श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆

☆ गीत ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।

कोई मैं ही मैं में रहता कोई बस वहम में रहता है।।

***

अपनेपन का  अहसास ही ताकत की दवा देता है।

मत रहो सदा ही क्रोध में यह घृणा को हवा देता है।।

भटक जाता आदमी जब द्वेष ही कहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

***

खाक हो जाता बदन पर रंजिश खत्म नहीं होती है।

शत्रुता में कोई भी नीति  सफल  यत्न नहीं होती है।।

आगे बढ़ता नहीं जो अभिमान बोझ जहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

****

जो संबंध जोड़ता और निभाता वही सफल होता है।

जो स्पर्धा नहीं ईर्ष्या करता वह सफलता भी खोता है।।

दिल में घृणा आग तो मन मस्तिष्क भी दहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted