श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५७ ☆

✍ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

हिस्से में  खेत  घर न ही खलिहान चाहिए

ख़िदमत को माँ पिता मेरे भगवान चाहिए

 *

रब रूठ जाए मुझसे तो परवाह कब मुझे

माँ जैसा सिर्फ़ एक निगहबान चाहिए

 *

सर जिसके सामने न  उठा उम्र भर सकूँ

ऐसे बशर का कोई न अहसान चाहिए

 *

हालात हों बुरे तो उसूलों पे ही रहूँ

क़ायम मुझे पहाड़ सा ईमान चाहिए

 *

हर रंग के गुलों से महकता जो  हर समय

दुनिया बने इक एक ऐसा ही गुलदान चाहिए

 *

मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों

इंसान को  हयात पै आसान चाहिए

 *

गद्दार है जो देश के माफिक न सोचते

हमको वतन परस्त ही इंसान चाहिए

 *

क्या अगले पल हो इसका भरोसा नहीं है पर

सौ वर्ष का बशर को है सामान चाहिए

 *

ग़ैरों का ग़मगुसार खुदाया मैं हो सकूँ

मालिक मेरे अरुण को ये इमकान चाहिए

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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