मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – झोपड़ी निर्जीव न थी…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
उस झोपड़ी में
सिर्फ़ घास फूस तिनके ही न थे
उसमें बसती थी
ज़िंदगी की जद्दोजहद
वह सिर्फ़ धूप से राहत नहीं
और बारिश से बचाती ही नहीं थी
एक सुरक्षित आसरा और पनाहगाह थी
टूटती सांसों को थामने के लिये
चूल्हे की आंच में तपते संघर्ष की
वह मूक साक्षी थी
टूटी चारपाई में वहां
कोई गुदड़ी का लाल पलता था
रात को टिमटिमाते दिये के उजाले से
कोई उम्मादें, आशाएं पलती थीं वहाँ
वो हारी नहीं, संसार के वैभव के आगे
हठ कर बैठी वह कुटिया
हारूंगी नहीं कभी
किसी आंधी, तूफ़ान के आगे
मेरे अंदर अभी
जीजीविषा की आधारशिला
बहुत मज़बूती से जड़वत् है
और रहेगी, तब तक
जब तक ” जीवन ” मेरे भरोसे
बसा रहेगा यहाँ…!!!!????
© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




