श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कहानी – “स्वर्ग के लिए जुगाड़”।)  

☆ कथा कहानी # 158 ☆ “स्वर्ग के लिए जुगाड़” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

बुआ चार घंटे पूजा करतीं हैं, 70 पार हो गई हैं। भगवान से अच्छी दोस्ती है तो पूजा के दौरान दो-तीन घंटे लड़के बहू की निंदा भगवान से कर लेतीं हैं, जीवन भर ससुराल वालों से चिढ़ती रहीं, मास्टरनी रहीं थीं तो पैसे का घमंड ब्याज के साथ मिला था।

चार दिन से नहाया धोया नहीं था तो भगवान को भोग भी नहीं लगा था, चार दिन भगवान भूखे थे, बुआ के चार दिन के बुखार ने तोड़ दिया था, जब ठीक हुईं तो नहा धोकर भगवान से बोलीं – मेरे सिवाय तुमको खाना देने वाला कौन है, तुम चार दिन से निर्जला बैठे हो, मुझे दुख है, पर इस बात की खुशी भी है कि इस बार तुमने मेरे कारण चार दिन का उपवास कर लिया है तो तुम्हारा स्वर्ग में जाना तय है और मुझे भी साथ ले चलोगे तो अगली बार से भूखा नहीं रहना पड़ेगा।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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Shyam Khaparde
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भाई क्या गजब की अभिव्यक्ति है, सटीक व्यंग है