हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ सत्य ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ सत्य 

इसका सत्य

उसका सत्य,

मेरा सत्य

तेरा सत्य,

क्या सत्य सापेक्ष होता है?

अपनी सुविधा

अपनी परिभाषा,

अपनी समझ

अपना प्रमाण,

दृष्टि सापेक्ष होती है,

साधो! सत्य निरपेक्ष होता है!

©  संजय भारद्वाज

रात्रि 12:27 बजे, 16.6.19

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 58 ☆ संस्मरण – हमारे मित्र डॉ लालित्य ललित जी ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर संस्मरण “हमारे मित्र  डॉ लालित्य ललित जी।  श्री विवेक जी ने  डॉ लालित्य ललित जी  के बारे में थोड़ा  लिखा  ज्यादा पढ़ें की शैली में बेहद संजीदगी से यह संस्मरण साझा किया है।। इस संस्मरण  को हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने के लिए श्री विवेक जी  का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 58 ☆

 

☆ संस्मरण –  हमारे मित्र डॉ लालित्य ललित जी ☆

खाने के शौकीन, घुमक्कड़, मन से कवि,  कलम से व्यंग्यकार हमारे मित्र  लालित्य ललित जी!

गूगल के सर्च इंजिन में किसी खोज के जो स्थापित मापदण्ड हैं उनमें वीडियो, समाचार, चित्र, पुस्तकें प्रमुख हैं.

जब मैंने गूगल सर्च बार पर हिन्दी में लालित्य ललित लिखा और एंटर का बटन दबाया तो आधे मिनट में ही लगभग ३१ लाख परिणाम मेरे सामने मिले. यह खोज मेरे लिये विस्मयकारी है. यह इस तथ्य की ओर भी इंगित करती है कि लालित्य जी कितने कम्प्यूटर फ्रेंडली हैं, और उन पर कितना कुछ लिखा गया है.

सोशल मीडिया पर अनायास ही किसी स्वादिष्ट भोज पदार्थ की प्लेट थामें परिवार या मित्रो के साथ  उनके  चित्र मिल जाते हैं. और खाने के ऐसे शीौकीन हमारे लालित्य जी उतने ही घूमक्कड़ प्रवृत्ति के भी हैं. देश विदेश घूमना उनकी रुचि भी है, और संभवतः उनकी नौकरी का हिस्सा भी. पुस्तक मेले के सिलसिले में वे जगह जगह घूमते लोगों से मिलते रहते हैं.

मेरा उनसे पहला परिचय ही तब हुआ जब वे एक व्यंग्य आयोजन के सिलसिले में श्री प्रेम जनमेजय जी व सहगल जी के साथ व्यंग्य की राजधानी, परसाई जी की हमारी नगरी जबलपुर आये थे. शाम को रानी दुर्गावती संग्रहालय के सभागार में व्यंग्य पर भव्य आयोजन संपन्न हुआ, दूसरे दिन भेड़ागाट पर्यटन पर जाने से पहले उन्होने पोहा जलेबी की प्लेटस के साथ तस्वीर खिंचवाई और शाम की ट्रेन से वापसी की.

मुझे स्मरण है कि ट्रेन की बर्थ पर बैठे हम मित्र रमेश सैनी जी ट्रेन छूटने तक लम्बी साहित्यिक चर्चायें करते रहे थे.

इसके बाद उन्हें लगातार बहुत पढ़ा, वे बहुप्रकाशित, खूब लिख्खाड़ लेखक हैं. व्यग्यम की गोष्ठियो में हम व्यकार मित्रो ने उनकी किताबों पर समीक्षायें भी की हैं. मैं अपने समीक्षा के साप्ताहिक स्तंभ में उनकी पुस्तक पर लिख भी चुका हूं. वे अच्छे कवि, सफल व्यंग्यकार तो हैं ही सबसे पहले एक खुशमिजाज सहृदय इंसान हैं, जो यत्र तत्र हर किसी की हर संभव सहायता हेतु तत्पर मिलता है. अपनी व्यस्त नौकरी के बीच इस सब साहित्यिक गतिविधियो  के लिये समय निकाल लेना उनकी विशेषता है.

वे बड़े पारिवारिक व्यक्ति भी हैं, भाभी जी और बच्चो में रमे रहते हुये भी निरंतर लिख लेने की खासियत उन्ही में है. इतना ही नही व्यंग्ययात्रा व्हाट्सअप व अब फेसबुक पर भी समूह के द्वारा देश विदेश के ख्याति लब्ध व्यंग्यकारो को जोड़कर सकारात्मक, रचनात्मक, अन्वेषी गतिविधियों को वे सहजता से संचालित करते दिखते हैं.

मैं उनके यश्स्वी सुदीर्घ सुखी जीवन की कामना करता हूं, व अपेक्षा करता हूं कि उनका स्नेह व आत्मीय भाव दिन पर दिन मुझे द्विगुणित होकर सदा मिलता रहेगा.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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English Literature – Poetry ☆ My strange encounters with weight ☆ Colonel Jayant Khadilkar

Colonel Jayant Khadilkar

(We proudly welcome Colonel Jayant Khadilkar  on e-abhivyakti.  Colonel Jayant Khadilkar was commissioned in June 1980 into the Corps of Signals. He is an Alumnus of National Defence Academy, Pune and Indian Institute of Science, Bengaluru. Academically brilliant, he was awarded Plaque of Honour in Signals Young Officers Course and Army Chief’s Gold Medal in the Signals Degree Engineering Course. He is an expert in Electronic and Information Warfare.  He was awarded the first prize for his MBA thesis on the use of Decision Making techniques in Electronic Warfare.  Colonel Jayant pursues writing as a hobby, to capture his thoughts on topics of current public interest.  Today, we present his classical poetry My strange encounters with weight  .)

☆ My strange encounters with weight  

 

My first RV with weight was in May 76,

at the pre joining medical for the NDA.

As the scale refused to move beyond 46,

a career in the Army seemed miles away.

 

I looked towards the doctor quizzingly,

outcome of the check up almost certain.

What a relief it was, when he said to me,

Go and eat bananas, minimum half a dozen.

 

Have water in plenty just before you come.

That should help you clear the minimum.

I thanked my stars, seized the opportunity.

The scale, next time, moved closer to fifty.

 

Courtesy the food at the NDA Mess,

coupled with intense physical work out,

weight was added and muscles built too.

I was above the Fly Weight, at fifty-two.

 

For Inter Squadron Boxing Competition,

Fly Weight category already stood taken.

Nominated to fight in the Light Fly Weight.

Pronto, my second encounter with weight.

 

Now I had to weigh between 45 and 48.

That meant a strict control on my diet.

No pastry and coffee, specially the cold one,

and getting wrapped in blankets after a run

 

Many years later, I had the third encounter,

when I was working in the private sector.

Courtesy the roles for which I was picked,

physical exercise got routinely skipped.

 

Frequently on tours, away from home,

Amongst buffet spreads, very inviting,

on savouries and sweets, I had a go,

acidity and indigestion notwithstanding.

 

My weight now measured eighty and two.

My waistline had grown, and tummy too.

As I visited him for a nagging head ache,

pre hyper tension, was the doctor’s take.

 

Very soon, I was prescribed a tablet,

and also had to take a blood sugar test.

Borderline diabetes was the diagnosis.

That made me sit up and take due notice.

 

(To be continued….)

© Col Jayant Khadilkar, Veteran

Pune

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ उत्सव कवितेचा # 9 – मागोवा ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  हम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी के हृदय से आभारी हैं कि उन्होने साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा करने की सहमति प्रदान की है। आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  ‘मागोवा

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा – # 9 ☆ 

☆ मागोवा  

आज घेताना मागोवा

जुनी वाट झाकोळावी

दूर धुक्यातून कोणी

जुनी कथा रेखाटावी.

 

आज व्हावा डोळाबंद

रंगरूप पळसाचे

जागवावे भाव मनी

भोळ्या खुळ्या शेवंतीचे

 

अर्धखुल्या पापणीत

स्वप्न सारे साठवावे.

कण क्षण सोशिलेले

दिठीदिठीत मिटावे.

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 54 ☆ देहाची शाल ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक अत्यंत मार्मिक, ह्रदयस्पर्शी एवं भावप्रवण कविता  “देहाची शाल।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 54 ☆

☆ देहाची शाल☆

 

ती सुगंध उधळित यावी मी मलाच उधळुन द्यावे

ती लाजत मुरडत जाता डोळ्यांत साठवुन घ्यावे

 

तो वसंत येतो जेव्हा ती फूल होउनी जाते

श्वासात उतरते तेव्हा माझाच श्वास ती होते

 

चंद्राचे रूप धवल हे त्या मुखकमळावर येते

ती प्रकाशकिरणे त्यातिल मज जाता जाता देते

 

पाहतो किनारा आहे किती व्याकुळतेने वाट

ती फेसाळत मग येते होऊन प्रीतीची लाट

 

तिमिराचा डाव उधळण्या काजवे घेउनी आलो

ती प्रसन्न व्हावी म्हणुनी मी वात दिव्याची झालो

 

प्रीतीच्या झाडावरती राघुने बांधले घरटे

मैना जे घेउन येते नसतेच गवत ते खुरटे

 

देहाची शाल करावी नि तिला लपेटुनी घ्यावे

मी भ्रमर होउनी अमृत त्या गुलाबातले प्यावे

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

 

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

 

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मराठी साहित्य – कविता ☆ —– कोडे —– ☆ सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। कई पुरस्कारों/अलंकारों से पुरस्कृत/अलंकृत सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी का जीवन परिचय उनके ही शब्दों में – “नियतकालिके, मासिके यामध्ये कथा, ललित, कविता, बालसाहित्य  प्रकाशित. आकाशवाणीमध्ये कथाकथन, नभोनाट्ये , बालनाट्ये सादर. मराठी प्रकाशित साहित्य – कथा संग्रह — ५, ललित — ७, कादंबरी – २. बालसाहित्य – कथा संग्रह – १६,  नाटिका – २, कादंबरी – ३, कविता संग्रह – २, अनुवाद- हिंदी चार पुस्तकांचे मराठी अनुवाद. पुरस्कार/सन्मान – राज्यपुरस्कारासह एकूण अकरा पुरस्कार.)

आज प्रस्तुत है सोशल मीडिया में आई कविताओं की बाढ़ पर आधारित आपकी एकआनंददायक कविता —– कोडे —– .

आपके ही शब्दों में – “गंमत म्हणून कविता. स्वतः सह सर्व कवींची क्षमा मागून.”

 

☆ —– कोडे —– ☆

 

कविता, कविता चोहिकडे

जिकडेतिकडे,  चहूकडे   ।।

 

वाट्स अँपवर  ‘ह्या  ‘ची कविता

फेसबुकवर  ‘ त्या  ‘ ची कविता

सगळे  झाले  कवी  फाकडे

जिकडे  तिकडे   ——-

 

“छान, सुंदर  “कमेंट”  ह्याची

“क्या बात  है।” ही दुसऱ्याची

सगळ्यांना  सगळेच आवडे

जिकडेतिकडे   ———

 

“माझ्या  कवितेचे  हे शीर्षक”

ओळी  वाचती  होऊन  भावुक

गंभीरपणे  कोणी न ऐकत

कशास  जो तो  तरी धडपडे

कवितेलाही  पडले  कोडे

जिकडेतिकडे     ——–

 

कविवर म्हणुनी  नांव  व्हावे

‘मी’ कोणितरी   खास असावे

आपण सुध्दा एक त्यातले

काव्याचा  पुर म्हणूनच  वाढे

कविता कविता  चोहिकडे   ।।

 

© मीनाक्षी सरदेसाई

‘अनुबंध’, कृष्णा हास्पिटलजवळ, पत्रकार नगर, सांगली.४१६४१६.

मोबाईल  नंबर   9561582372, 8806955070

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 51 – कविता – मिले न  मुझको मेरे राम ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी  एक अप्रतिम अध्यात्म पर आधारित विरह गीत “मिले न  मुझको मेरे राम।   कविता की प्रथम पंक्ति ही कविता का सार है और शेष है  विरह एवं प्रतीक्षा के भाव।  इस सर्वोत्कृष्ट  रचना के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 51 ☆

☆ कविता  – मिले न  मुझको मेरे राम

 

हाथों की लकीरों पर लिखा हुआ उनका नाम।

ना जाने किस जगह मिलेंगे मुझको मेरे राम।

 

वन उपवन  राह निहारी उनका आठो याम

फिरते फिरते नैना  हारी  मिले न मुझको मेरे राम।

 

पंछी घोसला बना लिए चुन चुन तिनका सारा।

कैसे बनाऊं आशियाना मिले न  मुझको मेरे राम।

 

व्याकुल हिरनी सी भटकूं करती रही उनका इंतजार।

ढूंढ – ढूंढ ताल तलैया दिखे न मुझको मेरे राम।

 

सांझ ढले बिरहा की मारी दिनका व्याकुल मन।

अंतस मन लिए शांत बैठी नैनों में समाए राम।

 

हाथों के लकीरों पर लिखा हुआ उनका नाम।

ना जाने किस जगह मिलेंगे मुझको मेरे राम।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (3) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत् की उत्पत्ति)

 

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।

सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ।।3।।

सदब्रहम (प्रकृति/योनि) में, मैं ही तो करता गभनिधान

जिससे पाता जन्म है जग में सकल जहान।।3।।

 

भावार्थ :  हे अर्जुन! मेरी महत्ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पति होती है।।3।।

 

My womb is the great Brahma; in that I place the germ; thence, O Arjuna, is the birth of all beings!।।3।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य ☆ आलेख ☆ जो कबिरा कासी मरै ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 

(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध। आज प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  की एक विचारणीय आलेख ”जो कबिरा कासी मरै“।डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  के इस सार्थक एवं  संत कबीर जी के विभिन्न पक्षों पर विमर्श के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।  ) 

 ☆ जो कबिरा कासी मरै ☆

कबीर की कविता अपने समय के समाज की प्राणवायु है।लेकिन आज भी वह उसी तरह बह रही है जैसी पहले बहती थी।उसकी चंदनी सुवास से आज भी वातावरण महमह महक रहा है।उसकी मूल्यगत महत्ता आज भी अप्रासंगिक नहीं हुई है।कबीर की कविता बहती हुई सरिता है,सरोवर या कूप का नीर नहीं जिसमें कालांतर में सड़न की गुंजाइश रहती है. वे संस्कृत और भाषा (हिंदी)के बहाने इस सत्य को कह भी जाते हैं-

“संसकीरत कूप जल ,भाखा बहता नीर. “

कबीर निजी जीवन में संत हैं और सामाजिक जीवन में समाज सुधारक। कुटिया के भीतर वे भले ही बहुत बडे निर्गुण संत और भक्त हैं पर उससे बाहर आते ही वे योद्धा हो जाते हैं।वे धूप-छांह वाली बदली नहीं घहरा कर बरसने वाले मेघ बन जाते हैं और भक्ति भाव की वह नदी बनकर बह उठते हैं जो केव ल भादों में ही नहीं प्यासों के लिए जेठ मास में भी बराबर बहती है-

“भक्ति भाव भादों नदी, सबै चलीं घहराय ।

सरिता सोइ सराहिये, जो जेठ मास ठहराय ॥ “

वे किसी को अतृप्त नहीं छोड़ना चाहते हैं।इसीलिए तो जेठ में भी जग को सीचने वाली नदी बने रहना चाहते हैं। इसलिए बाहर निकलते ही कभी लाठी तो कभी लुकाठा हाथ में थाम लेते हैं।कबीर उस व्यक्ति का नाम ही है जिसे खुद नहीं पता होता कि वह कब और क्या करने वाला है। लेकिन उसे हमेशा एक बात पता रहती है कि समाज की भलाई किसमे है।वह अंधेरा घिरा देखते हैं तो लुकाठा सबसे पहली अपनी ही कुटिया पर रखते हैं। उसके बाद कब किसकी कुटिया पर रख देंगे कोई नहीं जानता।वे भी नहीं जो हाथ जोडे उनके पीछे-पीछे चल पडे थे। लेकिन सबको विश्वास है कि हाथ में लुकाठा आते ही वे सच्चे पर अक्खड़ समाज चेता हो जाते हैं।जब भी और जहाँ भी खड़े होते हैं , सबको चेताते हुए चलते हैं-

“कबिरा खड़ा बजार में,लिए लुकाठा हाथ।

जो घर जारै आपना चलै हमारे साथ।।”

उन्हे खुद भी यह पता नहीं रहता है कि जब वे बाहर निकलते हैं तो उनकी भक्ति उनकी कुटिया के भीतर ही छूट जाती है।उस समय वे उस देह का ध्यान करते हैं जिस पर वस्त्र नहीं है। जिस पर वस्त्र नहीं होते उसके लिए वे लौटते ही वस्त्र बुनते हैं।वे उस वस्त्र को बुन कर नहीं छोड़ देते उसे पहनाते भी हैं ,जिसे उसकी ज़रूरत है। इसलिए कबीर जितने देह के भीतर हैं उससे अधिक वे देह के बाहर हैं।देह में होते हुए भी विदेह हैं।

कबीर सगुण की खाट खड़ी करने में माहिर हैं पर कभी-कभी खुद भी इसे गिराते हैं और उसी पर अपनी अन्मैली चदरिया बिछाकर बैठ जाते हैं।पाहन पूजने वालों को पानी पी-पकर गरियाते हैं।लेकिन खुद पाहन पूजते हैं।पर, चकिया पूजते हैं।वह इसलिए कि चकिया उपयोगी देवता है।दूसरा बेडौल हो या अति चिकना पाहन न तो उनके किसी काम का है और न उस जनता के ही लिए उपयोगी है ,जो पत्थरो के शिव्लिंग या अन्य देवी-देवताओं के सामने हाथ जोड़े खड़ी रहती है।

जहाँ पर शांति नहीं होती वहाँ वे शांति की आराधना करते हैं। उनकी नमाज़ वहीं होती है जहाँ कोई दुखियारी या दुखियारा होता है।वे उन्हें भली -भांति पता रहत है कि सबाब किसमें ज़्यादा है किसी गिरे हुए को उठाने में या नमाज़ अदा करने में। नमाज़ बाद में पढ़ते हैं। पहले तो वे गिरे हुए को उठाते हैं।ऐसे भक्त हैं वे।

कबीर को पढ़ते हुए वह युग सामने आ जाता है जब हिंदू-मुस्लिम आमने -सामने टकराते थे।लेकिन खून -खराबा शायद वैसा नहीं था जैसा सांप्रदायिक ज़हर फैलाने वाले बताते हैं।कबीर ने काशी में रहते हुए भक्ति की धारा में डुबकी लगाई।काशी विश्वनाथ के प्रांगण में ताल ठोंक कर हिंदू मुसलमान दोनों को ललकारा।यह केवल कबीर के बूते की बात थी।जब समाज को उसमें डूबते हुए देखा तो फौरन उससे बाहर आकर उन्हें चेताने लग गए। उन दिनों दोनों दीनों के लोग अपने-अपने धर्म को बेहतर बताते थे। लेकिन आज जैसा वैमनस्य उस समय शायद ही रहा हो।’ उनकी बोली-बानी और भाषा का रूप देखकर हम खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि यदि वे आज होते और अपने दोहे फेसबुक पर पोस्ट कर देते तो क्या उन्हें लाख-दो लाख से कम गालियां मिलतीं।हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या’ चलें लगे हाथ उदाहरण भी देख ही लेते हैं-

“कांकर ,पाथर जोरि के, मस्ज़िद लई ,बनाय ।

ता चढि मुल्ल बांग दे,क्या बहरा हुआ खुदाय।।”

हिंदुओं को भी उन्होंने आड़े हाथों लिया –

“पाहन पूजे हरि मिलै ,तो मैं पूजूं पहार ।”

उन्होंने निंदा की तो जमकर की।इसमें अपनी,अपनों या परायों की जैसी कोई सीमा रेखा ही नहीं बनाई।कबीर के अलावा और किसमें इतना साहस है कि वह निंदक को खुले हृदय से स्वीकारे।इन्होंने निंदक को स्वीकारा ही नहीं बल्कि आंगन में ही उसकी कुटी भी छवा दी।शुभ चिंतकों ने टोका तो उसके लाभ भी बता दिए और उन्हें भी अपने आंगन में ऐसा ही करने की सलाह दे डाली ,

”निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय।।”

प्रशंसा की तो उसमें भी कोर कसर नहीं छोड़ी-

“लाली मेरे लाल की ,जित देखूं तित लाल।

लाली देखन मैं गई ,मैं भी हो गई लाल।।”

उन्होंने अपने लाभ के लिए कभी चाटुकारिता कभी नहीं की और किसी और को खुश करने के लिए कभी किसी अन्य की निंदा भी नहीं की । वे तो मस्तमौला थे।फक्कड़ थे।कुछ-कुछ औघड़ भी थे। मौज़ में आए तो किसी के भी चिमटा चिपका दिए और चलते बने।कोई रोया तो रुककर झाड़े तब चले।वे रमता जोगी बहता पानी थे।उन्हें रोक भी कोई कैसे सकता था।

उन्होंने कभी किसी को मझधार में नहीं छोड़ा ।वे खुद भी कभी बीच में नहीं रुके या तो इस पार या उस पार।उनकी खुद की अपनी धारा भी थी और विचारधारा भी।वे सामंजस्य के कवि थे। असमंजस के नहीं। न खुद असमंजस में रहे और न किसी को डाला। या तो खुद किनारे हो लिए या सामने वाले को किनारे कर दिया। अपनी नापसंदगी और गंदगी को कभी ढोया नहीं।जब कोई चीज़ अनावश्यक और भारी लगने लगी,उसे उतार फेंका और चलते बने।

२४ मई २०१६ को महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के क्वांग्चौ,चीन आगमन पर मैंने ‘इंदु संचेतना’का विशेषांक निकाला था।उसमें स्नातक चतुर्थ वर्ष की छात्रा सुश्री झांग्छिन(हिंदी नाम शांति) ने महामहिम के नाम पत्र छपने के लिए दिया।उस पत्र में उसने भारतीय साहित्य समाज और संस्कृति के प्रति युवाओं के आकर्षण का उल्लेख किया था। उसने अपने पत्र में भारत के साहित्यकारों का विशेष उल्लेख किया है।पहले हैं लेखक प्रेम चंद फिर कबीर।समाज चेता कबीर का प्रभामंडल इतना दीप्त है कि सभी उसकी रोशनी में कुछ न कुछ पढ़ ही लेते हैं।उसके पत्र का वह अंश उद्धृत कर रहा हूँ जिसमें उसने कबीर को ससम्मान उल्लिखित किया है-

“मैं चीन में गुओगडोंग यूनिवर्सिटी ओफ़ फ़ोरेन स्टाडीज़ में हिंदी का एडवांस कोर्स कर रही हूँ ।मुझे याद है कि छोटी आयु में ही मैंने प्रेमचंद की कई कहानियाँ मंडारिन (चीनी भाषा )में पढ़ी थीं।वे विलक्षण कहानियाँ इतनी रोचक लगी थीं कि मैं अब तक बिल्कुल उनमें ही मग्न रही हूँ।वास्तव में मशहूर कथाकार प्रेमचंद के अतिरिक्त और भी बहुत सारे लोकप्रिय लेखक और कवि/कवयित्रियाँ हिंदी में हैं जिन्हें हिंदी साहित्य के इतिहास में अपनी खास जगह मिली है।भक्तिकाल में कबीर सबसे अधिक प्रभावित करते हैं।खासकर अपनी बेबाक बानी के कारण भी वे मुझे सबसे अधिक प्रासंगिक लगते हैं।भारत की जाति-पांति और सांप्रदायिकता के विरुद्ध उतनी खरी बानी किसी की नहीं है जितनी कबीर की।मेरी समझ से साहित्य आईना जैसा होता है जो अपने समाज से संबंधित जाति व राष्ट्रीय निवासियों की मनः स्थिति और उनकी दशा को यथार्थपूर्ण शब्दों में प्रकट करता है।

हिंदी साहित्य से प्रेम के कारण मैं हिंदी सीखने भारत गई थी। भारत में रहते हुए उसकी सभ्यता और संस्कृति में मेरी ज़बरदस्त रुचि बढ़ गई।भारतीय शौक भी मुझे हो गए।अनेक रस्म-रिवाज़ निभाने और शौक रखने वाले भारतीय भी मुझे पसंद हैं।मुझे भारत सिर्फ एक देश भर नहीं लगा।उसका वैश्विक रूप ,अलग-अलग भाषाएँ।अलग-अलग खान-पान,रंग रूप सभी कुछ मुझे मोहता रहा है । दुनिया भर के लोगों के लिए बहुत सी सीखने लायक नयी-पुरानी चीज़ें हैं वहाँ।”

चीन के विद्यार्थी बड़े चतुर सुजान हैं। वे हमारे कवियों और लेखकों की खूबी और खामियां हमसे अधिक तर्क संगत ढंग से जानते -मानते हैं।ऊपर के अनुच्छेद में झांग्छिन जिसका हिंदी नाम शांति है ने बड़ी बेबाकी से सबसे पहले प्रेम चंद फिर कबीर का नाम लेते हुए साहित्य को समाज का दर्पण कहा है।साहित्य की बात करते हुए वह भावुक नहीं हुई है।जिन और कवि/लेखकों को उसने पढा है उनमें समाज को यह आईना दिखाने की वह ताकत उसे नहीं दिखी होगी जो इनमें दिखी।इसीलिए उसने सबसे प्रेम चंद फिर कवियों में कबीर का नाम लिया है।उसने साहित्य को जिस समाज का आईना कहा है,कबीर उसी आइने को लेकर गली -गली ,चौराहे -चौराहे सबको दिखाते घूमे हैं। यही उनकी सबसे बड़ी सामाजिक उपादेयता भी है।इसी लिए देश क्या विदेश में भी उनकी सामाजिक उपादेयता को मूल्यांकित भी किया जा रहा है।

उन्होंने अलग से रोने के लिए कोई चेले-चूले नहीं मूड़े। क्योंकि उन्हें इस बात का बिल्कुल डर नहीं था कि उनके लिए कोई रोने वाला होगा या नहीं। उलटे उन्हें यह भरोसा था कि उनके कर्म उन्हें समाज में अमर बनाए रखेंगे-

“जब आए थे जगत में ,जगत हंसा हम रोए।

ऐसी करने कर चलें,हम हंसें जग रोए।।”

उनका यह विश्वास उनके किसी भी समकालीन संत में नहीं था।फिर वे चाहे रविदास हों या नानक उनके अपने जीवन काल में ही सभी के पंथ दूर से नज़र में आने लगे थे। उनके फहराते हुए ध्वज हर आने-जाने वाले को चिल्ला-चिल्लाकर उनके पंथ बताने लगे थे। लेकिन कबीर के साथ ऐसा न था।लोग जान ही न पाते थे कि उनका पंथ क्या है?प्रेम उनका असली पंथ था।कबीर जग के भले में अपना भला समझते थे न कि केवल अपने या ध्वज के नीचे आए कुछ अपनों के मोक्ष में।इस दृष्टि से संसार उनके लिए ठीक उसी तरह मिथ्या नहीं था जैसा और संतों के लिए था। वे संसार से भी उसी तरह प्रेम करते थे जैसे खुद से और अपने खुदा से।इसलिए उन्होंने संसार और घोर संसारियों को बुरा भला कहकर भी उसी तरह गले लगाए रखा जैसे मां-बाप अपनी नादान और नालायक संतान को भी बड़े प्यार से गले लगाए रखते हैं। उन्होंने प्रेम को खानों या खांचों में भी बांटना कभी उचित नहीं समझा।उन्होंने प्रेम को बस प्रेम रहने दिया।उसमें अलग से कोई रंग नहीं मिलाया।उसे खुद भी छककर पिया और औरों को भी उसी विशुद्ध प्रेमामृत का पान कराया-

“कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय ।

रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥”

बैठ कर पुजाना पाप था उनके लिए।थकते भी नहीं थे वे।इसलिए जीवन भर चलते रहे। कुछ करने वाले को ही वे कुछ देने के पक्ष में रहते थे। अलस अकर्मा साधु या गृहस्थ उन्हें कभी नहीं रुचे। बड़े कर्मठ थे कबीर और उन्हें अपने कर्म पर अटूट भरोसा भी था। कर्म के प्रबल पक्षधर और अकर्मण्यता के धुर विरोधी थे वे।फिर वह चाहे तारने का दंभ भरने वाला भगवान ही क्यों न हो।उसको भी मुफ्त में यश देना उन्हें कभी नहीं रुचा।राम को भी काम पर लगाने के लिए उन्होंने हरी भरी काशी त्यागी और ऊसर-बांगर वाले मगहर को चल पड़े –

“जो कबिरा कासी मरै, रामै कौन निहोर।”

 

©  डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

सूरत, गुजरात

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ सिंफनी ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ सिंफनी 

उठना चाहता है

लहर की तरह,

उठ पाता है

बुलबुले की तरह,

समय, प्रयत्न

और भाग्य की सिंफनी

सफलता तय करती हैं,

स्वप्न और सामर्थ्य

के बीच की दूरी

उफ़ कितनी खीझ

उत्पन्न करती है!

 

©  संजय भारद्वाज

( मंगलवार, 7 जून 2016, प्रातः 6:51)

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

writersanjay@gmail.com

मोबाइल– 9890122603

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