श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  कुछ कुछ होता है का मतलब

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३२

 व्यंग्य ☆ “कुछ कुछ होता है का मतलब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

 मैं रात्रि का भोजन करके पान खाने झब्बूलाल की दुकान पहुंचा। दुकान बंद होने का समय था इक्का दुक्का ग्राहक थे। दुकान में गाना बज रहा था

“तुम पास आए, यूं मुस्कुराए

तुमने न जाने क्या सपने दिखाए।

अब तो मेरा दिल जागे न सोता है।

क्या करूं हाए, कुछ कुछ होता है…

मुझे देखते ही झब्बू ने नमस्ते भाई साहब कहते हुए एक पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने पान मुंह के हवाले किया ही था कि झब्बू ने प्रश्न दाग दिया – भाई साहब, “ये कुछ कुछ होता है” का मतलब आखिर क्या होता है ? मैंने कहा झब्बू फालतू की बात मत छेड़ो, मुझे घर जाकर अभी एक लेख लिखना है। झब्बू बोला – भैया फालतू बात नहीं कर रहा। जब जब ये गाना सुनता हूँ देर तक सोचता रहता हूं कि आखिर ये “कुछ – कुछ” है क्या ? आप पत्रकार हैं। आप नहीं बताएंगे तो कौन बता पाएगा? मैंने कहा – प्यारे भाई पत्रकार क्या सब कुछ जानता है ?

झब्बू ने मेरी ओर लम्बी मुस्कान फेंकते हुए कहा – भैया में तो ऐसा ही समझता हूं। पत्रकार चोरी, डकैती, खून के बारे में पुलिस से ज्यादा, बजट के बारे में वित्त मंत्री और अर्थशास्त्रियों से ज्यादा, विदेश नीति के बारे में विदेश मंत्री और देश की सुरक्षा के बारे में रक्षा एवं गृह मंत्री व सेना से ज्यादा जानता है। अभी राम मंदिर में चंदा चोरी पर समाचार पत्रों को पढ़कर लग रहा है कि जैसे पत्रकार इस मामले में भी जांच अधिकारियों से ज्यादा जानते – समझते हैं। खेल पत्रकार तो क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, बैडमिंटन जैसे बड़े खेलों तक में यह बता देते हैं कि जीतने के लिए किस खिलाड़ी को कैसे खेलना चाहिए। शायद इसी कारण से लोग पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते, पत्रकारों से बचने की कोशिश करते हैं। मैंने झब्बूलाल से पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा भाई मुझे माफ करो मैं सादा पत्रकार हूं, खोजी या खेल पत्रकार नहीं और वापस लौटने लगा। झब्बू ने आवाज दी भाई साहब ये भाभी जी का पान तो लेते जाएं। मैं वापस मुड़ और पान की पुड़िया ली। झब्बू ने मार्मिक शब्दों में कहा, भैया आपने मेरी शंका का समाधान नहीं किया। अब मुझे रात भर नींद नहीं आएगी। सोचता रहूंगा कि आखिर “कुछ कुछ होता है” का मतलब क्या होने से है।

मैंने कहा देखो भाई झब्बू – “कुछ कुछ होने” का कोई एक मतलब नहीं है। इसके हजार मतलब हैं जो अलग – अलग परिस्थितियों में अलग – अलग होते हैं। शाहरुख खान, काजोल, रानी मुखर्जी को जो “कुछ कुछ” हुआ था वह अलग था। किसी राष्ट्राध्यक्ष को टॉफ़ी पाकर और झुमके पहनने से  किसी राष्ट्राध्यक्ष को जो “कुछ कुछ” हुआ वह अलग था, भारत की तरक्की देखकर चीन, पाकिस्तान और अमेरिका को जो “कुछ कुछ” हो रहा है वह अलग है, ईरान युद्ध में फंस कर ट्रंप को और यूक्रेन युद्ध में फंस कर पुतिन को होने वाला “कुछ कुछ” अलग है। इसी तरह बंगाल चुनाव हारकर ममता को और जीतकर भाजपा नेताओं को होने वाला “कुछ कुछ” भी अलग – अलग है। प्रियंका और राहुल को होने वाले “कुछ कुछ” की तुलना, बराबरी या समानता भी किसी दूसरे के “कुछ कुछ” से नहीं की जा सकती। मेरी बात से झब्बू के चेहरे पर समाधान के भाव उभरते देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। मैं वापस लौटने लगा तो झब्बू ने टोका, बोला – भाई साहब, मुझे पता था कि पत्रकार के पास हर बात का जवाब होता है, वह अति दूरदर्शी होता है तभी तो जब चंद्रशेखर जी प्रधान मंत्री थे तब एक बार उन्होंने कहा था कि अब पत्रकारिता इतने आगे बढ़ गई है कि मुझे सुबह समाचार पत्र पढ़कर पता चलता है कि मैंने कल रात क्या सोचा अथवा मैं आगे क्या करने वाला हूं। पत्रकारों पर झब्बू की बात सुनकर मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


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