श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३७ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
भड़पुरा से झाँसीघाट: 17 अक्टूबर 2018
रात्रि विश्राम हमने भडपुरा स्थित कुटी में किया। कुटी की देखभाल एक बूढ़ी माँ माँग-ताँग कर करती है। वह आश्रम किसी बड़े किसान ने इस शर्त पर बनवा दिया था कि परिक्रमा करने वालों को भोजन मिलना चाहिए। बूढ़ी माँ वैरागी हैं, उसका बेटा नवरात्रि में दुर्गा जी की मूर्ति का पंडा बना था। झाँकी के पंडाल में रहता था। सुबह नहाने धोने भर को घर आता था। उसे ख़बर लगी तो वह देखने आया। बातचीत करके संतुष्ट हो कर चला गया। उसकी बीबी को छः लोगों के लिए रोटी सब्ज़ी बनाना था तो उसका मूड ख़राब होने से वातावरण ठीक नहीं रहा। हमने खाना बनाने में मदद की पेशकश की, जिसे निष्ठुरता से ठुकरा दिया गया। उसका 12 साल का लड़का बहुत बातूनी था। उसी के मार्फ़त बातचीत चलती रही। अंत में अपनी घरेलू चार रोटियों के बराबर एक टिक्कड नमक मिर्च में बनी आलू की सब्ज़ी के साथ एक गोल थाली में आए जैसे भीम अपनी गदा के साथ रथ में डोलता चला आ रहा हो। किसी ने दो किसी ने तीन और किसी ने चार खाए। सच हैं स्वाद भोजन में नहीं भूख में होता है। नींद न जाने टूटी खाट, भूख न जाने बासी भात। यहाँ तो न खाट थी और न भात परंतु नर्मदा किनारा था। बाहर निकल कर नर्मदा की ओर देखा वह शांत होकर हँसिया आकार चाँद की रोशनी में निंद्रामग्न थी। लहरों की झिलमिल जो दिन में नज़र आती है वह नदारत थी।
वर्षो बाद जमीन पर और कुछ लोगों ने शायद जीवन में पहली बार गद्दे के बिना सोने का प्रयास शुरू हुआ। बिस्तर तीन तरफ़ से खुली दलहान में लगाए गए। सबसे पहले तो मच्छरों का हमला हुआ लड़के ने कचरा जलाकर धुआँ करके उनसे छुटकारा दिलाया। उसके बाद मुंशीलाल जी के पास एक कुतिया आकर सो गई। उसे डंडे से भगाया। सोने की कोशिश की तो बरगद के पेड़ पर तेज़ हलचल होने लगी। जैसे भूतों का डेरा हो। उठकर देखा तो निशाचार चमगादड़ का एक झुंड बरगद के फलों को खा रहा था। फलों के टुकड़े पट-पट नीचे गिर रहे थे। एकाध घंटा चमगादड़ देखते रहे। फिर सोने की कोशिश की तो सिर के पास कुछ आवाज़ आई। हाथ फेरा तो एक मेंढक पकड़ में आया उसे दूर फेंक दिया। सब डर गए कि मेंढक की खोज में साँप वहाँ आ सकता है। हमने सोचा छोड़ो यार शंकर भगवान गले में डाले रहते हैं। अब आएगा सो आएगा। 90% सांप ज़हरीले नहीं होते हैं और फिर जैसे हम सांप से डरते हैं उसी प्रकार वे भी आदमी से डरते हैं। अरुण दनायक जी अपनी डायरी लिखने बैठ गए। लोग पहले पानी पीते फिर पेशाब जाते रात गुज़रने की राह देखते रहे। देर रात एक झपकी लगी और सवेरा हो गया। कहीं कोई पाखाना नहीं था। खुले में हल्के हुए। कुटी की गाय का एक-एक गिलास कच्चा दूध पिया। उनको तीन सौ रुपए दान स्वरूप दिए और चल पड़े।
हम गाँव वालों से बैलों के बारे में पूछते रहे कि एक ज़माने में खेतों में, सड़कों पर और गौधुलि बेला में चर कर लौटते हुई रेहड में गायों के साथ मस्ती करते बैल और उछलते बछड़े दिखते थे, वे अब नदारत हैं। जो जानकारी मिली वह भयावह है। जब से ट्रैक्टर ट्रॉली, कल्टिवेटर, रोटावेटा, आए हैं तब से हल-बखर और बैलगाड़ी के साथ बैलों की भी विदाई हो गई लगती है। यहाँ तक तो ठीक था कि यंत्रीकरण ने मानवीय श्रम की जगह मशीनीकरण से कृषि काम आसान और उसकी गति तेज़ हो गई।
ग्रामीण लोगों से जब पूछा कि बैलों की ग़ैर-मौजूदगी में गायों के ग्यावन की क्या व्यवस्था है। ख़ुलासे चौंकाने वाले थे। गाय बैल का नैसर्गिक संसर्ग समाप्त हो गया है। भिटौनी में पशु चिकित्सालय में ख़बर देने पर वहाँ से कृत्रिम गर्भधारण करने कर्मचारी आते हैं। कृत्रिम गर्भाधान से गाय की देशी नस्ल ख़त्म हो रही है क्योंकि नर्मदा किनारे के गाँवों में बैल बूचडखानों की भेंट चढ़ चुके हैं। सरकार हरियाणा से विदेशी नस्ल का बीज लाकर गर्भाधान करवाती है। इस व्यवस्था से गाय के दूध की प्राकृतिक गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है। उनके और भैंस के दूध में कोई अंतर नहीं रहा है। गाय का दूध अब हल्का पीला नहीं होता। हमने जब भडपुरा में गाय का ताज़ा दूध पिया था वह पूरी तरह सफ़ेद था। सबसे पहले तो गाय से प्राकृतिक चारा छीनकर उन्हें खली-भूसा खिलाने लगे। उनसे खुली हवा में विचरण के साथ अब बैलों से प्राकृतिक मिलन भी छुड़ा लिया। एक मशीनी क्रिया से अनुत्तेजित अवस्था में लम्बी सीरिंज से गर्भाधान ने पशुओं से उत्साह उमंग उछलना कूदना भी छुड़ा लिया है। ऊपर से इंजेक्शन लगाकर दूध दुहने लगे। इस पूरी यात्रा में नर्मदा किनारे सिर्फ़ एक जगह गायों को बैल दिखा उनके चेहरे चमक उठे वे चारा चरना छोड़कर एकटक बैल को देखे जा रहीं थीं। भूख, नींद, आराम और प्रजनन पशुओं और मनुष्य की एकसी अनिवार्यता हैं इसीलिए मनुष्य को सामाजिक पशु माना जाता है। वह अद्भुत दृश्य तुरंत मोबाइल में क़ैद कर लिया।
हम पाँचों फिर चले और बीहड डांगर, नाले पार करते भीकमपुर पहुँचे। ऊँची घास से रास्ता नहीं सूझता था। एक भी गलत कदम कम से कम बीस फुट नींचे गिरा सकता था। और हुआ भी यही एक जगह रास्ते की खोज में दनायक जी गिरते गिरते बचे वापिस मुड उपर से मुंशीलाल पाटकार ने आवाज लगाई इधर आईये रास्ता यहाँ से है। अरुण दनायक ने सुरेश पटवा को मन ही मन कुढ़ते हुए ख़ूब गालियों से नवाज़ा कि यार इनके कहने में कहाँ फँस गए। अब कभी नहीं आएँगे। थोड़ा आराम करने के बाद बोले यार अगली यात्रा फ़रवरी में ही करेंगे।
भडपुरा के हनुमान आश्रम का तोता हमारे पहुँचते ही अपने सिर पर आकर बैठ गया। उतरने से साफ़ इंकार करता रहा। चिकनी चाँद उसे भा गई। तोता महाराज वीडियो के शौक़ीन थे। जिस देश में गंगा बहती है का “है आग हमारे सीने मे हम आग से खेला करते हैं “ गीत पर ख़ूब नाचा ससुरा। विडियो बंद करो तो चोंच मारता था। फिर लगाया “चल उड़ जा रे पंछी ये देश हुआ बेगाना” सुनकर मस्त हो गए तोता राम। काफ़ी मान-मनुअ्अल के बाद अरूण दनायक भाई के सिर को भी उपकृत किया। एक और साथी जगमोहन भाई की ज़िद पर महाराज वहाँ पहुँचे लेकिन टैक्स के रूप में चोंच मारकर ख़ून निकाल दिया। उसे काजू दिए तो उसने कुतर कर छोड़ दिए। तोता खुले में रहता था उड़ता नहीं था। पता चला कि उसे गाँजा पीसकर खिलाया गया है इसलिए उसे तलफ की आदत हो है इसलिए वह बाबाओं के पास रहता है।
धरती कछार गाँव पड़ा, वहाँ के स्कूल में दनायक जी ने बच्चों से मुलाकात में गांधी चर्चा की जिसने हमें आन्नदित किया कि गांधी जी की पहुँच समय और भौगोलिक स्थितियों की ग़ुलाम नहीं है। आंगनवाडी केन्द्र की ममता चढार की कर्तव्य परायणता से प्रफुल्लित हुए। धरती कछार से गोपाल बर्मन को कोलिता दादा का बैग रखने को साथ ले लिया। उसने बातों-बातों में बताया कि लोग भाजपा से नाराज़ हैं। ग्रामीण समाज में भी लड़कियाँ खुल कर बिना झिझक सामने आने लगीं हैं और शादियों के लिए लड़कों को निरस्त भी करने लगीं हैं। वहीं दूसरी ओर उनका यौन व्यवहार भी तेज़ी से बदल रहा है। बाय फ़्रेंड-गर्ल फ़्रेंड का कल्चर खेतों में या मेड पर विडीओ, वट्सएप, फ़ेस्बुक के माध्यम से फैल रहा है। ये मोबाइल क्रांति का असर है। अब लड़कियाँ को सेनेटरी पैड और विटामिन की गोलियाँ आंगनवाड़ी से प्रदान की जाती हैं।
आश्रम से चले तो आधा घण्टे में एक बड़े नाले से साबका पड़ा। सौ फ़ुट चढ़ाई चढ़ कर फिर नीचे उतर नाला पार किया, फिर चढ़ाई चढ़कर ऊपर पहुँचे तो पहाड़ी के सामने एक और नाला दिखा। भूगोल का दिमाग़ लगाया तो देखा कि एक ही नाला सांप की कुंडली की तरह चारों तरफ़ घुमा हुआ है। चार-पाँच बार पहाड़ियाँ चढ़-उतर कर नाला पार करना होगा लोगों का दम निकल जाएगा। निर्णय लिया कि दाहिनी तरफ़ नर्मदा में उतर जाएँ वहाँ से किनारे-किनारे झाँसीघाट की तरफ़ बढ़ेंगे। आगे बढ़े तो एक सौ फ़ुट ऊँची खाई का मुँह नाले में खुल रहा था। वह नाला नर्मदा में मिल रहा था। उतरने को कहीं कोई रास्ता नहीं था। हम (सुरेश पटवा) और कोलिता दादा आगे थे बाक़ी तीन पीछे भटक गए। कोलिता दादा को पीछे करके हम बैठ कर सौ फ़ुट खाई में स्कीइंग करके नाले के किनारे से नर्मदा की गोद में पहुँच गए। उन्होंने कोलिता दादा को भी इसी तरह स्कीइंग करके उतारा। तब तक बाक़ी लोग ऊपर आ गए थे वे चिल्ला रहे थे कि रास्ता कहाँ है। उनको तरीक़ा बताया तो वे आगे बढ़ने को तैयार न थे। लेकिन कोई रास्ता था भी नहीं। आधे घंटे की मशक़्क़त के बाद सब लोग नीचे आ गए। वहाँ से विक्रमपुर का रेल पुल अब स्पस्ट दिख रहा था और झाँसीघाट का सड़क पुल धुंधला सा नज़र आ रहा था।
ग्वारीघाट से लगभग पचास किमी दूर जबलपुर और नरसिंघपुर की सीमा पर स्थित भीकमपुर गाँव है। नर्मदा दाहिनी तट की ओर शान्त सी बहती है उधर बाँए तट से सनेर नदी अथाह जलराशि लिये आगे बढती है। ऐसा लगता है नर्मदा बडी विनम्रता से सनेर की भेंट की हुई जलराशि वैसे ही स्वीकारती है जैसे भिषुणी भिक्षा ग्रहण करती है और फिर अगले घाट की ओर चली जाती है। सनेर सदानीरा है,इसका जल स्वच्छ है और इसे लोग सनीर भी कहते हैं। सनेर नदी का उदगम सतपुडा के पहाड से होता है। इसका उदगम स्थल लखनादौन जिला सिवनी स्थित नागटोरिया रय्यत है। यह बारहमासी नदी धनककडी, नागन देवरी, दरगडा, सूखाभारत आदि गावों से गुजरते हुये संगम स्थल भीकमपुर पहुँचती है। कोलूघाट तट पर सिवनी जिले के आदिवासियों का मेला भरता है तो संगम तट भीकमपुर में जबलपुर व नरसिंहपुर जिले के लोग शिवरात्रि आदि पर्वो पर एकत्रित होते हैं।
नर्मदा परिक्रमा का पहला खंड योजना अनुसार पूरा होने को आ रहा था। सुबह से खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के भरोसे चले आ रहे थे। मंज़िल सामने देखकर भूखी देहों में अजीब सा शक्ति संचार होने लगा। नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लिया फिर दो घंटे में विक्रमपुर के रेल्वे पुलों के नीचे से निकल झाँसीघाट पहुँच गए। नहाया धोया नर्मदा जी को प्रणाम करके झोतेश्वर धर्मशाला पहुँचे।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





