हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – दोहे ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम दोहे । )

 ✍  लेखनी सुमित्र की – दोहे  ✍

बेचैनी  मन की बढ़ी, व्यस्त क्षणों के बाद ।

कोलाहल को चीर कर, आई कोमल याद।।

 

बैठा हूं मैं दूर पर, यादों में प्रिय पास ।

सारी दूरी पा, मन उपजा विश्वास ।

 

बहुत दूर है आज हम, कल थे बहुत करीब।

काट रहे हैं जिंदगी, यादें बनी सलीब।।

 

वे मधुमेह पल याद है, याद मधुर संवाद ।

बहुत चाहता भूलना, आ जाती है याद ।।

 

प्रकट नहीं मुख से अगर, होती नहीं प्रतीति।

ठहरेगी कब तक भला, कालपात्र’ में प्रीति ।।

 

दहक रही है जिंदगी, ज्यों जंगल की आग ।

स्वाहा ध्वनियों से परे, कहां रहा है भाग।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेष कुशल # 13 ☆ व्यंग्य ☆ आप तो बिलकुल हमारे जैसे हो ☆ श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक  व्यंग्य  आप तो बिलकुल हमारे जैसे हो। इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से हम आपसे उनके सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य साझा करने का प्रयास करते रहते हैं । श्री शांतिलाल जैन जी के व्यंग्य में वर्णित सारी घटनाएं और सभी पात्र काल्पनिक होते हैं ।यदि किसी व्यक्ति से इसकी समानता होती है, तो उसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा। हमारा विनम्र अनुरोध है कि  प्रत्येक व्यंग्य  को हिंदी साहित्य की व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल # 13 ☆

☆ व्यंग्य – आप तो बिलकुल हमारे जैसे हो 

नमस्ते ट्रम्प सर,

आपको हम भारतीय लोग बेहद पसंद करते हैं यह तो पता था, मगर क्यों, यह अब जाकर समझ में आया. इन्कम टैक्स की चोरी के मामले में आप तो बिलकुल हमारे जैसे निकले. सेम-टू-सेम. बल्कि हमारे भी गुरू निकले !! क्या जिगरा पाया है सर, पिछले अठारह साल में से ग्यारह साल तो धेलाभर टैक्स नहीं चुकाया. 2016 में चुकाया भी तो बस सात सौ पचास डॉलर, बोले तो मात्र पचपन हज़ार रुपये. इत्ता तो हमारे यहाँ लोअर क्लास बाबू की सेलेरी से कट जाता है. बहरहाल, खबर छपी तो आपका रिएक्शन आया ‘ये फेक न्यूज है’. सेम-टू-सेम हमारे जननायकों टाईप. लगा कि वाशिंगटन में भी हमारा अपना कोई राजनेता है जो अभी बस ट्वीट करने ही वाला है – ‘अपन तो बाबा-फ़कीर आदमी है, न इन्कम जानते हैं न टैक्स. सेवा कर रहे हैं देश की.’

बहरहाल, सोने जैसे बाल हैं आपके, सर. हम तो इन पर बहुत पहले से फ़िदा हैं मगर राज तो न्यूयार्क टाईम्स ने खोला. कंपनी खर्चे में डेबिट डाल के सत्तर हज़ार डॉलर तो आपने अपने बाल सवांरने पर खर्च किये, बोले तो पचास लाख रूपये. इत्ते में तो इंडिया में नया माथा प्लांट कर दें कॉस्मेटिक सर्जन्स. वैसे ईमानदारी से आपके सरतराश ने तो आपसे ज्यादा ही चुकाया होगा टैक्स. छोटे लोग ऐसी हिम्मत कहाँ कर पाते हैं. आदमी एक बार जमीर से गिरे तो वो अपने मातहतों के जमीर से भी नीचे गिर जाता है.

कसम से ट्रंप सर, कल को खुदा न ख्वास्ता आप चुनाव हार जाएँ तो घबराना मत – इंडिया में लड़ लेना. ऐसी क्वालिटी वाले नेताओं को हम सर-माथे पर बैठा के रखते हैं. हारते वे ही हैं जो ईमानदारी से टैक्स चुकाते हैं. बल्कि, आप तो सोचो मत, इंडिया आ ही जाओ सर. कुछ हम आपसे सीखेंगे, कुछ आप हमसे सीखना. माल कहाँ छुपाना है – टाईलेट की टाईल्स के पीछे, गद्दे में कॉटन के बीच, दीवार में ठुकी टोंटियों में, घर में लगी ठाकुरजी की प्रतिमा के नीचे. ट्रंप हाउस ऐसा बनवा देंगे कि इन्कम टैक्स ऑफिसर्स का बाप भी माल नहीं सूंघ पायेगा. और वैसे भी आपके घर छापा पड़ने की संभावना नहीं रहेगी. वो तो अपन के यहाँ तभी पड़ता है जब आप विपक्ष में हों और सत्तापक्ष में पाले गये दोस्तों से आपकी जुगाड़ कम हो गई हो. मंतर ये कि रहें तो सत्ता में, ना रहें तो भी सभी दलों में अपने मोहरे बिठाकर रखियेगा, तब कुछ ना बिगड़ेगा.

जब आयें तो पांच-सात एकड़ की खेती खरीद लीजियेगा. हमारे जननायक इत्ती खेती में तो करोड़ों की इन्कम दिखा लेते हैं. प्रोग्रेसिव कृषक जो ठहरे. कृषि वैज्ञानिक हैरान हैं कि बंजर जमीन में करोड़ों के सेब फल कैसे उग आते हैं. कहते हैं – ‘भाग्‍यवाले का खेत भूत जोतता है’. अपन के जननायक कमाते राजनीति में हैं, दिखाते खेती में हैं, इन्वेस्ट करते हैं शेल कंपनियों में, लांड्रिंग करते हैं शेयर बाज़ार में. उनका न कुछ बेनामी होता है और न कुछ आय से अधिक. देश सेवा का शुल्क मान कर रख लेते हैं मनी-मनी. एजेंसियां कहती हैं पनामा, सेशल्स या लिचटेंस्टीन टैक्स हेवन कंट्रीज हैं, वे गलत हैं. आदमी में थोड़ा सा रसूख और ढ़ेर सारी बेशर्मी हो तो कर बचाने का स्वर्ग अमेरिका भी है और इंडिया तो है ही.

इंडिया में इतना सब होते हुवे भी जब से आपके बारे में पढ़ा है – एक बड़ा वर्ग डिप्रेशन में चला गया है. उनको लगता है कि उनके ऊँट पहाड़ के नीचे आ गये हैं. उन्हें बचाने का उपाय ये है कि आप एक किताब लिखें – ‘रैपिडेक्स – आयकर बचाने के एक सौ एक शर्तिया नुस्खे’. बेस्ट सेलर वहाँ भी, यहाँ भी.

और अंत में, ये अपन के शर्ट की कॉलर ऊँची करके चलने के पल हैं. आखिर, अपन आप से ज्यादा इन्कम टैक्स जो चुकाते हैं ट्रंप सर. नहीं क्या ?

 

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

(ई-अभिव्यक्ति किसी व्यंग्य /रचना की वैधानिक जिम्मेदारी नही लेता। लेखकीय स्वतंत्रता के अंतर्गत प्रस्तुत।)

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ रोजाना ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ रोजाना ☆

कैसे चलती है कलम

कैसे रच लेते हो रोज?

खुद से अनजान हूँ

पता पूछता हूँ रोज,

भीतर खुदको हेरता हूँ

दर्पण देखता हूँ रोज,

बस अपने ही अक्स

यूँ ही लिखता हूँ रोज।

 

©  संजय भारद्वाज 

(6.6.2019, 11.10 बजे)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 19 – कुछ शब्दचित्र ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है आपका अभिनव गीत  “कुछ शब्दचित्र। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 19– ।। अभिनव गीत ।।

☆ कुछ शब्दचित्र

 

चित्र :: आमुख

 

बिखर गईं मुस्काने

होंठों की दराज से

माँगा जिनको सबने

चेहरे के समाज से

 

चित्र :: एक

 

मौसम डरा -डरा सा

बाहर को झाँका है,

मौका परदे के विचार

से भी बाँका है

 

चुपके पूछ रहा-

कपड़े क्या सस्ते हैं कुछ?

“तो खरीद लूँगा मैं”

कस्बे के बजाज से

 

चित्र :: दो

 

पेड़ों के पत्तों में

हलचल बढ़ने  वाली

शाख -शाख पर फैली

केसर उड़ने वाली

 

फैल रही खुशबू अब

चारों ओर सुहानी

हवा लुटाती है अपनापन

इस लिहाज से

 

चित्र :: तीन

 

वहीं ज्योति सी प्रखर

धूप की बेटी के मुख

अंग -अंग पर, छाया

रंग से बदल गया रुख

 

दोनों हाथों से घर में

वह सगुन स्वरूपा

डाल रही सगनौती है

छत पर अनाज से

 

© राघवेन्द्र तिवारी

27-06-2020

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ ☆  सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆  महात्मा गाँधी जी का जबलपुर दौरा ☆ डॉ. शिव कुमार सिंह ठाकुर

डॉ. शिव कुमार सिंह ठाकुर

हम ई-अभिव्यक्ति पर एक अभियान की तरह प्रतिदिन “संदर्भ: एकता शक्ति” के अंतर्गत एक रचना पाठकों से साझा कर रहे हैं। हमारा आग्रह  है कि इस विषय पर अपनी सकारात्मक एवं सार्थक रचनाएँ प्रेषित करें। हम सहयोगी  “साहित्यम समूह” में “एकता शक्ति आयोजन” में प्राप्त चुनिंदा रचनाओं से इस अभियान को प्रारम्भ कर रहे हैं।  आज प्रस्तुत है  डॉ. शिव कुमार सिंह ठाकुर जी की प्रस्तुति  “ भारतवासी  ”

☆  सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆  महात्मा गाँधी जी का जबलपुर दौरा ☆

एकता और शक्ति के संधान हेतु महात्मा गांधी जी ने जबलपुर का तीन बार दौरा किया था।

बात उन दिनों की है जब मध्य प्रदेश की राजधानी नागपुर हुआ करती थी, कांग्रेस के 35 वें अधिवेशन के बाद देश में नई चेतना का सूत्रपात हुआ। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा,  सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन के माध्यम से छुआछूत ऊंच-नीच आदि को बदलने हेतु यात्रा प्रारंभ की। उन दिनों जबलपुर राजनीतिक मायने में अत्यंत महत्वपूर्ण शहर था।

गांधी जी को 2 दिसंबर 1933 को रेल से आना था। जबलपुर के कार्यकर्ताओं ने विचार किया कि गांधीजी कटनी तक तो रेल से आएंगे क्योंकि वहां उनका कार्यक्रम है, वहां से उन्हें जबलपुर मोटर कार द्वारा लाना सही रहेगा। उन्हीं दिनों डॉक्टर जॉर्ज डिसिल्वा जो बापू के पुराने मित्र थे, ने नई मोटर कार शेवरलेट खरीदी थी । उसे लेकर नेशनल वॉइस स्काउट के साथ, जिनका नेतृत्व गुलाब चंद गुप्ता कर रहे थे ,कटनी पहुंचे ।किसी तरह कटनी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म तक कार ले जाई गई और वहां से उन्हें राष्ट्रीय तिलक विद्यालय ले जाया गया। कटनी में 1 दिन रुकने के बाद 3 दिसंबर 1933 को जॉर्ज डिसिल्वा स्वयं कार चलाते हुए गांधी जी को लेकर संध्या के समय जबलपुर पहुंचे। यहां पहुंचने पर व्यौहार राजेंद्र सिंह के साठिया कुआं स्थित निवास पर उन्हें ठहराया गया। गांधी जी की यह दूसरी बार जबलपुर यात्रा थी ।पूर्व में वह 20 मार्च 1921 को जवाहर गंज स्थित श्यामसुंदर भार्गव के निवास खजांची भवन में ठहरे हुए थे ।उस समय गांधी जी द्वारा किया गया दौरा कांग्रेस के प्रति आम जनता का विश्वास जागृत करने का था ।उनके साथ उनकी अंग्रेजी शिष्य। मीराबेन तथा ठक्करबापा भी थे।

गांधीजी 4 दिनों तक जबलपुर में रुके और हरिजन कोष के लिए निवेदन किया । म्युनिसिपल कमेटी की ओर से द्वारका प्रसाद मिश्रा तथा डिस्टिक काउंसिल की ओर से व्यवहार रघुवीर सिंह द्वारा मानपत्र अर्पित किया गया। सामाजिक संगठन विशेषकर गुजराती समाज की ओर से भी गांधी जी का सम्मान किया गया ।इसी तरह नेशनल वॉइज स्काउट की ओर से शुभम चंद जी जैन ,सवाई मल जी जैन तथा साहित्यकार भवानी प्रसाद जी तिवारी द्वारा महात्मा गांधी को अभिनंदन पत्र अर्पित किया गया।
छावनी निवासियों ने भी गांधी जी का स्वागत किया। सदर स्थित काली मंदिर तथा अग्रवाल मंदिर आदि को हरि जनों हेतु खुलवाया गया। उस समय गांधी जी नगर में थे तब अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक भी आयोजित की गई ।जिसमें जवाहरलाल नेहरू, खान अब्दुल गफ्फार, सरदार वल्लभभाई पटेल, सेठ जमनालाल बजाज, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सैयद महमूद एवं केएफ नरीमन आदि नेतागण शामिल थे। इन्हें गोपाल बाग में ठहराया गया था क्योंकि उन दिनों बाबू गोविंद दास जेल में थे, अतः सभी नेता गणों के ठहराने की व्यवस्था पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने स्वयं की थी।

महात्मा गांधी जी ने हरिजनों की दशा सुधारने और अछूतों उद्धार करने के लिए आत्म शुद्धि हेतु 21 दिन का ऐतिहासिक उपवास भी किया था। इलाहाबाद में कमला नेहरू अस्पताल का शिलान्यास महात्मा गांधी द्वारा किया जाना था, उसी यात्रा के दौरान गांधी जी ने इलाहाबाद जाते समय अल्प क्षणों के लिए जबलपुर के भेड़ाघाट स्टेशन पर उतर कर प्राकृतिक सौंदर्य देखने का कार्यक्रम बनाया। जब गांधी जी के मीरगंज स्टेशन पर उतरने की सूचना मिली तो नर्मदा प्रसाद जी सराफ, हुकुमचंद जी नारद,लक्ष्मी शंकर जी भट्ट, सेठ लक्ष्मी दास आदि भेड़ाघाट पहुंचे और गांधीजी को नर्मदा में नौका विहार, धुआंधार,बंदर कूदनी आदि का अवलोकन कराया। तत्पश्चात कार्यकर्ताओं के आग्रह पर महादेव भाई देसाई, कनु गांधी तथा महाराज कुमार विजयनगरम के साथ जबलपुर आए तथा सेठ हीर जी गोविंद जी के चेरीताल स्थित रत्न हीर निवास पर ठहरे।
गांधी जी 27 अप्रैल 1942 को बनारस विश्वविद्यालय जाते समय प्रातः कालीन जबलपुर आए, क्योंकि गांधी जी को दोपहर की गाड़ी से जाना था अतः अल्प समय के लिए मदन महल स्टेशन के समीप पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र के निवास पर रुके। विदित हो कि उनकी आगमन की पूर्व सूचना प्रसारित नहीं की गई थी, फिर भी बहुत सारे लोग उनके दर्शन को मदन महल स्टेशन पहुंच गए थे।

महात्मा गांधी जबलपुर वासियों का आदर सम्मान और प्रेम देखकर पूरे दिन जबलपुर में रुके और उस समय बाबू गोविंद दास का ऑपरेशन विक्टोरिया अस्पताल में हुआ था, उन्हें देखने के लिए गांधीजी और पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र विक्टोरिया अस्पताल गए और उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना की।

महात्मा गांधी ने यह महसूस किया की जबलपुर की जनता का स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना अनिवार्य है अतः जबलपुर से विचार क्रांति की शुरुआत महात्मा जी ने की थी।

सादर

डॉ.शिव कुमार सिंह ठाकुर
जबलपुर

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 65 ☆ कविता – महापौर ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी  की एक सार्थक कविता  – महापौर। ) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 65

☆ कविता  – महापौर ☆ 

शहर का मुखिया,

महापौर ऐसा हो,

जब भी जहां मिले,

तो मुस्करा के मिले,

जन जन के दुःख दर्द,

खिल खिला के दूर करे,

धर्म सम्प्रदाय से उठकर,

मानव धर्म का निर्वाह करे,

तेज तर्रार आदर्श लिए,

हरियाली की बात करे,

धूल को शहर से भगा के,

चमचमाती सड़क दे,

गगनचुंबी इमारतों के पास,

झिलमिलाती रोशनी दे,

बेरोजगारों को रोजगार दे,

समस्याओं को मार दे,

वार्ड वार्ड घूमकर,

जन जन को प्यार दे,

जनहित के कार्य में,

घर -द्वार त्याग दे,

महकते गुलाब और,

आलीशान मुस्कान दे,

शहर के द्वार में,

शान शौकत प्यार दे,

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ निधि की कलम से # 22 ☆ चाँद पाने का सफर ☆ डॉ निधि जैन

डॉ निधि जैन 

डॉ निधि जैन जी  भारती विद्यापीठ,अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पुणे में सहायक प्रोफेसर हैं। आपने शिक्षण को अपना व्यवसाय चुना किन्तु, एक साहित्यकार बनना एक स्वप्न था। आपकी प्रथम पुस्तक कुछ लम्हे  आपकी इसी अभिरुचि की एक परिणीति है। आपका परिवार, व्यवसाय (अभियांत्रिक विज्ञान में शिक्षण) और साहित्य के मध्य संयोजन अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है  आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण कविता  “चाँद पाने का सफर”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆निधि की कलम से # 22 ☆ 

☆ चाँद पाने का सफर 

 

चांदी  की कटोरी से माँ ने चाँद दिखाया था कभी,

चाँद छूने की आकांक्षा को जगाया था कभी।

 

उसे पाने को जी भी ललचाया था कभी,

गोल-गोल चाँद से जड़ा आकाश,

आकाश में तारों के बीच में अड़ा,

सुन्दर कोमल, माँ की कटोरी से शायद बड़ा,

चांदी की कटोरी से माँ ने चाँद दिखाया था कभी,

चाँद छूने की आकांक्षा को जगाया था कभी।

 

छत पर खड़ी करती रहती हूँ मैं कोशिश कभी,

कैद करना चाहती हूँ आकाश के ये सुन्दर पूत को कभी,

छू लेना चाहती हूँ उस मौन प्रतीक को कभी,

क्या ये कोशिश पूरी हो पायेगी कभी,

चांदी की कटोरी से माँ ने चाँद दिखाया था कभी,

चाँद छूने की आकांक्षा को जगाया था कभी।

 

©  डॉ निधि जैन,

पुणे

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #12 ☆ मास्क ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है।  सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग  स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए। आखिर मैं भी तो वही कर रहा हूँ। आज से हम प्रत्येक सोमवार आपका साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी प्रारम्भ कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है एक समसामयिक भावप्रवण रचना “मास्क”।  श्री श्याम खापर्डे जी ने  इस कविता के माध्यम से  मास्क के महत्व की चर्चा की है जो विचारणीय है।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 11 ☆ 

☆ मास्क ☆ 

दुविधा में है हर व्यक्ति

मिट ना जाये उसकी हस्ती

राह कोई सूझत नाही

डूब ना जाये जीवन की कस्ती

 

टोने टोटके काम ना आयें

व्यर्थ हो गई सारी सलाहें

तीव्र गति से फैलता जायें

कैसे रोकें कोई बतायें

 

लक्षण इसके समझ ना आये

हो जाये तब उभर कर आये

फेल हो गई सारी थ्योरी

कैसे अपनी जान बचाये

 

वैक्सिन नहीं जलद आने वाली

घोषणाएं है यह सब खाली

मास्क ही है बस एक उपाय

बिना मास्क कैसे करोगे रखवाली

 

मास्क आज कितना जरूरी है

मास्क बिना हर बात अधूरी है

मास्क नहीं तो कैसा जीवन

मास्क पहनना अब मजबूरी है

 

© श्याम खापर्डे 

09/10/2020

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

मो  9425592588

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हाँ मैं यशोधरा हूँ ……. ☆ श्री आलोक पाठक 

श्री आलोक पाठक 

जन्म – 1 सितंबर 1969

शिक्षा – एम कॉम एल एल बी

व्यवसाय – शासकीय सेवा

सम्मान – काव्य वर्तिका अलंकरण, प्रसंग काव्य शिरोमणि, मंथन साहित्यकार सम्मान, मां तुझे सलाम मुशायरा सम्मान, केंद्रीय हिंदी निदेशालय दिल्ली तथा हिंदी एवं भाषा विज्ञान विभाग रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा राष्ट्रीय शोध गोष्ठी सम्मान, अखिल  भारतीय कवि सम्मेलन प्रसंग अलंकरण सम्मान

☆  कविता ☆ हाँ मैं यशोधरा हूँ ……. ☆ 

( सिद्धार्थ (महात्मा  बुद्ध) के गृह त्याग पर कवि श्री अलोक पाठक जी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति)

हाँ मैं यशोधरा हूँ

एक रानी हूँ

 

हाँ मैं यशोधरा हूँ

एक रानी हूँ

 

हाँ मुझे याद है जब

सिद्धार्थ ब्याह कर लाए थे

मेरी नवजीवन में कितने

सुगंधित पुष्प खिलाए थे

यथार्थ के धरातल से हटकर

अनगिनत स्वप्न दिखाए थे

वैवाहिक जीवन में मेरे

तभी तो राहुल आए थे

शांत और निर्लिप्त भाव का

मैं निश्छल सा पानी हूँ ….1

 

हाँ मैं यशोधरा हूँ

एक रानी हूँ

 

हाँ मैंने देखा सिद्धार्थ को

जरा जन्म से उलझते हुए

हाँ मैंने देखा सिद्धार्थ के

अंतर्मन को सुलगते हुए

क्यों चाहा प्रश्नों का उत्तर

शाश्वत सत्य समझते हुए

नव पथ के लिए त्यागा वैभव

निज कर्तव्य भटकते हुए

कुटिल रात्रि के बाद खिली हूँ

ऐसी भोर सुहानी हूँ …….2

 

हाँ मैं यशोधरा हूँ

एक रानी हूँ

 

क्या दोष था राहुल का

जो तुमने उसको त्याग दिया

उसके कोमल मन में तुमने

कैसा वज्राघात किया

पितृ सुख और प्रेम ना देकर

तुमने क्यों अवसाद दिया

क्या कोई अक्षम्य भूल थी

जिसका यह प्रतिसाद किया

ना जग समझा ना मैं समझी

ऐसी अमिट कहानी हूँ…3

 

हाँ मैं यशोधरा हूँ

एक रानी हूँ

 

हाँ सोचो ऐसा मैं करती

क्या संसार समझ पाता

सामाजिक आक्षेपों से क्या

आँचल मेरा बच पाता

दोषों पर दोषों से मेरा

नाम कलंकित हो जाता

नारी के आदर्शों का भी

खंडन मंडन हो जाता

छली गई हूँ एक ज्ञानी से

ऐसी मैं अज्ञानी हूँ….  4

 

हाँ मैं यशोधरा हूँ

एक रानी हूँ

 

सिद्धार्थ जी के मन में तीन प्रश्न थे कि जन्म क्यों होता है? बुढ़ापा क्यों होता है और मृत्यु क्या होती है? यह तीनों प्रश्न वास्तव में प्रकृति से जुड़े हुए थे और मनुष्य के जीवन में हो रही घटनाओं से इनको जोड़ा जा सकता है। इन प्रश्नों का उत्तर सिद्धार्थ के लिए गए निर्णय से हो गया और यशोधरा ने अपने अनुभव के आधार पर यह उत्तर दिया कि राहुल का जन्म एक प्राकृतिक तथ्य है, पिता शुद्धोधन को सिद्धार्थ के वनवास से जो दारण दुख हुआ वही वास्तव में उनका बुढ़ापा है। मनुष्य के जीवन में जब जीने की कोई चाह ना बचे तब वह वृद्धावस्था का ही द्योतक होता है अन्यथा आदमी कितना भी वृद्ध हो जाए यदि उसका मन युवा है तो वह युवा ही रहता है। तीसरा प्रश्न यशोधरा का स्वयं का जीते जी मर जाना क्योंकि सिद्धार्थ के जाने के बाद युवावस्था में हुए इस घटनाक्रम से उनके जीवन में कुछ भी शेष नहीं रहा। उनका सब कुछ सिद्धार्थ के होने पर ही था और जब वही चले गए तो वह महल वह विलास की वस्तु उनके लिए महत्वहीन थी। एक नारी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि उसे अपने पति के सानिध्य में जीवन बिताने का अवसर प्राप्त हो यद्यपि सिद्धार्थ ने स्वयं के प्रश्नों के हल के लिए घर छोड़ा था किंतु उससे यशोधरा, राहुल और शुद्धोधन ही नहीं बल्कि पूरा साम्राज्य प्रभावित हुआ और एक परिवार में अनिश्चय की स्थिति निर्मित हुई। सिद्धार्थ अपने प्रश्नों का उत्तर तो पा सके किंतु राहुल यशोधरा और शुद्धोधन जो उन पर आश्रित थे उनके जीवन में आए झंझावात से उत्पन्न प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सके और अंततोगत्वा राहुल, यशोधरा और शुद्धोधन ने भी सन्यास धारण कर लिया। इस पूरे घटनाक्रम में यशोधरा के जीवन से सिद्धार्थ के तीन प्रश्नों का उत्तर रचना के अंतिम बंद में लिखने का प्रयास किया है –

हाँ मैं यशोधरा हूँ

एक रानी हूँ

हाँ उन प्रश्नों का उत्तर

 

आज तुम्हें मैं देती हूँ

कर सको यदि सहन तुम

अपना अनुभव कहती हूँ

दाम्पत्य सुख से जन्मा राहुल

यह प्रथम प्रश्न का पक्ष हुआ

आहत शुद्धोधन के मन से

द्वितीय प्रश्न भी दक्ष हुआ

मरण हुआ जीते जी मेरा

मैं तीसरी प्रश्न कहानी हूँ

 

हाँ मैं यशोधरा हूँ

एक रानी हूँ

 

© श्री आलोक पाठक

693, भालदारपुरा, जबलपुर – 482 002 मो-  98273 58121

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 18 ☆ अभंग—शब्दगंगा… ☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 18 ☆ 

☆ अभंग—शब्दगंगा… ☆

शब्दांचा प्रवाह,

वाहता असावा

मनात नसावा, न्यूनगंड…०१

 

शब्द गंगा सदा

वैचारिक ठेवा

अनमोल हवा, संदेश तो…०२

 

निर्मळ, सोज्वळ

असावे प्रेमळ

साधावे सकळ, योग्यकर्म…०३

 

शब्द ज्ञान देती

शब्द भूल देती

शब्द त्रास देती, नकळत…०४

 

म्हणुनी सांगणे

सहज बोलणे

शब्दांत असणे, प्रेमळता…०५

 

कवी राज म्हणे

अलिप्त असावे

सचेत रहावे, सदोदित…०६

 

© कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री.

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन, वर्धा रोड नागपूर – 440005

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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