श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “ये वसुंधरा हरी-भरी…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २२६ ☆
☆ ये वसुंधरा हरी-भरी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
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ये वसुंधरा हरी-भरी, कितनी हसीन है।
यह जन्म भूमि है मेरी, पावन जमीन है।।
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देवों की जन्म भूमि यह,शत्-शत् करें नमन।
माँ भारती की स्तुति पर, हमको यकीन है।।
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शुभ संस्कार सभ्यता है, यह संस्कृति महान।
राम-कृष्ण-बुद्ध की धरा, भारत कुलीन है।।
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हिमालय हमारा रक्षक,शिव-शक्ति की कृपा।*
माँ के चरण पखारता, सागर प्रवीन है।
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मौसम बिखेरे रँग यहाँ, नाचे मन मलंग।
उमंगें हरेक पर्व में, हर भक्त लीन है।।
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है देश यह सपेरों का, किसी ने यह कहा।
बदला है देखिए अभी, कितना नवीन है।।
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निर्माण का संकल्प ले, बढ़ते कदम रहे।
प्रगतिशील है हरेक पथ, उन्नत मशीन है।।
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दुश्मन पड़ोसी में बसे, हैं हर समय लड़े।
आतंकी पाक को अभी, लड़ाता चीन है।।
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ब्रम्होस को हमने चला, जग को दिखा दिया।
हिन्दुस्ताँ बदल चुका है, शत्रु-दहन-सीन है।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
23/6/26
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