हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।)

आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक विचारणीय आलेख  एवं ई-अभिव्यक्ति  का आह्वान एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें। 

हम ई-अभिव्यक्ति पर एक अभियान की तरह प्रतिदिन इस संदर्भ की एक रचना पाठकों के लिए लाने जा रहे हैं, लेखकों से हमारा आव्हान है कि इस विषय पर कलम चला कर रचनाएँ भेजें, हम इस का प्रारम्भ करेंगे सहयोगी  “साहित्यम समूह” में “एकता शक्ति” आयोजन में प्राप्त चुनी हुई रचनाओं से

☆ एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें  ☆

कोरोना के परिदृश्य में स्पष्ट हो चुका है कि केवल सबके बचाव में ही स्वयं का बचाव संभव है. एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें हैं. जो देश इस कठिनाई के समय में भी विस्तार की नीति अपना रहे हैं, वहां की सरकारें जनता से छल कर रही हैं. दुनियां के लिये यह समय सामंजस्य और एकता के विस्तार का है.

हमारी युवा शक्ति ही देश की सबसे बड़ी ताकत है.बुद्धि और विद्वता के स्तर पर हमारे देश के युवाओ ने सारे विश्व में मुकाम स्थापित किया है. हमारे साफ्टवेयर इंजीनियर्स  के बगैर किसी अमेरिकन कंपनी का काम नही चलता. हमारी स्त्री शक्ति सशक्त हुई है. देश के युवाओ से यही कहना है कि  हम किसी से कम नही है और हमारे देश को विश्व में नम्बर वन बनाने की जबाबदारी हमारी पीढ़ी की ही है.हमें नीति शिक्षा की किताबो से चारित्रिक उत्थान के पाठ पढ़ने ही नही उसे अपने जीवन में उतारने की जरूरत है. मेरा विश्वास है कि भारतीय लोकतंत्र एक परिपक्व शासन प्रणाली प्रमाणित होगी, इस समय जो कमियां भ्रष्टाचार, जातिगत आरक्षण, क्षेत्रीयता, भाषावाद, वोटो की खरीद फरोक्त को लेकर देश में दिख रही हैं उन्हें दूर करके हम विश्व नेतृत्व और वसुधैव कुटुम्बकम् के प्राचीन भारतीय मंत्र को साकार कर दिखायेंगे. आज जब मानवीय मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं, संभवतः रोबोट और मशीनी व्यवस्थायें ही देश से भ्रष्टाचार समाप्त कर सकती है, जैसा कंप्यूटरीकरण के विस्तार से रेल्वे या अन्य विभिन्न क्षेत्रो में हो भी रहा है.

सैक्स के बाद यदि दुनिया में कुछ सबसे अधिक लोकप्रिय विषय है तो संभवतः वह राजनीति ही है. लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली मानी जाती है.और सारे विश्व में भारतीय लोकतंत्र न केवल सबसे बड़ा है वरन सबसे  तटस्थ चुनावी प्रणाली के चलते विश्वसनीय भी है. चुनावी उम्मीदवार अपने नामांकन पत्र में अपनी जो आय  घोषित कर चुके हैं  वह हमसे छिपी नही है,  एक सांसद को जो कुछ आर्थिक सुविधायें हमारा संविधान सुलभ करवाता है,वह इन उम्मीदवारो के लिये ऊँट के मुह में जीरा है. प्रश्न है कि  आखिर क्या है जो लोगो को राजनीति की ओर आकर्षित करता है. क्या सचमुच जनसेवा और देशभक्ति ? क्या सत्ता सुख, अधिकार संपन्नता इसका कारण है ? मेरे तो परिवार जन तक मेरे इतने ब्लाइंड फालोअर नही है, कि कड़ी धूप में वे मेरा घंटों इंतजार करते रहें, पर ऐसा क्या चुंबकीय व्यक्तित्व है,  राजनेताओ का कि हमने देखा लोग कड़ी गर्मी के बाद भी लाखो की तादात में हेलीकाप्टर से उतरने वाले नेताओ के इंतजार में घंटो खड़े रहे, देश भर में.  जबकि उन्हें पता था कि नेता जी आकर क्या बोलने वाले हैं. इसका अर्थ  यही है कि अवश्य कुछ ऐसा है राजनीति में कि हारने वाले या जीतने वाले या केवल नाम के लिये चुनाव लड़ने वाले सभी किसी ऐसी ताकत के लिये राजनीति में आते हैं जिसे मेरे जैसे मूढ़ बुद्धि शायद समझ नही पा रहे. तमाम राजनैतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार देश के “रामभरोसे” मतदाता की तारीफ करते नही अघाते, देश ही नही दुनिया भर में हमारे रामभरोसे की प्रशंसा होती है, उसकी शक्ति के सम्मुख लोकतंत्र नतमस्तक है. रामभरोसे वोटरे के फैसले के पूर्वानुमान की रनिंग कमेंट्री कई कई चैनल कई कई तरह से करते रहे हैं. मैं भी अपनी मूढ़ मति से नई सरकार का हृदय से स्वागत करती हूं.पिछले अनुभवों में हर बार बेचारा रामभरोसे वोटर ठगा गया है, कभी गरीबी हटाने के नाम पर तो कभी धार्मिकता के नाम पर, कभी देश की सुरक्षा के नाम पर तो कभी रोजगार के सपनो की खातिर. एक बार और सही. हर बार परिवर्तन को वोट करता है रामभरोसे, कभी यह चुना जाता है कभी वह. पर रामभरोसे का सपना टूट जाता है, वह फिर से राम के भरोसे ही रह जाता है, नेता जी कुछ और मोटे हो जाते हैं. नेता जी के निर्णयो पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं,जाँच कमीशन व न्यायालय के फैसलो में वे प्रश्न चिन्ह गुम जाते हैं. रामभरोसे किसी नये को नई उम्मीद से चुन लेता है. चुने जाने वाला रामभरोसे पर राज करता है, वह उसके भाग्य के घोटाले भरे फैसले करता है.मेरी पीढ़ी ने तो कम से कम अब तक यही होते देखा है. प्याज के छिलको की परतो की तरह नेताजी की कई छबिया होती हैं. कभी वे  जनता के लिये श्रमदान करते नजर आते हैं, शासन के प्रकाशन में छपते हैं. कभी पांच सितारा होटल में रात की रंगीनियो में रामभरोसे के भरोसे तोड़ते हुये उन्हें कोई स्पाई कैमरा कैद   कर लेता है. कभी वे संसद में संसदीय मर्यादायें तोड़ डालते हैं, पर उन्हें सारा गुस्सा केवल रामभरोसे के हित चिंतन के कारण ही आता है. कभी कोई तहलका मचा देता है स्कूप स्टोरी करके कि  नेता जी का स्विस एकाउंट भी है. कभी नेता जी विदेश यात्रा पर निकल जाते हैं रामभरोसे के खर्चे पर, वे जन प्रतिनिधि जो ठहरे. संभवतः सर्वहारा को सर्व शक्तिमान बना सकने की ताकत रखने वाले लोकतंत्र की सफलता के लिये उसकी ये कमियां स्वीकार करनी जरूरी हैं.जो भी हो शायद यही लोकतंत्र है, तभी तो सारी दुनिया इसकी इतनी तारीफ करती है.

भारतीय लोकतात्रिक प्रणाली की वैधानिक व्यवस्थायें अमेरिकन व इंगलैण्ड सहित दुनिया के विभिन्न संविधानो के अध्ययन के उपरांत भीमराव अम्बेडकर जैसे विद्वानो ने निर्धारित की थीं. भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार तो विजयी उम्मीदवारों में से सबसे बड़े दल के सांसद,अपना नेता चुनते हैं, जो प्रधानमंत्री पद के लिये राष्ट्रपति के सम्मुख अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करता है, अर्थात जनता अपने वोट से सीधे रूप से प्रधानमंत्री का चुनाव नही करती यद्यपि सत्ता की मूल शक्ति प्रधानमंत्री में ही सन्नहित होती है . जबकि अमेरिकन प्रणाली में राष्ट्रपति सत्ता की शक्ति का केंद्र होता है, और उसका सीधा चुनाव जनता अपने मत से करती है.

अब जन आकांक्षा केवल घोषणायें और शिलान्यास नहीं कुछ सचमुच ठोस चाहती है . सरकार से हमें देश की सीमाओ की सुरक्षा, भय मुक्त नागरिक जीवन, भारतवासी होने का गर्व, और नैसर्गिक न्याय जैसी छोटी छोटी उम्मीदें  हैं . सरकार सबके हितो के लिये काम करे न कि पार्टी विशेष के, पर्दे के सामने या पीछे के नुमाइन्दो से सिफारिश पर, केवल उन लोगो के काम हो जिन के पास वह खास सिफारिश हो. जो उम्मीदें चुनावी भाषणो और रैलियो में जगाई गई हैं, वे बिना भ्रष्टाचार के मूर्त रूप लें .महिलाओ को सुरक्षा मिले, पुरुषो की बराबरी का अधिकार मिले. युवाओ को अच्छी शिक्षा तथा रोजगार मिले. आम आदमी को मंहगाई और भ्रष्टाचार से निजात मिले. अल्पसंख्यको को विश्वास मिले. देश का सर्वांगीण विकास हो सके.राष्ट्र कूटनीतिक रूप से, तकनीकी रूप से,सक्षम हो.  विकास के रथ पर सवार होकर हमारा देश दुनिया के सामने एक विकसित राष्ट्र के रूप में पहचान बनाये यह हर भारतीय की आकांक्षा है, और यही  सरकार की चुनौती है.

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते विकास के सारे मापदण्ड छिन्न भिन्न हैं  निश्चित ही सारी जबाबदारी केवल सरकार पर नही डाली जा सकती, हर नागरिक को भी इस महायज्ञ में अपनी भूमिका निभानी ही  होगी. सरकार विकास का वातावरण बना सकती है, सुविधायें जुटा सकती है, पर विकास तो तभी होगा जब प्रत्येक इकाई विकसित होगी, हर नागरिक सुशिक्षित बनेगा. जब देशप्रेम की भावना का अभ्युदय  हर बच्चे में होगा तो स्वहित के साथ साथ देशहित भी हर नागरिक के मन मस्तिष्क का मंथन करेगा. भ्रष्टाचार स्वयमेव नियंत्रित होता जायेगा और देश उत्तरोत्तर विकसित हो सकेगा. अतः नागरिको में सुसंस्कार विकसित करना भी नई सरकार के सम्मुख एक चुनौती है.

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन# 66 – रतनगढ़ का हमाम ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक हाइबन   “रतनगढ़ का हमाम। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन  # 66 ☆

☆ रतनगढ़ का हमाम ☆

चित्तौड़गढ़ से 70 किलोमीटर पूर्व में अरावली की पहाड़ी पर  तीनों ओर गहरी खाई के घुमावदार हिस्से पर रतनगढ़ का किला 11 वीं शताब्दी का बना हुआ है। इसे राजा रतनसिंह के नाम पर रतनगढ़ का किला कहते हैं। इसी से गांव का नाम रतनगढ़ पड़ा है।

यह रतनगढ़ सिंगोली तहसील जिला नीमच मध्यप्रदेश में स्थित है। पूर्व में यह जागीर ग्वालियर रियासत को इंदौर रियासत द्वारा स्थानांतरित की गई थी।

खंडहर हो चुके किले में एक अद्भुत हमाम घर है। यह हमामघर रूपी बावड़ी आज भी बनी हुई है । जिसमें 12 महीने पानी आज भी भरा रहता है । इसकी बनावट, तकनीकी व खुबसूरती से जमीन के अंदर की निर्माण कला की उत्कृष्टता का बखूबी समझा जा सकता है। जब यह बावड़ी सह हमाम घर आज के समय यह इतना बेजोड़ और उम्दा है तो उस जमाने में कैसा रहा होगा ?

प्राचीन समय में जमीन से इतनी ऊपर पहाड़ी पर इतनी जोरदार वास्तुकला की यह बावड़ी आधुनिक स्विमिंग पूल को भी मात देती है । यह ऊंची पहाड़ी पर समतल जमीन से तीन मंजिला नीचे दो भागों में विभाजित स्विमिंग पुल यानी पुराना हमामघर बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से बनाया गया है।

इसी किले पर बड़ी-बड़ी धान भरने की गोलाकार कोठियां बनी हुई है । जिनका दीवारों पर लगा चिकना प्लास्टर आज भी विद्यमान है । कई शताब्दी बीत जाने के बाद भी यह कोठियां आज भी बेहतर हालत में विद्यमान है। इससे भारतीय कामगारों की उत्कृष्टता और गुणवत्ता युक्त सामग्री का अंदाजा लगाया जा सकता है।

रतन-गढ़~

धानकोठी में गिरा

चूहा ले सांप।

~~~~~~~

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

26-08-20

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 36 ☆ भागमभाग ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “भागमभाग”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 36 – भागमभाग ☆

कुर्सी दौड़ का आयोजन चल रहा था। एक आनर सौ बीमार का दृश्य। आयोजक भी बहुत होशियार अपनी कुर्सी तो फिक्स करके बैठ गए बाकी सब को संगीत की धुन पर दौड़ा दिया। जो प्रतिभागी उनकी ओर विश्वास की दृष्टि से देखता, उसी की कुर्सी छिन जाती।  खेल शुरू हो गया। हर राउंड में, एक कुर्सी कम हो जाती , कुर्सी छोड़ कर  जाने वाला कातर निगाह से देखता और मन ही मन बड़बड़ाते हुए चला जाता। देखते ही देखते बस तीन लोग बचे अब तो समझ में ही नहीं आ रहा था कौन जीतेगा। बस आयोजक ही पूर्ण आत्मविश्वास से भरे नजर आ रहे थे।  अन्य दो प्रतिभागियों ने उनकी कुर्सी की जाँच करवाने के लिए कहा तो वो तैयार ही न हुए।

दूर बैठे वो सभी लोग जो अभी तक इस दौड़ में शामिल थे आ धमके और आयोजक को पूरी ताकत से हटाने लगे पर वो तो अपनी कुर्सी से हिल ही नहीं रहे थे।

किसी ने कहा फेविकोल का जोड़ है, हटेगा नहीं , कुर्सी ही तोड़ दो, तो न रहेगा बाँस न बजेगी बांसुरी।

तोड़- फोड़ शुरू हो गयी। एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप की झड़ी लग चुकी थी तभी  समझाइश लाल जी देवदूत के समान आ पहुँचे। अब तो सबकी निगाहें उनकी ओर ही लगी हुई थी।

उन्होंने सर्वप्रथम कुर्सी दौड़ के आयोजक को धन्यवाद देते हुए कहा आप सचमुच बधाई के पात्र हैं , जो सबको इस तरह से जोड़ कर रखे हुए हैं। अपने भावों को व्यक्त करने का ये सशक्त माध्यम है।  मन की बात अगर मन में रह जाए,  तो ये किसी भी काल में उचित नहीं रहा है। हम सब लोग चाय पर चर्चा करते हुए इस समस्या का निराकरण भी कर लेंगे।

चाय की चुस्कियों के साथ जब – जब चर्चा होती है , तब- तब बात केवल नाश्ते पर ही रुक जाती है। क्योंकि चाय और नाश्ते का चोली दामन का साथ जो ठहरा।

खैर निष्कर्ष वही ढाक के तीन पात, जिसको इस आयोजन में भाग लेना हो वो रुके अन्यथा द्वारा खुले है। जो नियमों के अनुसार नहीं चलेगा वो जा सकता है।

अगले महीने पुनः प्रथम रविवार को कुर्सी दौड़ की प्रतियोगिता होगी जो भी जुड़ना चाहे जुड़ सकता है , बस आयोजक के नियमों को मानना होगा।

 

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 43 ☆ हम बढ़े-बढ़े चले ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  “हम बढ़े-बढ़े चले.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 43 ☆

☆ हम बढ़े-बढ़े चले ☆ 

हम बढ़े- बढ़े चले

राह भी बढ़ी चली।

जीत- हार जिंदगी

खिल उठी कली- कली।।

 

सत्य मेरा मीत है

बढ़ रहा अतीत है

लिख गए हैं शब्द- शब्द

जिंदगी की प्रीति है

 

गाँव छूटता गया

शाम तो ढली-ढली।

जीत-हार जिंदगी

खिल उठी कली-कली।।

 

बाँटता हूँ हर्ष मैं

कर रहा विमर्श मैं

जो मिला है ईश से

ले रहा सहर्ष मैं

 

शिशुओं की चिर हँसी

लग रही भली- भली।

जीत हार जिंदगी

खिल उठी कली- कली।।

 

पीढ़ियाँ बदल रहीं

सीढ़ियाँ मचल रहीं

नीतियाँ बदल रहीं

रीतियाँ फिसल रहीं

 

अब नदी में मैल है

भर गई तली-तली।

जीत-हार जिंदगी

खिल उठी कली-कली।।

 

कुछ यहाँ से जा रहे

कुछ यहाँ पर आ रहे

जो मिला है प्रेम से

आज हम लुटा रहे

 

श्वांस-श्वांस विष भरा

आग भी जली-जली।

जीत-हार जिंदगी

खिल उठी कली-कली।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव : कोरोना मी नाराज आहो तुझ्यावर ….. खरे आहे ☆ श्री शामसुंदर महादेवराव धोपटे ☆

श्री शामसुंदर महादेवराव धोपटे

संक्षिप्त परिचय 

  • सेवानिवृत्त प्राचार्य,  महाराष्ट्र शासन द्वारा राज्य पुरस्कार से सम्मानित.
  • रक्तदान कार्य मे विशेष योगदान हेतू डॉ. बद्रिप्रसाद श्रीवास्तव पुरस्कार तथा राज्य रक्त संक्रमण परिषद से सम्मानित.  50 बार रक्तदान तथा रक्तदान शिविरों का आयोजन.
  • सामाजिक तथा संस्कृतिक संस्थाओं से संबधित. जेसीआय संस्था के पूर्व अध्यक्ष, लायन्स क्लब अध्यक्ष.
  • Personality Development के राष्ट्रीय प्रशिक्षक. 500 से अधिक शिविरों मे मार्गदर्शन.
  • महाराष्ट्र राज्य शिक्षण मंडळ, पुणे में अभ्यास मंडळ सदस्य के रूप मे कार्य. पाठ्य पुस्तक निर्मिती मे योगदान.
  • संताजी शिक्षण मंडळ के सहसचिव. एसपीएम माझी विद्यार्थी संघ के अध्यक्ष.
  • वृत्तपत्र लेखन कार्य तथा आकाशवाणी से कई बार विभिन्न कार्यक्रमों की प्रस्तुति.

☆ कवितेचा उत्सव : कोरोना मी नाराज आहो तुझ्यावर ….. खरे आहे ☆ श्री शामसुंदर महादेवराव धोपटे 

कोरोना मी नाराज आहो तुझ्यावर …..खरे आहे,

पण तू  जीव घेतो म्हणून नव्हे.

मित्रांच्या त्या कंपूत

सुख दुःखाच्या देवघेवित

रक्तसंबंधा पलीकडचा धीर अन्  सांत्वनाची  वाट

तू हिरावून घेतली ना रे…..

जिव्हाळ्याचा कंपू संपविलास की रे बाबा तू…..

 

मी नाराज नाही….. तुझ्यावर

की तू लग्न समारोह नीरस केले म्हणून.

पण  दिवसरात्र राबणाऱ्या त्या माय माऊलीच्या मुखमंडला वरील श्रमपरिहाराचे निरागस हास्य तू हिरावून घेतले ना तू,

 

मी नाराज नाही तुझ्यावर

की तू सांस्कृतिक कार्यक्रम बंद केले म्हणून

पण त्या कलावंताच्या निरागस कलाना दाद देण्याच्या आनंदापासून वंचित केलेस ना तू

 

मी नाराज नाही तुझ्यावर

की तू आजारी करतोस आप्तांना

पण खांद्यावर हात ठेवून

 

लढ म्हणण्याचा हक्क हिरावून घेतला ना तू…..

 

मी नाराज नाही तुझ्यावर

की तू मृत्यू देतो म्हणून

पण मानवतेचा शेवटचा खांदा अन्

हृदयाच्या रुदनाने दिलेला मुखाग्नी हिरावून घेतलास ना तू…..

 

हो रे कोरोना मी नाराज आहे तूझ्यावर, तू जीवन संपवतो म्हणून नव्हे

जगण्याचा आत्माच संपविलास ना रे…..

 

© श्री शामसुंदर महादेवराव धोपटे

चंद्रपूर

मो. 9822363911

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ गनीम ☆ श्री शरद कुलकर्णी

☆ कवितेचा उत्सव ☆ गनीम ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆ 

 

स्पर्धा जगण्याची ही,

की संघर्ष म्हणावे याला.

बनाव युद्धाचा जर हा,

मग मोल काय लढण्याला?

 

जिंकलो हरुन कितीदा ,

अन् जिंकुनी हरलो होतो.

अर्थहीन विसंगतीने तरीही ,

युयुत्सुच ठरलो होतो.

 

उशिराने थोड्या कळले,

जो अनर्थ घडला होता.

माझ्यातच खोल लपूनी,

गनीम दडला होता.

 

©  श्री शरद कुलकर्णी

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

 

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ बोध कथा – चाणाक्ष बालक ☆ अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी

☆ जीवनरंग ☆ बोध कथा – चाणाक्ष बालक ☆ अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी ☆ 

||कथासरिता||

(मूळ –‘कथाशतकम्’  संस्कृत कथासंग्रह)

? बोध कथा?

कथा १.  चाणाक्ष बालक

कांचीपुरम हे त्या काळातील एक श्रेष्ठ दर्जाचे अध्ययनक्षेत्र होते. तिथे एक विद्वान राहत होता. त्याचे अध्यापनातील कौशल्य विलक्षण होते. गुरु ज्ञानी तर असावाच, पण ते ज्ञान शिष्यामधे संक्रमित होणे हे जास्त महत्वपूर्ण असते. त्यावरूनच त्याची गुणवत्ता सिद्ध होते. त्या विद्वानाने आपल्या पाठ-प्रवचनाद्वारे अनेक विद्यार्थ्यांना विद्यासंपन्न केले. त्यामुळे त्या विद्वानाची कीर्ती सर्वत्र पसरली. त्याच्यासारखा श्रेष्ठ गुरु लाभावा म्हणून दूरवरून त्याच्याकडे विद्यार्थी येत असत.

एके दिवशी एक बालक त्या विद्वानाजवळ येऊन म्हणाला, “गुरुवर , आपणाकडून विद्या ग्रहण करावी अशी माझी मनोमन इच्छा आहे. तेव्हा आपण मला शिकवावे अशी नम्र विनंती आहे.”  त्या बालकाचे बोलणे ऐकताच त्याच्या बुद्धीची परीक्षा घ्यावी असे त्या विद्वानाला वाटले. म्हणून त्याने बालकास “देव कोठे आहे?” असा प्रश्न विचारला. तो प्रश्न ऐकताच क्षणार्धात बालक नम्रतेने उत्तरला, “गुरुवर, देव जिथे कोठे नाही ते आपण मला प्रथम सांगावे. नंतर मी आपल्या प्रश्नाचे उत्तर देतो.” बालकाच्या त्या उत्तराद्वारे विद्वानाला त्याच्या बुद्धीची क्षमता लक्षात आली. बालकाच्या विनंतीला अनुसरून त्याने त्याला विविध प्रकारचे ज्ञान देऊन विद्यासंपन्न केले.

तात्पर्य – खरोखरच बुद्धिमान व्यक्तींच्या बुद्धीची चुणूक बालपणातच दिसून येते !

 

अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी    

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सलीलप्रवाहात डोकावताना…. ☆ डाॅ.मेधा फणसळकर

डाॅ. मेधा फणसळकर

☆ विविधा ☆  सलीलप्रवाहात डोकावताना…. ☆ डाॅ. मेधा फणसळकर ☆

आम्ही टिळक आयुर्वेद महाविद्यालयातील सर्व कलाप्रेमी वैद्य लोक कॉलेजमध्ये असताना एका कलासक्त, संस्कृत विषयाच्या प्राध्यापिक असणाऱ्या “ माधवी पटवर्धन” या व्यक्तिमत्वाबरोबर कलेच्या माध्यमातूनच जोडल्या गेलो. व्यावसायिक शिक्षण घेणाऱ्या आम्हा मुलांमधील कलेच्या ओढीला हलकेच साद घालत सुरु केलेले कलामंडळ म्हणजे एक आनंदाचे झाड होते. तेच झाड पुन्हा एकदा अतुलच्या प्रयत्नाने पुन्हा बहरले. आम्ही ऑनलाईन भेटू लागलो आणि जवळजवळ वीस वर्षांनी ते मैत्र पुन्हा एकदा उजळले. त्यातीलच कालचे पुष्प म्हणजे ‛ सलील कुलकर्णी’ यांच्याशी झालेल्या गप्पा! सलीलप्रवाहात डोकावताना आलेली अविस्मरणीय क्षणाची अनुभूती!

सलीलजींच्या भाषेत सांगायचे तर “ विकिपीडियावर जे नाही ते ज्ञान केवळ आजी- आजोबांकडे आहे आणि अशा अनुभवाच्या पायाशी नेहमी बसावे” आम्हीही काल असाच काहीसा अनुभव घेतला. आणि एक संपन्न अनुभवाचा, विचारांचा खजिना आम्हाला गवसला.

सलीलजींच्या गाण्यातून, लेखनातून आणि वेगवेगळ्या कार्यक्रमातून ते आपल्याला नेहमी भेटतच असतात. पण काल झालेल्या ‛या हृदयीचे त्या हृदयी’ संवादातून हे व्यक्तिमत्त्व अधिकच उलगडत गेले. आज महाराष्ट्रात राहूनही उत्तम मराठी शब्दसुद्धा कानावर पडणे दुरापास्त झाले आहे. अशा वेळी सलीलजींच्या बोलण्यातील शब्दसंपत्ती, सखोल चिंतन मनाला अधिक समृद्ध करुन गेले. ऐकण्याची प्रक्रिया कमी झाली आहे याबद्दल त्यांना खंत वाटते. एखादे गाणे कित्येक वेळा ऐकले तरी प्रत्येक वेळी काहीतरी नवी अनुभूती देते. म्हणूनच ते म्हणतात ,“ गप्पा आणि भाषणामध्ये फरक आहे आणि त्यामुळेच मला गप्पा मारायला आवडतात.”  कारण त्यात  देवाण- घेवाण आहे. बोलणे आणि ऐकणे या दोन्ही प्रक्रिया त्यात आहेत.

आपले वैद्यकीय शिक्षण आणि कार्यक्षेत्र याची निवड करायची वेळ आली तेव्हा मनाला पटला तोच निर्णय घेतला आणि संगीतक्षेत्र निवडले. हे सांगताना ते म्हटले,“ ज्या गावात राहायचे नाही तिथे बंगला का बांधायचा?” अशा सहज सोप्या उपमा- उदाहरणानी हा सलीलप्रवाह आम्हाला त्यांचा जीवनप्रवास उलगडून दाखवत होता.

सातशेच्या वर त्यांनी संगीतरचना केल्या. बरेच वेळा आधी चाल आणि मग त्यावर शब्द सुद्धा बांधले. पण ठिपके जोडून रांगोळी काढण्यापेक्षा एखाद्या मनस्वी चित्रकाराने कुंचल्याच्या सहज मारलेल्या फाटकाऱ्यातून अप्रतिम चित्र उमटावे तसे गाणे आतून आले तरच रसिकांपर्यंत सहज पोहोचते असे त्यांना वाटते.

हृदयनाथ, लता मंगेशकर या नेहमीच त्यांच्या गुरुस्थानी असणाऱ्या व्यक्ती आहेत. त्यांच्याविषयी भरभरून बोलताना ते म्हणाले,“ झाड जितके मोठे तितका त्याचा विस्तार मोठा! ते ओरबाडण्यापेक्षा त्याचे सतत निरीक्षण करावे  आणि ते आपल्या आत रुजवण्याचा प्रयत्न करावा.”

अशाच गप्पा रंगत असताना “पुढच्या पिढीसाठी काय संदेश असेल किंवा काहीतरी उत्तम- अभिजात पुढे रुजावे असा गाण्यातून प्रयत्न असतो का?” असे विचारल्यावर ते लगेच म्हणाले,“ माझ्या मुलांनी काय ऐकावे हे मी ठरवू शकत नाही. पण उत्तम तेच त्यांच्या कानावर पडावे असा विचार कदाचित अंतर्मनात असेल आणि त्यातून जर असे संगीत निर्माण होत असेल आणि त्यातून पुढची पिढी घडली तर जास्त आनंद आहे.”

प्रत्येक गाणे हे खरं तर मूळची एक कविता असते हे आपण जाणतोच. जेव्हा अशा कवितांना संगीतकाराचा परिसस्पर्श लाभतो तेव्हा त्याचे सोने होते. पण त्यातही एक संगीतकार म्हणून त्यांनी एक विचार मांडला जो खरोखरच विचार करण्यासारखा आहे. ते म्हणतात,“ प्रत्येक वृत्तबद्ध कविता चालीत बांधण्याचा अट्टाहास करु नये. काहीवेळा सूरांनी त्याची धार बोथट होते आणि कवितेचा भाव हृदयापर्यंत पोहचू शकत नाही.”  एक मनस्वी कलाकारच एखाद्या कालाकृतीकडे इतक्या डोळसपणे बघू शकतो. म्हणूनच या सलीलप्रवाहात डोकावताना खोल असला तरी त्याचा नितळ तळ स्पष्ट दिसत होता. या प्रवाहाची स्वतःची अशी मनोभूमिका, दिशा ठरलेली आहे. आणि ती सखोल चिंतनातून आली आहे. म्हणूनच त्या प्रवाहातून वाहणारा विचारांचा खळखळता झरा काल आम्हाला निखळ आनंदात चिंब भिजवून गेला.

 

©  डाॅ. मेधा फणसळकर

9423019961

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ खार! ☆ श्रीमती अनुराधा फाटक

श्रीमती अनुराधा फाटक

 ☆ विविधा ☆ खार! ☆ श्रीमती अनुराधा फाटक  ☆ 

‘लहान सुंदर गोजिरवाणी अशी दिसे ही खार, लुसलुशीत हे अंग तिचेच शेपूट गोंडेदार!’

अशा वर्णनाची बालगीतात कुतूहलाचे स्थान निर्माण करणारी खार आजची नसून रामायणकालापासून तिची सर्वांना ओळख आहे .

रावणाच्या तावडीतून सीतेला सोडविण्यासाठी लंकेत प्रवेश करता यावा म्हणून वानरसेनेच्या मदतीने श्रीरामानी सेतू बाधंण्याचे

काम सुरु केले त्यावेळी एक खार सतत समुद्रातील वाळूत लोळून सेतूबांधावर येऊन आपले शरीर झाडत असल्याचे प्रभू रामचंद्रांच्या लक्षात आले. खारीचे हे काम पाहून त्यांनी कौतुकाने तिच्या पाठीवरून हात फिरविला. त्याची निशाणी अजूनही समस्त खार जमातीवर दिसते.खारीच्या शरीरावर असणारे पट्टे म्हणजे खारीच्या पाठीवर हात फिरविलेले श्रीरामांच्या बोटांचे ठसे समजले जातात. आपल्या कुवतीप्रमाणे दुसऱ्यांना मदत करणारी, स्ततःच्या इच्छेनुसार, कोणाचीही बळजबरी नसताना काम करणारी माणसे दुसऱ्यांच्या कामात खारीचा वाटा उचलताना दिसतात.

सतत वृक्षावर राहणारा, प्रत्येक वस्तू कुरतडून खाणारा  सर्वसंचारी असा निरुपद्रवी प्राणी म्हणजे खार! काही मुले एखादी वस्तू दाताने कुरतडत। बसतात तेव्हा खारीसारखा कुरतडत बसू नको असे म्हणतात. स्वतःच्या शरीराचा तोल सांभाळण्यासाठी खारीला झुपकेदार शेपूट उपलब्ध झाली असावी. खारीसारखी चपळ वृत्तीची मुले पाहिली की,सर्वांना आनंद होतो. खारीचा वाटा उचलून सर्व मुलांनी काही चांगले उपक्रम केले तर राष्ट्र उभारणीच्या कार्याचे उद्याचे चित्र नक्कीच आशादायक असेल. आज अजगराप्रमाणे सुस्तावलेल्या समाजात चेतना निर्माण करण्यासाठी खारीसारख्या कार्यक्षम प्रवृत्तीच्या माणसांची गरज आहे.

झरझर झाडावर, सरसर खाली पळणारी खार महत्वाचीच आहे.

 

© श्रीमती अनुराधा फाटक

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ अधीक महिना ☆ सुश्री दीप्ती कुलकर्णी

सुश्री दीप्ती कुलकर्णी

☆ इंद्रधनुष्य ☆ अधीक महिना ☆ सुश्री दीप्ती कुलकर्णी ☆ 

अधिक मास

अधिक मास म्हटलं की प्रत्येकच स्त्रीमध्ये एक प्रकारे उत्साह जागतो आणि महिनाभर वेगवेगळ्या प्रकारची रोज ३३ फुले वाहून ती आपल्या बाळकृष्णाची मनोभावे पूजा करते.

कृष्ण हा भगवान विष्णूचा आठवा अवतार . जेव्हा भगवान विष्णूंना विचारले गेले की तुम्हाला जाई, मोगरा, गुलाब, चंपा, पारिजातक अशी कोणती फुले पाहिजेत ? तेव्हा भगवान विष्णूंनी सांगितले की मला यातील कोणतेही फूल नको, मला आठ फुले पाहिजेत. ती आठ फुले कोणती याचे सुंदर वर्णन या संस्कृतच्या श्लोकामध्ये आपल्याला पहावयास मिळते .

? अयुसा प्रथमं पुष्पं

पुष्पं इंद्रियनिग्रहं

सर्वभूत दयापुष्पं

क्षमापुष्पं विशेषतः

ध्यानपुष्पं दानपुष्पं

योगपुष्पं तथैवच

सत्यं अष्टोदम पुष्पं

विष्णू प्रसीदं करेत ! ?

अर्थात –

अयुसा हे पहिले पुष्प आहे . म्हणजेच जाणुनबुजून किंवा अजाणतेपणी कोणत्याही प्रकारे हिंसा करू नका.

दुसरे पुष्प आहे इंद्रियनिग्रह.आपल्या इंद्रियांवर ताबा ठेवा . मला हे पाहिजे , माझ्या कडे ते नाही असे म्हणू नका.समाधानी रहा.

तिसरे पुष्ष आहे सर्वभूत दया. सर्वांवर प्रेम करा . कोणाचाही तिरस्कार करू नका .

चौथे आणि विशेष पुष्प आहे क्षमा . कोणी आपल्याला चुकीचा म्हणत असेल तरीही त्याला क्षमा करा.

ध्यान पाचवे पुष्प आहे .ध्यान करा ज्यामुळे मन एकाग्र होऊन मनावर ताबा मिळवता येईल.

दान सहावे पुष्प आहे . सढळ हाताने दान करा.

सातवे पुष्प आहे योग. योगा करा.

सर्वात महत्त्वाचे आठवे पुष्प आहे सत्य. नेहमी सत्य बोला .सत्य बोलून एखाद्या वेळी कोणाचे मन दुखले तरी चालेल पण असत्य बोलून एखाद्याच्या मनातून कायमचे उतरु नका.

ही पुष्पे अर्पण करून भगवान विष्णूला प्रसन्न करा.

अधिक मासाच्या भरभरून शुभेच्छा.

 

संग्राहक: सुश्री दीप्ती कुलकर्णी

कोल्हापूर

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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