श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हम कहां जा रहे हैं…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४६ ☆
☆ # “हम कहां जा रहे हैं…” # ☆
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यह कैसा विकास देश में ला रहे हैं
सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं
यहां छाया घना कोहरा है
यहां इंसान शतरंज का मोहरा है
कदम कदम पर फिरते बहरूपिये है
यहां हर व्यक्ति का चरित्र दोहरा है
वेश बदलकर हम क्या पा रहे हैं
सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं
यह कड़ाके की ठंड जलते हुए अलाव
उजड़ती बस्तियां जलते हुए गांव
निष्कासित बेघर जिनके लहूलुहान हैं पांव
भटक रहे हैं ढूंढते अपने सर पर छांव
रसूखदार बड़े-बड़े दाव लगाते जा रहे हैं
सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं
निर्बल लगा रहे हैं न्याय की गुहार
सब गूंगे बहरे हैं कौन सुनेगा पुकार
उनके पेट और पीठ पर पड़ रही है मार
दया की जगह उन्हें मिल रही दुत्कार
अंदर ही अंदर आक्रोश में सुलगते जा रहे हैं
सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं
एक प्रताड़ित बेटी मांग रही है न्याय की भीख
मीडिया से कह रही है मेरी यातनाएं लिख
दुर्दांत अपराधी को मिलनी चाहिए सिख
वरना दबके रह जाएगी न्यायालय में उसकी चीख
बेल पर छूट कर यह जालिम न्याय का मजाक उड़ाते जा रहे हैं
सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं
यह कैसा विकास देश में ला रहे हैं
सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं /
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© श्याम खापर्डे
फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो 9425592588
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