श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १४९ ☆
☆ जनगणमन की व्यथा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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होना क्या है
किसे पता है
शेष कुशल है यही कथा है।
लाँघ गए चौखट
अतीत की
बजती कोई धुन
सुगीत की
करना क्या है
किसे पता है
जनगण मन की यही व्यथा है ।
वर्तमान पीड़ित
उलझन से
राह निकलती है
करमन से
दुविधा क्या है
किसे पता है
अकर्मण्यता बनी प्रथा है ।
उग आए जंगल
आँखों में
सिमटे सपने सब
पाँखों में
उड़ना क्या है
किसे पता है
गंतव्यों की आत्मकथा है ।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(१४.८.२५)
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