डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मी टू : अंतहीन सिलसिला। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – यह किराये का मकान है / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३५ ☆

☆ मी टू : अंतहीन सिलसिला… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘मी टू’– एक सार्थक प्रयास, तथाकथित शोषित महिलाओं को न्याय दिलाने की मुहिम; वर्षों से नासूर बन रिसते ज़ख्मों से निज़ात पाने की अचूक मरहम …एक अंतहीन सिलसिला है। शायद यह वर्षों से सीने में दफ़न चिंगारी, ज्वालामुखी पर्वत के लावे की भांति सहसा फूट निकलती है; जो दूसरों के शांत-सुखद जीवन को तहस-नहस करने का उपादान बन; अपनी विजय-श्री का उत्सव मना रही होती है; विजय-पताका फहरा रही होती है… वहीं उसकी अभिव्यक्ति से समाज में व्याप्त संतुलन, समन्वय व सामंजस्य व समरसता का अंत भी संभाव्य है, निश्चित है।

भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने आधी आबादी को समानाधिकारों के प्रति सजग करते हुए, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस जगाया है… श्लाघनीय है। गीता में भी ‘अन्याय व ज़ुल्म सहने वाले को, ज़ुल्म करने वाले से अधिक दोषी व अपराधी स्वीकारा गया है।’ वैसे औरतों की ‘मी टू’ में सक्रिय प्रतिभागिता होने पर, समाज के हर वर्ग के रसूखदार सदमे में हैं; उनके हृदय में खलबली मची है। वास्तव में वे भयाक्रांत हैं, क्योंकि किसी भी पल किसी पर भी अंगुली उठ सकती है और वे निरपराधी होने पर भी हाशिए पर आ सकते हैं।

वैसे तो हर औरत जीवन में ऐसे हादसों की शिकार होती है। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक कदम- कदम पर वह निकटतम परिजनों द्वारा प्रताड़ित होती है। घर हो या कार्य-स्थल…वह कहीं भी सुरक्षित नहीं है; हर चौराहे पर दुर्योधन व दु:शासन उसकी अस्मत से खिलवाड़ करने को आतुर दिखाई पड़ते हैं। चंद माह की मासूम हो या वृद्धा, वह उनकी पल भर की शारीरिक क्षुधा को मिटाने का साधन बनती है। इतना ही नहीं, उस निर्दोष पर इल्ज़ाम लगा कर कटघरे में भी खड़ा कर दिया जाता है, जो अपराध उसने किया ही नहीं। सो! इन विषम परिस्थितियों में समझौता करना, उसकी विवशता बन जाती है और मुंह बंद कर के रहना– उसे ज़िंदा रहने की कीमत के रूप में चुकानी पड़ती है ताकि परिवार का रूतबा समाज में कायम रह  सके। परंतु उस झूठी मान-मर्यादा को बरक़रार रखने के लिए उसे आजीवन तिल-तिल कर मरना पड़ता है।

आइए! ज़रा दृष्टिपात करें, इसके स्याह पक्ष पर…  बहुत सी महिलाएं अपना स्वार्थ साधने हेतु सम्पन्न व सज्जन पुरुषों पर निशाना दाग़ने से भी नहीं चूकतीं। वे धन-ऐश्वर्य पाने, झूठी पद-प्रतिष्ठा बटोरने व अधिकाधिक सुख-सुविधा जुटाने के निमित्त; लोक- मर्यादा की परवाह न करते हुए; हर सीमा का अतिक्रमण कर गुज़रती हैं। उदाहरणत: 498 ए के अंतर्गत दहेज मांगने के इल्ज़ाम में, पति व ससुराल पक्ष के लोगों को कटघरे खड़ा करना; जेल की सीखचों के पीछे पहुंचाना या दुष्कर्म व घरेलू हिंसा के झूठे आरोप लगाने का दम्भ भरना; अपनी कारस्तानियों को सबके सम्मुख सीना तानकर बखान करना… सोचने पर विवश करता है कि आखिर इक्कीसवीं सदी की पथ-विचलित नारी किस घने अंधकार में खो गयी है? परंतु ममता की सागर, सीने में अथाह प्यार, असीम वफ़ा व त्याग के भाव संजोए– नि:स्वार्थ, संवेदनशील, प्रसाद की दैवीय गुणों से सम्पन्न श्रद्धेय नारी की तलाश आज भी जारी है। इसके विपरीत आधुनिक समाज में ‘मी टू’ अथवा दुष्कर्म के झूठे आरोप लगाकर प्रतिशोध लेने व नीचा दिखाने का प्रचलन भी बदस्तूर जारी है; जिसके परिणाम-स्वरूप आत्महत्या के मामले भी निरंतर सामने आ रहे हैं, जो समाज के लिए घातक हैं; मानव-जाति पर कलंक हैं। सो! समाज के लिए यह स्थिति अत्यंत शोचनीय हैं, चिन्तनीय हैं, निन्दनीय हैं।

एक प्रश्न मन में अक्सर कुलबुलाता है…आखिर इतने वर्षों के पश्चात्  दमित भावनाओं का प्राकट्य क्यों… यह दोषारोपण तुरन्त क्यों नहीं? सो! इसके पीछे उनकी मंशा व प्रयोजन जानने की आवश्यकता है, जिसका ज़िक्र पहले ही किया जा चुका है। इस संदर्भ में उन महिलाओं की चुप्पी के कारणों को उजागर करने की अत्यंत आवश्यकता है…आखिर  सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के पश्चात् सहसा यह विस्फोट क्यों? पच्चीस वर्ष तक हृदय में दफ़न दर्द के दावानल में विस्फोट क्यों?

प्रश्न उठता है— क्या ‘मी टू’ वास्तव में विरेचन है… उन चिरदमित भावनाओं का, अहसासों का, जज़्बातों का, जो कुंठाओं के रूप में लम्बे समय से उनके हृदय में सुप्तावस्था में दबी पड़ीं थीं और अवसर पाते वे जाग्रत हो गयी हैं? सो! उनका प्रदर्शन होने के पश्चात् दोनों पक्षों का व्यवहार सामान्य कैसे रह सकता है? शायद,! ‘मी टू’ शराफ़त का नकाब ओढ़े; समाज में ऊंचे-ऊंचे पदों पर काबिज़ लोगों की हक़ीक़त को उजागर करने का माध्यम हैं; उनके जीवन के कटु यथार्थ को प्रकट करने का मात्र साधन है या महिलाओं को न्याय दिलाने का उपादान भी है?

सो! इस विषय की प्रासंगिकता के साथ-साथ सकारात्मक व नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है। क्या यह दोनों पक्षों के हित में है… शायद नहीं। वास्तव में आरोपी पक्ष पर इल्ज़ाम लगाने से, कीचड़ के छींटे हमारे उजले दामन को भी मलिन करते हैं और इससे केवल दोनों परिवारों की इज़्ज़त ही दांव पर नहीं लगती, उनके घरों का सुख-चैन, शांति व सुक़ून भी नदारद हो जाता है। सो! सुप्रीम कोर्ट के मी-टू के साथ-साथ लिव-इन व विवाहेतर संबंधों पर भी  पुन: चिंतन करने की आवश्यकता का विचार मन में सहसा कौंधा, क्योंकि इससे मानसिक आघात व हंसते- खेलते परिवारों में ग्रहण लगने की अधिक संभावना है। सो! हमें अपनी संस्कृति की धरोहर को संजोए रखने का भरसक प्रयास करना चाहिए और मानव-मूल्यों के विघटन के  कारणों व समाधान के उपायों-कारकों को भी तलाशना चाहिए। शेष निर्णय व दायित्व आप पर।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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