अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (10) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

 

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।

त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ।।10।।

 

सत्व युक्त निश्शक मन, त्यागी जो विद्वान

किसी कर्म से द्वेष न, किसी में न रममान ।।10।।

 

भावार्थ :  जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है ।।10।।

The man  of  renunciation,  pervaded  by  purity,  intelligent  and  with  his  doubts  cut as under, does not hate a disagreeable work nor is he attached to an agreeable one.।।10।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य ☆ संस्मरण ☆ हिंदी आंदोलन परिवार (हिंआप यात्रा -3) ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 ☆ संस्मरण ☆ हिंदी आंदोलन परिवार (हिंआप यात्रा -3) 

(हिंदी आंदोलन परिवार के आंदोलन को अभियान  का अर्थ देने की सफल प्रक्रिया के लिए ई- अभिव्यक्ति परिवार की हार्दिक शुभकामनायें )

30 सितम्बर 2020,  हिंदी आंदोलन परिवार का 26वाँ स्थापना दिवस। सच कहूँ तो हिंआप केवल शब्द या संस्था भर नहीं है। हमारी संतान है हिंआप।

विवाह के लगभग ढाई वर्ष बाद हिंआप का जन्म हुआ। बच्चे के जीवन में गिरने-पड़ने-संभलने, उठने-चलने-दौड़ने के जो चरण और प्रक्रियाएँ होती हैं, वे सभी हिंआप के जीवन में हुईं। हमारी संतान अब नयनाभिराम युवा हो चुकी।

स्मृतिचक्र घूम रहा है और कलम चल रही है। ईश्वर की अनुकंपा, माता-पिता के आशीष और आत्मीय जनो की शुभकामनाओं के चलते सार्वजनिक जीवन में नगण्य-ही सही पर स्थापना मिली। इसके चलते प्रायः विभिन्न आयोजनों में जाना होता है। स्वागत/ सम्मानस्वरूप मिला पुष्पगुच्छ घर लाकर रख देता हूँ। ऊपर से बेहद सुंदर दिखते पुष्प तीन से चार दिन में पूरी तरह सूख जाते हैं। जड़ों से कटने पर यही स्थिति होती है।

हिंआप ने अपनी स्थापना के समय से ही काटने या तोड़ने के मुकाबले खिलने और जोड़ने की प्रक्रिया को अपनाया। हमने बुके के स्थान पर पौधे देने की परंपरा का अनुसरण किया,  विनम्रता से कहूँ तो कुछ अर्थों में सूत्रपात भी किया। पौधे मिट्टी से जुड़े होते हैं। इनमें वृक्ष बनने की संभावना अंतर्निहित होती है।

इसी संभावना को हिंआप में संगठन के स्तर पर लागू करने का प्रयास भी किया। सभी साथियों की प्रतिभा को यथासंभव समझकर मांजने- तराशने के समुचित अवसर देते गये। इसमें वाचन,लेखन, प्रस्तुति से लेकर  व्यवस्थापन कुशलता, समूह में काम करने की वृत्ति, नेतृत्व, सहयोग, समयबद्धता जैसे अनेक आयाम समाविष्ट हैं। मिट्टी से जुड़े रहने का लाभ यह हुआ कि कुछ वृक्ष बन चुके, कुछ पौधे हैं, कुछ अंकुर फूट रहे हैं, कुछ बीज बोये जा चुके। अत्यंत नम्रता से कहना चाहता हूँ कि इस प्रक्रिया के  चलते आज हिंआप के पास टीम ‘बी’ और टीम ‘सी’ भी तैयार हैं।

संस्था के सामूहिक प्रयासों ने ‘आंदोलन’ शब्द जिस अर्थ में ढल चुका था, उससे बाहर निकाल कर उसे ‘अभियान’ का अर्थ देने में सफलता पाई।

धारा के विरुद्ध काम करते समय प्राय: उपजने वाली निराशा और थकान का हिंआप सौभाग्य से अपवाद रहा। हर बीज से नया वृक्ष खड़ा करने की जिजीविषा इस उपवन को निरंतर विस्तृत करती रही।

हिंआप आशंका में संभावना बोने का मिशन है। नित विस्तृत होती परिधि में बीज से वृक्ष होने की संभावना को व्यक्त करती हिंआप के जन्म के आसपास के समय की अपनी एक रचना स्मरण हो आई।

जलती सूखी जमीन

ठूँठ-से खड़े पेड़

अंतिम संस्कार की

प्रतीक्षा करती पीली घास,

लू के गर्म शरारे

दरकती माटी की दरारें

इन दरारों के बीच पड़ा

वो बीज…,

मैं निराश नहीं हूँ

ये बीज मेरी आशा का केन्द्र है।

ये,

जो अपने भीतर समाये है

असीम संभावनाएँ-

वृक्ष होने की

छाया देने की

बरसात देने की

फल देने की

और हाँ;

फिर एक नया बीज देने की,

मैं निराश नहीं हूँ

ये बीज

मेरी आशा का केन्द्र है।

आशा बनी रही, भाषा टिकी रहे, संस्था चलती रहे उस दिन तक, जिस दिन भारतीय भाषाएँ शासन- प्रशासन, शिक्षा-दीक्षा, न्याय-अनुसंधान, हर क्षेत्र में  वांछित जगह पूरी तरह बना लें।

 

संजय भारद्वाज 

संस्थापक- अध्यक्ष

हिंदी आंदोलन परिवार

 सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 65 – घी निकालना है तो… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना घी निकालना है तो…। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 65 ☆

☆ घी निकालना है तो… ☆  

 

घी निकालना है तो प्यारे

उंगली टेढ़ी कर

या फिर श्री चरणों में उनके

अपना मस्तक धर।

 

नब्ज पकड़ कर इनकी

जमकर अपनी बात बता

चाहे तो पहले इसके

ले, जी भर इन्हें सता,

कुछ पिघलेगा, किंतु

दिखाएगा कुछ और असर

घी निकालना है तो …….।।

 

धूर्त चीन सी चालें

और चलेंगे ये बेशर्म

हमको भी ऊर्जस्वित हो

फिर हो जाना है गर्म

रखें पूँछ पर पांव, तभी

हलचल करते अजगर।

घी निकालना है तो……….।।

 

लंपट, धूर्त स्वार्थ में डूबे

इनका क्या है मोल

रहे बदलते सदा देश का

ये इतिहास भूगोल

दहन करें होली पर इनका

या की दशहरे पर।

घी निकालना है………..।।

 

सीधे-साधे लोगों की

क्या कीमत क्या है तोल

ऊपर से नीचे तक

नीचे से ऊपर तक पोल

किंतु जगा अब देश

ढहेंगे इनके छत्र-चँवर।

घी निकालना है तो प्यारे

उंगली टेढ़ी कर।।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 45 – बापू के संस्मरण-19- इसी का नाम है अंधा प्रेम …. ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “इसी का नाम है अंधा प्रेम ….”)

☆ गांधी चर्चा # 42 – बापू के संस्मरण – 19 – इसी का नाम है अंधा प्रेम ….☆ 

उन दिनों गांधीजी बिहार में काम कर रहे थे । अचानक वायसराय ने उन्हें बुला भेजा । अनुरोध किया कि वे हवाई जहाज से आयें । गांधीजी ने कहा, “जिस सवारी में करोड़ों गरीब लोग सफर नहीं कर सकते, उसमें मैं कैसे बैठूं?” उन्होंने रेल के तीसरे दर्जे से ही जाना तय किया । मनु बहन को बुलाकर बोले,” मेरे साथ सिर्फ तुझको चलना है । सामान भी कम-से-कम लेना और तीसरे दर्जे का एक छोटे-से-छोटा डिब्बा देख लेना ।” सामान तो मनु बहन ने कम-से-कम लिया, लेकिन जो डिब्बा चुना, वह दो भागों वाला था.

एक में सामान रखा और दूसरा गांधीजी के सोने-बैठने के लिए रहा । ऐसा करते समय मनु के मन में उनके आराम का विचार था । हर स्टेशन पर भीड़ होगी , फिर हरिजनों के लिए पैसा इकट्ठा करना होता है, रसोई का काम भी उसी में होगा तो वह घड़ी भर आराम नहीं कर सकेंगे । यही बातें उसने सोची पटना से गाड़ी सुबह साढ़े-नौ बजे रवाना हुई ।

गर्मी के दिन थे, उन दिनों गांधीजी दस बजे भोजन करते थे । भोजन की तैयारी करने के बाद मनु उनके पास आई, वे लिख रहे थे । उसे देखकर पूछा,”कहां थी?” मनु बोली,”उधर खाना तैयार कर रही थी ।

“गांधीजी ने कहा, जरा” खिड़की के बाहर तो देख ।” मनु ने बाहर झांका, कई लोग दरवाजा पकड़े लटक रहे हैं, वह सबकुछ समझ गई ।

गांधीजी ने उसे एक मीठी-सी झिड़की दी और पूछा,”इस दूसरे कमरे के लिए तूने कहा था?” मनु बोली,” जी हां, मेरा विचार था कि यदि इसी कमरे में सब काम करूंगी तो आपको कष्ट होगा ।

” गांधीजी ने कहा,”कितनी कमजोर दलील है । इसी का नाम है अंधा-प्रेम । यह तो तूने सिर्फ दूसरा कमरा मांगा, लेकिन अगर सैलून भी मांगती तो वह भी मिल जाता । मगर क्या वह तुझको शोभा देता? यह दूसरा कमरा मांगना भी सैलून मांगने के बराबर है ।” गांधीजी बोल रहे थे और मनु की आंखों से पानी बह रहा था ।

उन्होंने कहा, “अगर तू मेरी बात समझती है तो आंखों में यह पानी नहीं आना चाहिए । जा, सब सामान इस कमरे में ले आ । गाड़ी जब रुके तब स्टेशन मास्टर को बुलाना ।” मनु ने तुरंत वैसा ही किया. उसके मन में धुकड़-धुकड़ मच रही थी । न जाने अब गांधीजी क्या करेंगे! कहीं वे मेरी भूल के लिए उपवास न कर बैठे! यह सोचते-सोचते स्टेशन आ गया, स्टेशनमास्टर भी आये ।

गांधीजी ने उनसे कहा, “यह लड़की मेरी पोती है, शायद अभी मुझे समझी नहीं, इसीलिए दो कमरे छांट लिए । यह दोष इसका नहीं है, मेरा है । मेरी सीख में कुछ कमी है । अब हमने दूसरा कमरा खाली कर दिया है । जो लोग बाहर लटक रहे हैं, उनको उसमें बैठाइये, तभी मेरा दुख कम होगा ।” स्टेशन मास्टर ने बहुत समझाया, मिन्नतें की, पर वे टस-से-मस न हुए । अन्त में स्टेशन मास्टर बोले, मैं उनके लिए दूसरा डिब्बा लगवाये देता हूं ।

” गांधीजी ने कहा, हां, दूसरा डिब्बा तो लगवा ही दीजिये, मगर इसका भी उपयोग कीजिये । जिस चीज की जरूरत न हो उसका उपयोग करना हिंसा है । आप सुविधाओं का दुरुपयोग करवाना चाहते हैं । लड़की को बिगाड़ना चाहते हैं । बेचारा स्टेशनमास्टर! शर्म से उसकी गर्दन गड़ गई । उसे गांधीजी का कहना मानना पड़ा ।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 16 – ☆ ख़ुशी ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता ख़ुशी ) 

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 16   ☆– ख़ुशी

 

एक दिन घर की खिड़की से झाँक रहा था,

ख़ुशी वहां से गुजर रही थी,

 

मैंने उसे इशारे से रोका मगर वो आगे निकल गयी ,

देखा खुशी दो दुःख दरवाज़े पर छोड़ चली गयी ||

 

दरवाजा बन्द रखने लगा दुखों के आने के डर से,

एक दिन फिर किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी,

दरवाजा खोलकर देखा ख़ुशी जा चुकी थी,

देखा खुशी दो दुःख दरवाजे पर छोड़ चली गयी ||

 

एक दिन फिर खिड़की से झाँक रहा था,

ख़ुशी गुजर रही थी, मैंने रोकने की कोशिश की,

खुशी बोली कभी शक्ल देखी है अपनी आईने में,

देखा खुशी दो दुःख दरवाजे पर छोड़ चली गयी ||

 

दुखों से संघर्ष करके जिंदगी हार गया,

खिड़की बन्द देख खुशी ने दरवाजे पर दस्तक दी,

देखों आज तुम्हारे लिए खुशियों की सौगात लायी हूँ,

मुझे बेजान देख खुशी दरवाजे पर खुशियां छोड़ चली गयी ||

 

©  प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 67 – गझल – वृत्त – पीनाकी ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 67 ☆

☆ गझल – वृत्त – पीनाकी ☆

(लगागागा लगागागा लगागागा लगागा)

 

अता वाटे खरेतर हे जगा माहीत होते

कशाला मी उगाचच लपविले का भीत होते

 

असावे पूर्वजन्मीचे ऋणादीबंध काही

जसे राधा मुरारीही जुने मनमीत होते

 

गझल अद्यापही ज्यांची मना वेढून आहे

कळाले नाव ते चित्रा सहित जगजीत होते

 

मला आल्या पुन्हा हाका दिशा दाही उजळल्या

तुला सांगू कसे हे काय धुंडाळीत होते

 

अशी आहे नशा जगण्यात गझलेचीच सारी

थवे आजन्म शब्दांचेच कुरवाळीत  होते

 

फुले वाट्यास आलेली जरी बेरंग  होती

तरीही  क्षण सुखाचे पूर्ण गंधाळीत होते

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कळी ☆ श्री मुबारक उमराणी

श्री मुबारक बाबू उमराणी

☆ कवितेचा उत्सव :  कळी ☆ श्री मुबारक उमराणी ☆

 

कळी गळाली फुल गळाले

गळाली सारी झाडांची पाने

रक्तरंजीतात कोकिळा मुकी

जीवन सुके अबोल गाणे

 

झाले ते मुके अंधारी रात्री

निशब्द धुके, कोणी लुटला

वारा सुटला भयान राती

पाय पडता, पाला कुटला

 

जागे झाले काटे चीत्कारीत

नाचले कळ्यांच्या त्या राशीत

तुडवीत तुडवीत गेले

सुगंध फुलांचा पित पित

 

निशब्द चराचर निशब्द

थांबले झरे, थांबला चंद्र

थांबले रातकिडे चंचल

थांबला ढगा अाड तो चंद्र

 

भकास वाणी, भकास गाणी

ढग थेंब अश्रूंची ती धार

अश्रूथेंबच, कोणी करेना

अन्यायाविरूद्ध प्रहार

 

 

© श्री मुबारक बाबू उमराणी

शामरावनगर, सांगली

मो.९७६६०८१०९७.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ प्रमोशन ☆ श्रीमती मीनाक्षी सरदेसाई

श्रीमती मीनाक्षी सरदेसाई 

☆ विविधा ☆ प्रमोशन ☆ श्रीमती मीनाक्षी सरदेसाई 

स्त्रीने असिस्टंट म्हणून काम करणं हे सर्वमान्य आणि सर्वसामान्य आहे. पण ती जेव्हा बॉस म्हणून खुर्चीवर बसते तेव्हा तिला अनेक पातळ्यांवर संघर्ष करावा लागतो. तिची ‘बढती ‘ही व्यक्तिशः मानाची,जबाबदारीची,प्रतिष्ठेची असली तरी बरेच वेळा कुटुंबातल्या इतरांसाठी गैरसोयीची होते. तिच्या रुटीनच्या नोकरीने घराचा जो जम

बसलेला असतो, तो विस्कटतो.प्रमोशनची सुरुवात बहुधा बदलीने होते.

तिथे संघर्ष सुरु होतो. पहिल्याने हा संघर्ष तिच्या मनात होतो.बढतीमुळे दैनंदिनीत बदल,नवीन कामाचा अभ्यास, जबाबदारी, संसार संभाळताना हे जमेल?कशाला सुखाचा जीव दुःखात घाला!अशी द्विधा मनस्थिती होते. अशा वेळी तिला कोणी आधार दिला, प्रोत्साहन दिलं तर ती वरिष्ठ म्हणून उत्तम काम करू शकते

सरिता आकाशवाणीत ड्यूटीऑफिसर होती. तिला प्रमोशन मिळालं. पण बदली होणार होती. तिची दोन्ही मुलं शाळेत जाणारी ,  बऱ्याच अडचणी होणार होत्या.पण सरिताची नवविवाहित जाऊ –ती मदतीला धावली. ती सरिताला म्हणाली,” वहिनी, तुम्ही प्रमोशन घ्या. मी मुलांच अभ्यास घेण्यापासून सर्व करीन, सासुबाईना समजावून सांगेन. मधून मधून या. मुलांना भेटा, इकडची काळजी करू नका.”

सरिताने अशी दोन वर्ष काढली. मग मुलांना तिकडे न्हेलं. आता तिचा नवरा मधून मधून तिच्या गावी येतो. सासूबाई पण चेंज म्हणून येतात. अशी साथ घरातल्यानी दिली तर सरिता प्रमोशनच्या पुढच्या पायऱ्याही चढेल.

स्वाती एक माध्यमिक शिक्षिका. तिच्या पदव्या, लवकर नोकरीला लागल्यामुळे सिनिऑरिटी, त्यामुळे  मुख्याध्यापकाची जागा तिला इतर सहकारी मैत्रीणींच्या आधी मिळाली. शैला स्वातीची जिवलग मैत्रीण.तिला वाटलं चला, आता आपल्याला थोडी मोकळिक मिळेल.कामाच्या बाबतीत ती निष्काळजीच होती. सहामाही जवळ आली तरी तिच्या विषयाचा पोर्शंन पूर्ण नाही. दहावीच्या मुलांनी तक्रार केली. स्वातीने शैलाला ऑफिस मध्ये बोलावल, विचारलं.

“गेल्या महिन्यात आजारी होते तुला माहितच आहे की.”

“पण जादा तास घेऊन अभ्यासक्रम तू पुरा करायला हवा होतास.”

“आता मी असं करते.शिकवलय तेव्हढ्यावरच पेपर काढते. म्हणजे मुलं चिडायची नाहीत.”

“अग, दहावीचा पेपर बोर्डाच्या फॉरमँटप्रमाणे काढायला हवा. मुलांना सराव नको का व्हायला?तू पोर्शंन पुरा कर.”

शैलाने ऐकलं नाही. पालकांनी तक्रारी केल्याच.स्वातीची दोन्हीकडून पंचाईत. मग ती कडकपणे वागू लागली. काही मैत्रिणीनी समजून घेतलं काही तुटल्या.स्वातीने स्टाफ मिटिंगमध्ये सगळं क्लिअर केलं.कारण तिला आपल्या पदाची प्रतिष्ठा राखायची होती.ती म्हणाली, “मी भेदभाव करणार नाही. पुरुष शिक्षकांनी लक्षात घ्यावं, स्टाफमधल्या शिक्षिका तुमच्या इतक्याच कर्तव्यतत्पर आहेत पण काही वेळा त्यांना सवलती द्याव्या लागतात. कारण त्या माता आहेत. तुमच्या घरच्या स्त्रियांकडे बघा. स्त्री म्हणून सवलत नाही, पण सहानुभूती दाखवायला हवी ना! गैरसमज नको. त्यावेळी तरी पुरुष शिक्षकांनी माना डोलावल्या

आपली मैत्रीण  बॉसच्या खुर्चीवर बसली तर तिच्या सहकारी स्त्रियांनी तिला समजून घ्यायला हव.तिला ‘येस बॉस ‘म्हणताना आनंद , अभिमान वाटायला हवा. पण प्रत्यक्षात असं होतं का? की स्त्री स्त्रीची शत्रू ठरते?  तिच्या प्रमोशनवर अशी अनेक प्रश्न चिन्हं आहेत.

 

© श्रीमती मीनाक्षी सरदेसाई 

मो. – 8806955070.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ नजर ☆ सौ.प्रियदर्शिनी तगारे

सौ. प्रियदर्शिनी तगारे

☆ जीवनरंग ☆ नजर ☆ सौ.प्रियदर्शिनी तगारे ☆ 

दारावरची बेल वाजली. रजनीनं दार उघडलं. दारात समोरच्या फ्लॅट मधल्या काकू होत्या.

“आटपलं का तुझं?”

“हो काकू, आताच रमेश बॅंकेत गेले. मुलं तर आठालाच गेली शाळेत. तुमचं आवरलं ?”

“हो गं, म्हणूनच आले ना! बरं वाटतं तुझ्याशी बोलल्यावर. ये ना, बाहेरच पॅसेजमध्ये.”

दोघी पॅसेजमध्ये बोलत राहिल्या. एव्हढ्यात जिना चढून कुणी तरी वयस्क माणूस वर आला. तो जवळ आला आणि रजनीचं लक्ष त्याच्या डोळ्याकडं गेलं. ती एकदम दचकली. ‘अरे बापरे’असं  नकळत तिच्या तोंडून निघालं. काकूंची त्याच्याकडे पाठ होती. रजनीचा चेहरा पाहून त्या वळल्या. त्या माणसाकडं पहात बोलल्या, “या, हे आहेत घरात. येते गं रजनी “असं म्हणून काकू गेल्या.

सहा महिन्यांपूर्वी या गावात रमेशची बदली झाली होती. या अपार्टमेंटमध्ये फ्लॅट त्यांनी  भाड्याने घेतला होता. समोरच्या फ्लॅट मधल्या काकूंची सोबत चांगली होती.थोड्याच दिवसात त्यांनी रजनीला आईसारखी माया लावली होती.

तो माणूस आला त्यानंतर दोन दिवसांनी दुपारच्याच काकू आल्या. थोड्या इकडच्या तिकडच्या गप्पा झाल्या. मग काकू म्हणाल्या “रजनी, परवा तू त्या पाहुण्यांना बघून दचकलीस का ?”

रजनीनं न राहवून विचारलं,” काकू, ते ओळखीचे आहेत का तुमच्या ?”

“माझ्या बहिणीच्या दूरच्या नात्यातले आहेत ते. कुठल्याशा कार्यासाठी आले होते. पण तू …..”

रजनीनं क्षणभर काकूंकडं पहात आवंढा गिळला आणि ती बोलायला लागली,

“माझ्या लहानपणीची आठवण आहे ही. मी दहा-बारा वर्षांची असेन. घरात आई, बाबा, मी आणि माझी बहीण रागिणी एवढे होतो. आमच्या गल्लीत सगळी एकमजली लहान लहान घरं होती. आजूबाजूच्या घरातल्या सगळ्यांचं एकमेकांकडं येणंजाणं होतं. सगळ्या बायका एकत्र गप्पा मारत असत. आम्हा मुलींकरवी निरोपांची देवाणघेवाण होई तर कधी एखाद्या पदार्थ पोहचवला जाई. मी सगळ्यांकडं आनंदानं जात असे. फक्त गल्लीच्या टोकाला असलेल्या गोविंद अप्पांच्या घराकडे मात्र मी सहसा फिरकत नसे. खरं तर गोविंद अप्पांची बायको इंदिराकाकू आणि आमची आई यांची खूप मैत्री. पण मी तिकडं जात नसे याला कारण बापू, अप्पांचा धाकटा भाऊ. तसा तो मोठा होता, लग्न बिग्न झालेला. तो जेव्हां घरात असे तेव्हां घराच्या पायरीवर किंवा बाहेरच्या खोलीत उभा राहून सगळीकडे पहात असे. त्याची नजर फार विचित्र होती. त्या लहान वयातही मला त्यात काहीतरी वेगळं आहे हे जाणवत असे. त्यांच्या घरी जाऊन निरोप सांग असं आई म्हणाली की मी नाही म्हणायची. मग आईला राग यायचा. माझ्या न जाण्याला कारण होतं.

एकदा मी त्यांच्याकडे गेले. इंदिरा काकू  मागे स्वयंपाकघरात होत्या. तिकडे जाण्यासाठी मी निघाले तर मधल्या अंधाऱ्या बोळात बापूने मला……… त्याचा तो विचित्र स्पर्श आठवला तरी आजही अंगावर शहारा येतो. त्यावेळी मी आईला सांगू शकले नाही. काय सांगावं ते कळतच नव्हतं, खरं तर खूप काही घडलं नव्हतं. पण तरीही खूप काही होतं. त्याची नजर मनात धडकी भरवायची.

काकू, त्यादिवशी तुमच्या दाराशी त्यांना बघताच ती नजर आठवून मी दचकले.आई मला म्हणायची काहीतरीच विक्षिप्तपणा बाई तुझा. मग मलाही कधीतरी वाटायचं……..”

“नाही रजनी, तू चुकत नव्हतीस. हा बापू वागायला चांगला नव्हताच. बरं झालं; तेव्हां तू सावध झालीस. नाहीतर एखादा अवघड प्रसंग तुझ्यावर आला असता. मोठी माणसं काही वेळा लहान मुलांच्या बोलण्याकडं दुर्लक्ष करतात. पण त्याची मोठी किंमत मोजावी लागते. लहान मुलांना जेव्हां अशी जाणीव होते, त्यात नक्की तथ्य असतं”

काकूंचं बोलणं ऐकून रजनीला एव्हढ्या वर्षांनंतरही सुटल्याची भावना झाली.

 

© सौ.प्रियदर्शिनी तगारे

© सौ.प्रियदर्शिनी तगारे≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी वनचरी ☆ सुश्री स्नेहा दामले

 ☆ विविधा ☆ वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी वनचरी ☆ सुश्री स्नेहा दामले

आपलं जगणं बऱ्याच अंशी वृक्ष-वनस्पतींवर अवलंबून असतं .. आपल्या तोंडचा घास आणि आपला श्वास सगळी वनस्पतींची देणगी..

तुकाराम महाराजांनी उगीच नाही त्यांना सोयरे म्हटलं.. ‘वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी वनचरी’

आपल्या कुटुंबात,आपण आपल्या सोयरे मंडळींना/पाव्हणे मंडळींना खूप आदराचं, मानाचं स्थान देतो.

तसा आदर आणि मान, आपलं जगणं ज्या सोयर्‍यांवर अवलंबून आहे, त्या या वनस्पतींना आपण देतो का?

उत्तर बहुतेक नाही असंच येतं; आपण अति परिचय झाल्यासारखं फारच गृहीत धरतो त्यांना किंवा चक्क दुर्लक्ष करतो त्यांच्याकडे…

नर्मदालय’ संस्थेच्या माध्यमातून मध्यप्रदेशातील नर्मदा किनारीच्या मागास व वंचित मुलांसाठी शिक्षण विषयक काम करणाऱ्या भारती ठाकूर . त्यांची एक गोष्ट मध्यंतरी वाचली होती.. गोष्टीचं शीर्षक होतं ‘क्षमा..’

शेजाऱ्यांच्या तक्रारीवरून एकदा रागाच्या भरात भारती ताईंनी आपल्या बागेतलं १०-११ फुटी जास्वंदीचं झाड  अगदी दोन अडीच फुटांपर्यंत छाटलं..

आपल्या या अविवेकी कृत्याचा त्यांना लगेच पश्चात्तापही झाला.. पावसाळा होता त्यामुळे झाड पुन्हा लगेच वाढलं पण शेजाऱ्यांच्या कंपाउंडमध्ये एकही फांदी वाढली नाही परत! झाड वाढलं पण फुल मात्र एकही येईना; खतपाणी, सगळे प्रयोग करून झाले. मग कन्याकुमारीच्या विवेकानंद केंद्राच्या दीदींच्या सांगण्यावरून भारतीताईंनी त्या झाडाची क्षमा मागितली; त्याच्याशी रोज संवाद करू लागल्या, गप्पा मारू लागल्या.. एक वेगळंच जिव्हाळ्याचं नातं त्यांचं झाडाशी निर्माण झालं आणि मग काही दिवसात झाड कळ्यांनी पुन्हा भरून गेलं . झाडाने त्यांना ‘क्षमा’ केली होती..

ही गोष्ट मी वाचली आणि ती माझ्या अगदी हृदयाला भिडली.. मलाही झाडांची आवड आहे. झाडं आपल्याला प्राणवायू देतात, त्या जीवावर आपण खरं तर जगतो; पण आपण काय करतो त्यांना जगण्यासाठी? या विचाराने मी या मातीतल्या, देशी आणि नर्सरीत सहसा न आढळणाऱ्या झाडांची बियांपासून रोपं बनवते आणि मग कुणाला हवी त्याला देऊन टाकते लावायला. बिया एकत्र रुजत घालते आणि मग रोपांनी डोकं वर काढलं की त्यांना वेगळं काढून वेगवेगळ्या पिशव्यांत लावते. याचं कारण प्रत्येक बी वेगवेगळ्या पिशवीत लावायला आणि त्या पिशव्या ठेवायला माझ्याकडे तेवढी जागा नाही. हे रोप असं काढून पिशवीत लावलं की ते काढताना त्याच्या नाजूक मुळांना थोडी तरी इजा होतेच आणि मग त्या चिमुकल्या रोपाची पाने एक दिवस जरा मलूल असतात.. पुन्हा दुसऱ्या दिवशी नवीन परिस्थितीशी जुळवून घेत टवटवीत होतात. हा माझा नेहमीचा अनुभव..

वरील गोष्ट वाचली तेव्हा मी रुजत घातलेल्या गोकर्णीचं रोप पिशवीत लावण्याजोगं झालं होतं, यावेळी मी जरा अधिक हळुवारपणे ते मातीतून काढायचा प्रयत्न केला पण तरीही त्याला थोडंसं दुखलं असणारच अशा विचाराने सॉरी हं,दुखलं का रे तुला? असं म्हणत त्या पिटुकल्या रोपाशी मी संवाद केला आणि काय सांगू..या एका वाक्याने माझं मलाच केवढं बरं वाटलं..’आता तुला नवीन जागा देते हं’ असं म्हणून मी ते पिशवीत लावलं. थोडी माती दाबली, पाणी घातलं. भारतीताईंसारखा अनुभव यावेळी मलाही आला. यावेळी पिशवीतल्या रोपट्याने दुसऱ्या दिवशी मान टाकली नाही.

वनस्पतींनाही संवेदना असतात, त्या प्रतिक्रिया देतात हे सगळं आपण शिकलेलं असतो. विज्ञानाने  ते सिद्धही केले आहे.. आपल्या ऋषीमुनींना मात्र ही गोष्ट आधीपासून माहित असणार..पद्मपुराणात तो श्लोक आहे. कोणतीही वनस्पती आपल्या उपयोगासाठी तोडण्या आधी तिची प्रार्थना करून हा श्लोक म्हणायचा असतो.

आयुर्बलम यशो वर्च: प्रजा: पशून्वसूनिच |

 ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च तत्वं नो देहि वनस्पते ||

हे वनस्पती तू आम्हाला आयुष्य, उत्तम बल, यश, धन, प्रज्ञा आणि चांगली बुद्धी दे..

हा श्लोक मी वाचला होता आधी; पण त्या मागचा ऋषींचा वनस्पतींबद्दलचा आदर आणि प्रेमभाव या माझ्या अनुभवातून माझ्यासमोर लख्खपणे स्पष्ट झाला होता..

 

सुश्री स्नेहा दामले

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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