श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆
☆ श्रीमती अनुराधा गर्ग दीप्ति की कृति – युवान ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत)
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बालमन और किशोरवय की भावनाएं मिट्टी के उस लोंदे की तरह होती हैं, जिसे सही समय पर यदि सही आकार न मिले, तो भविष्य की संरचना अधूरी रह जाती है। इसी पावन और महती उद्देश्य को केंद्र में रखकर पाथेय प्रकाशन, जबलपुर से प्रकाशित कवयित्री श्रीमती अनुराधा गर्ग ‘दीप्ति’ की नव-प्रकाशित कृति ‘युवान’ (बाल-किशोरी गीतमाला) साहित्य जगत में एक अत्यंत स्वागतयोग्य और श्लाघनीय हस्तक्षेप है। यह पुस्तक मात्र कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी के नैतिक, चारित्रिक और सामाजिक परिष्कार का एक सशक्त माध्यम है। कवयित्री स्वयं एक आदर्श शिक्षिका रही हैं, और उनके लंबे शैक्षणिक जीवन का व्यावहारिक अनुभव इस पुस्तक के पृष्ठ-पृष्ठ पर पूरी प्रामाणिकता के साथ झलकता है। उन्होंने बच्चों के आसपास के परिवेश और उनके बौद्धिक स्तर को बहुत सूक्ष्मता से समझा है। जैसा कि आचार्य भगवत दुबे जी ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही रेखांकित किया है कि ये रचनाएं बच्चों को अनेक बुराइयों एवं कुरीतियों से बचाकर उनमें उच्च मानवीय संस्कारों का अनवरत पोषण करती हैं।
साहित्यिक दृष्टि से दीप्ति जी ने ‘युवान’ को छह वैविध्यपूर्ण भागों में विभक्त किया है, जिसमें धर्म-ज्ञान, प्रखर देशभक्ति, आधुनिक शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, महापुरुषों के प्रेरक व्यक्तित्व और तत्कालीन सामाजिक यथार्थ का अनूठा ताना-बाना बुना गया है। बाल-मनोविज्ञान के धरातल पर अवस्थित होकर रची गई इन रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता इनकी ‘गेयता’, प्रांजलता और भाषा की अत्यंत सरल बोधगम्यता है। पुस्तक में प्रकृति प्रेम और वसुंधरा के संरक्षण को लेकर कवयित्री का मन उद्वेलित हो उठता है, और वे ‘करो श्रृंगार धरती का’ कविता में नई पौध को अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए लिखती हैं:
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“सँवारोगे, सजाओगे,
बचाओगे इसे हर दिन।
ये ऋण माँ का उऋण होने का,
फिर आह्वान देती है।”
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‘युवान’ के अंतस में राष्ट्रीय चेतना और स्वदेश-अनुराग का स्वर अत्यंत प्रखर और मुखर है। ‘स्वर्णिम भारत’ और ‘ये भारत देश हमारा’ जैसी रचनाएं नई पीढ़ी के भीतर अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति के प्रति अगाध गौरव का संचार करती हैं। आज के वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्र को पुनः विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने का स्वप्न इन भव्य पंक्तियों में जीवंत हो उठता है:
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“विश्व शक्ति का प्रतीक,
परिश्रमी, बुद्धिमान।
शिक्षा की अलख से,
विश्व हो प्रकाशवान।
विश्व गुरु बने भारत,
एक साथ राष्ट्र गान गाइए।”
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कवयित्री केवल अतीत के वैभवशाली इतिहास के गौरवगान तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखतीं, बल्कि वर्तमान समाज में फैली विसंगतियों जैसे भ्रष्टाचार पर भी निर्भीकता से चोट करती हैं। वे भावी कर्णधारों को जागरूक करते हुए एक दृढ़ संकल्प की ओर प्रेरित करती हैं:
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“भ्रष्टाचारी का दलदल,
फैला है इतना ज्यादा।
इसे मिलकर दूर करेंगे,
हम सबका है यह वादा।”
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भारतीय संस्कृति की शाश्वत उत्सवधर्मिता, अनेकता में एकता और सर्वधर्म समभाव का पावन संदेश इस कृति की मूल आत्मा है। ‘उत्सवधर्मी देश मेरा’ जैसी कविताओं के माध्यम से अनुराधा जी बच्चों को बहुत ही सहज और आत्मीय ढंग से देश की सांप्रदायिक समरसता का पाठ पढ़ाती हैं:
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“सनतनी है संस्कृति अपनी
भारत भूमि माता अपनी।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
आपस में है भाई-भाई।”
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इसके अतिरिक्त, इस संकलन में समसामयिक और प्रासंगिक आधुनिक विषयों को भी अत्यंत कलात्मकता से स्थान दिया गया है। डिजिटल साक्षरता, ‘डिजीलेप’, ‘व्हाट्सएप असेसमेंट’ और ‘कोरोनाकाल की ऑनलाइन क्लास’ जैसी नवीनतम व्यावहारिक परिस्थितियों को गीतों के सांचे में ढालकर रचनाकार ने यह अकाट्य रूप से सिद्ध कर दिया है कि बाल-साहित्य को केवल परियों की कहानियों तक सीमित न रहकर समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।
साहित्यिक भाषा की प्रांजल तरलता, सुरुचिपूर्ण शब्द-चयन और भावों का विलक्षण सौष्ठव ‘युवान’ को एक अत्यंत मूल्यवान और संग्रहणीय कृति बनाता है। जैसा कि पुस्तक के संयोजक राजेश पाठक ‘प्रवीण’ जी ने पूर्णतः सटीक लिखा है, यदि शिक्षक-शिक्षिकाएं और अभिभावक इन प्रेरक कविताओं से विद्यार्थियों को परिचित कराएं, तो यह बाल-चेतना के उन्नयन और राष्ट्र-निर्माण में एक महती पुण्य का कार्य होगा। श्रीमती अनुराधा गर्ग ‘दीप्ति’ जी का यह सुप्रयास बालकों की नैसर्गिक जिज्ञासाओं का सम्यक समाधान भी करता है और उनके अंतर्मन को राष्ट्र-प्रेम की पावन ज्योति से आलोकित भी करता है। बाल और किशोर मनोविज्ञान को समृद्ध करती यह कृति हिंदी बाल-साहित्य की एक अमूल्य धरोहर सिद्ध होगी, जो हर संवेदनशील पाठक और शिक्षार्थी के अंतस को गहराई से छुएगी।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





