श्री अरुण कुमार दुबे
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तबाही रोकिए अब…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५६ ☆
तबाही रोकिए अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
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मिले है ज़ख़्म मुझको इश्क़ में अक्सर ही फूलों से
गिला कोई नहीं दिल में मुझे अपने रक़ीबों से
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पिलालो दूध कितना दोसती होती न सापों से
विवशता से नहीं रिश्ते सँवरते भावनाओं से
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ग़ज़ल कोई मुक़म्मल दोस्त आसानी से कब होती
कुरेदो ज़ख़्म दिल के सब्ज़ करने आप शूलों से
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बुरे अच्छे करो जो काम रखता वो अलग खाते
न पीछा छूटता इंसान का करता जो पापों से
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विसात इंसान की क्या है सितम करना नहीं इन पर
पिघल जाता है लोहा मुफ़लिसों की निकली आहों से
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नबाजे हमको जो क़ुदरत अकड़ को छोड़ देना है
सबक ये सींख लें हम भी झुकी फलदार डालों से
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निजी कामों को करने सिर्फ़ ये हमने नहीं पाईं
उठाएं गिर गए है जो ख़ुदा की बख्शी बाहों से
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तबाही रोकिए अब युद्ध घातक मोड़ पर पहुँचा
जमीं को पाट देगे आप क्या लोगों की लाशों से
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बड़ा है दोगला गिरगिट से अपने रंग ये बदले
नहीं अनजान रहना है अरुण दुश्मन की चालों से
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© श्री अरुण कुमार दुबे
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