मराठी साहित्य – विविधा ☆ ललित – आठवणींच असच असतं… ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

☆ विविधा: ललित – आठवणींच असच असतं…☆

संपादकांचा फोन आला आणि नाही म्हटलं तरी मी सुखावलोच. दिवाळी अंकासाठी काही ना काही लिहून पाठवल्याशिवाय ते काही गप्प बसणार नाहीत,हे माहित होत मला. आता मस्त एखादी दीर्घकथा लिहावी आणि द्यावी पाठवून अशा विचारात मी होतो. पण यंदाचा दिवाळी अंक अगदी छोटासा निघणार आहे, त्यामुळे काहीतरी छोटंसं पाठवा, एखादी जुनी आठवणही चालेल असं जेव्हा ते म्हणाले तेव्हा मी जरा हिरमुसलोच. तरी त्यांना होकार दिला आणि फोन ठेवला.

आता छोटंस काय बरं लिहावं? जुनी एखादी आठवण लिहायची म्हटलं तरी ते सोपं नव्हतं. कारण थोडं जरी मागे वळून बघितलं तरी आठवणी कशा झुंडीन पुढं येतात. त्यातली नेमकी कोणती सांगायची हे ठरविणं खूप अवघड असतं.  प्रत्येक आठवणीच महत्व,सौंदर्य वेगळंच असतं. खर तर,सगळ्या आठवणी डोळ्यासमोर आल्या की जरा गोंधळायलाच होतं. अशा वेळी आठवणी या स्त्री सारख्या वाटू लागतात.

खरंच, आठवणी या स्त्री सारख्याच असतात. स्त्रीची जशी अनेक रुपं पहायला मिळतात,तशीच आठवणींनाही विविध रुपं असतात. अल्लडपणानं बागडणारी बालिका,उमलत्या कळीप्रमाणे षोडशा,यौवनाने बहरलेली युवती, तारुण्याच्या उंबरठ्यावरून सौख्याचं माप ओलांडून संसारात पदार्पण करायला उत्सुक असणारी नवोढा, मातृत्वाने तृप्त झालेली माता, सर्व काही सोसून प्रौढपणाची जबाबदारी संयमाने पेलणारी गृहिणी आणि वृद्धत्वाकडे झुकत असताना नातवंडांच्या आगमनाने उल्हासित होणारी आजी ! स्त्रीची किती ही विविध रूप!

आठवणींचही असच असतं. त्यांच प्रत्येक रूप मोहविणारच असतं. बालपणीच्या आठवणींनी मन बागडत नाही असं कधी झालय का ? तारूण्यातल्या आठवणी त्यावेळच्या स्वप्नांना घेऊन येत असतात. तुमची स्वप्न सत्यात उतरलेली असोत किंवा नसोत, त्यांच्या नुसत्या आठवणींनी सुद्धा तुम्ही पुन्हा त्या काळात जाऊन पोहोचता. तुम्हाला यशाकडे घेऊन जाणारी एखादी आठवण असेल तर तुमच्या मनाला नव्याने बहर येईल. तुमच्या कर्तृत्वाच्या आठवणी, तुम्ही भोगलेलं, तुम्ही सोसलेलं, तुम्ही मिळवलेलं आणि काही वेळेला तुम्ही अगदी गमावलेलं सुद्धा ! सगळं सगळं तुम्हाला जेव्हा आठवायला लागतं तेव्हा त्या त्या काळातंल ते ते चित्रच तुमच्या डोळ्यासमोर उभं राहिल्याशिवाय राहणार नाही. तुमचं वय जसं वाढत जाईल तशी या आठवणींची किंमत वाढतच जाईल. म्हणून तर या आठवणी मनाच्या खोल कप्प्यात अगदी नाजूकपणे जपून ठेवायच्या असतात. सौख्याच्या आठवणी सर्वांना वाटाव्यात तर सोसलेलं सारं आपल्यासाठी ठेवावं.

आणि हो, या आठवणी आणखी एका बाबतीत अगदी स्त्री सारख्या असतात बरं का !

तुमची खरीखुरी सखी जशी तुमच्यापासून दूर जात नाही तशाच या आठवणी सुद्धा तुम्हाला कधी अंतर देत नाहीत. अगदी शेवटपर्यंत तुमच्याच होऊन राहिलेल्या असतात. आणि मग ? मग आपल्यानंतर आपण स्वतः दुसर्यासाठी आठवण बनून जातो. आठवणी जपण्याचा वारसा पुढे चालवण्यासाठी. !

© श्री सुहास रघुनाथ पंडित

सांगली
मो 9421225491

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – षोडश अध्याय (8) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दैवासुर संपद्विभाग  योग

(आसुरी संपदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन)

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌।

अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌।।8।।

जग का कोई न अधीश्वर कहीं न कोई आधार

भोग मात्र है सुख सही करते यही विचार ।।8।।

 

भावार्थ :  वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत्‌ आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?।।8।।

 

They say: “This universe is without truth, without a (moral) basis, without a God, brought about by mutual union, with lust for its cause; what else?”।।8।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पियाँ – 16 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ चुप्पियाँ – 16 ☆

…कुछ कहो

तुम्हारी चुप्पी

बरदाश्त नहीं होती,

मैंने कोरा कागज़

मोड़कर थमा दिया,

..पढ़ लो, सारा कुछ

इस पर लिख दिया है,

ज़िंदगी भी

एक करवट ले चुकी,

उसका बाँचना

बदस्तूर जारी है,

सोचता हूँ

इतना ज़्यादा तो

नहीं लिखा था मैंने!

 

©  संजय भारद्वाज 

(2.9.2018, 12:25 बजे)

#आपका दिन सार्थक हो।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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English Literature – Poetry ☆ Ekakshi —the Egalitarian ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Poetry  “एकाक्षी ” published previously as ☆ संजय दृष्टि  – एकाक्षी ☆.  We extend our heartiest thanks to the learned author  Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit,  English and Urdu languages) for this beautiful translation.)

Ekakshi —the Egalitarian

 Want to be

an egalitarian,

Beholding everyone

with similar eye…

Without being

one eye-closed,

Desired is

to develop

equanimity in both!

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – षोडश अध्याय (7) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दैवासुर संपद्विभाग  योग

(आसुरी संपदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन)

 

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।7।।

असुरो में न पवित्रता, दया न शुभ आचार

सत्य से कोसो दूर रह, करते पापाचार ।।7।।

 

भावार्थ :  आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है।।7।।

 

The demoniacal know not what to do and what to refrain from; neither purity nor right conduct nor truth is found in them.।।7।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ एकाक्षी ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ एकाक्षी ☆

 

एकाक्षी होना चाहता हूँ,

आवश्यक नहीं

एक आँख बंद कर लूँ,

वांछित है, दोनों में

समत्व विकसित कर लूँ!

 

©  संजय भारद्वाज 

10 अगस्त 17, संध्या 7.10

#आपका दिन सार्थक हो।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – षोडश अध्याय (6) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दैवासुर संपद्विभाग  योग

(आसुरी संपदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन)

 

द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु।।6।।

इस जग में दो सृष्टि है, दैव आसुरी नाम

क्रमशः अच्छे बुरे है इन  दोनो के काम ।।6।।

 

भावार्थ :  हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन।।6।।

 

There are two types of beings in this world-the divine and the demoniacal; the divine has been described at length; hear from Me, O Arjuna, of the demoniacal!।।6।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – तुम कहाँ छिपे हो मोहन …… ☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आज प्रस्तुत है  श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर विशेष कविता   “तुम कहाँ छिपे हो मोहन….”। )

☆ श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – तुम कहाँ छिपे हो मोहन…. ☆  

गीता के रचनाकार  कृष्ण,

हे दीनन के रखवाले

तुम कहाँ छिपे हो मोहन

प्यारे चक्र सुदर्शन वाले।

 

कितने ही लाक्षाग्रह धधके हैं,

पुनः इसी धरती पर

भीषण लपटों में जले जा रहे,

जलचर-थलचर-नभचर,

कौरव दल विध्वंसक बन कर

घेरा डाले चहुँ ओर खड़े

क्या और अभी भी खाली

इनके कुकर्मों के पाप घड़े,

है विदुर कहाँ जो गुप्त सुरंग से,

हमको आज निकाले

तुम कहाँ छिपे हो मोहन……

 

निशदिन कितनी ही द्रोपदियों

के चीर हरण होते हैं

जूएं में राजनीति के पांडव

लगा रहे गोते हैं

जिसका खा रहे नमक, विरुद्ध

उसके ही कैसे बोलें

है नेत्र बंद गुरु द्रोण-भीष्म  के

उनको कैसे खोलें,

है सचराचर दृष्टा!

इन ललनाओं की लाज बचा ले

तुम कहाँ छिपे हो मोहन……..

 

लावे की भांति असुर दलों के

निर्दय हाथ बढ़े हैं

इस पुनीत हिन्द-भूमि पर

दुष्कृत्यों के अंक चढ़े हैं,

शंकित मन, व्याकुल डरे हुए

गोकुल के ग्वाले-गौवें

कोयल बैठी गुमसुम

कर्कश स्वर गीत गा रहे कौवे,

दुष्टों का मद मर्दन कर प्रभु,

भक्तों की लाज बचा ले

तुम कहाँ छिपे हो मोहन…….

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

07/06/2020

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष ‘संजय उवाच’ – कृष्णनीति ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”)

☆ श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष ‘संजय उवाच’ – कृष्णनीति ☆

जीवन अखंड संघर्ष है। इस संघर्ष के पात्रों को प्रवृत्ति के आधार पर दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है, भाग लेनेवाले और भाग लेनेवाले। एक संघर्ष में भाग लेता है, दूसरा संघर्ष से भाग लेता है। बिरला कोई रणनीतिकार होता है जो भाग लेने के लिए सृष्टि के हित में भाग लेता है। ऐसा रणनीतिकार कालजयी होता है। ऐसा रणनीतिकार संयोग से नहीं अपितु परम योग से बनता है। अत: योगेश्वर कहलाता है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण के वध के लिए जरासंध ने  कालयवन को भेजा। विशिष्ट वरदान के चलते कालयवन को परास्त करना सहज संभव न था। शूरवीर मधुसूदन युद्ध के क्षेत्र से कुछ यों निकले कि कालयवन को लगा, वे पलायन कर रहे हैं। उसने भगवान का पीछा करना शुरू कर दिया।

कालयवन को दौड़ाते-छकाते श्रीकृष्ण उसे उस गुफा तक ले गए जिसमें ऋषि मुचुकुंद तपस्या कर रहे थे। अपनी पीताम्बरी ऋषि पर डाल दी। उन्माद में कालयवन ने ऋषिवर को ही लात मार दी। विवश होकर ऋषि को चक्षु खोलने पड़े और कालयवन भस्म हो गया। साक्षात योगेश्वर की साक्षी में ज्ञान के सम्मुख  अहंकार को भस्म तो होना ही था।

कृष्ण स्वार्थ के लिए नहीं सर्वार्थ के लिए लड़ रहे थे। यह ‘सर्व’ समष्टि से तात्पर्य रखता है। यही कारण था कि रणकर्कश ने समष्टि के हित में रणछोड़ होना स्वीकार किया।

भगवान भलीभाँति जानते थे कि आज तो येन केन प्रकारेण वे असुरी शक्ति से लोहा ले लेंगे पर कालांतर में जब वे पार्थिव रूप में धरा पर नहीं होंगे और इसी तरह के आक्रमण होंगे तब प्रजा का क्या होगा? ऋषि मुचुकुंद को जगाकर कृष्ण आमजन में अंतर्निहित सद्प्रवृत्तियों को जगा रहे थे, किसी कृष्ण की प्रतीक्षा की अपेक्षा सद्प्रवृत्तियों की असीम शक्ति का दर्शन करवा रहे थे।

स्मरण रहे, दुर्जनों की सक्रियता नहीं अपितु सज्जनों की निष्क्रियता समाज के लिए अधिक घातक सिद्ध होती है। कृष्ण ने सद्शक्ति की लौ समाज में जागृत की।

प्रश्न है कि कृष्णनीति की इस लौ को अखंड रखने के लिए हम क्या कर रहे हैं? हमारी आहुति स्वार्थ के लिए है या सर्वार्थ के लिए? विवेचन अपना-अपना है, निष्कर्ष भी अपना-अपना ही होगा।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – हे कृष्ण! तेरे एक अवतार में कितने किरदार ☆ श्री दिवयांशु शेखर

श्री दिव्यांशु शेखर 

(युवा साहित्यकार श्री दिव्यांशु शेखर जी ने बिहार के सुपौल में अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण की।  आप  मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। जब आप ग्यारहवीं कक्षा में थे, तब से  ही आपने साहित्य सृजन प्रारम्भ कर दिया था। आपका प्रथम काव्य संग्रह “जिंदगी – एक चलचित्र” मई 2017 में प्रकाशित हुआ एवं प्रथम अङ्ग्रेज़ी उपन्यास  “Too Close – Too Far” दिसंबर 2018 में प्रकाशित हुआ। ये पुस्तकें सभी प्रमुख ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर उपलब्ध हैं। आज प्रस्तुत है श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर आपकी कविता   “हे कृष्ण! तेरे एक अवतार में कितने किरदार। )

☆ श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष – हे कृष्ण! तेरे एक अवतार में कितने किरदार 

देवकी सुत भी, यशोदा पुत्र भी,

मथुरा निवासी भी, सर्वत्र वासी भी,

हजारों परिणीता भी, एक पत्नीव्रता भी,

प्रेम की सूरत भी, त्याग की मूरत भी,

राधा के गीत भी, गोपियों के मीत भी,

रुक्मणी से योग भी, मीरा के संयोग भी,

यारों के यार भी, बह्मांड के सूत्रधार भी,

कमजोरों के सँरक्षक भी, दुष्टों के भक्षक भी,

दूसरों के दर्द से अधीर भी, अपने लिए सख़्त कर्मवीर भी,

शांति के लिए रण छोड़ते भी, धर्म के लिए सीमा तोड़ते भी,

त्रिलोक के सबसे बड़े महारथी भी, महज एक सारथी भी,

अनेकों आरोपों से युक्त भी, सबके पापों को करते मुक्त भी,

सबसे निर्लिप्त भी, सँसार के पालन में संलिप्त भी,

नादान भक्तों के लिए हमेशा खड़े भी, विद्वानों के समझ से परे भी।

 

©  दिव्यांशु  शेखर

दिल्ली

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