डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “क्यों ?…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ९  ?

? कविता – क्यों ?… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

तुम जो इतने पास रहे हो,

मैं धड़कन तुम साँस रहे हो।

 *

जीवन यह अँधियारा मेरा,

क्यों आलोक तलाश रहे हो।

 *

तुम जीवन की पुष्प-वाटिका,

गेंदा और पलाश रहे हो।

 *

मैं तो इक उजड़ा गुलशन हूँ,

क्यों माली बन फाँस रहे हो।

 *

मैं तो पत्रहीन तरु जैसा,

पाल घरौंदा आस रहे हो।

 *

मेरे दुख, मेरी पीड़ा का,

क्यों करते परिहास रहे हो।

 *

मेरे दरम्याँ पतझड़ हरदम

तुम बहार मधुमास रहे हो

 *

मैं निराश हूँ, मैं उदास हूँ,

फिर भी मन में वास रहे हो।

 *

तुम हो आशावादी इतने,

तम में दीप्ति तलाश रहे हो।

 *

ली न कभी ख़बर, न पूछा

क्यों ‘राजेश’ उदास रहे हो ?

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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