श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सर्वोच्च…‘।)
☆ शशि साहित्य # ४० ☆
कविता – सर्वोच्च… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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कतरा बनकर आंसू का, आंखों से ना बह जाओ।
यह सोचकर हमने, अब रोना छोड़ दिया।।
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पढ़ ना ले कोई हमारी नजरों में तुमको।
सबके सामने पलकों को, गिराकर उठाना हमने छोड़ दिया।।
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नींद आएगी, साथ तेरे ख्वाब भी लायेगी।
रात ने भोर का इंतजार छोड़ दिया।।
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कुछ भाव ऐसे होते हैं, सिर्फ एहसासों में जीते हैं।
उनको शब्दों के बंधन में बांधना छोड़ दिया।।
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जन्म मरण से ऊपर भी कुछ ऐसे रिश्ते होते है।,
कितने जन्म लिए हमने, यह गिनती करना छोड़ दिया।।
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हर सांस में तू.. हर दुआ में शामिल है।
कितने दर पर शीश झुकाया हमने गिनना छोड़ दिया।।
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एक विश्वास मिला,, सर्वोच्च मिला, अब तो कुछ बाकी नही।
इच्छाएं खत्म हुई और मांगना छोड़ दिया।।
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




