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। इसीलिए परसाई जी ने लिखा कि व्यंग्य हंसने हंसाने की चीज़ नहीं है। मैं लिखता हूं क्योंकि मेरी संवेदना अभी जागृत है, क्योंकि मेरी दृष्टि में समाज में बहुत कुछ ऐसा है जो मुझे परेशान करता है और मुझे लिखने के लिए बाध्य करता है।

मेरे प्रकाशक, वर्जिन साहित्यपीठ के संचालक भाई ललित मिश्र को पुनः धन्यवाद देता हूं क्योंकि उनके सहयोग से ही मेरी लगभग सभी रचनाएं पुस्तक के रूप में आ सकी हैं। 1982 से 2018 तक के लगभग 36 वर्षों में अन्य प्रकाशकों के द्वारा मेरी 7 पुस्तकें प्रकाशित  हुईं, जबकि मिश्र जी ने 2019 से 2024 के 5 वर्षों में मेरी 6 पुस्तकें प्रकाशित  कीं। मेरे लिए यह बड़ी राहत की बात रही। मिश्र जी के साफ-सुथरे व्यवहार के कारण मुझे  इस दौर में कभी परेशानी नहीं हुई। पूर्व में पुस्तकों के प्रकाशन में  विलंब का मूल कारण यह रहा कि मैं संपर्क बनाने और दौड़-भाग करने में हमेशा कमज़ोर रहा। संयोग से ही मिश्र जी से परिचय हुआ, जो मेरे लिए संकटमोचक बना।

पुणे से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ब्लॉग संचालित करने वाले भाई हेमंत बावनकर का भी मैं ऋणी हूं। वे प्रति रविवार को मेरा एक लेख प्रकाशित करते हैं। अभी तक वे मेरे 300 से अधिक लेखों को पाठकों के सम्मुख ला चुके हैं। वे भी बहुत भले व्यक्ति हैं।  उन्हीं ने मेरा परिचय ललित मिश्र जी से कराया।

रायपुर से प्रकाशित अखबार ‘चैनल इंडिया’ के साहित्य संपादक श्री स्वराज करुण ने मेरी 70 से अधिक रचनाएं प्रकाशित कीं, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं। वे भी बहुत सज्जन व्यक्ति हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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जगत सिंह बिष्ट
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हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं!
श्रद्धेय परिहार साहब!
🙏 🙏 🙏 🙏

Kundan Singh Parihar
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धन्यवाद, बिष्ट जी।