स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५५ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ६ ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

☆

नौ चर दस तक गिनत गय, परै चरन लपटाय ।

नौ पर खे आये सरन, बरन न पूँछो जाय ||

*

मिलत मिलत मन मिलत है, लगत लगत लग जात।

दघि मिसरी कितनउ मिलै, पै मन नई अघात ||

*

माँग कुँआरी लै गई, मान-सरोवर गैल ।

पाप गलाये जुगत में, सुदर गये बिगरैल ||

*

मंजु मधुर फिर मद भरे, भरे भरे अधरान ।

छू अत ही छिद जात मन, खैंचे बिना कमान ॥

*

मुसुक मुलक जाहर भयी, जैसे लछमन रेख ।

बिजुरी घाँईं गिर परै, बचै न बाँमन-सेव ॥

*

माखन घाँईं गात है, मिसरी सी मुस्कान |

बोली बानी सहद-सी, कलपतरू सो धियान ||

*

मुख दरपन, मुखमंजरी, मुख मोती दरसाय ।

मुख में मौआ गुरीरो, मुख से कओ न जाय ||

*

जानें कैंसो लग रओ, हो रइ देह सकाम ।

पवन पलागन कै गई, लयें पिया कौ नाम ॥

*

जो बौड़ी फूलन लगी, लगी भौंर की भीर ।

रितु राजा ने आय कें, बदल दई तासीर ॥

*

जे आयॆ बॆ कढ़ गये, भये पसीना-पूर 1

दोउ ग्रहन के बीच में, धरती धारें घूर ॥

*

देखें सें ठंडक मिलै, मिलबे पे गरमाय ।

बिना मिले सूखो परै, याद करै सरसाय ॥

*

मनरथ जब समरथ भओ, दसरथ पाओ नाम ।

अमर अजर मन अजुध्या, जस जोती श्रीराम ||

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Dr Bhavna Shukla
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सादर नमन