हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आईना ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं सार्थक कविता आईना।  इस बेबाक कविता के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सादर नमन।)  

☆ कविता – आईना ☆ 

 

नहीं श्रृंगार का मात्र

यह आईना है समाज का

इंसान को परखने का

समस्या से जूझते जब

भी

देखते है आईना

मिलता है सुकून

समय की नज़ाकत

बनते-बिगडते रिश्ते

देश का भविष्य भी

नज़र आता है

परिपक्व और सौम्य

प्रतिबिम्ब समाज का

आत्मावलोकन इंसान का

आईना है पूरक सच्चाई की

इंसान के मन की परत

खोलकर आईना दिखाता

रास्ता उसे..

 

अच्छे- बुरे की पहचान

सही-गलत का फैसला

सगुण- निर्गुण का,

लेखा-जोखा है आईना

अंतर्मन का विस्तार है

संघर्ष व बलिदान की

कहानी दोहराता है

इतिहास को देखकर

आईने में शहीदों को

याद कर सीना गर्व से

इतराता है…

 

देश की आज़ादी

देख खुश होता है मन

तो दूसरी ओर

जर्जर होता देश भी

देखते हैं आईने में

बहता अश्रु न रुकता है

मुंम्बई में बम्ब ब्लास्ट

वो शहीदों की लाशे

बच्चों की चीख

सब कुछ नज़र आते ही

कान पर हाथ रख देते हैं

दंगे-फसाद सब के मूल में

देश की हर परेशानी

हर खुशी में मौजूद

समाज साक्ष है आईना ।

 

©  डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

लेखिका, सहप्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, जैन कॉलेज-सीजीएस, वीवी पुरम्‌, वासवी मंदिर रास्ता, बेंगलूरु।

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ घर के न  घाट के ☆ डॉ श्याम बाला राय

डॉ श्याम बाला राय

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार , पत्रकार  एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ श्याम बाला राय जी  का ई-अभिव्यक्ति  में हार्दिक स्वागत हैं। आपकी उपलब्धियां इस सीमित स्थान में उल्लेखित करना संभव नहीं है। कई रचनाएँ प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्र- पत्रिकाओं  में  प्रकाशित। कई राष्ट्रीय / प्रादेशिक /संस्थागत  पुरस्कारों /अलंकारों से पुरस्कृत /अलंकृत ।  लगभग 20 पुस्तकें प्रकाशित। कई साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं  का प्रतिनिधित्व। आकाशवाणी से समय समय पर रचनाओं का प्रसारण । आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण लघुकथा   ‘घर के न  घाट के’।)

☆ लघुकथा – घर के न  घाट के ☆ 

भागता हुआ रजिन्दर राय साहब के यहां आकर कहने लगा कि मालिक चलिए। प्रधान जी से कह दीजिए।

राय साहब ने कहा कि मैं क्या कहूँ प्रधान जी से?

चलिए बताता हूँ।

अरे! ऐसे कैसे जाऊं ? क्या करना है? क्या कहना है? ये पता तो होना चाहिए। मेरी बात भला प्रधान जी क्यों सुनेगे?

रजिन्दर संकोच करते हुए बोला कि मुम्बई से मेरा बबुआ आया है.

अच्छा ! आया है तो जाओ उसका स्वागत करो, खिलाओं पिलाओं, प्रधान जी से क्या कहना है?

नहीं मालिक! प्रधान जी गांव में घुसने के लिए मना कर रहे हैं। कह रहे है कि मैं स्वयं को नहीं फसाऊंगा। तुम लोग भागकर शहर से छिपने गांव आये हो। भला आप ही बताइये। कोई अपने घर में नहीं आयेगा।

राय साहब ने कहा कि तुम नहीं जानते हो कि कोरोना नाम की जानलेवा बिमारी पूरे विश्व में फैली है। उसका पभाव गांव में भी हो जायेगा तो गांव वाले कहाँ जायेगे इलाज कराने।

रजिन्दर निराश होकर बोला कि तब तो कोई साथ नहीं देगा। शहर में कोई काम नहीं था। ट्रेन का टिकट नहीं मिला तो ट्रक से ही बबुआ दिन-रात धूप में तपते हुआ गांव आया है। मैं उसे पानी भी नहीं पिला पा रहा हूँ। कोई मदद करने वाला नहीं है।

राय साहब रजिन्दर को समझाते हुआ कहे कि बिमारी जानलेवा है, शहर से गांव आने के बेचैन बहुत अधिक लोग बिमारी को लोगों में फैलाये है, इसलिए सरकार ने प्रधान को चेतावनी दी है कि गांव पहुँचने वाले पर ध्यान देना प्रधान की जिम्मेदारी है। यदि गांव में एक भी मरीज मिला तो प्रधान की जिम्मेदारी होगी। अतः प्रधान जी विवश है।

रजिन्दर रोते हुए कहने लगा कि गांव से शहरी देखकर शहर कमाने गया था बबुआ। आज न घर का रहा न घाट का। ये कैसी मेरी मूर्खता थी कि उसे घर छोड़कर शहर भेजा उससे अधिक मै यहा कमा लेता हूँ।

 

©  डॉ श्यामबाला राय

द्वारा श्री यश्वन्त सिंह, यू- 28, प्रथम तल, उपाध्याय ब्लाक, शकरपुर, दिल्ली – 110092

मोबाइल न0 – 9278280879

shyambalarai@yahoomail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 55 – सिद्धेश्वरी के दोहे  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  शब्दों पर आधारित अप्रतिम  “ सिद्धेश्वरी के दोहे   ।   इस सर्वोत्कृष्ट  प्रयास  के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 55 ☆

☆ सिद्धेश्वरी के दोहे 

 

1. भूकंप 

आया भूकंप  धरती फटी, मची त्राहि-त्राहि

सहे प्रकृति का कोप सब, समय सूझे कुछ नाहि

 

2.कुटिया

कहे कबीर कुटिया भली, भवन महल अटारी

दो गज जमीन सोइये, मीठी नींद सवारी

 

3.चौपाल

चौपालों में बैठ दादा, कहते राम कहानी

राज छोड़ वनवास गये, कैकयी टेढ़ी जबानी

 

4.नवतपा

नवतपा की ताप बहुत, हाहाकार मचाय

भरी दोपहरी न निकले, शरीर अपने बचाय

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 55 ☆ श्वासांची दरी ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक समसामयिक एवं भावप्रवण कविता  श्वासांची दरी।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 55 ☆

☆ श्वासांची दरी☆

 

का तुझ्या माझ्यात श्वासांची दरी ?

लाव ओठी तू जराशी बासरी

 

सूर कानी मधुर आले कोठुनी

राधिका होते पुन्हा ही बावरी

 

अर्पिली देवा तुला मी ही फुले

अन् सुगंधी होत आहे टोकरी

 

राउळी गेलोच नाही मी कधी

रोज येतो सूर्यनारायण घरी

 

विठ्ठलू जाते जनीचे फिरवितो

भक्तिची माया असे ही ईश्वरी

 

माणिकाचे घालु का मी लोणचे ?

पोट भरण्या लागते रे भाकरी

 

ग्रीष्म मातीने किती हा सोसला

धाडल्या आता सरी तू भूवरी

 

ईद्र देवाची कृपा ही जाहली

रानभर होती पसरली बाजरी

 

घाबरावे अंधकारा का तुला ?

धीर देते ही प्रभा तर केशरी

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ उत्सव कवितेचा # 10 – ही रैना ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  हम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी के हृदय से आभारी हैं कि उन्होने साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा करने की सहमति प्रदान की है। आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  ‘ही रैना ’ 

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा – # 10 ☆ 

☆ ही रैना 

 

ही रैना

नवी नवेली

छैलछबिली

नखरेवाली

अलगद खाली

उतरून आली

तरल पाउली

चरचरावर

टाकीत आपुले

विलोल विभ्रम

मांडित अवघा

रंगरूपाचा

अपूर्व उत्सव

नाचनाचली

रंगरंगली

झिंगझिंगली

झुलत राहिली

 

बापुडवाणी

होऊन

पडली

क्षितीज कडेला

पुन्हा सकाळी

ही रैना

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (10) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय)

 

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।

रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ।।10।।

 

सतगुण होता है सजग,रज औं तम को जीत

सत तम को जीत रज, सत, रज को तम जीत।।10।।

 

भावार्थ :  हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है।।10।।

 

Now Sattwa prevails, O Arjuna, having overpowered Rajas and Tamas; now Rajas, having overpowered Sattwa and Tamas; and now Tamas, having overpowered Sattwa and Rajas!।।10।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – दोहे ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम दोहे। )

 ✍  लेखनी सुमित्र की – दोहे  ✍

 

बांच सको तो बांच लो ,आंखों का अखबार।

प्रथम पृष्ठ से अंत तक ,लिखा प्यार ही प्यार ।।

 

नयन तुम्हारे वेद सम,  चितवन  है श्लोक ।

पा लेता हूं यज्ञ फल, पलक पुराण विलोक।।

 

नयन देखकर आपके, हुआ मुझे एहसास।

जैसे ठंडी आग में, झुलस रही हो प्यास ।।

 

आंखों के आकाश में, घूमे सोच विचार।

अंत:पुर आंसू बसे, पलके पहरेदार ।।

 

आंखों आंखों दे दिया, मन का चाहा दान।

आंखों में ही डूब कर, हुआ कुंभ का स्नान ।।

 

इन आंखों में क्या भरा, हरा किया जो काठ।।

सहमति हो तो डूब कर, कर लूं पूजा-पाठ ।।

 

खुली आंख देखा किए, दुनिया का दस्तूर ।

अभी अभी जो था यहां, अभी अभी है दूर।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

9300121702

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 7 – पानी की पीर ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है उनका अभिनव गीत  “पानी की पीर ”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ #7 – ।। अभिनव गीत ।।

☆ पानी की पीर  ☆

 

एक बहिन  ::  गगरी

कलशा   ::  एक भाई

लौट रही पनघट से

मुदिता भौजाई

 

प्यास बहुत गहरी

पर उथली घडोंची

पानी की पीर

जहाँ गई नहीं पोंछी

 

एक नजर छिछली पर

जगह-जगह पसरी है

सम्हल सम्हल चलती

है  घर  की   चौपाई

 

कमर कमर अँधियारा

पाँव पाँव दाखी

छाती पर व्याकुल

कपोल सदृश पाखी

 

एक छुअन गुजर चुकी

लौट रही दूजी

लम्बाया इंतजार

जो था चौथाई

 

नाभि नाभि तक उमंग

क्षण क्षण गहराती है

होंठों  ठहरी तरंग

जैसे उड़ जाती है

 

इठलाती चोटी है

पीछे को उमड़ घुमड़

आज  इस नई संध्या

जैसे बौराई

 

© राघवेन्द्र तिवारी

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ सत्य ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ सत्य 

प्रलय के बाद

बचा रहता है सत्य,

सृजन के पूर्व

विद्यमान होता है सत्य,

सत्य आदिबिंदु है,

सत्य इतिबिंदु है,

अपरंपार ही सत्य

संसार भी सत्य,

ईश्वर ही सत्य

नश्वर भी सत्य,

ज्ञान ही सत्य

विज्ञान भी सत्य,

यथार्थ ही सत्य

कल्पना भी सत्य,

सूक्ष्म ही सत्य

स्थूल भी सत्य,

एक ही सत्य

अनेक भी सत्य,

सत्य अनादि

सत्य अनंत,

सत्यं परं धीमहि

एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति!

©  संजय भारद्वाज

(प्रातः 9.55 बजे, 17.6.19)

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 55 ☆ परसाई जी के जीवन का अन्तिम इन्टरव्यू – – लोक शिक्षण ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  उनके द्वारा स्व हरिशंकर परसाईं जी के जीवन के अंतिम इंटरव्यू का अंश।  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी ने  27 वर्ष पूर्व स्व  परसाईं जी का एक लम्बा साक्षात्कार लिया था। यह साक्षात्कार उनके जीवन का अंतिम साक्षात्कार मन जाता है। आप प्रत्येक सोमवार ई-अभिव्यिक्ति में श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के सौजन्य से उस लम्बे साक्षात्कार के अंशों को आत्मसात कर सकेंगे।) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 55

☆ परसाई जी के जीवन का अन्तिम इन्टरव्यू – – लोक शिक्षण ☆ 

जय प्रकाश पाण्डेय–

आपके लेखन में प्रारंभ से लोक शिक्षण पर बहुत बल है। कई लोगों का मानना है कि इस उद्देश्य के प्रबल आग्रह के कारण आपके लेखन की साहित्यिक महत्ता या गरिमा क्षतिग्रस्त हुई है, आत्म समीक्षा के एकांत क्षणों में क्या आपको भी ऐसा लगता है ?

हरिशंकर परसाई-

एक तो इसका कारण यह हो सकता है कि मैं 10-12 साल शिक्षक रहा हूं, तो जो मेरे अंदर शिक्षक था, वह मरा नहीं या मैं शिक्षक का ही रोल प्ले करता रहा। मेरे लेखन में लोक शिक्षण है और मैं अभी भी ये मानता हूं कि लोक शिक्षण बहुत आवश्यक है, जो देश में वर्तमान हालात चल रहे हैं उसके लिए मैं उसी बात को दोषी मानता हूं कि राजनैतिक दलों ने,  ट्रेड यूनियन्स ने, विश्वविद्यालयों ने लोक शिक्षण नहीं कराया। लोगों को शिक्षित नहीं किया गया। वैज्ञानिक दृष्टि नहीं दी गई, तर्क नहीं दिए गए। इतिहास सही ढंग से नहीं समझाया गया। समाज की रचना को ठीक से नहीं समझाया गया। अन्धविश्वासों को नहीं मिटाया गया, पुरानी परंपराओं के प्रति विरक्ति नहीं पैदा की गई। ये लोक शिक्षण होता है जो वास्तव में नहीं हुआ, हमारे देश में लोक शिक्षण नहीं हुआ, इसलिए हम आज भी देख रहे हैं कि हमारे देश के ऊपर संकट ही संकट हैं। लोक शिक्षण दो प्रकार का होता है, एक तो सीधा, स्पष्ट और दूसरा परोक्ष या सांकेतिक। मेरे लेखन में कहीं शायद सीधा डायरेक्ट कोई शिक्षण आ गया हो, कोशिश मैंने यही की है कि परोक्ष रूप से शिक्षण करूं, अपने व्यंग्य के द्वारा या स्थितियों का चित्रण करके मैं रख दूं और उससे पढ़ने वाला शिक्षक हो जावे, ये मैंने कोशिश की। अब इससे मेरे साहित्य की मौलिकता घटी या बढ़ी है, मैं नहीं कह सकता हूं,  हो सकता है घटी हो, मान लेता हूं, परन्तु मैं लोक शिक्षण को साहित्य में आवश्यक मानता हूं।

……………………………..क्रमशः….

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

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