श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३४ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
तिलवारा घाट से भेड़ाघाट: 14 अक्टूबर 2018…
रामायण काल में राम को केवट ने नदी पार कराई थी। निषाद राज उन्हें दूर तक छोड़ने गए थे उनसे उनके वनराज्य में वनवास बिताने का आग्रह करते रहे परंतु राम न रुके। महाभारत काल में वे धीवर कहलाने लगे। महाभारत कथा की जड़ में एक धीवर कन्या सत्यवती ही है। उसके लिए कौरव-पांडव से थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। चद्रवंशी राजाओं में एक प्रतापी राजा हुए थे शान्तनु, उनका राज्य गंगा के दोनों किनारों पर फैला हुआ था। वे अक्सर गंगा किनारे घूमने जाया करते थे। गंगा नदी देवी रूप में प्रकट होकर उनसे मिलीं तो वे उन पर आसक्त हो गए। विवाह का निवेदन किया जिसे गंगा ने नकार दिया लेकिन दैहिक सम्बंध आज की सहनिवासी (Living Together) तर्ज़ पर स्थापित हो गए। गंगा ने शर्त रखी कि वह जो कुछ भी करेगी शान्तनु कोई प्रश्न नहीं करेंगे। यदि सवाल किया तो वे उन्हें छोड़कर चली जाएँगी। उनके सात पुत्र हुए जिन्हें पैदा होते ही गंगा ने नदी को अर्पित कर दिए उन सात पुत्रों की कहानी सप्त ऋषियों के उद्धार से जुड़ी है। जब आठवाँ पुत्र हुआ तो शान्तनु से नहीं रहा गया। उन्होंने गंगा को टोक दिया। गंगा ने वह पुत्र शान्तनु को दे दिया और हमेशा के लिए चलीं गईं। उस पुत्र का नाम देवव्रत रखा गया। वे बाद में भीष्म पितामह कहलाए।
एक मत्स्यगंधा धीवर कन्या सत्यवती अपने पिता के साथ यमुना में नाव खेती थी। एक दिन उसके पिता नदी किनारे नहीं थे वह अकेली नाव पर बैठी थी। तभी पाराशर ऋषि आए उन्होंने उससे गंगा पार उतारने का निवेदन किया। पिता जी को आने में विलम्ब हो रहा था अतः सत्यवती ख़ुद नाव खे कर पाराशर ऋषि को गंगा में उतर गई। गंगा का पाठ चौड़ा था। सत्यवती का उत्तरीय उसके वक्ष से उड़-उड़ जा रहा था उसने उत्तरीय को क़स कर कमर में बाँध लिया। अब उसके वक्ष पर एक कंचुकी भर थी। वह पसीने से तरबतर नाव खेते जा रही थी। पसीने से उसकी कंचुकी का अस्तित्व समाप्त सा हो देह का उभार निखर आया, उसकी बाहों की गोलाई और वक्ष की कसावट पर पाराशर ऋषि की निगाह पड़ी। उसके गीले बदन से मत्स्य गन्ध की मादकता पाराशर ऋषि की नथुनों में समायी तो वे कामाशक्त हो गए। सत्यवती भी ऋतुश्राव से निवृत हुई थी। नाव में समागम हुआ जिससे वेद व्यास जी का जन्म हुआ, जिन्होंने महाभारत लिखी थी। इस वास्तविक घटना को तर्क-वितर्क का जामा कथावाचक पहनाते रहते हैं कि सत्यवती की देह से आती दुर्गंध से निजात पाने के लोभवश वह तैयार हुई थी। पाराशर ऋषि और सत्यवती मिलन से वेद व्यास का जन्म हुआ था। पाराशर ऋषि सत्यवती को छोड़कर सन्यासी की राह चले गए।
राजा शान्तनु के जीवन से गंगा जा चुकी थी वे नदी किनारे उदास घूमते थे। उनकी निगाह सत्यवती पर पड़ी और सत्यवती ने उनको देखा। प्रेम अंकुर फूटते देर न लगी। शान्तनु ने उसके पिता से विवाह का प्रस्ताव रखा तब तक गंगापुत्र देवव्रत को अगला राजा बनाना तय हो चुका था। सत्यवती के पिता ने विवाह के लिए शर्त रखी कि सत्यवती की संतान ही अगला राजा बनेगी, जिसे शान्तनु ने मान लिया। फिर सवाल उठा कि देवव्रत की संतान भी राजा का दावा कर सकती है। शान्तनु चुप रह गए। पिता को उदास देखकर देवव्रत ने प्रतिज्ञा की, कि वह आजीवन अविवाहित रहकर सिंहासन की सेवा करेंगे। उस भीष्म प्रतिज्ञा से वे भीष्म कहलाए। शान्तनु और सत्यवती से एक पुत्र विचित्रवीर्य नाम का हुआ। उसके विवाह के लिए काशी राजा की तीन कन्याओं अम्बे, अम्बा और अम्बालिका को भीष्म भरे स्वयंवर से उठा लाए। अम्बे का प्रेम प्रसंग किसी अन्य राजकुमार से था तो उसे वापस जाने दिया। उसे प्रेमी राजकुमार ने नकार दिया तो वह शिखंडी बनी। अम्बा और अम्बालिका से संतान पैदा नहीं हो रही थी। सत्यवती ने पाराशर ऋषि से उत्पन्न अपने पुत्र वेद व्यास से नियोग द्वारा अम्बा से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पाण्डु पैदा करवाए और एक दासी से विदुर पैदा हुए। यहीं महाभारत युद्ध की नीव पड़ गई। धीवर कन्या सत्यवती कौरव-पांडव की राजमाता थीं। पुराणों में आर्य-अनार्य सम्मिलन की अनेकों घटनाओं में से यह एक घटना है। यही हमारा पौराणिक इतिहास है। धीवर आदिवासी कन्या थी। आदिवासी प्रारम्भ से भारत के निवासी रहे थे आर्यों ने उनको अपने में मिलाने के लिए बेटी व्यवहार का तरीक़ा अपनाया था।
राजा दुष्यंत की कहानी में कालिदास ने शकुंतला की अँगूठी ढीमर द्वारा पकड़ी गई मछली के पेट में मिली बताई थी। उस समय तक धीवर नाम बदलकर ढीमर हो चुका था। मध्ययुग में वही ढीमर बड़ी-बड़ी नाव गंगा में खेने लगे थे अतः वे मल्लाह कहलाने लगे। अंग्रेज़ों के आने के बाद बंगाल में डोली उठाने के लिए और लुटेरों के क़हर से निपटने के लिए वे मेहनतकश लोग कहार कहलाने लगे। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ों ने आसाम में चाय के बाग़ लगाए तब कलकत्ता से उन मल्लाहों को आसाम ले गए वहाँ मल्लाहों ने एक प्रचलित ब्राह्मण उपनाम बरुआ अपना लिया क्योंकि उनको लाने वाला एक बरुआ ब्राह्मण ही था और अंग्रेज़ उन्हें बरुआ कहकर बुलाते थे। अतः निषाद समाज बरौआ कहलाने लगा। उन्ही बरुआ को त्रिपुरा में बर्मन बुलाते थे। जैसे सचिन देव बर्मन और उनके पुत्र आर.डी.बर्मन। आज़ादी के बाद बरौआ शब्द बर्मन में बदल गया। नर्मदा किनारे के सभी नाविक अब बर्मन कहलाना पसंद करते हैं।
इस समाज को कहीं आदिवासी माना जाता है, कहीं हरिजन और कहीं पिछड़ा वर्ग। इनके बच्चे बचपन से ही शराब, जुआँ और ग़लत लतों में पड़कर चालीस साल की उम्र तक बुढ़ा जाते हैं। शाम होते ही कच्ची शराब की गन्ध, बिड़ी के धुए के साथ, भूनी मछली की महक इनके गाँवों के आसपास फैलने लगती है। राजनीतिज्ञों के लिए इस समाज के लड़के प्रचार-प्रसार के लिए कच्चा माल हैं। सभी राजनैतिक दल मंच सजाने, भीड़ जुटाने, दौड़ भाग में इनका उपयोग ख़ूब खुलकर करते हैं। इनके जवान बच्चे 2,000-3,000 रुपए मासिक पर मिल जाते हैं। नेताओं की गाड़ियों में भरकर बाहुबली प्रदर्शन में इनका उपयोग किया जाता है। परिक्रमा के दौरान ये लोग खेतों को गोडकर रबी की फ़सल के लिए खेतों को तैयार करते नज़र आए। कुछ युवक ग़ैरक़ानूनी रूप से रेत माफ़िया के लिए नावों में रेत भरते नज़र आए। राजनीतिज्ञ, अफ़सर, पुलिस और पत्रकारों का एक नेक्सस याने गिरोह बन गया है जो बड़ी बेरहमी से नर्मदा के पेट से रेत निकाल कर उसके प्राकृतिक स्वरूप को बिगाड़ने में लगा है। बर्मन समाज भी उनके विरुद्ध आवाज़ नहीं उठा सकता क्योंकि वे ख़ुद सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमाए खेती कर रहे हैं। यदि वे आवाज़ उठाएँगे तो अगले दिन ज़मीन से बेदख़ल। जिन लोगों पर भौगोलिक वातावरण को अक्षुण बनाए रखने की ज़िम्मेदारी है वे ख़ुद मिलकर उसे उजाड़ने में लगे हैं। जब बागड ही खेत खाने लगे तो फिर सुअरों की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस मामले में जनता में कोई जागृति नहीं है। नर्मदा के बहाव की दिशा में किनारे पर बेशुमार पोलिथिन और प्लास्टिक बोरियाँ पेड़ों पर लदी हुई मिलीं। रेत खनन और पोलीथिन प्लास्टिक से नर्मदा की नैसर्गिकता को जो भयानक नुक़सान हो रहा है उसकी भरपाई मुश्किल है।
शाम को चार बजे धुआँधार पहुँच गए। डूंडवारा से पसर कर बहने वाली नर्मदा अचानक लजा कर सिमट गई। उसका पानी सिमट कर गहरे खड्ड में तेज़ी से गिरने लगा तो वह छोटे कणों में बदलकर धुएँ की शक्ल में दिखने लग गया। यही जबलपुर की शान धुआँधार जलप्रपात है। पंचवटी तट स्थित नेपाली कोठी, जहाँ हमारे ठहरने की व्यवस्था अरुण जी के रिश्तेदार सुधीर भाई ने की थी, वहीं रात्रि विश्राम किया। यहाँ से हमारे एक अन्य साथी अविनाश दवे भी जबलपुर लौट गये।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






