हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 37 ☆ नीलमोहर ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  प्रकृति के आँचल में लिखी हुई एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  “ नीलमोहर ”। सुश्री सुजाता जी के आगामी साप्ताहिक  स्तम्भ में अमलतास पर अतिसुन्दर रचना साझा करेंगे।  )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 37 ☆

 नीलमोहर

नील गगन से

यह नीलमोहर

जाने क्या क्या

बात करें ।

आसमान को

अपना रंग देकर

फिर आकर

धरती से मिले।

शाखाओं पर

आसमान ही

लेकर अपने

साथ चले।

फिर क्यों धूल में

नीलाभ बनकर

धरती पर आँचल

ओढ़ चले।

 

© सुजाता काळे

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ सामयिक संदर्भ और युवा पीढ़ी ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार

डॉ प्रतिभा मुदलियार 

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव।  वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

आज जब हम सब मानवता के एक कठिन समय से गुजर रहे हैं, ऐसे में आपका समसामयिक आलेख सामयिक संदर्भ और युवा पीढ़ी निश्चित ही युवाओं में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा। हम भविष्य में आपसे ऐसे ही सकारात्मक साहित्य कि अपेक्षा करते हैं। इस अतिसुन्दर आलेख के लिए आपकी लेखनी को सादर नमन। )

☆ सामयिक संदर्भ और युवा पीढ़ी ☆

बीत गया एक और दिन…. !! कैसा मंज़र है यह… हम तालाबंदी में साँसें ले रहे हैं। घरों में सुरक्षित हैं और बाहर असुरक्षित! अबतक कभी नहीं  जाना नहीं था कि दिन क्या गिनना क्या होता है? अभी अभी तक व्यस्तताओं में दिन फूर्रर्र से उड़ जाया करते थे। एक दिन होता था ‘रविवार’ का .. राहत का… आराम का…खुशी का। अब हर दिन रविवार हो गया है। हमारे जीवन में रविवार का एक विशेष अर्थ है। उसके कई आयाम होते हैं। रविवार यानि छुट्टी !  कोई आपा धापी नहीं। कोई होड़ हडबडी नहीं। कोई व्यस्तता नहीं। यह दिन होता है अलसाने का… लंबी साँस लेकर फिर से बिस्तर पर पसर जाने का.. फूर्सत का! नरेश मेहता ने शायद इसी कारण अपनी एक कविता में प्रिया से कहा था, “एक रविवार बनकर आओ”!  कहना यही है कि जब हर दिन रविवार हो जाता है तो उसका महत्व घट जाता है। इन दिनों हम सब हर रोज ‘रविवार’ को जी रहे हैं… और इस ‘रविवार’ से ऊब भी रहे हैं। हमने अब दिन गिनना शुरु किया है। जैसे जैसे दिन गुज़र रहे हैं मन उदास होता जा रहा है। निराशा का कुहासा गहन होता चला जा रहा है। जीवन की गति एकदम से रुक गयी है। मन को कितना भी क्यों न समझाऊँ, कितना भी व्यस्त क्यों न रखूँ, मन का एक कोना बहुत अधिक हताश और निराश ही हो रहा है। आए दिन आनेवाली खबरों से मन और बैठा जा रहा है। ऐसे समय मेरे सामने आ जाती है आज की युवा पीढ़ी। वह युवा पीढ़ी जो तालाबंदी के कारण घरों में कैद है।

हमारा देश युवाओं का देश है। बल्कि युवाओं के मामले में विश्व में हमारा देश सबसे समृद्ध है। दुनिया में सबसे अधिक युवा हमारे देश में हैं। किंतु युवा महज एक उम्र नहीं है। उससे भी अधिक कुछ है। युवा जिसमें असीमित संभावनाएं होती हैं, रचनात्मकता होती है, जिनमें कल्पना की ऊँची उड़ान होती है। ।युवाओं में होती है असीम उत्सुकता, बेहोशी, जोश और उतावलापन। यह आयु होती है ऊर्जा से भरपुर। यह वह युवा है जो सपने देखने और उसे पुरा करने की हिम्मत रखता है। किंतु आज की इस दारुण स्थिति में यह युवा पीढ़ी, उनका सारा गणित ही बदल जाने के कारण असंमजस की स्थिति में हैं। क्या करें… कैसे करें.. कहाँ जाय.. कैसे जाय… ऐसे कई सारे सवाल उनके मूँह बायें खडे हैं। भले ही अभी उनके मूँह से इन प्रश्नों की बौछार नहीं हो रही हैं, किंतु उनका मन बहुताधिक हताश है। सारी परीक्षाएँ आगे बढ गयी है। शिक्षा सत्रों का कैंलडर बदलता जा रहा है। पढाई में लगे हुए हैं पर अभी भी असंसजस में हैं। भले ही इंटरनेट के माध्यम से कई सारी जानकारी हासिल कर रहे हैं। जानकारियों से लैंस हैं पर इसका करें क्या? इतना ही नहीं इस तालेबंदी के चलते कई युवाओं की नोकरियों पर गाज़ गिर रही है।  अनेक ऐसे युवा ऐसे भी हैं जिनकी शादी भी होने वाली थी, लेकिन अब अनिश्चित काल के लिये विवाह की तारीखें आगे बढ़ानी पड रही हैं।

आज कोरोना के संक्रमण से देश के देश उसकी चपेट में आ चुके हैं। सारी आर्थिक व्यवस्था चरमरा रही हैं और हम समय के पीछे चलने लगे हैं। इस सच्चाई से अब हर कोई अवगत है। जिन युवाओं ने अपनी आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने संजोए थें, जिन आँखों में एक नया जीवन करवट ले रहा था, जिनके लिए आसमान को अपने आलिंगन में लेने की चाह थी, वह युवा वर्ग आज किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में आ गया हैं।

जब यह महामारी बिना दस्तक दिए हमारे जीवन में घुस गयी हैं तब से हमारे जीवन की दिशा ही बदल गयी है। सोशल लाइफ के आदी युवाओं को सोशल डिस्टनसिंग का कल्चर अपनाना पड़ रहा है। पश्चिम की देखा देखी गले लगना, हाथ मिलाना, गलबाहियाँ डालना आदि की जो वृत्ति युवाओं में आ गयी है, उन्हें अब दो गज देह की दूरी को स्वीकारना पड़ रहा है। वे आज न किसी से मिल पा रहे हैं… न किसी से मुलाकात हो पा रही है। न वीक एंड की पार्टी है और ना ही घूमने जाने ही योजना, न शॉपिग है ना लॉंग ड्राईव है, ना पानी पुरी है ना चाट है। कुछ नहीं, है तो बस हाथ में मोबाईल है और जिसके माध्यम से जुडे है अपने अपने संसार से!

पिछले दो चार दिन से विश्वविद्यायल जा रही हूँ। तैंतीस प्रतिशत कर्मचारियों को ड्युटी पर जाना है। तो जा रही हूँ। गत बीस सालों से यह कैंपस मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहा है। सच कहती हूँ, काफी दिनों बाद जब गयी तब प्राकृतिक सुंदरता के बावजूद कैंपस में मन नहीं लगा था। विश्विविद्यालय की ‘जान’ वे बच्चे ही वहाँ नदारद थे। कक्षाएँ खाली पडी थीं, कैंटिन की कुर्सियाँ उदास पडी थीं। पैरापीट उजाड से लग रहे थे। पेडों के नीचे के  बेंचिस पर जहाँ सारे छात्र छात्राएं हँसते खेलते रहते थे, गप्पे लगाते बैठा करते थे आज एकदम वीरान लग रहे थे। वहाँ पसरी पडी हरी दूब अपने छोटे छोटे सिर उठाकर मानों उनके आने का इंतजार कर रहीं थी। वह स्कूल, कॉलेज ही क्या. जहाँ विद्यार्थी ही ना हो?

यह युवापीढ़ी आज करोना की बदौलत घरों में कैद हैं। उनके आँखों में कुछ प्रश्न  उभरते हैं, पर जूबाँ पर नहीं आते, आखिर हम कबतक इंटरनेट पर सर्फिंग करें? कबतक आँनलाईन पढाई करें?.. ऑनलाईन पढाई भी क्या पढाई है? .. क्लास में बैठकर टीचर्स के लेक्चर्स सुनना, बोर्ड-चॉक से विषय का समझाना और समझना अलग ही होता है। और तो और क्लास का अपना एक ‘क्लास रुम कल्चर’ भी तो होता है। टिचर्स पर कमेंट करना, फुसफुसाना, टिचर्स के देखते ही चुप होना, और उनकी पीठ होते ही फिर बोलना, मुस्कुराना… यह सब आँन लाईन कक्षाओं में कैसे संभव हैं? ऑनलाइन क्लास में तो बस टीचर्स की आवाज़ साफ सुनाई दे इसलिए सबको म्यूट किया जाता है, सबके विडीओ स्टॉप किए जाते हैं… और चलती रहती हैं एक तरफा क्लास…पहले पहले तो अच्छा लगा… फिर वही मनोटोनोस हो गया तो इससे भी उकता गए!

सुवह पीठ पर बैकपैक डालकर निकला हुआ बच्चा शाम देर से थका हारा घर आ जाता है तो उसके लिए घर ‘राहत’ का स्थान था। किंतु इन दिनों मात्र घर ही सीमांत हो गया है। टी. वी की खबरें और इंटरनेट की जानकारियाँ और भी दहला देनेवाली होती हैं तो अपना घर की स्वर्ग लगने लगता है। पीज्जा, बर्गर, पानी पुरी, इडली दोसा, नुडल्स से अपना पेट भर लेनेवाले इन युवाओं को अब घर की दाल रोटी से काम लेना पड़ रहा है। याद तो आती है फास्ट फूड की किंतु भय भी है कि उतने ही ‘फास्ट’ यह ‘फूड’ करोना का संक्रमण घर लेकर आएगा। इसलिए अपने जीवन में ‘भय’ के साथ आयी इस ‘ऊब’ को वे अपने ‘इनोवेटीव’ अंदाज में अभिव्यक्त कर रहे हैं। फिर वह टीक टॉक का विडिओ हो, अपनी बनायी बिर्यानी हो या ऑस्ट्रेलिया के नक्शे की तरह बनायी रोटी हो उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर अपने सोशल लाइफ को maintain भी कर रहे हैं। युवा ही नहीं घर में बंद लगभग सब के सब  सोशल मीडिया पर अपनी अदाकारी की तसवींरें साझा कर रहे हैं।

इस युवापीढ़ी को अब अपनों का, अपने रिश्तों का सही अर्थ, उनके सही मायने समझ आ रहे हैं, घर की रोटी का असली स्वाद भी समझ आ रहा है, असकी अहमियत भी पता लग रही है…किंतु भीतर से उनका मन-पाखी उड़कर बाहर जाना चाहता है… चार दीवारों से बाहर.. आसमान को नापना चाहता है।

किंतु इसके साथ साथ सिक्के का एक और पहलू भी है। युवा और विकास एक दूसरे के पूरक हैं। युवा आज और कल के भी नेता हैं। यह युवा पीढ़ी विश्व का वर्तमान तो है ही, भविष्य भी है। कोरोना संक्रमण के कारण युवाओं के व्यक्तित्व का एक पहलू मुझे बहुत बहुत भाया, और वह है उनके भीतर की इन्सानियत का, उनके भीतर के दयाभाव का और करुणाभाव का। आज इस करोना काल  के वे ‘वॉरियर’ हैं। अच्छा लगता है, मन भर आता है, अपने उत्तरदायित्व के प्रति उनकी सजगता देखकर दिल से उनके लिए दुआ निकलती है।

मेरा एक छात्र है.. समाजसेवा में तत्पर। कोराना के कारण अपने गाँव में बंद हो गया है। मैंने हरबार उसे दूसरों की मदद करते हुए देखा है। इस संकट की स्थिति में एक गर्भवती महिला को अपने गाँव से शहर तक लाने के लिए बिना अपने स्वास्थ्य की परवाह किए सहायता के लिए दौड़ पड़ा। मैंने देखा है मेरे अपने भाई को जो चिलचिलाती धूप में अपना कर्तव्य शिद्दत से निभानेवाले पुलिसकर्मियों के लिए पानी मुहैय्या कराता है। देखा है उस युवा को जो अपनी स्कूटर पर मरीज को बिठाकर अस्पताल लिए जा रहा है। देखा है,  इस युवा पीढ़ी को जो इस आपदा के काल में भूखों को खाना खिला रही हैं। सड़क पर आवारा घूमनेवाले बेज़ुबान पशुओं को दाना,पानी, चारा और खाना दे रहे हैं। यही वह युवा है देश का, जो सारे संकटों का सामना करते हुए निकल पड़ा है अपने देश को संभालने! जिताने!  कोराना के प्रकोप ने सारी दुनिया पर कहर ढाया है। किंतु युवा पीढ़ी ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए एक नया रूप दिखाया है। कई डाक्टरों, नर्सों, पुलिसकर्मिंयों और सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान की बाजी लगाकर मोर्चा संभाला है और उनके दृढविश्वास और समर्पण ने एक बार और साबित कर दिया है कि युवा देश का भविष्य है। भले ही अब दिन उतने सहज नहीं है किंतु भारत की युवा पीढी देश को नई ऊँचाई पर ले जा रही है। यह ऊंचाई है परस्पर सहयोग की, करुणा की, मदद की, आत्मभाव की, रचनात्मक विचार की, जुडने की और जोडने की। इसलिए आज वह अपने देश के भविष्य और उम्मीद की शक्ति है।

अक्सर पुरानी पीढ़ी आनेवाली पीढ़ी में नुख्स देखती ही।  आज भले ही दौर बदला है, सदियाँ बदली हैं पर बदली नहीं है तो युवाओं के प्रति हमारी शिकायतें। इनको अक्सर नकारात्मक और परिवेश के प्रति उपेक्षा का भाव रखनेवाली पीढ़ी माना जाता रहा है। लेकिन कोरोना महामारी के इस संकट में युवा पीढ़ी का यूं आगे आना और सकारात्मक कार्य में भागीदार बनना सराहनीय ही है। उनके इस कार्य ने हमारी बुजर्आ सोच को बदला है। उनका यह सहयोग और उनकी समझ कितनों के लिए अनुकरणीय है। विश्व भर में फैली इस महामारी के प्रकोप में हमारे गांवों से लेकर महानगरों तक युवा पीढ़ी पूरी एहतियात के साथ लोगों की मदद में जुटी हुई हैं। इतिहास गवाह है कि प्राकृतिक आपदाओं के समय में देश के युवाओं ने हमेशा अपना योगदान दिया है। भूकंप, बाढ़ या फिर कोई दुर्घटना ही क्यों न हो युवाओं को पीड़ितों की मदद करते हुए देखा गया है। इस संक्रमण के संकट के समय युवा कई तरह से देश और समाज एक लिए सहायक बन हुए हैं। अपने तईं युवा अपनी अपनी सोच के बल पर कोरोना से लड़ाई लड़ रहे हैं।

आज कोराना से मनुष्य का अस्तित्व खतरे में आ गया है। किंतु मनुष्य में  बहुत अधिक जीवतता है। वह कोरना से नहीं हारेगा। भले ही कोरोना मनुष्य को मारने पर आमादा हो जाए पर मनुष्यता का संबल लेकर चलने वाली युवापीढ़ी उसे हरा देगी। क्येंकि यह पीढ़ी चिंतित भी है और समर्पित भी है। उनका यह स्वार्थरहित कार्य ऐसे समय में भी हमारे होठों पर हल्की सी मुस्कुराहट लाता है और ह्दय में उम्मीद जगाता है।

अंत में हरिवंश राय बच्चन की कुछ पंक्तियाँ जो मुझे इस वक्त बहुत प्रासंगिक लग रही है उसे उद्घृत कर रही हूँ,

तू न थकेगा कभी/तू न रुकेगा कभी /तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

यह महान दृश्य है/चल रहा मनुष्य है/ अश्रु स्वेद रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

*****

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 43 – स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 43 ☆

☆ स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड 

मैंने आपको शरीर की तीन मुख्य नाड़ियों के विषय में बताया था। इन तीनों नाड़ियों की तुलना भारत की तीन मुख्य नदियों के साथ कर सकते हैं गंगा इड़ा है, यमुना पिंगला और सरस्वती सुषुम्ना नाड़ी है । कलियुग में इन नाड़ियों के कर्म इनके नामों के अनुसार ही समझ सकते हैं । इन दिनों कोई भी नहीं या बहुत कम लोग आध्यात्मिक रूप से दिनचर्या जीते हैं, जिसका अर्थ है सुषुम्ना नाड़ी या सरस्वती नदी में कोई प्रवाह नहीं है क्योंकि सुषुम्ना नाड़ी किसी भी व्यक्ति के जीवन के अध्यात्म को दर्शाती है । सरस्वती नदी की वास्तविक उपस्थिति की स्थिति के विषय में भी यह सत्य है । कलियुग में सरस्वती नदी लगभग लुप्त हो गयी है ।

अब इड़ा नाड़ी या गंगा नदी को ले लो जो मानसिक गतिविधियों को दर्शाती है । आजकल हमारे विचार शुद्ध नहीं हैं, और वास्तविक गंगा नदी भी बहुत ज्यादा प्रदूषित हो गयी है । पिंगला नाड़ी या यमुना नदी के साथ भी सामान परिस्थिति है, आजकल लोग शारीरिक रूप से तंदरुस्त नहीं हैं । उन्हें हर दिन पैदा होने वाली कई नई बीमारियां होती रहती हैं । पिंगला नाड़ी शारीरिक शक्ति या सूर्य ऊर्जा होती है । तो फिर इन दिनों पिंगला नाड़ी और यमुना नदी शुद्ध नहीं रह गयी है । इसी तरह मानव शरीर में उपस्थित सभी नाड़ियाँ वास्तव में भारत की प्राचीन नदियाँ ही हैं । मैं वेदों, पुराणों आदि में उल्लिखित नदियों के विषय में बात कर रहा हूँ ।

पर क्या कारण है कि ये नदियाँ केवल भारत में है दुनिया में अन्य कहीं नहीं? क्योंकि उस समय सभ्यता केवल भारत में ही उपस्थित थी । जिसकी सीमाएं भारत के इन दिनों की भौगोलिक सीमाओं से बहुत अलग थी, और इसमें एशिया, यूरोप, अफ्रीका आदि के भौगोलिक क्षेत्र भी शामिल थे । और उस समय लगभग पूरी मानव आबादी उस समय के भौगोलिक भारत में ही बसी थी । कृष्णा, कावेरी, सरयू इत्यादि जैसी सभी भारतीय नदियाँ वास्तव में मानव शरीर की नाड़ियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । यहाँ तक कि नदी ‘वैतरनी’ जो यमलोक (मृत्यु के भगवान के निवास स्थान) की ओर जाती है भी मानव शरीर में सूक्ष्म रूप में भी उपस्थित है । और यमलोक की ओर जाने वाली आत्मा मृत्यु के समय इस नदी से ही निकलती है कुछ लोगों ने इस नदी को अन्य नाम दिए हैं ।

मैंने कलियुग का उदाहरण लिया है । क्या आप जानते हैं कि विभिन्न युगों के बीच बुनियादी अंतर क्या है और हमारे दैनिक जीवन को अच्छे गुण और बुरे गुण कैसे प्रभावित करते हैं?

सत्य युग में सत्य के चार भाग थे और कुछ भी भ्रष्ट या धोखाधड़ी या बुरा नहीं था । सत्य हर जगह उपस्थित था, यह वैदिक युग और उससे पहले का समय था । दूसरे युग त्रेता युग होता है जिसमें तीन भाग अच्छे और एक बुरा होता है । इस युग में विभिन्न साम्राज्यों के अधीन विभिन्न विभिन्न क्षेत्र थे कुछ क्षेत्रों में अच्छे साम्राज्य स्थापित थे एवं कुछ अन्य में बुरे । जिनके बीच में कभी कभी टकराव हुआ करता था जिसमें अच्छे एवं सच्चे साम्राज्य के लोग बुरे और गंदे साम्राज्य के लोगों को परास्त कर देते थे । उदाहरण रामायण जिसमें भगवान राम के क्षेत्र अयोध्या में धर्म के अनुसार ही सब कार्य होते थे और लंका का क्षेत्र जिसमें धर्म विरुद्ध कार्य होते थे एवं जिसका राजा राक्षस रावण था वह क्षेत्र अयोध्या से दूर स्थान पर स्थित था। भगवान राम ने रावण को मार डाला और फिर से सच्चाई स्थापित की ।

तीसरा युग द्वापर होता है जिसमें दो भाग अच्छे और दो बुरे थे । उस युग में अच्छाई और बुराई और करीब आ गयी । उदाहरण महाभारत जिसमें एक ही परिवार में अच्छे और बुरे लोग उपस्थित  थे । कुछ परिवार के सदस्य पांडव अच्छे थे, और अन्य कौरव बुरे थे । पांडव और कौरव एक ही परिवार के थे । उनके बीच में संपत्ति को लेकर युद्ध हुआ जिसमें पांडव जीते और कौरव हार गए, और सच्चाई एवं धर्म फिर से स्थापित हुए । कलियुग में सभी लोग अच्छे और बुरे का संयोजन हैं । कोई भी शत प्रतिशत अच्छा नहीं है और कोई भी शत प्रतिशत बुरा नहीं है”

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 4 – अशोक कुमार ….1 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : अशोक कुमार ….1 पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 4 ☆ 

☆ हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : अशोक कुमार ….1 ☆ 

अशोक कुमार (1911-2001) हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता थे। हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में दादा मुनि के नाम से मशहूर अशोक कुमार उर्फ़ कुमुद लाल गांगुली का जन्म एक मध्यम वर्गीय बंगाली परिवार में 13 अक्टूबर 1911 को हुआ था। इनके पिता कुंजलाल गांगुली पेशे से वकील थे। उनके तीन पुत्र कुमुद ( अशोक कुमार), आभास (किशोर कुमार) और कल्याण (अनूप कुमार) एवं एक पुत्री सती देवी थी। अशोक कुमार ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मध्यप्रदेश के खंडवा शहर में प्राप्त की, बाद मे स्नातक की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की लेकिन क़ानून की परीक्षा में फ़ेल हो गए तो बहन के पास बम्बई पहुँच गए। उनका विवाह बंगाली लड़की शोभा से कलकत्ता में हुआ था। इस दौरान उनकी दोस्ती शशधर मुखर्जी से हुई। भाई बहनो में सबसे बड़े अशोक कुमार की बचपन से ही फ़िल्मों मे काम करके शोहरत की बुंलदियो पर पहुंचने की चाहत थी, लेकिन वह अभिनेता नहीं बल्कि निर्देशक बनना चाहते थे। अपनी दोस्ती को रिश्ते मे बदलते हुए अशोक कुमार ने अपनी इकलौती बहन की शादी शशधर मुखर्जी से कर दी, जो उस समय  बांबे टॉकीज में काम कर रहे थे। सन 1934 मे न्यू थिएटर कलकत्ता मे बतौर लेबोरेट्री असिस्टेंट काम कर रहे अशोक कुमार को उनके बहनोई शशधर मुखर्जी ने बाम्बे टॉकीज में अपने पास बुला लिया।

जीवन नैया’ की शूटिंग के दौरान हिमांशु राय की बीवी यानी फिल्म की हीरोइन देविका रानी हीरो नजमुल हसन के साथ भाग गईं. बाद में दोनों में झगड़ा हो गया तो लौट आईं. राय ने अशोक कुमार से हीरो बनने के लिए कहा. लेकिन वे नहीं माने. बहुत समझाया और राय ने कहा कि वे ही उन्हें इस मुसीबत से निकाल सकते हैं. उन्हें यकीन दिलाया कि उनके यहां अच्छे परिवारों वाले, शिक्षित लोग ही एक्टर होते हैं तब अशोक माने और ये उनकी डेब्यू फिल्म साबित हुई.

जब अशोक हीरो बने तो उनके घर खंडवा में कोलाहल मच गया. उनकी तय शादी टूट गई. मां रोने लगीं. उनके पिता नागपुर गए. वहां अपने कॉलेज के दोस्त रवि शंकर शुक्ला से मिले जो तब मुख्य मंत्री थे. उन्होंने स्थिति बताई और अपने बेटे को कोई नौकरी देने की बात कही. शुक्ला ने दो नौकरियों के ऑफर लेटर दिए. एक था आय कर विभाग के अध्यक्ष का पद जिसकी महीने की तनख्वाह 250 रुपये थी.

पिता अशोक से मिले और एक्टिंग छोड़ने को कहा. अशोक हिमांशु राय के पास गए और उन्हें नौकरी के कागज़ दिखाए और कहा कि उनके पिता बाहर खड़े हैं और उनसे बात करना चाहते हैं. राय ने अकेले में उनके पिता से बात की. थोड़ी देर बाद उनके पिता उनके पास आए और नौकरी के कागज़ फाड़ दिए. उन्होंने अशोक से कहा, “वो (हिमांशु राय) कहते हैं कि अगर तुम यही काम करोगे तो बहुत ऊंचे मुकाम तक पहुंचोगे. तो मुझे लगता है तुम्हें यहीं रुकना चाहिए.”

1936 मे बांबे टॉकीज की फ़िल्म (जीवन नैया) के निर्माण के दौरान फ़िल्म के अभिनेता नजम उल हसन ने इसी कारणवश फ़िल्म में काम करने से मना कर दिया। इस विकट परिस्थिति में बांबे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय का ध्यान अशोक कुमार पर गया और उन्होंने उनसे फ़िल्म में बतौर अभिनेता काम करने की पेशकश की। इसके साथ ही ‘जीवन नैया’ से अशोक कुमार का बतौर अभिनेता फ़िल्मी सफर शुरू हो गया।

उन्होंने न तो थियेटर किया था, न एक्टिंग का कोई अनुभव था. ऐसे में अशोक कुमार के अभिनय में पारसी थियेटर का लाउड प्रभाव नहीं था. यही उनकी खासियत बनी. वे हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे और उनकी एक्टिंग एकदम नेचुरल थी. जो आज तक एक्टर्स हासिल करने की कोशिश करते हैं. इसके अलावा हिमांशु राय और देविका रानी ने भी उन्हें सबकुछ सिखाया. वे उन्हें अंग्रेजी फिल्में देखने के लिए भेजते थे. हम्प्री बोगार्ट जैसे विदेशी एक्टर्स को देखकर और उनकी स्टाइल व अपने विश्लेषण से अशोक ने अभिनय सीखा.

सुबह का नाश्ता वे ठाठ से करते थे. उनका कहना था कि एक्टर लोग पूरे दिन कड़ी मेहनत करते हैं और ब्रेकफास्ट दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन है. इसी से पूरे दिन दृश्यों को करते हुए उनमें ऊर्जा बनी रहती थी.

1937 मे अशोक कुमार को बांबे टॉकीज के बैनर तले प्रदर्शित फ़िल्म ‘अछूत कन्या’ में काम करने का मौका मिला। इस फ़िल्म में जीवन नैया के बाद ‘देविका रानी’ फिर से उनकी नायिका बनी। फ़िल्म मे अशोक कुमार एक ब्राह्मण युवक के किरदार मे थे, जिन्हें एक अछूत लड़की से प्यार हो जाता है। सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी यह फ़िल्म काफी पसंद की गई और इसके साथ ही अशोक कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री मे अपनी पहचान बनाने में क़ामयाब हो गए। इसके बाद देविका रानी के साथ अशोक कुमार ने कई फ़िल्मों में काम किया। इन फ़िल्मों में 1937 मे प्रदर्शित फ़िल्म इज्जत के अलावा फ़िल्म सावित्री (1938) और निर्मला (1938) जैसी फ़िल्में शामिल हैं। इन फ़िल्मों को दर्शको ने पसंद तो किया, लेकिन कामयाबी का श्रेय बजाए अशोक कुमार के फ़िल्म की अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया।

इसके बाद अशोक कुमार ने 1939 मे प्रदर्शित फ़िल्म कंगन, बंधन 1940 और झूला 1941 में अभिनेत्री लीला चिटनिश के साथ काम किया। इन फ़िल्मों मे उनके अभिनय को दर्शको द्वारा काफी सराहा गया, जिसके बाद अशोक कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री मे स्थापित हो गए।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – आलेख ☆ डॅल्गोना’ कॉफी आणि बरंच काही ☆ श्री अमोल अनंत केळकर

श्री अमोल अनंत केळकर

( ई- अभिव्यक्ति में युवा मराठी साहित्यकार श्री अमोल अनंत केळकर जी का हार्दिक स्वागत है। आप मराठी व्यंग्य  विधा (विडंबन)  के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मैं समझता हूँ इस विधा में अभिरुचि केअतिरिक्त  एम बी ए  (मार्केटिंग)  शैक्षणिक योग्यता निःसंदेह पृष्ठभूमि में कार्य करती ही है। श्री अमोल अनंत केळकर जी के ही शब्दों में  उनका परिचय –  “सध्या राहणार बेलापूर नवी मुंबई. ठाण्याजवळ  स्टील कंपनीत नोकरीला. प्रासंगिक लेखन/ विडंबन / चारोळ्या ललित लेखन. ‘माझे टुकार ई-चार ‘ ( www.poetrymazi.blogspot.in)  आणि ‘ देवा तुझ्या द्वारी आलो’ ( www.kelkaramol.blogspot.in) हे दोन ब्लाॅग. यावर नियमीत लेखन. जोतिष शास्त्राची आवड”।  आपका लेखन नितांत सहज  एवं धाराप्रवाह है। आज प्रस्तुत है उनकी विशिष्ट रचना डॅल्गोना’ कॉफी आणि बरंच काही .)
डॅल्गोना’ कॉफी आणि बरंच काही .

मंडळी मला कल्पना नाही ‘डॅल्गोना’  हा शब्द मी बरोबर लिहिला आहे की नाही पण सध्या याची जबरदस्त क्रेझ सोशल मिडियावर पहायला मिळत आहे.  ‘डॅल्गोना कॉफी ‘ ते “डॅल्गोना व्हिस्की” पर्यत झेप या प्रकाराने घेतली आहे. त्यामुळे अर्थातच आम्हाला ही याची दखल घेणे भाग पडले आहे.

तुम्ही म्हणाल काय गरज आहे का दखल घ्यायची?  पण मला सांगा छान “फिल्टर कॉफी” फार तर “नेस कॉफी ” अगदीच मोठी झेप म्हणजे “कोल्ड कॉफी” असताना काय गरज होती का हे ‘डॅल्गोना कॉफी ‘ वगैरे पॅटर्न पाडायची?

माझ्यामते चहा, कॉफी या भावंडांच्यात कोण श्रेष्ठ हा लढा वेगळ्या वळणावर येऊन थांबला आहे. या बहिण भावंडांच्यात कॉफी हे शेंडेफळ. कायमच हीचे जास्त लाड होतात हे साधारण निरीक्षण. मग टीव्ही शोच्या नावात काॅफी आली, तिथे चर्चा करणारे पुढ्यात मोठ्ठा मग्गा घेऊन एकदम स्टाईलीश चर्चा करु लागले. अर्थात त्यामुळे हीचा भाव थोडा चढलेलाच.

हळूहळू हळूहळू ‘चहा’ ने ही कात टाकली. ब्लॅक, रेड, अद्रक, ग्रीन अशा स्वरूपात मिळू लागला. पुर्वी ठराविक ‘अमृततूल्य’ , किंवा गाड्यांवर असणारा चहा वेगवेगळ्या व्यावसायिक आऊटलेट रुपाने नावाजला जाऊ लागला. मग कॉफीला कुठल्या तरी नव्या अवतारात येणे आवश्यकच होते.  ‘शो मस्ट गो ऑन’ असंच काहीस असाव

आता या डॅल्गोना चा सरळ गावठी अर्थ जो मी समजलो तो असा की कॉफी जी आपल्यासमोर येते त्यात दोन द्रव्यांचे थर वेगवेगळे दिसणे. हाच तो डॅल्गोना पॅटर्न. थोडक्यात सांगायचे

तर करुन  घ्या द्रव्यांचे,

वेगवेगळे लेअर

मग फोटो काढून करा,

डॅल्गोना कॉफी  शेअर

हा डॅल्गोना पॅटर्नचा # ट्रेंड आत्ता आल्यानंतर जरा विचार केला की अरे अनेकवेळा आपण या साच्यातून गेलोय की. अगदी लहानपणी बाबा रोज पहाटे “राम मंदीर “ते “विश्रामबाग ” फिरायला घेऊन जायच्याआधी जबरदस्तीने दूध अंड द्यायचे. एका ग्लासात ते  अंड फोडायचे आणि वरुन दूध घातलं की झकास डॅल्गोना पॅटर्न बनायचा. अगदी सहज तीन लेअर म्हणजे खाली पिवळा बल्क, वर द्रव्य (अंड्याची ग्रेव्ही म्हणूया का?  )  आणि तिसरा थर दुधाचा.  ते तिन्ही थर नुसते बघत बसावे असे वाटायचे. (कारण चव फारसी आवडलेली नसायची )  मग बाबा स्वत: उशीर होईल म्हणून पटापट ते तिन्ही थर एकजीव करुन प्यायला लावायचे. ही या पँटर्न शी झालेली पहिली ओळख.

शाळेतल्या मास्तरांनी तोंडावर उठवलेल्या चार बोटांचा थर इतर चेहऱ्यापेक्षा वेगळा दिसत असताना याला ‘डॅल्गोना पॅटर्न’ मधे घ्यायचे का हे तुम्हीच सांगा.

शाळेतील बीजगणित+ भूमिती, इतिहास+ नागरिकशास्त्र +भूगोल,  हिंदी +संस्कृत असे वेगवेगळ्या थरातील पण एकमेकांशी संबंधित विषय हे माझ्या दृष्टीने ‘डॅल्गोना पॅटर्नच”

आम्ही दहावीत असताना समजा भूमितीचा पेपर रद्द झाला असता तर आम्ही अशी चारोळी नक्कीच केली असती

इतिहास म्हणाला नागरिकशास्त्राला

‘आयसोलेशन’ मधे आहे ‘ज्योग्राफी’

या दु:खात दोघे मिळून

चल घेऊ “डॅल्गोना कॉफी’

आता जास्त वेळ न दडवता तुम्हाला सरळ घेऊन जातो केमिकल इंजिनियरींगच्या रसायनशास्त्र प्रयोग शाळेत. या ठिकाणी चार वर्षात असंख्य टेस्ट ट्यूब फोडल्यात. किती केमिकल्स, किती प्रकारे, किती प्रमाणात छोट्याशा त्या नळकांडीत घालून या डॅल्गोना पॅटर्नद्वारे घडवलेत याची गणती नाही. त्या चार वर्षात शनी-मंगळ युती कडून ही एवढे धडाम-धूम स्फोट झाले नसतील एवढे आम्ही स्फोट प्रयोगशाळेत केले. बरं हे कळलं, जेंव्हा अंतीम वर्षानंतर कॉलेजमधून परत जाताना मिळणा-या डिपोझीटचा आकडा वरील करामतींमुळे सर्रकन खाली आला तेंव्हा.

बाकी तुम्हीही अनेक प्रकारे हा पॅटर्न अनुभवला असणार. काही नशीबवान असतील ज्यांनी खरोखरच अशी कॉफी पिली असेल. काही जणांनी सूर्योदय, सूर्यास्तावेळी आकाशात दिसणाऱ्या “डॅल्गोना छटा” बघितल्या असतील किंवा अगदीच कुणीतरी ओरडून ते बघ असं दाखवलेलं ‘इंद्रधनुष्य’ असेल.

आता यातलं कुणी काहीच केलं नसलं तरी तुम्ही नक्कीच नशीबवान आहात की गेली अनेकवर्षे तुम्ही ललित,विडंबन,कविता,चारोळी युक्त ‘टुकार डॅल्गोना पॅटर्न  ललित’ वाचत आलात, आणि जे आत्ताही केलंतं

©  श्री अमोल अनंत केळकर

१३/०४/२०२०

नवी मुंबई, मो ९८१९८३०७७९

poetrymazi.blogspot.in

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ बच्चों के लिए योग निद्रा ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  Yoga Nidra for Children (In Hindi): बच्चों के लिए योग निद्रा☆ 

Video Link >>>>

Yoga Nidra for Children (In Hindi): बच्चों के लिए योग निद्रा

 

Based on: Yoga Nidra by Swami Satyananda Saraswati

Presented by : Jagat Singh Bisht

Yoga Nidra can be practised even by small children, taking into account their nature and special requirements. For children between 8 and 14 years, it is difficult to remain in one spot even for 10 minutes. Yet they relax far more quickly and deeply than adults. Therefore practice sessions of 10 or 15 minutes are sufficient.

In general children are far less tense and preoccupied than adults. They are more open and receptive to the experience of yoga nidra.

This video is dedicated to Swami Satyananda Saraswati!

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – द्वादश अध्याय (20) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

द्वादश अध्याय

(भगवत्‌-प्राप्त पुरुषों के लक्षण)

 

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।

श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।20।।

जो धार्मिक है, धर्म को पूजे यथा सजीव

श्रद्धावान परायण , वह प्रिय मुझे अतीव ।।20।।

 

भावार्थ :  परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम ‘श्रद्धा’ है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं।।20।।

 

They verily who follow this immortal Dharma (doctrine or law) as described above, endowed with faith, regarding Me as their supreme goal, they, the devotees, are exceedingly dear to me.।।20।।

 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥12॥

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 46 ☆ चिंता बनाम पूजा ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  जीवन में  चिंता का स्थान एवं उसके व्यक्तिगत, सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पक्ष को उजागर करता एकआलेख चिंता बनाम पूजा।यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 46 ☆

☆ चिंता बनाम पूजा

‘जब आप अपनी चिंता को पूजा, आराधना व उपासना में बदल देते हैं, तो संघर्ष दुआओं में परिवर्तित हो जाता है।’ चिंता तनाव की जनक व आत्मकेंद्रिता की प्रतीक है, जो हमारे हृदय में अलगाव की स्थिति उत्पन्न करती है। इसके कारण ज़माने भर की ख़ुशियाँ, हमें अलविदा कह रुख़्सत हो जाती हैं और उसके परिणाम-स्वरूप हम घिर जाते हैं–चिंता, तनाव व अवसाद के घने अंधकार में–जहां हमें मंज़िल तक पहुंचाने वाली कोई भी राह नज़र नहीं आती।’

वैसे भी चिंता को चिता समान कहा गया है, जो हमें कहीं का नहीं छोड़ती और हम नितांत अकेले रह जाते हैं। कोई भी हमसे बात तक करना पसंद नहीं करता, क्योंकि सब सुख के साथी होते हैं और दु:ख में तो अपना साया तक भी साथ नहीं देता। सुख और दु:ख एक-दूसरे के विरोधी हैं, शत्रु हैं। एक की अनुपस्थिति में ही दूसरा दस्तक देने का साहस जुटा पाता है…तो क्यों न इन दोनों का स्वागत किया जाए। ‘अतिथि देवो भव’ हमारी संस्कृति है, हमारी परंपरा है, आस्था है, विश्वास है, जो सुसंस्कारों से पल्लवित व पोषित होता है। आस्था व श्रद्धा से तो धन्ना भगत ने पत्थर से भी भगवान को प्रकट कर दिया था। हां! जब हम चिंता को पूजा में बदल लेते हैं अर्थात् सम्पूर्ण समर्पण कर देते हैं, तो वह प्रभु की चिंता बन जाती है, क्योंकि वे हमारे हित के बारे में हमसे बेहतर जानते हैं। सो! आइए–अपनी चिंताओं को उस सृष्टि-नियंता को समर्पित कर सुक़ून से ज़िंदगी बसर करें।

‘बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय’ इस कहावत से तो आप सब परिचित होंगे कि जिस मनुष्य पर प्रभु का वरद्-हस्त रहता है, उसे कोई लेशमात्र भी हानि नहीं पहुंचा सकता; उसका अहित नहीं कर सकता। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि आप हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाएं कि अब तो सब कुछ प्रभु ही करेगा। जो भाग्य में लिखा है, अवश्य होकर अर्थात् मिल कर रहेगा क्योंकि ‘कर्म गति टारे नहीं टरहुं।’ गीता मेंं भी भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म का संदेश दिया है तथा उसे ‘सार्थक कर्म’ की संज्ञा दी है। उसके साथ ही वे परोपकार का संदेश हुए, मानव-मात्र के हितों का ख्याल रखने को कहते हैं। दूसरे शब्दों में वे हाशिये के उस पार के नि:सहाय लोगों के लिए मंगल-कामना करते हैं, ताकि समाज में सामंजस्यता व समरसता की स्थापना हो सके। वास्तव में यही है–सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम राह, जिस पर चल कर हम कैवल्य की स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं।

संघर्ष को दुआओं में बदलने की स्थिति जीवन में तभी आती है, जब आपके संघर्ष करने से दूसरों का हित होता है और असहाय व पराश्रित लोग अभिभूत हो, आप पर दुआओं की वर्षा करनी प्रारंभ कर देते हैं। दुआ दवा से भी अधिक श्रेयस्कर व कारग़र होती है, जो मीलों का फ़ासला पल भर में तय कर प्रार्थी तक पहुंच अपना करिश्मा दिखा देती है तथा उसका प्रभाव अक्षुण्ण होता है…रेकी भी इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आजकल तो वैज्ञानिक भी गायत्री मंत्र के अलौकिक प्रभाव देख कर अचंभित हैं। वे भी इस तथ्य को स्वीकारने लगे हैं कि दुआओं व वैदिक मंत्रों में विलक्षण व अलौकिक शक्ति होती है। मुझे स्मरण हो रही हैं– स्वरचित मुक्तक-संग्रह ‘अहसास चंद लम्हों का’ की चंद पंक्तियां… जो जीवन मे अहसासों की महत्ता व प्रभुता को दर्शाती हैं… ‘अहसास से रोशन होती है ज़िंदगी की शमा/ अहसास कभी ग़म, कभी खुशी दे जाता है/ अहसास की धरोहर को सदा संजोए रखना/ अहसास ही इंसान को बुलंदियों पर पहुंचाता है।’ अहसास व मन के भावों में असीम शक्ति है, जो असंभव को संभव बनाने की क्षमता रखते हैं।

उक्त संग्रह की यह पंक्तियां सर्वस्व समर्पण के भाव को अभिव्यक्त करती है…’मैं मन को मंदिर कर लूं /देह को मैं चंदन कर लूं /तुम आन बसो मेरे मन में /मैं हर पल तेरा वंदन कर लूं’…जी हां! यह है मानसिक उपासना… जहां मैं और तुम का भाव समाप्त हो जाता है और मन, मंदिर हो जाता है और भक्त को प्रभु को तलाशने के लिए मंदिर-मस्जिद व अन्य धार्मिक-स्थलों में माथा रगड़ने की आवश्यकता महसूस नहीं होती। उसकी देह चंदन-सम हो जाती है, जिसे घिस-घिस कर अर्थात् जीवन को साधना में लगा कर, वह प्रभु के चरणों में स्थान प्राप्त करना चाहता है। उसकी एकमात्र उत्कट इच्छा यही होती है कि परमात्मा उसके मन में रच-बस जाए और वह  हर पल उसका वंदन करता रहे… एक भी सांस बिना सिमरन के व्यर्थ न जाए। इसी संदर्भ में मुझे स्मरण हो रहा है–महाभारत का वह प्रसंग, जब भीष्म पितामह शर-शैय्या पर लेटे थे। दुर्योधन पहले आकर उनके शीश की ओर स्थान प्राप्त कर स्वयं को गर्वित व हर्षित महसूसता है और कृष्ण उनके चरणों में बैठ कर संतोष का अनुभव करते हैं। सो! वह कृष्ण से प्रसन्नता का कारण पूछता है और अपने प्रश्न का उत्तर पाकर हतप्रभ रह जाता है कि ‘मानव की दृष्टि सबसे पहले सामने वाले अर्थात् चरणों की ओर बैठे व्यक्ति पर पड़ती है, शीश की ओर बैठे व्यक्ति पर नहीं।’ भीष्म पितामह भी पहले कृष्ण से संवाद करते हैं और दुर्योधन से कहते हैं कि मेरी दृष्टि तो पहले वासुदेव कृष्ण पर पड़ी है। इससे संदेश मिलता है कि यदि तुम जीवन.में ऊंचाई पाना चाहते हो, तो अहं को त्याग, विनम्र बन कर रहो, क्योंकि जो व्यक्ति ज़मीन से जुड़कर रहता है; फलदार वृक्ष की भांति झुक कर रहता है… सदैव उन्नति के शिखर पर पहुंच सूक़ून व प्रसिद्धि पाता है।’

सो! प्रभु का कृपा-प्रसाद पाने के लिए उनकी चरण-वंदना करनी चाहिए… जो इस कथन को सार्थकता प्रदान करता है कि ‘यदि तुम जीवन में ऊंचाई पाना चाहते हो अथवा उन्नति के शिखर को छूना चाहते हो, तो किसी काम को छोटा मत समझो। जीवन में खूब परिश्रम करके सदैव नंबर ‘वन’ पर बने रहो और उस कार्य को इतनी एकाग्रता व तल्लीनता से करो कि तुम से श्रेष्ठ कोई कर ही न सके। सदैव विनम्रता का दामन थामे रखो, क्योंकि फलदार वृक्ष व सुसंस्कृत मानव सदैव झुक कर ही रहता है।’ सो! अहं मिटाने के पश्चात् ही आपको करुणा-सागर के निज़ाम में प्रवेश पाने का सुअवसर प्राप्त होगा। अहंनिष्ठ  मानव का वर्तमान व भविष्य दोनों अंधकारमय होते हैं। वह कहीं का भी नहीं रहता…न वह इस लोक में सबका प्रिय बन पाता है, न ही उसका भविष्य संवर सकता है अर्थात् उसे कहीं भी सुख-चैन की प्राप्ति नहीं होती।

इसलिए भारतीय संस्कृति में नमन को महत्व दिया गया है अर्थात् अपने मन से नत अथवा झुक कर  रहिए, क्योंकि अहं को विगलित करने के पश्चात् ही मानव के लिए प्रभु के चरणों में स्थान पाना संभव है। नमन व मनन दोनों का संबंध मन से होता है। नमन में मन से पहले न लगा देने से और मनन में मन के पश्चात् न लगा देने से मनन बन जाता है। दोनों स्थितियों का प्रभाव अद्भुत व विलक्षण होता है, जो मानव को कैवल्य की ओर ले जाती हैं। सो! नमन व मनन वही व्यक्ति कर पाता है, जिसका अहं अथवा सर्वश्रेष्ठता का भाव विगलित हो जाता है और वह विनम्र.प्राणी निरहंकार की  स्थिति में आकाश की बुलंदियों को छूने का सामर्थ्य रखता है।

‘यदि मानव में प्रेम, प्रार्थना व क्षमा भाव व्याप्त हैं, तो उसमें शक्ति, साहस व सामर्थ्य स्वत: प्रकट हो जाते हैं, जो जीवन को उज्ज्वल बनाने में सक्षम हैं।’ इसलिए सब से प्रेम करने से सहयोग व सौहार्द बना रहेगा और आपके ह्रदय में प्रार्थना भाव जाग्रत हो जायेगा …आप मानव-मात्र के हित व मंगल की कामना करना प्रारंभ कर देंगे। इस स्थिति में अहं व क्रोध का भाव विलीन हो जाने पर करुणा भाव जाग्रत हो जाना स्वाभाविक है। महात्मा बुद्ध ने भी प्रेम, करुणा व क्षमा को सर्वोत्तम भाव स्वीकारते हुए, क्षमा भाव को क्रोध पर नियंत्रित करने के अचूक साधन व उपाय के रूप में प्रतिष्ठापित किया है। इन परिस्थितियों में मानव शक्ति व साहस के होते हुए भी, अपने क्रोध पर नियंत्रण कर, निर्बल पर वीरता का प्रदर्शन नहीं करता, क्योंकि वह  ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात’ अर्थात् वह बड़ों में क्षमा भाव की उपयोगिता, आवश्यकता, सार्थकता व महत्ता को समझता-स्वीकारता है। महात्मा बुद्ध भी प्रेम व करुणा का संदेश देते हुए स्पष्ट करते हैं कि वास्तव में ‘जब आप शक्तिशाली होते हुए भी निर्बल पर प्रहार नहीं करते, श्लाघनीय है, प्रशंसनीय है।’ इसके विपरीत यदि आप में शत्रु का सामना करने की सामर्थ्य व शक्ति ही नहीं है, तो चुप रहना आप की विवशता है, मजबूरी है, करुणा नहीं। मुझे स्मरण हो रहा है, शिशुपाल प्रसंग …जब शिशुपाल ने क्रोधित होकर भगवान कृष्ण को 99 बार गालियां दीं और वे शांत भाव से मुस्कराते रहे। परंतु उसके 100वीं बार वही सब दोहराने पर उन्होंने उसके दुष्कर्मों की सज़ा देकर उसके अस्तित्व को मिटा डाला।

सो! कृष्ण की भांति क्षमाशील बनिए। विषम व विपरीत परिस्थितियों में धैर्य का दामन थामे रखें, क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया देने से जीवन में केवल तनाव की स्थिति ही उत्पन्न नहीं होती, बल्कि ज्वालामुखी पर्वत की भांति विस्फोट होने की संभावना बनी रहती है। इतना ही नहीं, कभी-कभी जीवन में सुनामी जीवन की समस्त खुशियों को लील जाता है। इसलिए थोड़ी देर के लिए उस स्थान को त्यागना श्रेयस्कर है, क्योंकि क्रोध तो दूध के उफ़ान की भांति पूर्ण वेग से आता है और पल-भर में शांत हो जाता है। सो! जीवन में अहं का प्रवेश निषिद्घ कर दीजिए …क्रोध अपना ठिकाना स्वत: बदल लेगा।

वास्तव में दो वस्तुओं के द्वंद्व अर्थात् अहं के टकराने से संघर्ष का जन्म होता है। सो! पारिवारिक सौहार्द बनाए रखने के लिए अहं का त्याग अपेक्षित है, क्योंकि संघर्ष व टकराव से पति-पत्नी के मध्य अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसका खामियाज़ा बच्चों को एकांत की त्रासदी के दंश रूप में झेलना पड़ता है। सो! संयुक्त परिवार-व्यवस्था के पुन: प्रचलन से जीवन में खुशहाली छा जाएगी। सत्संग, सेवा व सिमरन का भाव पुन: जाग्रत हो जाएगा अर्थात् जहां सत्संगति है, सहयोग व सेवा भाव अवश्य होगा, जिसका उद्गम-स्थल समर्पण है। सो! जहां समर्पण है, वहां अहं नहीं; जहां अहं नहीं, वहां क्रोध व द्वंद्व नहीं– टकराव नहीं, संघर्ष नहीं; क्योंकि द्वंद्व ही संघर्ष का जनक है। यह स्नेह, प्रेम, सौहार्द, त्याग, विश्वास, सहनशीलता व सहानुभूति के दैवीय भावों को लील जाता है और हम चिंता, तनाव व अवसाद के मकड़जाल में फ़स कर रह जाते हैं… जो हमें जीते-जी नरक के द्वार तक ले जाते हैं। आइए! चिंता को त्याग व अहं भाव को मिटा कर, पूर्ण समर्पण करें, ताकि संघर्ष दुआओं में परिवर्तित हो जाए और जीते-जी मुक्ति प्राप्त करने की राह सहज व सुगम  हो जाए।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ सीढ़ियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

आज  इसी अंक में प्रस्तुत है श्री संजय भरद्वाज जी की कविता  “ सीढ़ियों “ का अंग्रेजी अनुवाद  Stairs…” शीर्षक से ।  हम कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी के ह्रदय से आभारी  हैं  जिन्होंने  इस कविता का अत्यंत सुन्दर भावानुवाद किया है। )

 

☆ संजय दृष्टि  ☆  सीढ़ियाँ

आती-जाती

रहती हैं पीढ़ियाँ

जादुई होती हैं

उम्र की सीढ़ियाँ,

जैसे ही अगली

नज़र आती है

पिछली तपाक से

विलुप्त हो जाती है,

आरोह की सतत

दृश्य संभावना में

अवरोह की अदृश्य

आशंका खो जाती है,

जब फूलने लगे साँस

नीचे अथाह अँधेरा हो

पैर ऊपर उठाने को

बचा न साहस मेरा हो,

चलने-फिरने से भी

देह दूर भागती रहे

पर भूख-प्यास तब भी

बिना लांघा लगाती डेरा हो,

हे आयु के दाता! उससे

पहले प्रयाण करा देना

अगले जन्मों के हिसाब में

बची हुई सीढ़ियाँ चढ़ा देना!

मैं जिया अपनी तरह

मरूँ भी अपनी तरह,

आश्रित कराने से पहले

मुझे विलुप्त करा देना!

कृपया घर में रहें, सुरक्षित रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

प्रातः 8:01 बजे, 21.4.19

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 46 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  “भावना के दोहे। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 46 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

 

उथल-पुथल है हृदय में,

कर लो तुम संवाद।

जीवन हो तुम राधिके,

गूंजा अनहद नाद।।

 

जीवन में चारों तरफ,

फैला है अँधियार

बिना ज्ञान-दीपक भला,

कौन करे उजियार।।

 

इस अनंत संसार  का,

कोई ओर न छोर

हरि सुमिरन से ही मिले,

मंगलकारी भोर

 

कोरोना के काल में,

बढ़ी पेट की आग।

सुनने वाला कौन है

भूख तृप्ति का राग।।

 

जीवन के नेपथ्य से,

कौन रहा है भाग।

करो आज का सामना,

छोड़ कपट खटराग।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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