श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४७ ☆ श्री सुरेश पटवा
8.गढ़चिरौली यात्रा
नक्सलियों के मायके में
कैलाश मेश्राम की स्टेट बैंक के भोपाल स्थित स्थानीय कार्यालय में पदस्थी के दौरान मेरी उनसे हुई मुलाक़ात मित्रता में बदल गई। कुछ समय बाद कैलाश की पदोन्नति सहायक महाप्रबंधक की श्रेणी में होने के साथ उनका तबादला अंकेक्षण (Audit) विभाग में हो गया। दोनों घूमने-फिरने के शौक़ीन थे इसलिए कैलाश जहाँ भी आडिट करने जाते वहाँ मुझे घूमने-फिरने बुलाते। अनेकों बार कार्यक्रम बनता परंतु किन्ही कारणों से बिगड़ जाता। नवम्बर 2020 के पहले हफ़्ते में कैलाश को आडिट हेतु पंद्रह दिन गढ़चिरौली में रहना था। उन्होंने मुझे गढ़चिरौली भ्रमण हेतु आमंत्रित किया।
मैंने गढ़चिरौली के वनीय वैभव, गोंडी-तेलुगु-मराठी लोगों की मिलीजुली जीवंत संस्कृति, बाबा आमटे के पुत्र प्रकाश आमटे एवं उनकी पत्नी मंदाकिनी आमटे द्वारा पलकोटा, वेडिया और इंद्रावती नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थापित लोक बिरादरी सेवा आश्रम, अल्लापल्ली के प्रसिद्ध सागौन वन क्षेत्र और मार्क्सवादी नक्सल आतंकवाद के मायके के नाम से मशहूर कमलापुर वनक्षेत्र के बारे में सुन रखा था। गढ़चिरौली भ्रमण की बड़ी पुरानी इच्छा कुलबुला उठी। नौ नवम्बर 2020 को कार के टैंक में सिरे तक पेट्रोल भराकर सुबह छः बजे भोपाल से गढ़चिरौली के लिए निकल लिए।
ठंडी हवा के झोंकों से बतियाते जैसे ही अब्दुल्लागंज पार किया विंध्याचल पर्वत के सुहाने दृश्य और ताज़ी हवा के झोंकों ने मन प्रसन्न कर दिया परंतु वह प्रसन्नता अधिक देर नहीं टिकी रही क्योंकि आगे आठ-दस किलोमीटर लम्बा धूल भरा ट्रैफ़िक जाम उसका स्वागत करने को तैयार था। फ़र्स्ट ग़ैर में घिसटते-घिसटते एक घंटे का रास्ता तीन घंटों में पूरा कर इटारसी पार करके केसला और पथरौटा से गुज़र कर शाहपुर पहुँचने ही वाले थे कि सतपुड़ा की लुभावनी हरीतिमा को छूकर आए हवा के झोंकों ने उसकी तबियत खुश कर दी। पता चला कि बैतूल ज़िला लग चुका है। हरे भरे पहाड़ों से घिरे एक ढ़ाबे पर मुँह-हाथ धोकर घर से लाया टिफ़िन ख़ाली करके पेट में भरा और वहाँ पड़ी खटिया पर पटिया को सिरहाना बनाकर लेट गए। लेटते ही दिमाग़ में बैतूल ज़िले की भौगोलिक संरचना और बसावट के विचार तरंगित होने लगे।
बैतूल
बैतूल समुद्र तल से 2,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित वनों और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है, जो पूरे वर्ष यहाँ जलवायु को सुखद व मनमोहक बनाता है। यह सतपुड़ा रेंज के मैदानी इलाकों में स्थित होने से धूल भरे शहर के जीवन से एक सुखद, शांतिपूर्ण भ्रमण हेतु उपयुक्त है। बैतूल ज़िला मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 180 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा, नागपुर, खंडवा, होशंगाबाद, हरदा जिलों की गोद में सतपुड़ा पर्वत के दक्षिणी पठार से नागपुर की तरफ़ फैले मैदान तक फैला हुआ है।
इतिहास की किताबों में यह क्षेत्र वाकाटक वंश, राष्ट्रकूट, सतवाहन, मुगल, गोंड, भोंसले, ब्रिटिश के अधीन रहा बताया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, बैतूल क्षेत्र बदनूर का इलाक़ा के नाम से जाना जाता था। इस स्थान और ज़िले का वर्तमान नाम इसके दक्षिण में लगभग 5 किमी की दूरी पर बसे एक छोटे से शहर बैतूल-बाजार के कारण पड़ा है। लेकिन बैतूल शब्द कहाँ से आया? बैतूल का शाब्दिक अर्थ “बिना बाढ़” का है। इस क्षेत्र के चारों तरफ़ कपास की खेती बहुतायत से होती थी। किसानों ने यहाँ भी कपास लगाना शुरू किया लेकिन यहाँ की ज़मीन पथरीली और जलवायु नम से होने से यहाँ कपास का पौधा बढ़ता (तूल) नहीं था। जैसे “बातों को तूल न देना” याने न बढ़ाना एक मुहावरा है। वैसे ही कपास के पौधों का न बढ़ना बैतूल हो गया।
वहाँ आदिवासियों की छोटी हाट लगती थी जिसे बैतूल बाज़ार पुकारा जाने लगा। उन्नीसवी सदी में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ फ़तह करके लौटते वक्त चौथ-सरदेशमुखी वसूली हेतु बिरार का इलाक़ा शिवाजी के वंशज राघोजी भोसले को सौंपा गया था। मराठा साम्राज्य विखंडन होने पर अंग्रेजों ने बैतूल को राजस्व तालुक़ा बना दिया। 1822 में जिला मुख्यालय को वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया, तभी से स्थानीय बोली में बदनूर इलाक़ा बैतूल के नाम से जाना जाने लगा।
बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में मराठों ने मंदिरों और पूजा स्थलों के रूप में अपने अमिट निशान छोड़ हैं। कई हिंदू और जैन मंदिर इस क्षेत्र के आसपास उसी समय के बने हैं। एक पहाड़ी की चोटी पर बना, मुक्तागिरी जैन मंदिर जैनियों के लिए यह एक पवित्र स्थान है। सबसे प्रसिद्ध मंदिर शहर के केंद्र से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बालाजीपुरम मंदिर है। 15 एकड़ में फैला, मंदिर 2001 में बनाया गया एक लंबा ढांचा और वास्तुकला में आधुनिक है। बसंत पंचमी के त्योहार पर हर साल मेला भरता है। कुकरुखमाला, सोना घाटी, मुलताई और शापना जलाशय आसपास के अन्य पर्यटन स्थल हैं।
अमरावती जिले में हाटीघाट और चिकलदा पहाड़ियों के किनारे ताप्ती की सहायक नदियाँ मोरंड और गंजल दक्षिणी-पश्चिमी सीमा निर्धारित करती हैं। मोरंड नदी और ढोढरा मोहर रेलवे स्टेशन के आगे से तवा नदी ज़िले की उत्तरी सीमा बनाती हैं। पूर्वी सीमा छोटी नदियों और पहाड़ियों से गुलज़ार हैं। जिनमें से खुरपुरा और रोटिया नाला बरसात के दिनों में बादलों से ढँके अनेकों प्रपातों का निर्माण करते हैं। गोंड, कोरकु, भरिया, कुर्मी, कुनबी, मेहरा और चमार इस ज़िले के मुख्य निवासी हैं। क़रीब आधा घंटा आराम के बाद पुनः यात्रा शुरू करके शाम को पाँच बजे के आसपास नागपुर शहर के मकान दिखने लगे।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





