सूचनाएँ/Information ☆ विश्ववाणी हिंदी संस्थान –  २०  वां  दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान लघुकथा पर्व आयोजित  ☆

सूचनाएँ/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ विश्ववाणी हिंदी संस्थान –  २०  वां  दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान लघुकथा पर्व आयोजित  ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

 

जबलपुर, २३-५-२०२०। विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर के  २० वे दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान लघुकथा पर्व में देश के विविध राज्यों के २५ लघुकथाकारों ने सहभागिता की। इस महत्वपूर्ण अनुष्ठान की मुखिया समर्पित समाजसेवी, से. नि. प्राध्यापक आशा रिछारिया तथा पाहुना लघुकथा आंदोलन की शिखर हस्ताक्षर कांता रॉय भोपाल के स्वागतोपरान्त इंजी. उदयभानु तिवारी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।  कोकिलकंठी गायिका मीनाक्षी शर्मा ‘तारिका’ ने आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ द्वारा रचित हिंदी महिमा के दोहों की प्रभावी प्रस्तुति की। विषय प्रवर्तन करते हुए संयोजक आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने मनुष्य के जन्म के पूर्व ही कथा के उद्भव का संकेत देते हुए महाभारत के अभिमन्यु प्रसंग को उठाया। उन्होंने शिशु कथा, बाल कथा, किशोर कथा, पर्व कथा, बोध कथा, लोक कथा, आदि को लघु कथा के विविध प्रकार निरूपित करते हुए मानकों के पिंजरे में रचनाधर्मिता को कैद कर कृत्रिम साहित्य सृजन को दिशाहीन बताया।

वरिष्ठ लघुकथाकार लक्ष्मी शर्मा ने ‘स्टोर रूम’ शीर्षक लघुकथा में वृद्धों को घरों से बाहर किये जाने की समस्या को उठाया। अर्चना मलैया की लघुकथा ‘बोलते पौधे’ में हरीतिमा के प्रति संवेदशीलता प्रदर्शित हुई। छाया त्रिवेदी की लघुकथा ‘पत्तल दोना और कोरोना’ में परिस्थितिजनित व्यवहारिकता को प्रस्तुत किया। संस्कृत, हिंदी और बुंदेली की विदुषी लेखिका डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने ‘कचौट’ लघुकथा में सामाजिक मर्यादा के नाम पर असंवेदनशील व्यवहार से जीवन भर टीसती कचौट को सामने लाती है और बदलती सामाजिक परिस्थितियों को स्वीकारने का संदेश देती है। ‘प्रश्नचिन्ह’ शीर्षक लघुकथा में डॉ. भावना मिश्र ने व्यक्तिगत हित को वरीयता देने और सामाजिक संबंधों की उपेक्षा से उपजी त्रासदी को शब्दित किया। प्रीती मिश्र  की लघुकथा ‘स्वच्छता’ शीर्षकानुरूप सन्देशवाही लघुकथा है। टीकमगढ़ के लघुकथाकार राजीव् नामदेव ‘राना लिघौरी’ ने ‘बिजनेस’ शीर्षक लघुकथा में भिखारी द्वारा चल करने और उसे उचित ठहरने की मानसिकता को उद्घाटित किया।

डॉ. मुकुल तिवारी ने ‘प्यासे पशु’ शीर्षक लघुकथा में व्यावहारिक बुद्धि के अभावऔर मीना भट्ट की लघुकथा ने जेबकतरी से  उत्पन्न त्रासदी को शब्द दिए। दतिया के प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव ‘असीम’ ने लघुकथा ‘सोच’ में माँ के प्रति लापरवाह बेटे और बेटे के प्रति मोहान्ध माँ को चित्रित किया। इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार की लघुकथा ‘नर्मदा मैया की जय विकास कार्यों के प्रति ग्रामीणों के अंध विरोध तथा उनसे लाभ मिलने पर स्वीकारने की मानसिकता को सामने लाती है। विश्वासघाती पति को दो पत्नियों द्वारा दंडित करने पर केंद्रित लघुकथा प्रस्तुत की भारती  नरेश पाराशर ने। ‘स्पेसवासी’ लघुकथा में छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ने लघुकथा ‘स्पेसवासी’ में पारिस्थितिक जटिलता को परिहास में लेकर जिंदादिली से जीने  एक संदेश देती है। इंजी अरुण भटनागर ने कोरोना त्रासदी की नीरसता को पौधों की प्रेम वार्ता के माध्यम से तोड़ते हुए जीवन को पूर्णता से जीन एक संदेश दिया। सपना सराफ की लघुकथा ‘प्रेमकथा’ चित्रपटीय नाटकीयता पूर्ण है। पानीपत से सम्मिलित हुई मंजरी शुक्ल ने ‘सोच’ शीर्षक लघुकथा  में औरों की खुशी में सम्मिलित होकर खुश होने का सुन्दर संदेश दिया। भिंड से आई लघुकथाकार मनोरमा जैन ‘पाखी’ ने छद्म शौक के पाखंड पर प्रहार करती लघुकथा प्रस्तुत की। नक्सलवाद से प्रभावित बस्तर से  सुपरिचित लघुकथाकार रजनी शर्मा ने आदिवासी बोली हल्बी मिश्रित हिंदी में जीवन परिदृश्य प्रस्तुत करते हुए अणुदा लघुकथा  आदिवासियों और वनों के संबंध में बाधक बनते शासन-प्रशासन और विकास कार्यों से उपजी त्रासदी को उद्घाटित करती है। मीनाक्षी शर्मा ‘तारिका’ ने प्रथम लघुकथा प्रस्तुत करते हुए कल की चिंता छोड़कर आज का स्वागत करने का संदेश दिया। सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ने ‘सहोदर’ शीर्षक लघुकथा में घटनाओं के तानेबाने में छिपे संबंधों के कुहासे में सच को तलाशते किशोर की मानसिक समस्या, सवालों को उठाती है। कार्यक्रम की मुखिया से. नि. प्राध्यापिका आशा रिछारिया की लघुकथा ‘असल धर्म’ में कोरोना त्रासदी से भूखे मजदूरों मजदूरों की मदद देने का प्रेरक संदेश देती है। विश्ववाणी हिंदी संसथान के संयोजक-संचालक आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने लघुकथा मोहन भोग में रोजगार गंवा चुके मजदूरों के पलायन और भुखमरी की समस्या को उठाते हुए उन्हें भोजन करने को भगवन को चढ़ाये मोहन भोग की तरह बताया। दमोह की लघुकथाकार बबीता चौबे ‘शक्ति’ ने अपनी लघुकथा ‘तुम्हारी साथी’लघुकथा में पंचेन्द्रियों से संवाद के माध्यम से नारी विश्वास का संकेतन किया गया। दिल्ली की सफल लघुकथाकार सुषमा शैली की लघुकथा ‘बाल मन’ में आर्थिक अभाव के बावजूद एक बच्चे के मन में दूसरे बच्चे के प्रति उपजी संवेदना उभर कर सामने आई।

अध्यक्षीय संबोधन में  श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता आशा रिछारिया जी  ने विविध भाषा-बोलिओं के समन्वय को श्रेयस्कर बताते हुए लघुकथा में विविध प्रांतों के लघुकथाकारों के सम्मिलित होने पर हर्ष व्यक्त करते हुए कार्यक्रम को सफल निरूपित किया। मुख्य अतिथि कांता राय ने विषय प्रवर्तन में प्रस्तुत किये गए लघुकथा के विकास को सराहते हुए प्रत्येक लघुकथा पर अपनी राय व्यक्त की। अंत में इंजी अरुण भटनागर ने आभार प्रदर्शन किया।

 

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  Buddha#3 – Anapanasati Sutta ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ BUDDHA –  Anapanasati Sutta  ☆ 

Video Link >>>>

Buddha – Anapanasati Sutta

The meditator, having gone to the forest, to the shade of a tree, or to an empty building, sits down with legs folded crosswise, body held erect, and sets mindfulness to the fore. Always mindful, the meditator breathes in; mindful, the meditator breathes out.

The sixteen contemplations:

FIRST TETRAD (BODY GROUP)

  1. While breathing in long, one knows: “I breathe in long.” While breathing out long, one knows: “I breathe out long.”
  2. While breathing in short, one knows: “I breathe in short.” While breathing out short, one knows: “I breathe out short.”
  3. One trains oneself: “Sensitive to the whole body, I breathe in. Sensitive to the whole body, I breathe out.”
  4. One trains oneself: “Calming the whole body, I breathe in. Calming the whole body, I breathe out.”

SECOND TETRAD (FEELINGS GROUP)

  1. One trains oneself: “Sensitive to rapture, I breathe in. Sensitive to rapture, I breathe out.”
  2. One trains oneself: “Sensitive to pleasure, I breathe in. Sensitive to pleasure, I breathe out.”
  3. One trains oneself: “Sensitive to mental processes, I breathe in. Sensitive to mental processes, I breathe out.”
  4. One trains oneself: “Calming mental processes, I breathe in. Calming mental processes, I breathe out.”

THIRD TETRAD (MIND GROUP)

  1. One trains oneself: “Sensitive to the mind, I breathe in. Sensitive to the mind, I breathe out.”
  2. One trains oneself: “Gladdening the mind, I breathe in. Gladdening the mind, I breathe out.”
  3. One trains oneself: “Steadying the mind, I breathe in. Steadying the mind, I breathe out.”
  4. One trains oneself: “Liberating the mind, I breathe in. Liberating the mind, I breathe out.”

FOURTH TETRAD (WISDOM GROUP)

  1. One trains oneself: “Focusing on impermanence, I breathe in. Focusing on impermanence, I breathe out.”
  2. One trains oneself: “Focusing on fading away, I breathe in. Focusing on fading away, I breathe out.”
  3. One trains oneself: “Focusing on cessation, I breathe in. Focusing on cessation, I breathe out.”
  4. One trains oneself: “Focusing on relinquishment, I breathe in. Focusing on relinquishment, I breathe out.”

(Translated from Pali by Thanissaro Bhikkhu)

BREATH BY BREATH – THE LIBERATING PRACTICE OF INSIGHT MEDITATION – LARRY ROSENBERG WITH DAVID GUY

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (8) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

 

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च ।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌ ।।8।।

 

इन्द्रियों से वैराग्य हो, अहंकार से दूर

जन्म-मृत्यु, जरा, व्याधि,दुख द्वेष खोज भरपूर ।।8।।

 

भावार्थ :  इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना।।8।।

 

Indifference to  the  objects  of  the  senses,  also  absence  of  egoism,  perception  of  (or  reflection on) the evil in birth, death, old age, sickness and pain,।।8।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य ☆ प्रसंग/कविता ☆ प्रसंग- संकट सब पर है / कविता – बेहद उदास रहती है गिलहरी ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 

(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध। आज प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  की एक विचारणीय प्रसंग “संकट सब पर है एवं कविता  ”बेहद उदास रहती है गिलहरी “।  डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  के इस सार्थक एवं समसामयिक  प्रसंग एवं  कविता के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।  ) 

 ☆ संकट सब पर है ☆

पता नहीं क्यों मैं उन महापुरुषों से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ जो इस संकट में बहुत कुछ पॉजिटिव खोज ले रहे हैं। वे इससे बहुत खुश हैं कि कोई सड़क हादसा नहीं हुआ।गंगा निर्मल हो गई। काशी के अस्सी घाट पर कोई अंतिम संस्कार नहीं हुआ। हार्ट अटैक कम हो गए और भी बहुत कुछ। जब कोई घर से ही नहीं निकल पा रहा तो अस्पताल कहाँ से और कैसे पहुँचेगा। ज़िंदा कहीं नहीं निकल पा रहा तो मुर्दा कैसे काशी यात्रा पर जाएगा। गंगा जी तो बिना कोरोना के भी निर्मल हो सकती थीं।

कल एक गाय अपने चिल्लाते हुए बछड़े को छोड़ नहीं पा रही थी। कुछ दूर जाकर लौट-लौट कर आकर बार-बार उसे चाट रही थी। यह दृश्य मैं और मेरी धर्मपत्नी अपनी बोलकनी से देख रहे थे।

मैं तो वहाँ से हट गया पर श्रीमती गायत्री शर्मा जी वहीं डटी रहीं। एक माँ का दर्द माँ ही जान सकती है।

उस गाय का बार-बार आना-जाना वह ऐसे देख रही थी कि बहुत संभव है उसे उसके कदम तक याद हो गए हों।

अंतत: बछड़ा खड़ा हो गया और वे दोनों वहाँ से चले गए। लेकिन हम दोनों बहुत देर तक उदास रहे । कुछ मुखर तो बहुत कुछ मौन भाषा में प्राणि जगत पर छाए संकट पर विमर्श करते रहे।

संकट सिर्फ़ मानव पर ही नहीं सब पर है।

इसी प्रसंग में प्रस्तुत है अपनी एक कविता-

 ☆  बेहद उदास रहती है गिलहरी  

बचपन में

तैरने के लिए

लबालब भरा

एक बड़ा -सा तलाव रहता था

हमारे गाँव में

सीप,घोंघे,केकड़े

सिंघाड़े-सा

मुँह निकाले कछुए

मोतियों की आँखें लिए

लपालप उछलती

मछलियाँ भरी रहती थीं

उस तलाव में

गिलहरियाँ ही गिलहरियाँ

थीं हमारी बगिया में

मोरों के केका

कोयलों की कूक से

आबाद थी बगिया

पेड़ कटे तो

गायब हो गईं गिलहरियाँ

न जाने कहाँ उड़ गए

मोर,कोयलें,सुग्गे,कौए,कठफोरवा,नीलकंठ

और,

न जाने कितनी और भी

नाम- बेनाम चिड़ियाँ

एक गिलहरी का जोड़ा बचा था

पिछवाड़े के अमरूद पर

कच्चे अमरूदों,डालियों और पत्तियों तक से

गाढ़ी दोस्ती थी उनकी

तलाव सूखा

साथ में अमरूद

और एक गिलहरी भी

(पता नहीं

इसी गम में

या गिर कर मरी हो वह)

झर कर गिर गई

सूखे पत्ते की मानिंद

बची हुई भी

बस बची भर है

इन दिनों

अमरूद पर

अनुलोम-विलोम नहीं करती

न ही पिछले पैरों पर खड़ी होकर

जायजा लेती है

मुँह नहीं चलाती

मूँछों पर ताव नहीं देती

बमुश्किल दीवारों पर

थकी-थकी-सी

चढ़ती-उतरती

चारों तरफ़ घुंघची-सी आँखों से

कुछ खोजती हुई

बेहद उदास रहती है गिलहरी।

 

©  डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

सूरत, गुजरात

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 38 ☆ अमलतास  ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  प्रकृति के आँचल में लिखी हुई एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  “अमलतास ”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 38 ☆

  ☆ अमलतास 

 

पीतांबर है या

पहनी अंशुमालाएँ?

या किरणों का

उत्सर्ग हुआ ।

 

गदराया है,

सोना पेड़ पर

या मौसम ही

सोने सा हुआ।

 

कोई कहे

जादु हुआ है,

या कोई कहे

यह गजब हुआ ।

 

© सुजाता काळे

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पियाँ- 9 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  ☆  चुप्पियाँ- 9

मेरी चुप्पी का

जवाब पूछने

आया था वह,

मेरी चुप्पी का

एन्सायक्लोपीडिया

देखकर

चुप हो गया वह!

# दो गज की दूरी, है बहुत ही ज़रूरी।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

( प्रात: 9:45, 2.9.2018)

(कवितासंग्रह *चुप्पियाँ* से)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 5 – अशोक कुमार ….2 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : अशोक कुमार ….2 पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 5 ☆ 

☆ हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : अशोक कुमार ….2 ☆ 

अपने समय में (1940 के बाद के वर्षों में) अशोक कुमार का क्रेज़ ऐसा था कि वे कभी-कभार ही घर से निकलते थे और जब भी निकलते तो भारी भीड़ जमा हो जाती और ट्रैफिक रुक जाता था. भीड़ दूर करने के लिए कभी-कभी पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती थीं. रॉयल फैमिलीज़ और बड़े घरानों की महिलाएं उन पर फिदा थीं और लाइन मारती थीं.

अशोक कुमार को 1943 मे बांबे टाकीज की एक अन्य फ़िल्म किस्मत में काम करने का मौका मिला। इस फ़िल्म में अशोक कुमार ने फ़िल्म इंडस्ट्री के अभिनेता की पांरपरिक छवि से बाहर निकल कर अपनी एक अलग छवि बनाई। इस फ़िल्म मे उन्होंने पहली बार एंटी हीरो की भूमिका की और अपनी इस भूमिका के जरिए भी वह दर्शको का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने मे सफल रहे। किस्मत ने बॉक्स आफिस के सारे रिकार्ड तोड़ते हुए कोलकाता के चित्रा सिनेमा हॉल में लगभग चार वर्ष तक लगातार चलने का रिकार्ड बनाया।

बांबे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय की मौत के बाद 1943 में अशोक कुमार बॉम्बे टाकीज को छोड़ फ़िल्मिस्तान स्टूडियों चले गए। वर्ष 1947 मे देविका रानी के बाम्बे टॉकीज छोड़ देने के बाद अशोक कुमार ने बतौर प्रोडक्शन चीफ बाम्बे टाकीज के बैनर तले मशाल, जिद्दी और मजबूर जैसी कई फ़िल्मों का निर्माण किया। इसी दौरान बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले उन्होंने 1949 में प्रदर्शित सुपरहिट फ़िल्म महल का निर्माण किया। उस फ़िल्म की सफलता ने अभिनेत्री मधुबाला के साथ-साथ पार्श्वगायिका लता मंगेश्कर को भी शोहरत की बुंलदियों पर पहुंचा दिया था।

पचास के दशक मे बाम्बे टॉकीज से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी खुद की कंपनी शुरू की और जूपिटर थिएटर को भी खरीद लिया। अशोक कुमार प्रोडक्शन के बैनर तले उन्होंने सबसे पहली फ़िल्म समाज का निर्माण किया, लेकिन यह फ़िल्म बॉक्स आफिस पर बुरी तरह असफल रही। इसके बाद उन्होनें अपने बैनर तले फ़िल्म परिणीता भी बनाई। लगभग तीन वर्ष के बाद फ़िल्म निर्माण क्षेत्र में घाटा होने के कारण उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी बंद कर दी। 1953 मे प्रदर्शित फ़िल्म परिणीता के निर्माण के दौरान फ़िल्म के निर्देशक बिमल राय के साथ उनकी अनबन हो गई थी। जिसके कारण उन्होंने बिमल राय के साथ काम करना बंद कर दिया, लेकिन अभिनेत्री नूतन के कहने पर अशोक कुमार ने एक बार फिर से बिमल रॉय के साथ 1963 मे प्रदर्शित फ़िल्म बंदिनी मे काम किया । यह फ़िल्म हिन्दी फ़िल्म के इतिहास में आज भी क्लासिक फ़िल्मों में शुमार की जाती है। 1967 मे प्रदर्शित फ़िल्म ज्वैलथीफ में अशोक कुमार के अभिनय का नया रूप दर्शको को देखने को मिला। इस फ़िल्म में वह अपने सिने कैरियर मे पहली बार खलनायक की भूमिका मे दिखाई दिए। इस फ़िल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया। अभिनय मे आई एकरुपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेता के रूप मे भी स्थापित करने के लिए अशोक कुमार ने खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इनमें 1968 मे प्रदर्शित फ़िल्म आर्शीवाद खास तौर पर उल्लेखनीय है। फ़िल्म में बेमिसाल अभिनय के लिए उनको सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस फ़िल्म मे उनका गाया गाना रेल गाड़ी-रेल गाड़ी बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।

1984 मे दूरदर्शन के इतिहास के पहले शोप ओपेरा हमलोग में वह सीरियल के सूत्रधार की भूमिका मे दिखाई दिए और छोटे पर्दे पर भी उन्होंने दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया। दूरदर्शन के लिए ही दादामुनि ने भीमभवानी, बहादुर शाह जफर और उजाले की ओर जैसे सीरियल मे भी अपने अभिनय का जौहर दिखाया।

अशोक कुमार को दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्म फेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया। पहली बार राखी 1962 और दूसरी बार आर्शीवाद 1968, इसके अलावा 1966 मे प्रदर्शित फ़िल्म अफसाना के लिए वह सहायक अभिनेता के फ़िल्म फेयर अवार्ड से भी नवाजे गए। दादामुनि को हिन्दी सिनेमा के क्षेत्र में किए गए उत्कृष्ठ सहयोग के लिए 1988 में हिन्दी सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें 1999 में पद्म भूषण और 2001 में  उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अवध सम्मान प्रदान किया गया। अशोक कुमार भारतीय सिनेमा के एक प्रमुख अभिनेता रहे हैं। प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार भी आपके ही सगे भाई थे। लगभग छह दशक तक अपने बेमिसाल अभिनय से दर्शकों के दिल पर राज करने वाले अशोक कुमार का निधन 10 दिसम्बर 2001 को हुआ।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 44 – दृष्टि ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “दृष्टि। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 44 ☆

☆ दृष्टि 

 मैं अब आपको स्वर योग के विषय में कुछ बताता हूँ । सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को अनुभव करने का प्रयत्न कीजिए । देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है । स्वर योग के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा । इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से श्वास निकलता अनुभव हो तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा । श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वर योग का आधार हैं । सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है । इसका रंग काला है । यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है । इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं ओर स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी ओर अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर । सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः जब दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा ।

गांधार नाड़ी नाक में, हस्तिजिह्वा दाहिनी आंख में, पूषा दाये कान में, यशस्विनी बायें कान में, अलंबुसा मुख में, कुहू लिंग प्रदेश में और शंखिनी गुदा में जाती है । हठयोग में नाभिकंद अर्थात कुंडलिनी का स्थान गुदा से लिंग प्रदेश की ओर दो अंगुल हटकर मूलाधार चक्र में माना गया है । स्वर योग में कुंडलिनी की यह स्थिति नहीं मानी जाती है। स्वर योग शरीर शास्त्र से संबंध रखता है और शरीर की नाभि गुदामूल में नहीं, वरन उदर मध्य ही हो सकती हैं । इसीलिए यहाँ नाभिप्रदेश का तात्पर्य उदर भाग मानना ही ठीक है । श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष संबंध उदर से ही है । स्वर योग इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य को नाभि तक पूरी साँस लेनी चाहिए । वह प्राण वायु का स्थान फेफड़ों को नहीं, नाभि को मानता है । गहन अनुसंधान के पश्चात अब शरीर शास्त्री भी इस बात को स्वीकारते हैं कि वायु को फेफड़ों में भरने मात्र से ही श्वास का कार्य पूरा नहीं हो जाता । उसका उपयुक्त तरीका यह है कि उससे पेड़ू तक पेट सिकुड़ता और फैलता रहे एवं डायफ्राम का भी साथ-साथ संचालन हो । तात्पर्य यह कि श्वास का प्रभाव नाभि तक पहुँचना जरूरी है । इसके बिना स्वास्थ्य खराब होने का खतरा बना रहता है । इसीलिए सामान्य श्वास को स्वर योग में अधूरी क्रिया माना गया है । इससे जीवन की प्रगति रुकी रह जाती है । इसकी पूर्ति के लिए योग के आचार्यों ने प्राणायाम जैसे अभ्यासों का विकास किया ।

तो वास्तव में हम प्रकृति और ब्रह्मांड में बाहरी परिवर्तन के साथ हमारे आंतरिक शरीर और मस्तिष्क के परिवर्तनों को समझ सकते हैं ।

 

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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मराठी साहित्य – कविता ☆ केल्याने होतं आहे रे # 35 – फुगडी कोरोनाची ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है। आज प्रस्तुत है श्रीमती उर्मिला जी की रचना  “फुगडी कोरोनाची ”। उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ केल्याने होतं आहे रे # 35 ☆

☆ फुगडी कोरोनाची ☆ 

(काव्यप्रकार :-मुक्तछंद)

 

फू बाई फू.. फुगडी फू..वाढ वाढ वाढतोयस कोरोना तूं रे कोरोना तूं.ऽऽ.!!धृ.!!

 

विमानातनं आलास !

हाहा म्हणता पसरलास!

तग धरुन बसलास !!१!! आता फुगडी फू….

 

कोरोना रे कोरोना !

तुझा लाडका चायना !

व्हायरस पाठवून केली की हो दैना !

कोरोनाची पीडा आता जाता जाईना !!२!! फुगडी फू…

 

अमेरिका फ्रान्स स्पेन अन् इटली !

चायनाची तर हौसच फिटली !

लाखोंची पतंग याने की हो काटली !!३!! आता फुगडी फू…

 

कोरोनाचा तर वाढतोय जोश!

त्यावर नाही अजून निघाला डोस !

गावेच्या गावे याने पाडली ओस !

जिकड तिकडं याचाच घोष !!४!! आता फुगडी फू..

 

आम्ही नाही हरणार !

शासनाचे ऐकणार!

घरातच रहाणार!

फळे आम्ही खाणार!

सात्त्विक आहार घेणार !

तुला पळवून लावणार !

जोमाने उभे रहाणार!!५!! आता फुगडी फू…

 

©️®️उर्मिला इंगळे

सातारा

दिनांक:२१-५-२०.

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!

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मराठी साहित्य – कविता/गीत ☆ विडंबन – हा ‘ टॅग ‘ गाडीला लावीतसे ☆ श्री अमोल अनंत केळकर

श्री अमोल अनंत केळकर

( युवा मराठी साहित्यकार श्री अमोल अनंत केळकर जी मराठी व्यंग्य  विधा (विडंबन)  के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मैं समझता हूँ इस विधा में अभिरुचि केअतिरिक्त  एम बी ए  (मार्केटिंग)  शैक्षणिक योग्यता निःसंदेह पृष्ठभूमि में कार्य करती ही है। श्री अमोल अनंत केळकर जी के ही शब्दों में  उनका परिचय – “सध्या राहणार बेलापूर नवी मुंबई. ठाण्याजवळ  स्टील कंपनीत नोकरीला. प्रासंगिक लेखन/ विडंबन / चारोळ्या ललित लेखन. ‘माझे टुकार ई-चार ‘ ( www.poetrymazi.blogspot.in)  आणि ‘ देवा तुझ्या द्वारी आलो’ ( www.kelkaramol.blogspot.in) हे दोन ब्लाॅग. यावर नियमीत लेखन. जोतिष शास्त्राची आवड”।  आपका लेखन नितांत सहज  एवं धाराप्रवाह है। आज प्रस्तुत है उनकी विशिष्ट विडंबन रचना “हा ‘ टॅग ‘ गाडीला लावीतसे “जो कि मराठी गीत  “हा छंद जिवाला लावि पिसे !” पर आधारित है। )

 ☆ हा ‘ टॅग ‘ गाडीला लावीतसे ☆ 

(मुळ  गाणे : हा छंद जिवाला लावि पिसे !)

 

तिथे टोल सखे भरपूर दिसे

खिशात ‘ मनी ‘ सर ले भलते

दिनरात तुझा रे ध्यास जडे

हा ‘ टॅग ‘ गाडीला लावीतसे

 

ती रांग  तुझ्या नजरेमधली

गाडी आपली नेहमीच बळी

‘टॅगात ‘ असेल जादुखरी

गेलो ओलांडुनी  ‘फास्ट’ कसे

 

आरशाच्या मागे चिकटव वरी

हा स्कँन होतसे लईभारी

तो मार्ग मग घायाळ करी

वेगात पळाली कार दिसे

 

©  श्री अमोल अनंत केळकर

१३/०४/२०२०

नवी मुंबई, मो ९८१९८३०७७९

poetrymazi.blogspot.in

१८/१२/१९

 ☆ मुळ गाणे : हा छंद जिवाला लावि पिसे ! ☆ 

 

तुझे रूप सखे गुलजार असे

काहूर मनी उठले भलते

दिनरात तुझा ग ध्यास जडे

हा छंद जिवाला लावि पिसें!

 

ती वीज तुझ्या नजरेमधली

गालीं खुलते रंगेल खळी

ओठांत रसेली जादुगिरी

उरिं हसति गुलाबी गेंद कसे!

 

नखर्यांत तुझ्या ग मदनपरी

ही धून शराबी दर्दभरी

हा झोक तुझा घायाळ करी

कैफांत बुडाले भान असे!

 

☆ ☆ ☆ ☆ ☆ 

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