डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय लघुकथा – ‘फूल की वेदना‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३५२ ☆
☆ लघुकथा ☆ फूल की वेदना ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
सुधीर एक मित्र को छोड़ने एयरपोर्ट गया था। लौटने में देखा सड़क के एक तरफ फूलों का मेला लगा है। तरह तरह के फूल, सुन्दरता में एक से बढ़कर एक। सुधीर मंत्रमुग्ध खड़ा देखता रह गया। इतने सारे फूल इतना सौंदर्य बिखेर रहे हैं और इस निर्जन में इन्हें देखने वाला, इनकी कद्र करने वाला कोई नहीं। इनका सारा सौंदर्य व्यर्थ ही जा रहा है। उसे अंग्रेज़ कवि थॉमस ग्रे के प्रसिद्ध शोकगीत की पंक्तियां याद आयीं— ‘Full many a flower is born to blush unseen, and waste its sweetness on the desert air.’
वह आगे बढ़ा। सोचा कुछ फूल तोड़ लिए जाएं। घर में गुलदान में सजाएंगे। पत्नी खुश होगी। इसी इरादे से आगे बढ़ा, तभी फूलों के बीच से आवाज़ आयी, ‘कहिए महोदय, क्या इरादे हैं?’
सुधीर चमत्कृत होकर बोला, ‘कौन बोल रहा है?’ जवाब आया, ‘हम फूल ही बोल रहे हैं। क्या हमें तोड़ना ज़रूरी है?’
सुधीर ने जवाब दिया, ‘तो फिर फूलों का उपयोग ही क्या है? यहां जंगल में तुम्हें देखने वाला कौन है?’
आवाज आयी, ‘हमारा काम संसार को सुंदर बनाना है। हमें अपनी डाल अपना जीवन पूरा करने दो। तोड़ने के घंटे दो घंटे बाद तुम हमें कचरे में फेंक देते हो। हमें अपनी उम्र पूरी करने दो। जिसे हमें देखना होगा वह स्वयं हमारे पास आएगा।
‘तुम हमारी उपयोगिता की बात करते हो, लेकिन आदमी से ज़्यादा हमारा दुरुपयोग कोई नहीं करता। तुम हत्यारों, बलात्कारियों को माला पहनाते हो, हमें शवों पर चढ़ाते हो, हमें अपनी नदियों में फेंक कर जल को प्रदूषित करते हो, अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए देवताओं पर चढ़ाते हो। दूसरों की खुशामद के लिए हमारा उपयोग करते हो। त्योहारों पर हमें पूरी तरह लूट लिया जाता है। कुल मिलाकर आदमी अपने स्वार्थ-साधन के लिए हमारे उपयोग करता है और हमारे युवावस्था में आते ही हमारे जीवन पर विराम लगा देता है।’
सुधीर कुछ देर चुप रह कर बोला, ‘आदमी तुम्हें तोड़ता है तो उसमें हर्ज़ क्या है? नहीं तोडेंगे तो एक दिन तुम डाल पर ही मुरझा कर गिर जाओगे।’
जवाब आया, ‘सो तो एक दिन मनुष्य भी मुरझा कर गिरता है। तो क्या उसका जीवन बीच में ही समाप्त कर देना चाहिए?’
सुधीर असमंजस में चुप हो गया।
फूलों से आवाज़ आयी, ‘एक अंग्रेज कवि ने ‘डेफ़ोडिल्स’ शीर्षक की कविता लिखी है। उसे पढ़ो। उसमें कवि ने सिर्फ डेफ़ोडिल्स के दर्शन से प्राप्त उल्लास की बात की है, तोड़ने की बात नहीं की। कविता की आखिरी पंक्तियां हैं, ‘And then my heart with pleasure fills, and dances with the daffodils.’
‘हमारे देश के ही एक बड़े कवि ने हमारी भावना को अपनी कविता में बहुत अच्छी तरह से व्यक्त किया है। पुष्प की अभिलाषा लिखते हुए वे कहते हैं कि पुष्प न तो सुरबाला के गहनों में गूंथा जाना चाहता है, न प्रेमी की माला में बिंधना चाहता है, न सम्राटों के शव पर चढ़ना चाहता है, न देवों पर चढ़कर इठलाना चाहता है। पुष्प की अभिलाषा केवल यह है कि उसे मातृभूमि के लिए जीवन देने जा रहे वीरों के पथ में फेंक दिया जाए।’
फूलों की बात सुनकर सुधीर कुछ शर्मिंदा होकर बिना फूल तोड़े ही लौट पड़ा।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





बहुत सुंदर! 🌻🌷🪻🌸
जरा हटके रचना, मन आनंदित हुआ।
साधुवाद सर।🙏🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी।