सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है ‘सरसी छंद -गीत – पावस ऋतु’।)
☆ मंजिरी साहित्य # २२ ☆
सरसी छंद -गीत – पावस ऋतु ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
धरती ओढ़े हरी चुनरिया, प्रकृति करे श्रृंगार l
पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll
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भीगी धरा निकलती ऊष्मा, बुझा रही है प्यास l
चातक हुआ तृप्त जल पीकर, हलधर बांधे आस ll
झूमे डाली नाच मयूरा, खुश होता संसार l
पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll
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किट -किट करते कीट पतंगा, झरना गाते गीत l
हरी भरी हरियाली सुंदर, सबको लगते मीत ll
कलकल करती नदियाँ लहरें, गान लगे मल्हार l
पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll
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बादल गरजे बिजली छिटके, रिमझिम पडती बूंद l
बूढ़े बच्चे मन हर्षाये, मिलता गात मुकुंद ll
गर्म हवा से व्याकुल मन को, मिलती शीतल धार l
पावस ऋतु मेघो का गर्जन, हो रिमझिम बौछार ll
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






