श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
संजय दृष्टि – समीक्षा का शुक्रवार # 26
‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ — मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे — संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव
समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज
पुस्तक का नाम – ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’
विधा – शोध कार्य
मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे
संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव
प्रकाशक – क्षितिज प्रकाशन, पुणे
पृष्ठ संख्या – 308
मूल्य – रु. 500/-
अपने-अपने पर सबके राम ☆ श्री संजय भारद्वाज
श्रीराम, भारतीय संस्कृति के शलाका पुरुष हैं। रामकथा कल-कल प्रवाहित होती धारा है। प्रवाह, धारा का प्राण है। श्रीराम का जीवनचरित अपने आप में कविता है। जिसने भी इस चरित को लिखा, उसकी लेखनी से कविता स्वयं प्रवाहित होने लगी। इस प्रवाह का राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने शब्दों में कुछ यूँ वर्णन किया है,
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है,
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।
इस सहज संभाव्यता ने महर्षि वाल्मीकि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य स्वयंभू और विभिन्न भाषाओं में अनेकानेक मूर्धन्य कवियों से रामकथा लिखवाई। यह सिलसिला अब तक चल रहा है।
प्रस्तुत पुस्तक ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे का महत्वपूर्ण शोध-प्रबंध है। जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है, यह ग्रंथ जैन आचार्य स्वयंभू रचित ‘पउमचरिउ’और गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ का तुलनात्मक अध्ययन है।
वस्तुत: महर्षि वाल्मीकि कृत ‘रामायण’, रामकथा का आदिग्रंथ है। भारत में विभिन्न भाषाओं में रामकथा पर आधारित लगभग 300 ग्रंथ हैैं। स्थूल रूप से ये सभी रामायण से अनुप्राणित हैं। बांग्ला में कृतिवास की ‘रामायण’, तमिल में ‘कंबन रामायण’, मराठी में संत एकनाथ की ‘भावार्थ रामायण’, गुरु गोविंद सिंह जी की ‘गोविंद रामायण’, माधव कंदली की ‘असमिया रामायण’, सारलादास की ‘उड़िया रामायण’, रंगनाथ की ‘तेलगु रामायण’, भानुभक्त की ‘नेपाली रामायण’, एषुतुच्छन की ‘मलयालम रामायण’, कन्नड़ की ‘तोखे रामायण’, आदि कुछ नाम हैं। यही नहीं बल्कि विभिन्न अंचलों के साथ-साथ विभिन्न जनजातियों में भी लिखित या श्रुत रामायण मिलती हैं।
इनमें संबंधित भाषा-भाषियों की स्थानीय संस्कृति, परिवेश, भौगोलिक स्थितियों के अनुसार छोटे-बड़े परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं।
दो ग्रंथों के तुलनात्मक अध्ययन की अपनी चुनौतियाँ होती हैं। इनमें देश, काल, स्थिति का अंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गोस्वामी जी के ‘रामचरितमानस’ की गणना विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्यों में होती है। यह महाकाव्य भारतीय लोक के लिए आदर्श आचार-संहिता है। आचार्य स्वयंभू का ‘पउमचरिउ’ जैन दर्शन को केंद्र में रखकर रचा गया है। इसके चलते इस ग्रंथ में वाल्मीकि कृत मूल रामकथा में कई बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होते हैं।
संभवत: ‘पउमचरिउ’ एकमात्र अपवाद है जिसमें रावण का वध श्रीराम के हाथों ना होकर लक्ष्मण के हाथों कराया गया है। प्रचलित रामकथा के कुछ पात्रों के नाम में परिवर्तन भी इसमें देखने को मिलते हैं। हनुमान जी के ब्रह्मचारी रूप की मान्यता के विपरीत उन्हें आठ सहस्त्र पत्नियों के पति के रूप में प्रस्तुत करना, शूर्पणखा को खर-दूषण की पत्नी बताना एवं अन्य अनेक परिवर्तन हैं। इसमें श्रीराम एवं रावण का धार्मिक, सांस्कृतिक परिवेश समान बताया गया है। रावण का चरित्र चित्रण श्रीराम की अपेक्षा विस्तृत है। ‘पउमचरिउ’ के रावण का खलनायकत्व भी उसके प्रति सहानुभूति जगाने में सहायक है।
राम, भारतीय आस्था का चैतन्य स्वरूप हैं। हमारे लोकजीवन के कण-कण और क्षण-क्षण में राम हैं। यही कारण है कि बच्चे के जन्म पर रामलला की बधाइयाँ गाई जाती हैं। संबोधन के लिए हम जीवन भर ‘राम-राम’ कहते हैं। अंतिम सत्य के रूप में काया से चेतन तत्व जब प्रस्थान कर जाता है तो ‘राम नाम सत्य है’ को स्मरण किया जाता है। रामकथा, भारतीय लोकमानस में पैठी हुई है। पारंपरिक रामकथा में परिवर्तन की स्वीकार्यता भी श्रीराम के व्यक्तित्व में अंतर्निहित उदारता का ही प्रतीक है।
गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के देवत्व को रेखांकित किया। जबकि आचार्य स्वयंभू ने उनके मनुष्यत्व को लेखनीबद्ध किया। महत्वपूर्ण यह है कि मनुष्यत्व हो या देवत्व, अंतर्निहित तो रामत्व ही है।
वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि, देवर्षि नारद से पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ पुरुष के बारे में अनेक प्रश्न करते हैं। देवर्षि हर एक का उत्तर देते हुए श्रीराम का नाम गिनाते हैं। इसी क्रम में देवर्षि का यह कथन महत्वपूर्ण है-
सर्वदाभिगत: सद्भि: समुद्र इव सिन्धुभि:।
आर्य: सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शन:॥
जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सदा राम से साधु पुरुष मिलते रहते हैं। वे आर्य एवं सब में समान भाव रखने वाले हैं, उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है।
प्रियदर्शन श्रीराम की कथा को भाषा की दृष्टि से देखें तो रामचरितमानस अवधी में रचा गया है जबकि पउमचरिउ की भाषा अपभ्रंश है। ऐसे में शोधकर्ता के लिए तुलनात्मक अध्ययन जटिल और अनेक प्रश्नों को हल कर आगे बढ़ने की प्रक्रिया हो जाता है। शोधकर्ता डॉ. साठे ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक सूक्ष्म से सूक्ष्म बिंदु का विस्तृत अध्ययन कर तटस्थ भाव से शोध करने का प्रयास किया है। यह श्लाघनीय है।
यह शोध साठ वर्ष पूर्व किया गया था। शोधकर्ता अब दिवंगत हो चुके हैं। देह की नश्वरता के संबंध में गोस्वामी जी रामचरितमानस में लिखते है,
बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा॥
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा॥
अर्थात मनुष्य की देह सौभाग्य से प्राप्त होती है। विभिन्न ग्रंथ कहते हैं कि देवताओं के लिए भी इसकी प्राप्ति सहज नहीं होती। मनुष्य योनि, साधन योनि है। यह मोक्ष प्राप्ति का द्वार है। अतः देह नष्ट होने से पहले इसका सदुपयोग कर अपना परलोक सुधार लेना चाहिए।
आचार्य स्वयंभू ने इस विषय को पउमचरिउ में यूँ व्यक्त किया है,
जं देहु तं णासधम्मु।
णिच्चु ण होइ कइ वि कम्मु॥
जिसे देह कहते हैं, उसका मूल स्वभाव नश्वरता है। स्वाभाविक है कि कोई भी देह जगत में सदा बनी नहीं रह सकती।
छह दशक बाद इस शोध का प्रकाशित होना इस बात की पुष्टि करता है कि देह अनिवार्य रूप से नश्वर है पर विचार और चिंतन ईश्वर हैं। ईश्वर अर्थात समय की सीमा के परे शाश्वत अस्तित्व। अक्षर-अक्षर जोड़कर रचा जाता है साहित्य। यूँ ही ‘अक्षर’ नामकरण नहीं हुआ। जिसका क्षरण नहीं होता वही अक्षर है।
यही कारण है कि संपादक द्वय डॉ. मृणालिनी शहा और डॉ. लतिका जाधव को साठ वर्ष का अंतर प्रभावित नहीं कर पाया और उन्होंने शोध प्रबंध को प्रकाशित करने का बीड़ा उठाया। ज्ञान के नित्य भाव का यह प्रमाण है।
इस प्रबंध के प्रकाशन की व्यावहारिक कठिनाइयाँ रही होंगी। तत्कालीन भाषा, तब की टाइपिंग, अक्षर विन्यास, वर्तनी और व्याकरण में समय-समय पर हुए परिवर्तन इन सब पर संपादक द्वय ने परिश्रम किया है। जिन बातों को ज्यों का त्यों रखने की अपरिहार्यता रही होगी, उन्हें वैसे ही रहने दिया गया है।
स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे द्वारा किया यह महत्वपूर्ण काम है। वस्तुत: किसी भी शोध प्रबंध को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करते हुए अनेक बिंदु विधागत परिवर्तन की मांग करते हैं। शोधप्रबंध के प्रारूप में हर बिंदु के साथ आवश्यक लगने वाले संदर्भ, पुस्तक रूप में उतने प्रयोजनीय प्रतीत नहीं होते। इन सब पर काम करके शोधप्रबंध को शोधकर्ताओं और सामान्य पाठक के हाथ में एक सुपाठ्य पुस्तक के रूप में लाने का बीड़ा दोनों संपादकों ने पूरे सामर्थ्य से उठाया है।
दोनों संपादकों को हार्दिक बधाई। आशा है कि यह पुस्तक हर जिज्ञासु के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। शुभं भवतु।
© संजय भारद्वाज
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



















