(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…५।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०० ☆
☆ – प्रायमरी का मास्टर…५ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
मान होता है मशीनों का
और मास्टर
मर-मर के जीता है।
तो मैं कह रहा था कि
शिक्षक के मन में
राशन या रकम का
प्रश्न प्रमुख नहीं है।
उसे हार्दिक सम्मान दीजिये
उसके लेखे
इससे बड़ा कोई सुख नहीं है।
मैं नहीं कहता कि
वो दूध का धुला है,
या उसमें कोई कमी नहीं है।
वो गल्ती करता है जरूर
पर हुजूर
क्या वो आदमी नहीं है ?
आप कहेंगे
तो मैं नौकरी छोड़ दूँगा।
मुझे कोई मोह नहीं है।
मैनें साफ बात कही है
ये कोई विद्रोह नहीं है।
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “पूज्य पिता जी...”।)
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – मेरी भाषा…
आज 14 सितम्बर अर्थात हिन्दी दिवस है। विभिन्न सरकारी कार्यालयों में हिन्दी पखवाड़ा मनाया भी जा रहा /है।
वस्तुत: भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देनेवाली वाणी है। कूटनीति का एक सूत्र कहता है कि किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति नष्ट करनी हो तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। इस सूत्र को भारत पर शासन करने वाले विदेशियों ने भली भाँति समझा और संस्कृत जैसी समृद्ध और संस्कृतिवाणी को हाशिए पर कर अपने-अपने इलाके की भाषाएँ लादने की कोशिश की।
असली मुद्दा स्वाधीनता के बाद का है। राष्ट्रभाषा को स्थान दिए बिना राष्ट्र के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता को परिभाषित करने की प्रवृत्ति के परिणाम भी विस्फोटक रहे हैं।
यूरोपीय भाषा समूह के प्रयोग से ‘कॉन्वेंट एजुकेटेड’ पीढ़ी, भारतीय भाषा समूह के अनेक अक्षरों का उच्चारण नहीं कर पाती। ‘ड़’, ‘ण’ अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। ‘पूर्ण’, पूर्न हो चला है, ‘शर्म ’ और ‘श्रम’ में एकाकार हो गया है। हृस्व और दीर्घ मात्राओं के अंतर का निरंतर होता क्षय, अर्थ का अनर्थ कर रहा है। ‘लुटना’ और ‘लूटना’ एक ही हो गये हैं। विदेशियों द्वारा की गई ‘लूट’ को ‘लुटना’ मानकर हम अपनी लुटिया डुबोने में अभिभूत हो रहे हैं।
लिपि नये संकट से गुजर रही है। इंटरनेट खास तौर पर फेसबुक, एक्स, वॉट्सएप, इंस्टाग्राम पर अनेक लोग देवनागरी के बजाय रोमन में हिन्दी लिखते हैं। ‘बड़बड़’ के लिए barbar/ badbad (बर्बर या बारबर या बार-बार) लिखा जा रहा है। ‘करता’, ‘कराता’, ‘कर्ता’ में फर्क कर पाना भी संभव नहीं रहा है। जैसे-जैसे पीढ़ी पेपरलेस हो रही है, स्क्रिप्टलेस भी होती जा रही है।
संसर्गजन्य संवेदनहीनता, थोथे दंभवाला कृत्रिम मनुष्य तैयार कर रही है। कृत्रिमता की पराकाष्ठा है कि मातृभाषा या हिन्दी न बोल पाने पर व्यक्ति संकोच अनुभव नहीं करता पर अंग्रेजी न जानने पर उसकी आँखें स्वयंमेव नीची हो जाती हैं। शर्म से गड़ी इन आँखों को देखकर मैकाले और उसके वैचारिक वंशजों की आँखों में विजय के अभिमान का जो भाव उठता होगा, ग्यारह अक्षौहिणी सेना को परास्त कर वैसा भाव पांडवों की आँखों में भी न उठा होगा।
हिन्दी पखवाड़ा, सप्ताह या दिवस मना लेने भर से हिंदी के प्रति भारतीय नागरिक के कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। आवश्यक है कि नागरिक अपने भाषाई अधिकार के प्रति जागरुक हों। समय की मांग है कि हिन्दी और सभी भारतीय भाषाएँ एकसाथ आएँ।
बीते सात दशकों में पहली बार भाषा नीति को लेकर वर्तमान केंद्र सरकार संवेदनशील और सक्रिय दिखाई दे रही है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता, भारत और भारतीयता के पक्ष में स्वयं प्रधानमंत्री ने पहल की है। नयी शिक्षा नीति में भारत सरकार ने पहली बार प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने को प्रधानता दी है। तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीय भाषाओं का प्रवेश हो चुका है, यह सराहनीय है।
केदारनाथ सिंह जी की प्रसिद्ध कविता है, जिसमें वे कहते हैं,
जैसे चींटियाँ लौटती हैं/ बिलों में,
कठफोड़वा लौटता है/ काठ के पास,
वायुयान लौटते हैं/ एक के बाद एक,
लाल आसमान में डैने पसारे हुए/
हवाई-अड्डे की ओर/
ओ मेरी भाषा/ मैं लौटता हूँ तुम में,
जब चुप रहते-रहते/
अकड़ जाती है मेरी जीभ/
दुखने लगती है/ मेरी आत्मा..!
अपनी भाषाओं के अरुणोदय की संभावनाएँ तो बन रही हैं। नागरिकों से अपेक्षित है कि वे इस अरुण की रश्मियाँ बनें।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी।
इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।
साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!
🌼 Words of the Buddha 🌼
Dhammapada 14.183
> “The entire teaching of the Buddha can be distilled into three simple movements: refrain from what is harmful, cultivate what is wholesome, and purify the mind.”
🪷 English
Abstain from all unwholesome deeds,
perform wholesome ones,
purify your mind —
this is the teaching of the Buddhas.
Dhammapada 14.183
💫 The message:
Spiritual life is not complicated. First, stop doing what causes harm. Then, consciously cultivate goodness, kindness and compassion. Finally, turn inward and purify the mind, for our actions and words ultimately arise from the mind.
—
🌿 हिन्दी
सभी अकुशल कर्मों से विरत रहो,
कुशल कर्मों का आचरण करो,
अपने चित्त को शुद्ध करो—
यही बुद्धों की शिक्षा है।
धम्मपद 14.183
🪷 संदेश:
बुद्ध की शिक्षा का सार बहुत सरल है—बुराई से बचें, अच्छाई को अपनाएँ और अपने मन को निर्मल करें। केवल बाहरी आचरण को बदलना पर्याप्त नहीं; वास्तविक परिवर्तन तब होता है जब मन शुद्ध, करुणामय और जागरूक होता है।—
🕉️ Pāli
Sabbapāpassa akaraṇaṃ,
kusalassa upasampadā,
sacittapariyodapanaṃ —
etaṃ buddhāna sāsanaṃ.
🌸 In essence:
Do no harm. Do good. Purify the mind.
Three simple steps — and a whole path to awakening.
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख…” ।)
☆ शेष कुशल # ६८ ☆
☆ व्यंग्य – “ऑनलाइन अध्यक्ष के ऑफ़लाइन दुःख…”– शांतिलाल जैन ☆
पिछले अठ्ठाइस दिनों से कलफ़ लगे कुरते-पजामे अपने पहने जाने की हसरत लिए उनकी ओर तक रहे हैं. उन शॉलों की संख्या में भी इज़ाफा नहीं हो रहा जिनके बारे में उनके मन में एक अदम्य लेकिन भोला विश्वास है कि एक दिन वे कोलकाता के द रसेल एक्सचेंज में नीलाम की जाएँगी और हिंदी जगत का कोई धरोहर प्रेमी कोई उन्हें ऊँची बोली लगाकर खरीद लेगा. उनके शेल्फ में लकड़ी के चौकोर गत्ते पर टिके लगभग नौ इंच ऊँचे तीन जगह से टेढ़े हुए जा रिए स्मृति चिन्ह की वृद्धि दर स्थिर हो गई है. फूलमालाओं की एडिक्ट हो चुकी गर्दन के अपने तकाज़े हैं. रह रह कर एक तलब सी उठती है. कर कमल बुके ग्रहण करने को कुलबुलाने लगते हैं. दरअसल, वे भी चाहते हैं कुरते-पजामे पहने जाएँ मगर विवश हैं. ऑकेजन बन ही नहीं रहा. ऐसा नहीं है कि पिछले अठ्ठाइस दिनों में उन्होंने किसी गोष्ठी की अध्यक्षता न की हो. की है. तीन-चार की है, मगर ऑनलाइन, वर्चुअल. आग लगे ऐसी तकनालॉजी को जिसने अध्यक्षीय ठाठ ख़त्म कर दिए. अध्यक्षता गूगल मीट पर हो तो चाय भी घर की पीनी पड़ती है श्रीमान्. टू-जीबी डेटा ज़ेब का लग जाता है सो अलग. हैरान हैं वे – बारात में जाना और पान-सुपारी घर की खाना, ये कौनसी बात हुई!!
ऑफ़लाइन अध्यक्षयाई के दिन भी क्या स्वर्णिम दिन हुआ करते थे. सुदूर शिमला-मसूरी-नैनीताल तक से ऑफर आया करते थे. जलवा हुआ करे था अध्यक्षजी का. सेकंड एसी से यात्रा. एक्सक्लूसिव टैक्सी का इंतजाम. थ्री स्टार स्टे, मिसेज अध्यक्ष के साथ साईट सीइंग के आनंद का प्रबंध. क्लोज डोअर रसरंजन की सुविधा. मेमोरेबल गिफ्ट. आयोजक बिछे-बिछे जाते थे. डिजिटल क्रांति ने अध्यक्षीय रुतबे पर पानी फेर दिया है. वे बड़े लेखक हैं. चालीस साल पहले उन्होंने एक उपन्यास लिखकर चतुर्दिक ख्याति पाई है. उसके बाद वे चाहकर भी कभी कुछ नहीं लिख पाए, साहित्यिक जगत उन्हें अध्यक्षता से विराम जो लेने नहीं दे रहा. इन चार दशकों में उन्हें अध्यक्ष होने की लत लग गई है. कितना कारूणिक है यह सब कि उम्र और साहित्यिक यात्रा के इस मोड़ पर उन्हें ऑनलाइन के दुःख झेलने पड़ रहे हैं.
सुदूर डेस्टिनेशन तो छोड़िए, इन दिनों शहर के शहर में आयोजक ऑनलाइन कार्यक्रम करा लेते हैं. पर्देदारी यह कि दूसरे शहर से भी कुछ वक्ताओं को जोड़ना है सर. ऑनलाइन से पूर्व के कालखंड में जब अपने ही शहर में हुआ करता था ऑफ़लाइन व्याख्यान तब अध्यक्षजी का जलवा देख देख कर स्थानीय प्रतीक्षारत अध्यक्षीय उम्मीदवारों के कलेजों पर साँप लोट जाया करते थे. ‘हाय हमारा नंबर कब आएगा?’ दो वालिंटियर कार लेकर पंद्रह मिनट पहले घर के बाहर हाज़िर. साहित्य में फिजीकल योगदान देते कार्यकर्ता घंटी देने के बाद अध्यक्षजी के घर से बाहर आने की प्रतीक्षा करते. आपस में बतियाते. बीच बीच में मरियल सी देसी कुतिया को लतियाकर भगाते हुए समय काट रहे हैं. कुतिया भी अध्यक्षजी को लेने आई कार का रियर व्हील भिगोने के मिशन पर है. प्रतिबद्ध. उसे एक सिंपल सा फैक्ट नहीं पता है – एक प्रतिबद्ध प्राणी हर दौर में लतियाया ही जाता है. खैर, साहित्य सेवा में असल त्याग तो इन दोनों वालिंटियर्स का है, दोनों निस्पृह भाव से सड़क पर खड़े उनकी प्रतीक्षा जो कर रहे हैं.
चलिए, अध्यक्षजी तैयार हैं मगर बाहर नहीं आ रहे. टाईम से बाहर निकल आएँ तो अध्यक्ष होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता. एनवक़्त पर डियो मिल नहीं रहा. बेडरूम से ड्राइंगरूम तक आने में समय लग रहा है. कोई बात नहीं – बड़े आदमी हैं. हाँ कर दी यही बहुत है. प्रस्ताव आया तब तो उन्होंने मना ही कर दी थी. मिनिमम तीन मनुहार से कम में हाँ करते ही कब हैं? कहा कि इस दिन मुझे देहरादून एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करने जाना है. काफी मनुहार के बाद उन्होंने देहरादून का कार्यक्रम निरस्त करके इस स्थानीय कार्यक्रम की हाँ की है. घंटाभर प्रतीक्षा भी करना पड़े तो कोई बात नहीं. बड़े आदमी हैं. थैंक गॉड. आधे घंटे बाद ही बाहर आ गए हैं. कार में बैठते बैठते पूछा – अरे आप लोगों ने चाय ली? (पानी तक मयस्सर नहीं हुआ). मगर – नहीं नहीं सर, अभी नहीं. पहले चलते हैं. देर हो गई है. डियो की तेज़ महक से रास्तेभर वालिंटियर्स का जी मिचलाता रहा. मैंने ऊपर बताया ना आपको – साहित्य सेवा में असल त्याग तो इन दोनों कार्यकर्ताओं का है.
बहरहाल, अध्यक्ष होने का जन्मसिद्ध अधिकार पाए साहित्यकार को ऑनलाइन के कारण हिंदी साहित्य में ऐसे बुरे देखने पड़ेंगे उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था. ऊँचा मंच, बीच में उनकी दो इंच ऊँची कुर्सी, बिसलेरी का पानी, संचालिका से बीच बीच में बतियाने का सुख काफ़ूर हो गया है. सामान्यतः मिनिमम ऑडियंस की भूमिका में उनकी अपनी एक निजी सेना होती है. लगभग हर स्थानीय कार्यक्रम में मौजूद. अपनी चेयर पर बैठे बैठे जड़ हो जाने तक जमी रहती. नई किताब की भूमिका लिखवाने की गरज से आखिर तक जमे रहते कुछ नए लेखक, अध्यक्षजी की आँखों की शर्म से रुक जाया करते जूनियर लेखक. कुछ मोबाइल पर बात करने की एक्शन करते करते हॉल से एग्जिट कर जाते, फिर भी कुछ तो अध्यक्षीय उद्बोधन के समाप्त होने तक रुकते ही. क्या तो सुख था! फोटोग्राफर के लेन्स की जद में आते ही अध्यक्षजी सीरियस हो जाते, गंभीर मुद्रा में सोचने लगते या कुछ नोट्स लेने की अदाएँ फोटो में कैद करा लेते. अब तो बस स्क्रीन शॉट है, इनसेट-वन-बी से मौसम की ली हुई तस्वीर से मिलता जुलता. और है एक मसोसा हुआ मन. अध्यक्षीय धज ख़त्म जो हो गई है.
ऑनलाइन कार्यक्रमों से आयोजकों के अलावा किसी को आराम मिला है तो वो माँ शारदे को मिला है. डेढ़ बाय दो की फ्रेम में कैद माँ को आभार प्रदर्शन की आख़िरी पंक्ति तक सुनना पड़ती थी. चार अगरबत्तियों की खुशबू में साढ़े तीन घंटे गुजारना कितना भारी पड़ता था उन्हें. इनके चक्कर में वीणा बजाने की रियाज़ छूट जाया करती सो अलग. प्रोग्राम के बाद अध्यक्षजी तो कार में निकल जाया करते, उन्हें किसी वालिंटियर की एक्टिवा के फुट-बोर्ड पर लौटना पड़ता. प्रसन्न हैं वे, ऑफ़लाइन में शिरकत करने की विवशताएँ ख़त्म जो हो गई हैं.
आशा पर आकाश टिका है श्रीमान्. ऑफ़लाइन का बीज अभी पूरी तरह डूबा नहीं है. रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह बीच बीच में कहीं कहीं ऑफ़लाइन बुलावे भी आ रहे हैं. अठ्ठाइस दिन पहले एक ऑफ़लाइन कार्यक्रम में बुलाए जाने से मिले रिजुविनेशन से चार हफ्ते कट गए. अब फिर कलफ़ लगे कुरते-पजामे अपने पहने जाने की हसरत लिए उनकी ओर तक रहे हैं. पुराने दिन वैसे के वैसे लौटेंगे कि नहीं पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता. हम तो यही चाहेंगे आग लगे गूगल-मीट, झूम-मीटिंग, माइक्रोसॉफ्ट-टीम, मेटावर्स की तकनालॉजी में. अध्यक्षजी के अच्छे दिन लौट आएँ – हमारी शुभकामनाएँ.
फ़िल-वक़्त “Meeting Ended by Host”.
-x-x-x-
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – हिंदी का मान करें…!
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – हिंदी भाषा का बदलता स्वरूप: परम्परा से डिजिटल युग तक।)
☆ आलेख – हिंदी भाषा का बदलता स्वरूप: परम्परा से डिजिटल युग तक ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम नहीं बल्कि किसी समाज की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना, जीवन दृष्टि और सामाजिक सम्बन्धों की संवाहिका होती है। हिंदी भाषा ने भी भारतीय समाज के बदलते सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और तकनीकी परिवेश के साथ निरंतर अपना स्वरूप बदला है। संस्कृत, प्राकृत,अपभ्रंश और विभिन्न लोकभाषाओं की विकास परम्परा से निर्मित आधुनिक हिंदी ने भक्ति आंदोलन,औपनिवेशिक काल, राष्ट्रवादी आंदोलन, स्वतंत्रता प्राप्ति, जनसंचार माध्यमों और भूमंडलीकरण के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए आज डिजिटल युग में प्रवेश किया है। आज हिंदी का स्वरूप मुद्रित पुस्तकों और औपचारिक लेखन तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, ब्लॉग, बेबसाइट, डिजिटल पत्रकारिता, मोबाइल संदेश, वीडियो मंच, पाॅडकास्ट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे तकनीकी माध्यमों ने हिंदी के प्रयोग की नई संभावनाएँ खोली हैं, साथ ही रोमन लिपि में हिंदी लेखन, हिंग्लिश,संक्षिप्त शब्दावली,इमोजी और त्वरित संचार ने हिंदी की पारम्परिक भाषिक संरचना के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं,इसलिए आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि हिंदी किस दिशा में बदल रही है और इस परिवर्तन का उसके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
भाषा में परिवर्तन प्रकृति का नियम है। कोई भी जीवित भाषा पूर्णत: स्थिर नहीं रह सकती। समाज में नए विचार आते हैं तो नए शब्दों की आवश्यकता होती है। नई तकनीक विकसित होती है तो नए शब्द आते हैं। सामाजिक सम्बन्धों में बदलाव होता है तो सम्बोधन और अभिव्यक्ति के तरीके भी बदलते हैं, अत: भाषा की जीवंतता का प्रमाण उसका परिवर्तन है। समस्या परिवर्तन में नहीं, उस समय उत्पन्न होती है जब परिवर्तन के कारण भाषा की अभिव्यक्तिगत क्षमता, व्याकरणिक स्पष्टता या सांस्कृतिक स्मृति कमजोर होने लगे। हिंदी की शक्ति उसके आधुनिक शब्दकोश में नहीं अपितु उसकी व्यापक लोक सांस्कृतिक जड़ों में है। भारतीय समाज में भाषा और लोकजीवन का सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है। लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें-मुहावरे आदि परम्पराएँ हिंदी के भाषिक संसार को समृद्ध करती रहीं हैं। ‘ जैसा देश, वैसी भाषा ‘ केवल कहावत नहीं, हिंदी के विकास की वास्तविकता है। अलग-अलग क्षेत्रों ने हिंदी को अपनी ध्वनि, शब्द और मुहावरे प्रदान किए। ब्रजभाषा ने हिंदी साहित्य की कृष्णभक्ति और शृंगार की समृद्ध अभिव्यक्ति दी। अवधी ने रामकथा और लोकजीवन को स्वर दिया। भोजपुरी, बुंदेली, मैथिली आदि ने हिंदी की शब्द सम्पदा और सांस्कृतिक चेतना को व्यापक बनाया। भक्तिकाल में तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, रैदास आदि ने हिंदी का लोकव्यापीकरण किया। आधुनिक हिंदी के निर्माण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने आधुनिक पत्रकारिता, नाटक और गद्य को नई दिशा दी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा के परिष्कार और अनुशासन पर बल दिया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भाषा का प्रश्न राष्ट्रीय चेतना से जुड़ गया। समाचार पत्रों की भाषा, टेलीविजन, डिजिटल पत्रकारिता ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया। शीर्षक छोटे हो गए, समाचार प्रस्तुति त्वरित हुई है और पाठक टिप्पणी के माध्यम से भाषिक संवाद का हिस्सा बन गया है।
इंटरनेट ने हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर प्रस्तुत किए हैं। पहले हिंदी में प्रकाशन के लिए मुद्रण की आवश्यकता होती थी अब कोई भी व्यक्ति ब्लॉग, बेबसाइट या सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी में सामग्री प्रकाशित कर सकता है। डिजिटल युग ने हिंदी को अवसर तो दिए हैं लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से लिखने के कारण वर्तनी की अनेक त्रुटियाँ दिखाई देतीं हैं। रोमन लिपि के अत्यधिक प्रयोग से देवनागरी लेखन अभ्यास प्रभावित हो सकता है। हिंग्लिश का अतिरेक भाषिक अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकता है। त्वरित डिजिटल संचार के कारण गंभीर और चिंतनपरक लेखन के लिए समय कम होता जा रहा है। इन सभी चुनौतियों के बावजूद हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन पत्रकारिता, ई-पुस्तकें, ऑडियो-वीडियो साहित्य, पाॅडकास्ट, डिजिटल शोध, मशीन अनुवाद, भाषा तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक हिंदी शिक्षण आदि विस्तार का अवसर बन सकते हैं।
अंतत: कहा जा सकता है कि हिंदी भाषा का वर्तमान स्वरूप उसकी हजारों वर्षों की परिवर्तनशील यात्रा का परिणाम है। डिजिटल युग ने हिंदी को अभूतपूर्व विस्तार दिया है, सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, यूनिकोड ने देवनागरी को डिजिटल आधार दिया है, ऑनलाइन शिक्षा ने हिंदी में ज्ञान की नई सम्भावनाएँ पैदा की हैं। इन परिस्थितियों में हिंदी के प्रति न तो अंध परम्परावाद उचित है और न ही अंध आधुनिकतावाद। आवश्यक है कि हिंदी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक तकनीक को स्वीकार करे। हिंदी की शक्ति उसके परिवर्तन में है और उसकी पहचान परम्परा में निहित है, इसलिए हिंदी के भविष्य की सही दिशा यही होगी,जिसमें परम्परा से संस्कार,आधुनिकता से विस्तार, तकनीक से गति और साहित्य से संवेदना प्राप्त हो।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुड़ और शक्कर…“।)
अभी अभी # १०९२ ⇒ आलेख – गुड़ और शक्कर श्री प्रदीप शर्मा
गुड़ तो गुणों की खान है। शक्कर के अवगुणों से हम लोग अब भी अनजान हैं। जब भी कोई खुशी का मौका आया, लोग झट से बोल उठते हैं, आपके मुँह में घी-शक्कर! ऐसे मौकों पर किसी को आहत नहीं किया जाता। वह मीठा बोल ही रहा है न, कोई खिला तो नहीं रहा।
शक्कर कोई आसमान से नहीं टपकती! वह भी गुड़ से ही बनती है। गुड़ गन्ने से बनता है। गन्ना खेत में उगता है। बचपन में हम जब शहर के आसपास के गाँवों में जाते थे, तो गन्ने के खेत लहलहाया करते थे और गाँव गाँव में कड़ाहों में गुड़ बनाया जाता था। गुड़ हम वहाँ खा जाया करते थे, और गन्ने घर ले आया करते थे।।
एक समय, हमारे प्रदेश के ही निमाड़ और धार जिले में कई शुगर मिलें थीं। जनता पार्टी के राज में गन्ने का मूल्य इतना सस्ता हो गया था कि लोग गन्ना बेचने के बजाए जलाने लग गए थे। आज भी महाराष्ट्र प्रदेश गन्ना और शक्कर उत्पादन में अग्रणी है।
शकर को हम चीनी भी कहते हैं। गन्ने को अंग्रेज़ी में भले ही शुगर-कैन कहते हों, गुड़ को अंग्रेज़ी में jaggery कहते हैं, शुगर नहीं। और यह भी जान लीजिए, लोगों को शकर की बीमारी होती है, गुड़ और शहद की नहीं। आज से चीनी कम।।
हर भारतीय रसोई में आज भी गुड़ ज़रूर मिलेगा। हर भारतीय थाली में एक गुड़ का टुकड़ा अवश्य रखा जाता था। प्रसाद में पहले गुड़-चने का प्रचलन था, जो कालांतर में चने-चिरौंजी का प्रसाद कहलाने लगा। आज बच्चे गुड़ को dairy milk के नाम से पहचानते हैं। कई सब्जियों में मिठास के लिए गुड़ का ही प्रयोग होता है, शकर का नहीं। सक्रांति के त्योहार पर तिल गुड़ खाकर मीठा बोला जाता है और ठंड में गुड़ की गजक के क्या कहने।
यही हाल नमक का है। पहले घरों में डल्ले वाला नमक आता था। सरकार आज भी iodized नमक का विज्ञापन कर रही है, जिससे थायरॉइड जैसी बीमारी पर रोक लगती है और दूसरी ओर प्राकृतिक चिकित्सक सफ़ेद नमक को ज़हर घोषित करने पर तुले हैं। टाटा शान से अपना नमक यह कहकर बेच रहा है, कि आपने देश का नमक खाया है। किसी को अपना नमक खिलाकर देशभक्त बनाना कोई टाटा से सीखे और अपने मंदिर में घंटी बजाकर भक्त बनाना बिड़ला मंदिर से।।
शुगर और बीपी दोनों ही बीमारियां शकर और नमक से होती हैं अतः आपसे करबद्ध निवेदन है कि आप भले ही गुड़ खाएँ और गुलगुले से परहेज करें, लेकिन अपने भोजन में नमक और शकर की मात्रा अवश्य घटाएँ।
अंत में एक और काम की बात! जब गुणवत्ता में गुड़, शक्कर से बेहतर है, तो गुरु भी गुड़ ही रहेगा और चेला उससे कमतर, यानी शक्कर। गुरु गुड़ की मिठास है और चेला शक्कर, यानी मधुमेह बीमारी की जड़। किसी ने ग़लत नहीं कहा, अगर गुरु को गुड़ कहा, और चेले को शक्कर। गुरु गुड़ ही रहेगा, और चेला, शक्कर।।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – शादी का गुलाब जामुन।)
☆ चुभते तीर # १३६ – व्यंग्य – शादी का गुलाब जामुन☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
अवधेश जी के जीवन का एक ही ध्येय था—शादी के मंडप में बने ‘वीआईपी’ खाने की गुणवत्ता का निरीक्षण करना। वे मोहल्ले के ऐसे पारखी थे जो बिना न्यौता कार्ड देखे भी बता सकते थे कि किस मैरिज हॉल में असली देसी घी का इस्तेमाल हो रहा है और कहाँ रिफाइंड का गोलमाल चल रहा है।
इस बार शादी उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी, पड़ोस के वर्मा जी के बेटे की थी। वर्मा जी ने तीन महीने पहले से ही शेखी बघारना शुरू कर दिया था कि उन्होंने लखनऊ के सबसे महंगे हलवाई को बुलाया है और जो गुलाब जामुन उनकी शादी में मिलेगा, वैसा पूरे प्रदेश में कहीं नहीं बना होगा।
अवधेश जी शादी में पहुंचे तो उनकी नज़र सीधे मीठे के स्टॉल पर टिकी। वहाँ एक विशाल पीतल के कड़ाहे में गरमा-गरम बड़े-बड़े गुलाब जामुन तैर रहे थे। खुशबू ऐसी थी कि दूर खड़े आदमी के मुंह में भी पानी आ जाए। अवधेश जी ने अपनी प्लेट उठाई और गुलाब जामुन के काउंटर की तरफ कदम बढ़ाए।
लेकिन जैसे ही वे पहुँचे, हलवाई ने एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया—’आरक्षित: केवल समधी जी और विशेष अतिथियों के लिए’।
अवधेश जी की अनाहत भावना तिलमिला उठी। एक तरफ वर्मा जी दूर खड़े होकर उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे, जैसे कह रहे हों—’आज तो तरसते ही रह जाओगे अवधेश जी!’
अवधेश जी ने ठान लिया कि चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, वे वह गुलाब जामुन खाकर ही रहेंगे। उन्होंने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने देखा कि समधी जी का परिवार एक अलग बने लाल शामियाने में बैठा हुआ था, जहाँ वेटर हाथ में ढकी हुई चांदी की थालियाँ लेकर जा रहे थे।
अवधेश जी ने झट से अपनी जैकेट उतारी, गले में एक लाल गमछा लपेटा और एक खाली थाल उठाकर सीधे वीआईपी शामियाने की तरफ बढ़ गए। वे ऐसे हाव-भाव से चलने लगे जैसे शादी के मुख्य प्रबंधक वही हों।
शामियाने के गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी ने उन्हें रोका, “सर, आप अंदर कहाँ जा रहे हैं?”
धेश जी ने आंखें तरेरीं और कड़क आवाज़ में बोले, “मूर्ख! दिखता नहीं कि समधी जी की स्पेशल प्लेट में एक गुलाब जामुन कम है? अगर उन्होंने बुरा मान लिया तो शादी रुक जाएगी, ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी?”
सुरक्षाकर्मी डर के मारे पीछे हट गया। अवधेश जी सीधे मुख्य मेज़ पर पहुंचे जहाँ दूल्हे के पिता यानी स्वयं समधी जी बैठे थे। अवधेश जी ने बहुत ही आदर से प्लेट उनके सामने रखी और एक बड़ा सा गुलाब जामुन अपनी प्लेट में उठाकर कोने में टेबल पर बैठ गए।
पहला चम्मच मुंह में डालते ही अवधेश जी की आंखें बंद हो गईं। सचमुच, ऐसा अद्भुत स्वाद उन्होंने पहले कभी नहीं चखा था। लेकिन तभी पीछे से वर्मा जी की कड़क आवाज़ गूंजी, “अवधेश जी! आप समधी जी के निजी शामियाने में क्या कर रहे हैं?”
पूरा शामियाना शांत हो गया। समधी जी ने अवधेश जी की तरफ देखा। अवधेश जी का राज़ खुल चुका था।
अवधेश जी आराम से खड़े हुए, मुंह का निवाला निगला और मुस्कुराकर बोले, “वर्मा जी, मैं तो बस यह जांचने आया था कि आपके समधी जी को सबसे बेहतरीन चीज़ मिल रही है या नहीं। और अब मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि समधी जी, आपने बिल्कुल सही घर में रिश्ता जोड़ा है, जहाँ मेहमानावजी दिल से होती है!”
समधी जी खुशी से गद्गद हो गए। उन्होंने उठकर अवधेश जी को गले लगा लिया और कहा, “वाह! ऐसे फ़िक्र करने वाले पड़ोसी किस्मत वालों को मिलते हैं।”
पूरा शामियाना तालियों से गूंज उठा। वर्मा जी का मुंह बन गया, लेकिन उन्हें भी मुस्कुराकर ताली बजानी पड़ी, जबकि अवधेश जी आराम से दूसरा गुलाब जामुन उठाने लगे।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अंधकार…”।)