हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ — मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे — संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

?‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ — मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे — संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव  ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम – ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’

विधा – शोध कार्य

मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे

संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव

प्रकाशक – क्षितिज प्रकाशन, पुणे

पृष्ठ संख्या – 308

मूल्य – रु. 500/-

? अपने-अपने पर सबके राम ☆ श्री संजय भारद्वाज ?

श्रीराम, भारतीय संस्कृति के शलाका पुरुष हैं। रामकथा कल-कल प्रवाहित होती धारा है। प्रवाह, धारा का प्राण है। श्रीराम का जीवनचरित अपने आप में कविता है। जिसने भी इस चरित को लिखा, उसकी लेखनी से कविता स्वयं प्रवाहित होने लगी। इस प्रवाह का राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने शब्दों में कुछ यूँ वर्णन किया है,

राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है,

कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।

इस सहज संभाव्यता ने महर्षि वाल्मीकि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य स्वयंभू और विभिन्न भाषाओं में अनेकानेक मूर्धन्य कवियों से रामकथा लिखवाई। यह सिलसिला अब तक चल रहा है।

प्रस्तुत पुस्तक ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे का महत्वपूर्ण शोध-प्रबंध है। जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है, यह ग्रंथ जैन आचार्य स्वयंभू रचित ‘पउमचरिउ’और गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ का तुलनात्मक अध्ययन है।

वस्तुत: महर्षि वाल्मीकि कृत ‘रामायण’, रामकथा का आदिग्रंथ है। भारत में विभिन्न भाषाओं में रामकथा पर आधारित लगभग 300 ग्रंथ हैैं। स्थूल रूप से ये सभी रामायण से अनुप्राणित हैं। बांग्ला में कृतिवास की ‘रामायण’, तमिल में ‘कंबन रामायण’, मराठी में संत एकनाथ की ‘भावार्थ रामायण’, गुरु गोविंद सिंह जी की ‘गोविंद रामायण’, माधव कंदली की ‘असमिया रामायण’, सारलादास की ‘उड़िया रामायण’, रंगनाथ की ‘तेलगु रामायण’, भानुभक्त की ‘नेपाली रामायण’, एषुतुच्छन की ‘मलयालम रामायण’,  कन्नड़ की ‘तोखे रामायण’, आदि कुछ नाम हैं। यही नहीं बल्कि विभिन्न अंचलों के साथ-साथ विभिन्न जनजातियों में भी लिखित या श्रुत रामायण मिलती हैं।

इनमें संबंधित भाषा-भाषियों की स्थानीय संस्कृति, परिवेश, भौगोलिक स्थितियों के अनुसार छोटे-बड़े परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं।

दो ग्रंथों के तुलनात्मक अध्ययन की अपनी चुनौतियाँ होती हैं। इनमें देश, काल, स्थिति का अंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गोस्वामी जी के ‘रामचरितमानस’ की गणना विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्यों में होती है। यह महाकाव्य भारतीय लोक के लिए आदर्श आचार-संहिता है। आचार्य स्वयंभू का ‘पउमचरिउ’ जैन दर्शन को केंद्र में रखकर रचा गया है। इसके चलते इस ग्रंथ में वाल्मीकि कृत मूल रामकथा में कई बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होते हैं।

संभवत: ‘पउमचरिउ’ एकमात्र अपवाद है जिसमें रावण का वध श्रीराम के हाथों ना होकर लक्ष्मण के हाथों कराया गया है। प्रचलित रामकथा के कुछ पात्रों के नाम में परिवर्तन भी इसमें देखने को मिलते हैं। हनुमान जी के ब्रह्मचारी रूप की मान्यता के विपरीत उन्हें आठ सहस्त्र पत्नियों के पति के रूप में प्रस्तुत करना, शूर्पणखा को खर-दूषण की पत्नी बताना एवं अन्य अनेक परिवर्तन हैं। इसमें श्रीराम एवं रावण का धार्मिक, सांस्कृतिक परिवेश समान बताया गया है। रावण का चरित्र चित्रण श्रीराम की अपेक्षा विस्तृत है। ‘पउमचरिउ’ के रावण का खलनायकत्व भी उसके प्रति सहानुभूति जगाने में सहायक है।

राम, भारतीय आस्था का चैतन्य स्वरूप हैं। हमारे लोकजीवन के कण-कण और क्षण-क्षण में राम हैं। यही कारण है कि बच्चे के जन्म पर रामलला की बधाइयाँ गाई जाती हैं। संबोधन के लिए हम जीवन भर ‘राम-राम’ कहते हैं। अंतिम सत्य के रूप में काया से चेतन तत्व जब प्रस्थान कर जाता है तो ‘राम नाम सत्य है’ को स्मरण किया जाता है।  रामकथा, भारतीय लोकमानस में पैठी हुई है। पारंपरिक रामकथा में परिवर्तन की स्वीकार्यता भी श्रीराम के व्यक्तित्व में अंतर्निहित उदारता का ही प्रतीक है।

गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के देवत्व को रेखांकित किया। जबकि आचार्य स्वयंभू ने उनके मनुष्यत्व को लेखनीबद्ध किया। महत्वपूर्ण यह है कि मनुष्यत्व हो या देवत्व, अंतर्निहित तो रामत्व ही है।

वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि, देवर्षि नारद से पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ पुरुष के बारे में अनेक प्रश्न करते हैं। देवर्षि हर एक का उत्तर देते हुए श्रीराम का नाम गिनाते हैं। इसी क्रम में देवर्षि का यह कथन महत्वपूर्ण है-

सर्वदाभिगत: सद्भि: समुद्र इव सिन्धुभि:।

आर्य: सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शन:॥

जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सदा राम से साधु पुरुष मिलते रहते हैं। वे आर्य एवं सब में समान भाव रखने वाले हैं, उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है।

प्रियदर्शन श्रीराम की कथा को भाषा की दृष्टि से देखें तो रामचरितमानस अवधी में रचा गया है जबकि पउमचरिउ की भाषा अपभ्रंश है। ऐसे में शोधकर्ता के लिए तुलनात्मक अध्ययन जटिल और अनेक प्रश्नों को हल कर आगे बढ़ने की प्रक्रिया हो जाता है। शोधकर्ता डॉ. साठे ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक सूक्ष्म से सूक्ष्म बिंदु का विस्तृत अध्ययन कर तटस्थ भाव से शोध करने का प्रयास किया है। यह श्लाघनीय है।

यह शोध साठ वर्ष पूर्व किया गया था। शोधकर्ता अब दिवंगत हो चुके हैं। देह की नश्वरता के संबंध में गोस्वामी जी रामचरितमानस में लिखते है,

बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा॥

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा॥

अर्थात मनुष्य की देह सौभाग्य से प्राप्त होती है। विभिन्न ग्रंथ कहते हैं कि देवताओं के लिए भी इसकी प्राप्ति सहज नहीं होती। मनुष्य योनि, साधन योनि है। यह मोक्ष प्राप्ति का द्वार है। अतः देह नष्ट होने से पहले इसका सदुपयोग कर अपना परलोक सुधार लेना चाहिए।

आचार्य स्वयंभू ने इस विषय को पउमचरिउ में यूँ व्यक्त किया है,

जं देहु तं णासधम्मु।

णिच्चु ण होइ कइ वि कम्मु॥

जिसे देह कहते हैं, उसका मूल स्वभाव नश्वरता है। स्वाभाविक है कि कोई भी देह जगत में सदा बनी नहीं रह सकती।

छह दशक बाद इस शोध का प्रकाशित होना इस बात की पुष्टि करता है कि देह अनिवार्य रूप से नश्वर है पर विचार और चिंतन ईश्वर हैं। ईश्वर अर्थात समय की सीमा के परे शाश्वत अस्तित्व। अक्षर-अक्षर जोड़कर रचा जाता है साहित्य। यूँ ही ‘अक्षर’ नामकरण नहीं हुआ। जिसका क्षरण नहीं होता वही अक्षर है।

यही कारण है कि संपादक द्वय डॉ. मृणालिनी शहा और डॉ. लतिका जाधव को साठ वर्ष का अंतर प्रभावित नहीं कर पाया और उन्होंने शोध प्रबंध को प्रकाशित करने का बीड़ा उठाया। ज्ञान के नित्य भाव का यह प्रमाण है।

इस प्रबंध के प्रकाशन की व्यावहारिक कठिनाइयाँ रही होंगी। तत्कालीन भाषा, तब की टाइपिंग, अक्षर विन्यास, वर्तनी और व्याकरण में समय-समय पर हुए परिवर्तन इन सब पर संपादक द्वय ने परिश्रम किया है। जिन बातों को ज्यों का त्यों रखने की अपरिहार्यता रही होगी, उन्हें वैसे ही रहने दिया गया है।

स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे द्वारा किया यह महत्वपूर्ण काम है। वस्तुत: किसी भी शोध प्रबंध को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करते हुए अनेक बिंदु विधागत परिवर्तन की मांग करते हैं। शोधप्रबंध के प्रारूप में हर बिंदु के साथ आवश्यक लगने वाले संदर्भ, पुस्तक रूप में उतने प्रयोजनीय प्रतीत नहीं होते। इन सब पर काम करके शोधप्रबंध को शोधकर्ताओं और सामान्य पाठक के हाथ में एक सुपाठ्य पुस्तक के रूप में लाने का बीड़ा दोनों संपादकों ने पूरे सामर्थ्य से उठाया है।

दोनों संपादकों को हार्दिक बधाई। आशा है कि यह पुस्तक हर जिज्ञासु के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। शुभं भवतु।

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Articles ☆ Words of the Buddha ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🪷 Words of the Buddha 🪷

🌿 The Bonds That Hold the World Together

✨ English

«Generosity, kind words,

doing a good turn for others,

and treating all people alike:

these bonds of sympathy are to the world

what the linchpin is to the chariot wheel.»

— Jātaka 20

🇮🇳 हिन्दी

«दानशीलता, मधुर वचन,

दूसरों के लिए उपकार करना,

और सभी के प्रति समान व्यवहार रखना—

ये लोक में मैत्री के वे बन्धन हैं

जो रथ के पहिए को थामे रखने वाली कील के समान हैं।»

 

📜 Pāli

«Dānañca peyyavajjañca,

atthacariyā ca yā idha;

samānattatā ca dhammesu,

tattha tattha yathārahaṃ.»

— Jātaka 20

—

🌸 The Essence of the Teaching

A chariot may have a strong body, beautiful wheels and powerful horses, but without a small linchpin holding the wheel firmly in place, the entire vehicle cannot move safely.

Human society is much the same.

Generosity makes us willing to share.

Kind words soften hearts.

Doing good for others turns sympathy into action.

And treating people with fairness and equality gives relationships dignity and trust.

None of these acts, by themselves, may appear grand. Yet together they hold families, friendships, communities and societies together.

The Buddha’s wisdom here is wonderfully practical: the world is not held together merely by laws and institutions, but by the everyday goodness that people extend to one another.

A little generosity.

A kind word.

A helping hand.

A heart that does not discriminate.

These may seem like small things—but, like the humble linchpin of a chariot, they keep the wheel of human life turning. 🪷

🌼 बुद्ध का संदेश

हम प्रायः संसार को बड़ी शक्तियों से चलता हुआ देखते हैं—धन, सत्ता, नियम और संस्थाएँ। बुद्ध हमें उसकी एक अधिक सूक्ष्म सच्चाई दिखाते हैं।

समाज को जोड़कर रखने वाली शक्ति मनुष्य की मनुष्यता है।

जब हम देते हैं, तो दूरी घटती है।

जब हम मधुर बोलते हैं, तो कठोरता पिघलती है।

जब हम किसी के काम आते हैं, तो करुणा कर्म बन जाती है।

और जब हम सबके साथ समान व्यवहार करते हैं, तो सम्मान और विश्वास जन्म लेते हैं।

रथ का पहिया जिस छोटी-सी कील से अपनी जगह टिका रहता है, वह दिखाई भी नहीं देती; फिर भी उसके बिना यात्रा सम्भव नहीं।

ठीक वैसे ही, संसार की स्थिरता अनेक छोटी-छोटी सद्भावनाओं पर टिकी है।

इसलिए किसी बड़े अवसर की प्रतीक्षा मत कीजिए।

आज किसी के लिए कुछ बाँटिए।

किसी से प्रेमपूर्वक बोलिए।

किसी के काम आइए।

और हर मनुष्य को उसी सम्मान से देखिए, जिसकी अपेक्षा आप अपने लिए रखते हैं।

🌿 छोटे-छोटे सद्कर्म ही मिलकर मानवता का रथ आगे बढ़ाते हैं। 🪷🙏

#WordsOfTheBuddha #Buddha #Dhamma #Jataka #Generosity #Kindness #Compassion #Humanity #Wisdom #Goodness #मैत्री #करुणा #मानवता #बुद्धवाणी

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३४० ☆ भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३४०– साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – श्राद्ध पक्ष ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

मिले बुजुर्गों का हमें, छतरी रूपी हाथ।

हरदम ऐसी कामना, रहें हमेशा साथ।।

* 

श्राद्ध पक्ष में हम करें, करें  पिंड का दान।

पितरों का तर्पण करें, करते वो कल्याण।।

 *

करकशता है काग की, बनी यही पहचान।

फिर भी मिलता है उसे, श्राद्धपक्ष सम्मान।।

 *

गौ का  ग्रास निकालते, काग श्वान का भाग।

आस लगाए बैठते, गौ माता अरु काग।।

 *

श्रद्धा प्रादुर्भाव से, श्राद्ध पक्ष में आज।

पुरखों के आशीष से, बनते बिगड़े काज।।।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३२१ ☆ संतोष के दोहे – पितृ पक्ष… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  – संतोष के दोहे – पितृ पक्ष…। आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३२१ ☆

☆ संतोष के दोहे – पितृ पक्ष… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

पितरों को सादर नमन, वंदन शत शत बार

सदा आप ही हमारे, जीवन का आधार

*

तुम बिन सूना सा लगे, यह अपना घर द्वार

कोई देता है कहाँ, तुम सा लाड़ प्यार

तर्पण पितरों का करें, सदा प्रेम से आप

श्रद्धा से ही श्राद्ध है, हरती भव के ताप

जिनके पुण्य प्रताप से, जीवन में उल्लास

उनके ही आशीष से, रिद्धि सिद्धि का वास

पुण्य कर्म से सुधरता, अपना ही परलोक

करनी ऐसी कर चलो, घर में हो आलोक

आना जाना है लगा,यह जीवन का सार

अपने कर्मों से मिले,जीवन में सत्कार

पितृ भक्ति से सदा ही,जीवन सफल महान

पित्र चरण की धूल को,पूजे सकल जहान

ईश्वर के अस्तित्व का,हो जिनसे अहसास

धन्य धन्य वो लोग हैं, रहें पिता के पास

पितरों के आशीष से,जीवन में “संतोष”

सांची सेवा से बढ़े, सुखद शांति का कोष

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ११३ – गीत – टेढ़ी चाल… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – टेढ़ी चाल…।

? रचना संसार # ११३ ?

☆ गीत – टेढ़ी चाल…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

जब पसीना श्रम बहा है,

लक्ष्य रक्षित कर दिया।

काल की हर ठोकरों ने,

खूब शिक्षित कर दिया।।

**

विधि लिखा माथे हमारे,

सूद साहूकार का।

थी लगोटीं तन अकेली,

मोह बस सरकार का।।

*

टीस सावन दे गया था,

तन असिंचित कर दिया।

**

भ्रष्ट नेता चाल टेढ़ी,

नित्य कर लगते नए।

आग लगती है घरों में,

सब कुएँ भी ढह गए।।

*

आँख पर पट्टी बँधीं है,

रक्त रंजित कर दिया।।

**

देख आशाएँ भटकती,

मात्र गक्कड़ हाथ है।

प्याज के लाले पड़े हैं,

बस गरीबी साथ है।।

*

खाट टूटी भाग्य फूटे,

गात खंडित कर दिया।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४६ – तिपहिया साइकिल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – तिपहिया साइकिल।)  

☆  चुभते तीर # १४६ – व्यंग्य  – तिपहिया साइकिल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राजकीय दिव्यांग एवं बाल पुनर्वास केंद्र के मुख्य दालान की सीलन भरी दीवार के सहारे लोहे की एक पुरानी और घिसी हुई तिपहिया साइकिल पिछले बीस सालों से रखी हुई थी जिसके पिछले दोनों पहियों के रबर वाले टायर गल चुके थे और उसकी लोहे की हरी चादर पर वक्त की मार से लाल जंग की गहरी परत चढ़ चुकी थी। उस तीन पहियों वाली छोटी गाड़ी के हैंडिल पर कभी सेरेब्रल पाल्सी से जूझते बच्चों के कांपते हाथों की मजबूत पकड़ के पसीने की गंध बसी थी जो अब धूल और जालों के नीचे दम तोड़ रही थी। उस दालान के ठीक नीचे टूटी ईंटों वाले चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही सोमदत्त काका अपनी जामुन की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले सोमदत्त काका दिन भर उस हरी तिपहिया साइकिल के पैडल को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। केंद्र परिसर में सुबह से ही आधुनिक रोबोटिक व्हीलचेयरों, न्यूरो-स्टिम्यूलेशन मशीनों और महंगे फिजियोथेरेपी उपकरणों का प्रदर्शन करने के लिए शहर के बड़े-बड़े निजी अस्पतालों के डॉक्टरों और अफसरों की चमचमाती गाड़ियाँ आ रही थीं। मंच से सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चों के सपनों को पंख लगाने पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए न्यूरोलॉजिस्टों और सूट-बूट पहने अफसरों को दालान के कोने में रखी उस पुरानी कबाड़ साइकिल से कोई सरोकार नहीं था। केंद्र का पुराना चपरासी मंगरू जब भी हाथ में चाय की केतली लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे मंगरू आज सेरेब्रल पाल्सी दिवस के इस मेले में इस तीन पहियों वाली गाड़ी पर किसी लड़खड़ाते बच्चे को बैठाने का कोई हुक्म आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों के खिलौने ही बांटे जा रहे हैं?” मंगरू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

पुनर्वास केंद्र में हाल ही में राजधानी के सामाजिक कल्याण एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण सचिवालय से नए मुख्य परियोजना निदेशक बनकर आए डॉक्टर अनिमेष भारद्वाज बहुत ही कड़क, आधुनिक न्यूरो-रिहैबिलिटेशन के जानकार और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए सेंसरी रूम का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे सोमदत्त काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस दीवार के सहारे खड़ी हरी तिपहिया साइकिल पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को विश्व सेरेब्रल पाल्सी दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और डिजिटल थेरेपी के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक कबाड़ गाड़ी के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और केंद्र के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे सोमदत्त काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य दालान का रास्ता क्यों रोकते हैं, अगर आपको कोई दिव्यांग सहायता पेंशन या मुफ़्त बैसाखी का फार्म भरना है तो भीतर दफ्तर में जाकर बाबू से मिलिए, इस तरह बाहर बैठकर दालान में रखी एक टूटी बेकार तिपहिया साइकिल को घूरने से इस मुल्क के सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चों के पैर सीधे नहीं होने वाले हैं।” सोमदत्त काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “निदेशक साहब मैं किसी मुफ़्त की बैसाखी या पेंशन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस तिपहिया साइकिल पर वह खोया हुआ सहारा वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए सहारे की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस सेरेब्रल पाल्सी दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके आधुनिक सहायक उपकरण बांट रही है, फिर आपकी इस पुरानी तिपहिया साइकिल का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त फिजियोथेरेपिस्ट पंडित कृपाशंकर जी जो पिछले चालीस सालों से उस केंद्र के हर बच्चे और हर थेरेपी के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “निदेशक साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस जिले में सेरेब्रल पाल्सी से ग्रस्त बच्चों को परिवार वाले घर के किसी अंधेरे कोने में लावारिस छोड़ देते थे तब काका के इकलौते बेटे मानस ने इसी दालान में खड़े होकर उन मासूमों के अधिकारों की सबसे बड़ी अलख जगाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “मानस ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस हरी तिपहिया साइकिल से जुड़ा हुआ है?” पंडित कृपाशंकर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब मानस उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और संवेदनशील युवा ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट था, जब बड़े अस्पताल गरीब बच्चों के इलाज के नाम पर लाखों लूटते थे तब मानस ने अपनी जेब के पैसों से बढ़ई और लोहार के साथ मिलकर यह पहली तिपहिया साइकिल बनाई थी ताकि पक्षाघात से जूझते बच्चे खुद अपने पैरों पर खड़े होने का अभ्यास कर सकें, उसने इस साइकिल को दालान में स्थापित करके कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे के अंतिम दिव्यांग बच्चे को मुफ्त में सहारा नहीं मिल जाएगा तब तक वह किसी बड़ी विदेशी मेडिकल लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

सोमदत्त काका ने कृपाशंकर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस तिपहिया साइकिल के जंग लगे पैडल को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे मानस ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह तिपहिया साइकिल केवल लोहे का ढांचा नहीं बल्कि लड़खड़ाते बचपन के स्वाभिमान की गाड़ी है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय दिव्यांग कल्याण बोर्ड का सबसे बड़ा मुफ़्त पुनर्वास प्रोजेक्ट पास कराकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस गाड़ी में ताजे रंग भरेगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े बाल कल्याण मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी पुनर्वास प्रोजेक्ट फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब मानस ने गरीबों के मुफ्त इलाज की मुहिम छेड़ी थी तो विदेशी रोबोटिक व्हीलचेयर और महंगी थेरेपी मशीनों के बहुराष्ट्रीय सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए मानस को अपनी अंतरराष्ट्रीय न्यूरो-रिहैब कंपनी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त साझेदारी देकर खरीद लिया था। मानस ने अपने सारे आदर्शों और उस तिपहिया साइकिल का वास्ता ताक पर रखकर उन समझौतों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति न्यूरो-थेरेपी टाइकून बन गया जो आज उसी कस्बे के गरीब पक्षाघात पीड़ित बच्चों को बाहर का रास्ता दिखाकर रईसों के बच्चों से एक-एक घंटे की थेरेपी के बीस हजार रुपए वसूलने का सबसे बड़ा अस्पताल चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि मानस तो खुद मासूमों की मजबूरी का सबसे बड़ा कसाई बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर विश्व सेरेब्रल पाल्सी दिवस पर मूक पक्षाघात पीड़ित बच्चों के प्रति करुणा का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप के हाथों की इस तिपहिया साइकिल को मुनाफे के बाजार में बेचकर लड़खड़ाते बचपन की सांसों का सौदा करते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई संवेदना से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस धूल भरी तिपहिया साइकिल को ताकते रह गए और पूरा पुनर्वास केंद्र उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १११२ ⇒ मुक्ति और ऋणमुक्ति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मुक्ति और ऋणमुक्ति…“।)

?अभी अभी # १११२ ⇒ आलेख – मुक्ति और ऋणमुक्ति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आदमी स्वतंत्र पैदा हुआ था, लेकिन हर जगह जंजीरों में जकड़ा हुआ है। ” रूसो “

The man was born free, but everywhere in chains. (Rousseau)

हम एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं, हमें अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है, अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की छूट है, अपनी मर्जी अनुसार खाएं, पीएं, मौज़ करें। किसी का एक कौड़ी का हम पर कोई कर्जा नहीं, न उधो का लेना, न माधो का देना।

पंछी बनूं, उड़ता फिरूं मस्त गगन में,

आज मैं आजाद हूं, दुनिया के चमन में।

फिर हम पर कैसा बंधन, कैसा कर्ज़, और कैसी मुक्ति!  क्या कोई किसी की आत्मा को कैद कर पाया है। सात तालों में कृष्ण का जन्म होता है, जो दुनिया को मुक्ति का मार्ग सुझाता है, मर कर भी अमर होते हैं शहीद, स्वतंत्रता सेनानी, घुट घुटकर तो सिर्फ कायर ही जीते हैं। जहां संघर्ष में सृजन होता हो, कोई महर्षि अरविंद जेल में रहकर सावित्री जैसे महाकाव्य की रचना करता हो, वही सच्चे अर्थ में मुक्त है, उन्मुक्त है, समय, काल और परिस्थिति भी उसके आगे नतमस्तक है।।

आज हम मुक्त हैं, स्वतंत्र हैं, आजाद हैं, हम पर कौन सा कर्ज है, जो हम इतने परेशान हैं ? आप नहीं जानते। पिछली सरकार खजाना खाली छोड़ गई और देश पर इतना कर्ज छोड़ गई, जिसे चुकाने में हमें नानी याद आ गई। हमारा वादा है, हम आपको और इस देश को न केवल कर्जमुक्त करेंगे, बल्कि देश का भंडार भी भरेंगे। स्वर्ण युग वापसी पर है, रामराज्य की वापसी तय है। बस ठंड रखें।

चलो देश की चिंता से भी आप मुक्त। अब जब आप पैदा हुए तो न केवल अपने माता पिता के ऋणी हुए, अपने नामकरण के साथ ही अपने कुल कुटुंब और पितरों का ऋण भी आप पर आ गया। इतना ही नहीं, यह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के भी आप ऋणी हो गए। स्वर्ग में बैठे देवता और ग्रह नक्षत्र भी आपको नहीं छोड़ने वाले। उनके लिए यज्ञ, हवन, दान पुण्य करें, उन्हें आहुति दें, उन्हें संतुष्ट करें। और अगर नहीं किया तो ? पड़े रहें, कर्ज में, बंधन में, कभी इस मंदिर तो कभी उस घाट। कभी काल सर्प तो कभी पितृ दोष। बस श्राद्ध पक्ष आया ही समझो। बिना ऋण मुक्ति के भी कहीं मुक्ति हुई है। सबको तृप्त करो, खीर पूड़ी खाओ खिलाओ, नो ड्यूज सर्टिफिकेट पाओ।।

क्या कहा, आपने इन सबका ठेका नहीं लिया। हमारा दर्शन चार्वाक दर्शन है। देश का एन .पी .ए. बढ़े तो बढ़े, हम तो कर्ज लेकर घी पियेंगे और विदेशों में अपना माल्यार्पण करवाएंगे।

स्विस बैंक में हमारा नाम है।

हम देश के कानून को मानते हैं, ईश्वर और अदालतों के न्याय पर हमें भरोसा है। वहां देर है अंधेर नहीं।

हम यह भी जानते हैं कि हमारा पाप का घड़ा भर चुका है, लेकिन हमने कुशलतापूर्वक घड़े में छेद कर दिया है। न पाप का घड़ा कभी भरेगा, और ना कभी हम पर न्याय का डंडा पड़ेगा। कई एन.जी.ओ. भी खोल रखे हैं, ट्रस्ट हैं, आश्रम हैं, धर्मशालाएं, टी. वी.चैनल और आय.टी.कंपनीज हैं हमारे नाम। हमारे ही सांसद हैं, हमारे ही धर्मगुरु, कहां से करें शुरू!  हम इस हाथ दान देते हैं, उस हाथ अनुदान भी ले लेते हैं। हम इस देश के ऋणी हैं, यहां की जनता के ऋणी हैं। निष्काम कर्म कर रहे हैं। तेरा तुझको अर्पण। हमें मुक्त होने से तो ईश्वर भी नहीं रोक सकता।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २७ ☆ आलेख – परशुराम जी – ३ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – ३‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # २७ ☆

? आलेख – परशुराम जी – ३ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

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जिस हिन्दु धर्म, संस्कृति में हमने जन्म लिया है वह सभी दृष्टि से कृतार्थ धन्य है l इस धर्म ने इस संस्कृति ने जो- जो भी देखा, जिस -जिस का उच्चारण किया, जिस -जिस का अनुभव किया, जो बताया गया उसका वैसा ही प्रचार किया वो विश्व कल्याण हेतु किया l

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”l

ये मेरा वो तेरा कहने की जगह हम कहते हैं ये पूरा विश्व ही हमारे लिये एक परिवार के समान है और हमारा भारत देश उस विश्वरूपी परिवार का भगवान घर है l सम्पूर्ण विश्व को जिन्होंने मांगल्य और पवित्रता प्रदान की वही तो हमारी संस्कृति है, वही हमारा सनातन धर्म है l हमारे देश की भूमि पुण्याई की भूमि है l हमारे देश को पवित्र स्थली बनाने के लिये प्रधानता उन सभी सगुण अवतारों की है l इसमें आचार्य, संत, महापुरुष और उस ईश्वरीय सत्ता के सभी अवतार आते हैं l ये सभी एक ही बात कहते हैं, एक ही बात समझाते हैं कि ये सारी वसुंधरा, ये सारा विश्व एक कुटुंब की तरह है l

हम सनातनी इतने सौभाग्यशाली हैं कि हमारी भारत भूमि ने हमारी संस्कृति ने हमारे हिन्दू धर्म ने इस जगत को इतना भर भर के दिया है जिसे किसी तराजू में तोला नहीं जा सकता क्यूंकि वह बेमोल है l

हमारे सनातन में लिखा है कि यदि मानव जीवन को कृतार्थ करना हो तो इन तीन प्रस्थानत्रयी का अभ्यास होना जरूरी होता है

1- वैदिक प्रस्थानत्रयी

2-पुराणिक प्रस्थानत्रयी

3- संतो की प्रस्थानत्रयी

1- वैदिक प्रस्थानत्रयी- इसमें ब्रम्ह सूत्र, दशोपनिषद और भगवदगीता आते हैं l ब्रम्ह सूत्र को न्याय प्रस्थान, दशोपनिषदको श्रुति प्रस्थान एवं भगवदगीता को स्मृति प्रस्थान भी कहा जाता है l ये तीनों ग्रंथ वैदिक प्रस्थानत्रयी के मुख्य स्तम्भ माने जाते हैं l

2-पुराणिक प्रस्थानत्रयी-  इसमें रामायण, महाभारत एवं श्रीमदभागवत आते हैं l

3- संतो की प्रस्थानत्रयी- उत्तर भारत में कबीर, सूर और तुलसी इनकी प्रस्थानत्रयी है l महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर माउली, एकनाथ, तुकोबा एवं समर्थ रामदास जी की प्रस्थानत्रयी है l दक्षिण में आलवार, नयनार, आचार्य रामानुज, निम्बार्क, वल्लभचार्य आदि l

धर्म जिसके कारण मनुष्य को भौतिक समृद्धि मिलती है साथ में अर्थ का भी लाभ होता है l

हिन्दू धर्म है इसीलिये मानव में मनुष्यता बची है l

सगुण अवतार हमारी हिन्दू संस्कृति का महत्वपूर्ण लक्षण है l

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् ।

अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि प्रचक्षते

मद्वयं = मत्स्य पुराण, मारकंडेयपुराण

भद्वयं = भागवत पुराण, भविष्य पुराण

ब्रत्रयं = ब्रम्ह पुराण, ब्रम्हवैवर्त पुराण, ब्रम्हाड पुराण

वचतुष्टयम् = वराह पुराण, वायु पुराण, वामन पुराण, विष्णु पुराण

अनापलिङ्गकूस्कानि = अग्नि पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, लिंग पुराण, गरुड़ पुराण, कूर्म पुराण, स्कन्द पुराण l

ये सब मिलकर अठारह पुराण हैं l

 – क्रमशः

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ४१ – कविता – प्रत्याशा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘प्रत्याशा…‘।)

☆ शशि साहित्य # ४१ ☆

? कविता – प्रत्याशा… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

चाहे हों बोझिल नींद से पलकें,

सपनों को तुम ना सोने देना…

*

लंबी दूरी तय करना है,

कदमों को ना थकने देना…

*

श्रम को अपना हथियार बना लो,

सफलता… सन्मुख शीश नवाने देना…

*

कल उसको पुनः उदय होना है,

तो सूरज को ढल जाने देना…

*

नयी है आभा, नई बहारें,

राह के कांटे, बिसरा देना…

*

चाहे तूफानों से हो जाए सामना,

 डोर आशा की थामें रहना…

*

विपरीत हो जाए सब राहें,

दीपक लगन का, जलाए रखना…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०८ – सुवर्ण पान…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

☆ सुवर्ण पान…! ☆

? कवितेचा उत्सव # ३०८ – विजय साहित्य ?

कविराज विजय यशवंत सातपुते

☆ सुवर्ण पान…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

(दशाक्षरी)

☆

जाण जगाची, हृदी ठेऊनी

रसिक धामी, रमला नाना

विश्वनाथ हा, कलासक्त हा

सच्चा माणूस, जगला नाना.

*

चित्रपटांचा, बादशाह हा

रंगभूमीचा, नटसम्राट

प्रचंड खस्ता, खात जाहला

दिगंत नाना, शब्द अचाट…!

*

अगम्य याची, संवाद कला

कथानकाची, हृदयी जागा

नाट्य, चित्र ही, प्रवास यात्रा 

माणुसकीचा, अतूट धागा..!

*

हिंदी मराठी, भाषा भगिनी

अनंत रुपी, दिसला नाना

अभिनयाची,असिम उंची

उन्नत झाल्या, रसिक माना.

*

हृदी जनांच्या,नांदत होता

परी ग्रासला, हृद्य विकार

नाना भुमिका, साकारीत हा

इहलोकीच्या, वळला पार

*

बहु आयामी , रेखाचित्र हे

आठवणींचे, सुवर्ण पान

कसे जगावे, सांगून गेला

कलागुणांचे, देऊन दान..!

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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