हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४२ ⇒ रेसिडेंसी एरिया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रेसिडेंसी एरिया।)

?अभी अभी # ९४२ ⇒ आलेख – रेसिडेंसी एरिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे लिए हमारा निवास ही रेसिडेंस है लेकिन हमारे शहर में एक रेसिडेंसी एरिया भी है जहां कभी अंग्रेज अफसर रहते थे। जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, वे नान – रेसिडेंट कहलाते हैं। भारत में तब अंग्रेजों का ही शासन था, इसलिए वे रेसिडेंट कहलाए।

हम अपनी पहचान, परिवेश इतनी आसानी से नहीं बदलते। आज भी रेसिडेंसी एरिया अपनी जगह है, वहां अफसरों के निवास हैं, कलेक्टर, कमिश्नर के बंगले हैं, रेसीडेंसी कोठी है, रेसिडेंसी क्लब है। देश में हर जगह गेस्ट हाउस है, सर्किट हाउस है। अंग्रेज चले गए, ठाट बाट छोड़ गए।।

आज भी आप शहर के इस शांत क्षेत्र में चले जाएं, साफ सुथरी सड़कें, हरियाली, बड़े बड़े बंगले, साथ में खुले अहाते, बड़े बड़े मैदान। बगीचा, टेनिस कोर्ट और शुद्ध हवा। आसपास कोई बहु – मंजिला इमारत नहीं, कोई शॉपिंग मॉल अथवा ट्रेडिंग सेंटर नहीं। आपका पड़ोसी कोई अफसर ही हो सकता है, या फिर कोई कॉलेज का प्रोफेसर।

इसी क्षेत्र में जेल भी है और आकाशवाणी का प्रसारण केंद्र भी। आकाशवाणी के क्वार्टर भी हैं और उनके कर्मचारियों द्वारा बसाई गई रेडियो कॉलोनी। बस, इतनी ही कहानी है रेसीडेंसी एरिया की। इसके बाद एक तरफ अगर चिड़िया घर है तो दूसरी तरफ आजाद नगर।।

देश को आजाद हुए सात से अधिक दशक बीत गए, अंग्रेजी राज चला गया, जन सेवक आ गए, राजाओं के महल खाली हो गए, जनता झोपड़ी में और मंत्री बंगलों में आ गए। सन् ७४ में प्रदेश की राजधानी भोपाल प्रवास के दौरान टी टी नगर से लगे हुए ७४ बंगलों के दर्शन प्रात: कालीन भ्रमण के दौरान किए थे। अफसरों और मंत्रियों की नेम प्लेट और आलीशान बंगले। तब और अब मैं सुविधाएं बढ़ी ही हैं, कम नहीं हुई। उसी अनुसार महंगाई भी बढ़ी ही है, कम नहीं हुई।

सामंती सोच, अंग्रेजियत और कांग्रेसी संस्कृति को छोड़ हम एक नई संस्कृति में प्रवेश कर चुके हैं जिसे आप शुद्ध भारतीय संस्कृति कह सकते हैं। हमारे आचार विचार में सादगी और आदर्श का प्रवेश अगर आज भी नहीं होता, तो यह तय है कि हम एक दोहरी जिंदगी जी रहे हैं, जिसमें सिर्फ पाखंड और दिखावा है। आज कोई लाल बहादुर शास्त्री नहीं जो देश पर संकट के समय एक वक्त का भोजन छोड़ने का संकल्प ले और बिना सरकारी विज्ञापन बाजी और कार्यकर्ताओं के शोर के, देशवासी प्रेरित हो, एक समय का भोजन त्यागने का संकल्प ले लें।।

अफसर, गाड़ी बंगले नहीं छोड़ सकता, मंत्री कारों के काफिले और विमान यात्रा नहीं छोड़ सकता। जिस देश में सादगी दिखावा और पाखंड का प्रतीक बन जाए, वहां शान शौकत और भव्यता ही एकमात्र विकल्प बच रहता है। अंग्रेजों ने भारत नहीं, इंडिया छोड़ा। हमने उनका रेसीडेंसी एरिया अपना लिया। आज से उनके सारे बंगले हमारे बंगले हो गए। अर्दली जो थे, चपरासी हो गए।

कुछ भी हो, आई लव माय इंडिया ! इसीलिए मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, शाइनिंग इंडिया।

नमस्ते इंडिया, सावधान इंडिया।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक

भारतीय जीवन में उत्सव केवल तिथियों का क्रम नहीं हैं, वे मन की तैयारी और सांस्कृतिक चेतना की एक निरंतर यात्रा हैं। कोई भी पर्व अचानक नहीं उतरता; वह धीरे-धीरे ऋतुओं की चाल के साथ हमारे भीतर स्थान बनाता है।

फाल्गुन की चहल-पहल और रंगों की स्मृतियों के बाद जब चैत की आहट सुनाई देती है, तब कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन मानो जीवन की गति को थोड़ा थाम लेने का अवसर देते हैं। यह समय बाहरी उत्सवों की चकाचौंध से अधिक भीतर की सजगता का समय होता है—एक ऐसी साधना, जिसमें मन स्वयं को आगामी पर्वों के लिए तैयार करता है।

इन्हीं दिनों में आती है शीतला अष्टमी। लोकजीवन में यह बसोरा के रूप में भी जानी जाती है। इस दिन रसोई की अग्नि को विश्राम दिया जाता है और एक दिन पूर्व बनाया गया बासा भोजन श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है। पहली दृष्टि में यह एक साधारण परंपरा प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर लोकबुद्धि का गहरा संतुलन छिपा है—स्वास्थ्य, स्वच्छता और संयम का संतुलन।

शीतला माता की पूजा करते हुए घरों में एक अलग प्रकार की शांति उतर आती है। चूल्हा भले ही न जले, पर श्रद्धा की एक उजली लौ पूरे घर में फैल जाती है। यह विराम हमें स्मरण कराता है कि जीवन में निरंतर गति जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है ठहरना भी।

यही ठहराव आगे आने वाले नवरात्रि की भूमिका भी रचता है। शक्ति की आराधना का यह महान पर्व केवल नौ दिनों की उपासना भर नहीं, बल्कि उससे पहले की यह मानसिक तैयारी भी उसका एक महत्वपूर्ण आधार है। कृष्ण पक्ष के ये दिन हमें संकेत देते हैं कि अब अपने भीतर की अनावश्यक व्यग्रताओं को धीरे-धीरे कम किया जाए, घर-आँगन को सहेजा जाए और मन में श्रद्धा के लिए एक निर्मल स्थान बनाया जाए।

भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि यहाँ हर बड़े उत्सव से पहले एक शांत प्रस्तावना होती है—जैसे संगीत से पहले की धुन, या भोर से पहले का वह सन्नाटा जिसमें प्रकाश जन्म लेता है।

इस दृष्टि से देखें तो शीतलाष्टमी केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक क्रम का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो हमें आने वाली नवरात्रि की ऊर्जा के लिए भीतर से तैयार करता है।

कृष्ण पक्ष के ये पंद्रह दिन इसलिए रिक्त नहीं हैं।

वे मन को संयत करने की एक साधना है

ताकि जब शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़े,

तो उसके साथ हमारी आस्था और बलवती हो सके।

शायद इसी कारण भारतीय संस्कृति ने उत्सवों के बीच ऐसे शांत पड़ाव रचे हैं, जहाँ मन स्वयं से संवाद कर सके। शीतलाष्टमी का यह सहज विराम और नवरात्रि की आने वाली ऊर्जा—दोनों मिलकर हमें यह स्मरण कराते हैं कि शक्ति की उपासना केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता और संतुलन से पूर्ण होती है।

कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन हमें ठहरकर देखने का अवसर देते हैं—अपने भीतर, अपने परिवेश में और अपनी परंपराओं में। जब मन का आकाश निर्मल हो जाता है, तभी आस्था का चंद्रमा पूर्णता की ओर बढ़ता है,इसीलिए हमारे उत्सव केवल मनाए नहीं जाते—

वे पहले भीतर जागते हैं,

फिर जीवन में उजाला भर देते हैं।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०३ ☆ आलेख – “भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०३ ☆

?  आलेख – भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी ललित निबंध के संसार में पंडित विद्यानिवास मिश्र एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से मिट्टी की सोंधी गंध और वेदों की ऋचाओं को एक साथ पिरोया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिस ललित निबंध की आधारशिला रखी थी, मिश्र जी ने उसे अपने अद्भुत पांडित्य और लोक-अनुभवो को शब्दों से एक विशाल प्रासाद में परिवर्तित कर दिया। उनका लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अविरल धारा का प्रवाह है, जो गाँवों की पगडंडियों से होती हुई दर्शन के शिखर तक पहुँचती है।

उनके निबंध अनुभूति और शिल्प का संगम हैं।

मिश्र जी के निबंधों का ‘ललित’ पक्ष उनके आत्मपरक दृष्टिकोण में निहित है। उनके निबंधों में ‘मैं’ का अहंकार नहीं, बल्कि ‘मैं’ की आत्मीयता घुली होती है। जब वे ‘कदम की फूली डाल’ या ‘आम्र-मंजरी’ की बात करते हैं, तो वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे पाठक को अपने साथ उस संवेदन-धरातल पर ले जाते हैं जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और केवल प्रवाही रसात्मकता शेष रहती है।

उनकी असाधारण स्मृतयो का रोचक वर्णन लालित्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे वर्तमान की किसी छोटी-सी घटना जैसे बारिश की बूंदों का गिरना , को भी निबंध में इतिहास और पुराणों की महान परंपराओं से जोड़ देते हैं। उनके लेखन में शब्द ‘अर्थ’ ही नहीं देते, बल्कि ‘ध्वनि’ और ‘दृश्य’ भी पैदा करते हैं। उनके निबंधों में एक प्रकार की ‘तरलता’ है, जो पाठक के मन में किसी पुराने राग की तरह गूंजती रहती है।

लोक और शास्त्र का अनूठा अद्वैत

विद्यानिवास मिश्र के लेखन की  विशिष्टता है ।उनके निबंधों में लोक और शास्त्र का समन्वय है। जहाँ एक ओर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और पाणिनी के व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित थे, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय में लोक-गीतों और ग्रामीण अंचल की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। उनके निबंधों में उपनिषदों के सूत्र और कबीर की साखियाँ एक ही धरातल पर आकर संवाद करती हैं। वे अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा महलों में नहीं, बल्कि उन लोरियो में सुरक्षित है जो एक माँ अपने बच्चे को सुलाते समय गाती है।

मिश्र जी की कृतियाँ कालजयी हैं। उनमें तथ्यात्मक वैचारिक विस्तार है। ये निबंध भारतीय जीवन-दर्शन के कोश बन गए हैं। उनका निबंध संग्रह ‘तुम चंदन हम पानी’ भक्ति और समर्पण की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार ‘आँगन का पंछी और बनजारा मन’ में उन्होंने मनुष्य की उस छटपटाहट को स्वर दिया है जो एक ओर अपनी जड़ों , आँगन से बँधना चाहता है और दूसरी ओर अनंत ज्ञान की खोज में ‘बनजारा’ बनकर भटकना चाहता है।

उनका सबसे चर्चित निबंध ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ आधुनिक हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। एक संगीत कार्यक्रम से देर रात घर लौटते अपने पुत्र और अतिथि कन्या की प्रतीक्षा में बैठी एक माँ की ममतामयी चिंता को उन्होंने जिस प्रकार कौशल्या की राम के प्रति चिंता से जोड़ा, वह अद्भुत है। यह निबंध प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जब तक इस देश में ‘मुकुट के भीगने’ अर्थात, संस्कृति और मर्यादा के संकट की चिंता जीवित है, तब तक हमारी संवेदनाएँ मृत नहीं हो सकती ।

कुशल संपादक और पत्रकारिता के प्रतिमान

पंडित जी का संपादन कर्म उनके लेखन जितना ही प्रभावशाली था। उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक के रूप में हिंदी पत्रकारिता को एक नई गरिमा और वैचारिक गहराई प्रदान की। उनके संपादन में भाषा की शुद्धता और वैचारिक प्रखरता का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ पत्रिका के माध्यम से नए रचनाकारों को एक मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए। वे मानते थे कि समाचार केवल सूचना नहीं होते  बल्कि उनकी प्रस्तुति ऐसी हो जिससे वो समाज के मानस को संस्कारित करने का माध्यम बने।

 पंडित विद्यानिवास मिश्र का अवदान यह है कि उन्होंने हिंदी निबंध को रूखेपन और कोरे बौद्धिक विलाप से बाहर निकाला। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा जड़ नहीं होती, बल्कि वह एक बहती हुई नदी है जो नए युग के साथ मिलकर अपना मार्ग बनाती है। आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब व्यक्ति अपनी पहचान खो रहा है, मिश्र जी का साहित्य हमें पुनः अपनी मिट्टी की सुगंध और अपने संस्कारों के उजियारे की ओर ले जाता है। वे आजीवन एक ऐसे ‘सांस्कृतिक यात्री’ बने रहे, जिनकी यात्रा का गंतव्य भारत की शाश्वत मेधा की खोज था।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४१ ⇒ गुणगान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुणगान।)

?अभी अभी # ९४१ ⇒ आलेख – गुणगान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भक्ति और देशभक्ति का अर्थ ही मेरे देश की धरती और मेरे आराध्य इष्ट, मातृ शक्ति, सदगुरु एवं परम पिता परमेश्वर का गुणगान है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

सबसे निराली महिमा है भाई, दो अक्षर के राम की, जय बोलो सियावर राम की। राम का गुणगान करिये। राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये। नमन करना, वंदना करना, नाम लेना, मंत्र का जाप करना, अथवा प्रार्थना करना, सभी उसी ईश्वरीय शक्ति का गुणगान ही तो है।।

जो गुणवान है, सर्व शक्तिमान है, ज्ञान दाता और मोक्ष दाता है, उससे हमारा एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का नाता है। उसका रूप भी हो सकता है, कोई आकार भी हो सकता है, और वह निर्गुण निराकार भी हो सकता है। रिश्ते में वह आपकी मां भी हो सकती है, और आपका बाप भी हो सकता है।

गुण के गाहक सहस नर !

हमारे दैनिक उपयोग के उत्पादों का विज्ञापन क्या उनका गुणगान नहीं है। हमारे नेताओं की, अमर शहीदों की, और धार्मिक उत्सवों और जुलूसों में जो जय जयकार होती है, क्या वह गुणगान नहीं है। स्तुति का अर्थ भी गुणगान ही होता है। हमारे वेदों की ऋचाओं और संस्कृत के सुभाषितों में जहां जहां नमः का प्रयोग हुआ है, वह भी गुणगान ही है।।

निंदा स्तुति मनुष्य का स्वभाव है। अपने हित और आत्म कल्याण की भावना अगर उसे किसी के गुणगान की ओर प्रवृत्त करती है तो लालच, खुदगर्जी और स्वार्थ उसे किसी की निंदा के लिए मजबूर करता है। कहीं किसी की सात्विक प्रवृत्ति है तो किसी की तामसिक। हमारे अंदर ही देवासुर संग्राम चल रहा है और हमें उसका पता ही नहीं है।

किसी की तारीफ करना, प्रशंसा करना अथवा बढ़ाई करना हमें बचपन से ही घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। बड़ों का आदर, सदा सच बोलना, चोरी नहीं करना, किसी की निंदा नहीं करना और सदा ईश्वर का ध्यान करना। यानी सदाचार का तावीज आपको पहना दिया जाता है।।

जहां प्रेम है, वहां प्रशंसा है। गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा, आके यहां रे ! आप इसे फिल्मी गीत कहें अथवा कविता, आखिर यह भी तो गुणगान ही है। गीत, संगीत, भजन, कव्वाली, आरती, सत्संग और प्रवचन, कहां नहीं गुणगान।

फूलों का खिलना, पक्षियों का कलरव, बच्चों का खिलखिलाना, नदी का कलकल बहना और झरनों का गिरना क्या हमें यह सोचने और गुणगान करने पर मजबूर नहीं करता, ये कौन चित्रकार है। सिर पर लाखों तारों वाला नीला आसमान छतरी की तरह तना हुआ है, पृथ्वी घूम रही है, फिर भी हम कभी स्थिर और स्थितप्रज्ञ हैं, तो कभी चंचल और चलायमान। तो क्यों न करें, सिर्फ उस सर्वशक्तिमान का गुणगान।।

आप स्वतंत्र हैं गुणगान के लिए, जिसका चाहे करें।

अपने माता पिता, बंधु सखा अथवा गुरुजन का। इस वसुंधरा का करें, मातृभूमि का करें, अपने सदगुरु का करें, अथवा अपने प्रिय नेता का। आपका विवेक सदा आपका साथ दे। बस निंदा किसी की ना करें।

बड़ा आसान है किसी का गुणगान करना, लेकिन उससे भी मुश्किल है किसी की निंदा नहीं करना। जहां निंदा का अभाव है, वहां गुणगान ही गुणगान है। आप स्वयं गुणों की खान हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४० ⇒ गया और बोधगया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गया और बोधगया।)

?अभी अभी # ९४० ⇒ आलेख – गया और बोधगया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मैं कभी गया नहीं गया, बोधगया नहीं गया। सुना है दोनों जगह ऐसी हैं, जहां मुक्ति मिलती है।

जो चला गया, उसे भी और जिसे जीवन का बोध हो गया, उसे भी। जिसे बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया। इसी स्थान पर बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी, वह बोधिवृक्ष यहीं है।

आखिर यह कैसा बोध है जो बोधगया में ही होता है। आप चाहें तो इसे आत्मबोध कहें, आत्म साक्षात्कार कहें, सेल्फ रियलाइजेशन कहें, यह होता तो हमारे अंदर ही है। यह बोधिवृक्ष भी हमारे अंदर ही है। अंदर की खोज के लिए बाहर का आलंबन तो लेना ही पड़ता है। चारों धाम की यात्रा अंतर्यात्रा के बिना कभी पूरी नहीं होती।।

मैं इतना अभागा, कभी प्रयागराज भी नहीं गया। गया हो या बोधगया, बद्रीनाथ धाम हो या हर की पेढ़ी, मुक्ति का द्वार तो गंगा ही है और गंगा, जमना और सरस्वती, तीनों नदियों का संगम भी प्रयागराज ही में है। हो गया न महाकुंभ। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की प्रतीक ही तो हैं ये तीनों नदियां। जिसमें सरस्वती यानी वैराग्य तो लुप्त है। बिना वैराग्य के कहां मुक्ति। बुद्ध का वैराग्य ही बोधगया है।

हां मैं कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद रॉक मेमोरियल जरूर गया हूं, कुछ समय के लिए ध्यानमग्न हो विवेकानंद भी बना, फिर वापस चला आया। काश विक्रमादित्य के सिंहासन की तरह बोधिवृक्ष के नीचे बैठने से ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाए तो जीवन कितना आसान हो जाए। लेकिन यहां गुडविल नहीं, स्ट्रांग विल काम आती है। वैराग्य कोई जागीर नहीं, कि वसीयतनामे के जरिए चाहे जिसके नाम कर दी जाए।।

कबीर अक्सर ताने बाने की बात करते हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की बात करते हैं। इड़ा, पिंगला को आप चाहें तो सूर्य चंद्र नाड़ी समझें अथवा प्रतीक रूप में ज्ञान और भक्ति रूपा गंगा जमना, लेकिन सुषुम्ना तो अदृश्य वही सुप्त नाड़ी है, जो वैराग्य रूपी सरस्वती नदी की प्रतीक है। तीनों का संगम ही महाकुंभ है जो इसी शरीर में सहस्रार है। जिसे अमृत कहा जाता है, वह वह मुक्ति है जो हमें जन्म मरण के बंधन से मुक्त करती है। देव असुर दोनों मूर्ख थे, जो मुक्त होने की अपेक्षा, स्वर्ग प्राप्ति के लिए, और अमर होने के लिए, अमृतपान करना चाहते थे।

कबीर को भी इसका बोध था और बुद्ध को भी। जीते जी जिसे इसका बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया, अमर हो गया वर्ना लगाते रहो डुबकी ज्ञान और भक्ति की गंगा में, बिना वैराग्य भाव के, करते रहो अमृत पान। जब छूटेंगे प्रान, यहीं गया में ही होगा पिंड दान।।

काश मुक्ति इतनी आसान होती ! काशी मरणोन्मुक्ति। काशी में तो केवल प्राण त्यागने से ही मुक्ति मिल जाती है। मैं मति का मारा तो कभी काशी भी नहीं गया। सोचता हूं, जीते जी ही एक बार काशी हो आऊं, प्रयागराज के संगम में स्नान करके बोधगया भी हो आऊं। मन में यह मलाल तो नहीं रहेगा, जीते जी मैं कहीं भी नहीं गया ; न गया, न बोधगया..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जब नई पीढ़ी आगे बढ़ती है, तो दिल मुस्कुरा उठता है ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱जब नई पीढ़ी आगे बढ़ती हैतो दिल मुस्कुरा उठता है 🥰

जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब हमारी अपनी उपलब्धियाँ धीरे-धीरे स्मृतियों में धुंधली पड़ने लगती हैं। जिन सफलताओं पर कभी हमें गर्व हुआ करता था, वे अब यादों की अलमारी में सलीके से रखी रहती हैं।

परन्तु जीवन की यही तो सुंदरता है कि उस खाली जगह को हमारे अपने बच्चों और युवाओं की उपलब्धियाँ भर देती हैं। सच कहें तो उनकी सफलता हमें अपनी सफलता से भी अधिक आनंद और गर्व का अनुभव कराती है। ऐसा लगता है मानो हमारी अधूरी आशाएँ और सपने उन्हीं के माध्यम से आगे बढ़ रहे हों।

🌱हमारे परिवार का एक गौरवपूर्ण क्षण🌷

आज मैं आप सबके साथ हमारे परिवार का एक अत्यंत हर्ष और गर्व का क्षण साझा करना चाहता हूँ। मेरे भतीजे विशाल को 2026 के गणतंत्र दिवस समारोह में नई दिल्ली के भव्य कर्तव्य पथ पर सीनियर डिवीजन आर्मी का सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुना गया।

वह क्षण मेरे लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला था। जब मंच से घोषणा हुई:

“सीनियर अंडर ऑफिसर विशाल सिंह, सर्वश्रेष्ठ कैडेट, सीनियर डिवीजन आर्मी, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ निदेशालय”

तो मेरी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विशाल को पदक से अलंकृत किया गया और उन्हें ट्रॉफी, बैटन तथा चेक प्रदान किया गया।

हमारे पूरे परिवार के लिए यह क्षण अविस्मरणीय बन गया—गर्व और आनंद से भरा हुआ।

🌱भोपाल में सम्मान🌷

इस उपलब्धि के उपलक्ष्य में भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा एक सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया।

नई दिल्ली में आयोजित एक महीने के प्रशिक्षण शिविर के अपने अनुभव साझा करते हुए विशाल ने बहुत सुंदर बात कही। उसके शब्द थे—

“एनसीसी केवल वर्दी तक सीमित नहीं है। यह अनुशासन, धैर्य और देश के सम्मान के प्रति समर्पण की जीवनशैली है। दिल्ली का यह शिविर एक बहुत बड़ा सीखने का अवसर था, जहाँ देश के विभिन्न भागों से आए कैडेटों के साथ मिलकर वास्तविकता को समझने का मौका मिला।”

उसकी यह बात सुनकर लगा कि वह केवल पुरस्कार ही नहीं जीतकर आया, बल्कि जीवन के मूल्य भी सीखकर लौटा है।

🌱उज्ज्वल भविष्य की कामना🌷

परिवार के एक बुज़ुर्ग के रूप में मुझे यह देखकर अत्यंत संतोष और गर्व होता है कि हमारे घर का एक युवा अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रसेवा के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।

ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि विशाल का भविष्य उज्ज्वल हो और वह देश की सेवा करते हुए निरंतर आगे बढ़ता रहे।

हम जैसे लोगों के लिए ऐसे क्षण यह एहसास दिलाते हैं कि समय भले ही हमें धीरे-धीरे मंच से पीछे ले आए, पर उत्कृष्टता की मशाल अब सक्षम और समर्पित हाथों में सुरक्षित है।

विशाल को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ और आशीर्वाद – उसका जीवन देश की सेवा में गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी बने।

 

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

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The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३९ ⇒ चाय, चखना – चबैना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चाय, चखना – चबैना।)

?अभी अभी # ९३९ ⇒ आलेख – चाय, चखना – चबैना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चखना और चबैना में वही अंतर है, जो सिर्फ चाय और चाय पानी में है। हम जब सिर्फ चाय की बात करते हैं, तो साथ में पानी मुफ्त होता है। लेकिन बात जब चाय पानी की होती है तो उसका मतलब सिर्फ चाय और पानी नहीं होता।

प्यास लगने पर जब किसी से एक ग्लास ठंडा पानी मांगा जाता है, तो केवल जल ही पेश किया जाता है, गुलाब जल नहीं, लेकिन जब किसी मेहमान को एक कप चाय की प्याली पेश की जाती है, तो एक ग्लास पानी सहज रूप से साथ चला आता है।।

लेकिन चाय पानी की तो बात ही निराली है। बेटा, बहुत दिनों बाद अंकल आए हैं, कुछ चाय पानी का इंतजाम करो। अब मामला सिर्फ चाय और पानी का नहीं, कुछ और का भी है बिस्किट, नमकीन, गर्मागर्म पकौड़े अथवा फल फ्रूट, सभी चाय पानी में परिभाषित हो जाते हैं। यानी अच्छा भला चाय नाश्ता हो जाता है।

यह तो हुआ चाय पानी का शाब्दिक और सात्विक अर्थ ! कलयुग में चाय पानी का एक अर्थ और होता है, जहां सेवा मुफ्त उपलब्ध नहीं होती, वहां चाय पानी का अर्थ साधारण नहीं रह जाता।

वहां चाय पानी का अर्थ मुट्ठी गर्म करना भी हो सकता है। हप्पू सिंह की भाषा में आप इसे न्यौछावर भी कह सकते हैं। कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी। यहां सभी काम हो सकता है, बशर्ते, हो जाए चाय पानी।।

लेकिन बात तो चखना और चबैना की हो रही थी चाय और चाय पानी की नहीं ! हम भी अजीब हैं।

आप अंगूर चखकर खरीद सकते हो, लेकिन चना तो चखकर नहीं लिया जा सकता। चखने से भी कहीं पेट भरा है। भूख लगने पर तो चना चबैना भी छप्पन भोग का ही काम करता है।

चखने का काम अमीरों का है, शौकीनों का है। एक बेचारा गरीब मेहनतकश इंसान क्या खाएगा और क्या चखेगा। वह तो रूखी सूखी खाकर, ठंडा पानी पीकर संतुष्ट हो जाता है लेकिन अमीर तो खरीदने के पहले हर चीज चखेंगे, नाक भौं सिकोड़ेंगे,

बहुत मीठा है, no no, it’s too oily and spicy.केवल चखने से ही उनकी हेल्थ और हाइजीन पर असर पड़ता है, खाने की तो बात ही छोड़िए।।

हम चबैने का और अन्न, रोटी का तो ख़ैर, सम्मान करते हैं, लेकिन चखने के तौर तरीकों के बारे में जरूर दो चार बातें करना पसंद करेंगे, क्योंकि दो शब्द चखने के लिए काफी नहीं होते।

जो मजा चखने में है, उससे अधिक मजा किसी को मज़ा चखाने में है। दुनिया में ऐसी कई चीजें हैं, जिन्हें अगर सिर्फ मुंह लगाओ, तो गले ही पड़ जाती हैं, फिर चाहे वह गुटखा ही क्यों न हो।।

खुशी के मौके पर किसी का मुंह मीठा कराना हमारी संस्कृति है, परंपरा है ! क्या किसी का स्वागत मुंह कड़वा करके किया जा सकता है। लेकिन गालिब ने जिसे शराब कहा है, वह तो कड़वी है, और देखो तो किस किसके मुंह लगी है।

यह एक ऐसी कड़वी दवा है जिसके पीने के बाद, मुंह का स्वाद ठीक करने के लिए कुछ चखना पड़ता है। नमकीन मूंगफली से काजू बादाम तक यह चखने की रेंज होती है।

पहले पीने का मज़ा और बाद में चखने का मज़ा। लिपटन और ब्रुक बॉन्ड चाय को टाटा और चाय पानी की नानी, पहले पीना और फिर चखना, कल की किंगफिशर, तेरी यही कहानी।।

कोशिश करें, चाय पानी और चबैने से ही काम चलाएं, क्यों कुछ कड़वी चखने के चक्कर में, लोहे के चने चबाएं। अगर कुछ चखना ही हो, पूरे परिवार और बाल बच्चों को सराफा या छप्पन ले जाएं। क्यों न कुछ मीठा चखें, कुछ नमकीन खाएं। हमें भी साथ ले जाएं, जब कभी इंदौर आएं ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६९ – देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६९ ☆ देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे समाज में उपरोक्त किंवदंती को बहुत बुरा माना जाता हैं। आज का समय इसके बिल्कुल विपरीत हो गया हैं। अपना उल्लू सीधा करने में कोई भी पीछे नहीं रहता हैं।

पूरा विश्व युद्ध की आग से तप रहा है। हमारा मीडिया इस मौके को खूब भांजने में रात दिन एक कर रहा हैं। जब कभी युद्ध आदि का समय आता है, मीडिया वाले भी भूतपूर्व रक्षा अधिकारियों को अपने पैनल में लेकर दिन भर चर्चा कर अपनी टी आर पी दिन दोगुनी और रात चौगुनी वृद्धि कर लेते हैं।

 स्टूडियो को “वार रूम” का टाइटल मिल जाता हैं। मोहोल को युद्धमय बनाने के लिए समय समय पर सायरन बजा दिया जाता हैं। शरीफ सा दर्शक इनकी फरेबी बातों में बंधा रहकर मूर्ख बनता रहता हैं।

 हमारे एक परिचित मुंबई स्थित बहुत बड़ी विज्ञापन कंपनी में कार्यरत हैं। उन्होंने बातचीत में बताया आज कल फिल्मी सितारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों का क्रेज़ कम हो रहा हैं। विज्ञापनों में बहुत शीघ्र इन रक्षा विशेषज्ञों को देखा जा सकेगा। भूतपूर्व योद्धा यदि मान जाएं तो बोर्नविटा, डाबर और मसाले बनाने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत दे सकती हैं। टीवी पर अपनी सेवाएं देने वाले चेहरे को जनता विज्ञापनों में देखकर ही उत्पाद खरीदने का मानस बनाती हैं।

 हमें तो लगता है, आने वाले समय में टीवी एंकर भी विज्ञापनों में भी छा जाएंगे, बशर्ते उनके चैनल इसकी अनुमति दे देवें

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ – आलेख – संस्कारधानी मेरा अपना शहर ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख “संस्कारधानी मेरा अपना शहर ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ ☆

🌻आलेख🌻संस्कारधानी मेरा अपना शहर 🌧️

आइये जबलपुर के बारे में कुछ अंश  आपको बता रही हूंँ। ताल तलैया से घिरा हुआ माँ नर्मदा तट पवित्र स्थल जहाँ की संगमरमर की चट्टानें विश्व प्रसिद्ध है।

यहाँ के घाट, गौरी घाट, उमा घाट, तिलवारा घाट, भेड़ाघाट, ऐसे घाटों से सजा जिसमें 52 ताल और 84 छोटी तलैया शामिल है। इस कारण इसे तालों का शहर भी कहा जाता है।

इसका मुख्य नाम जाबालिपुरम था। जो हमारे जाबालि ऋषि के नाम पर पड़ा। इसे त्रिपुरा और गढा नाम से भी जाना जाता है।

मूलतः कलचुरी काल में त्रिपुरा उनकी राजधानी थी और गोड काल में गढ़ा प्रमुख  स्थल था। ऋषि जाबालि की तप स्थली होने के कारण इसे जाबालिपुरम कहा गया जो बाद में रूप बदलते- बदलते जबलपुर हो गया।

जबलपुर को हमारे संत श्रद्धेय विनोबा भावे जी ने संस्कारधानी घोषित किया। उनका दिया हुआ यह उपहार जीवनपर्यंत जबलपुर वासी अपने नाम और पता के साथ संस्कारधानी लिखते हैं।

पौराणिक गाथा है रानी दुर्गावती का साम्राज्य जिन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। भारत के प्राचीन इतिहास को देखते हुए रानी दुर्गावती का साम्राज्य इसे कहा जाता है और जबलपुर में संस्कार, प्रीत, गीत, जीव, जल और सुंदर से सुंदर मंदिरों का गढ़ भी कहा जाता है। यहाँ पर माँ भगवती की तीन मुँह वाली मूर्ति जो तेवर में भी विराजी है। त्रिपुर सुंदरी के नाम से प्रसिद्ध है।

यहां पर माँ भगवती महाकाली महालक्ष्मी मां सरस्वती के एक ही पत्थर पर तीनों देवियों का मुँह जुड़ा हुआ है। हजारों की संख्या में रोज यहाँ दर्शन करते हैं। सुबह से शाम तक माँ भगवती का प्रसाद भंडारा के रूप में प्राप्त होता है।

चारों तरफ पहाड़ से घिरे होने के कारण इसे जल संग्रहण का मुख्य स्थल माना गया। माँ नर्मदा की असीम कृपा यहाँ पर बहुत सारे ऐसी अनुसंधान और योगशाला भी बनाई गई और जगह-जगह जल संरक्षण को महत्व दिया गया। एक प्रकार से पर्यावरण को बढ़ाया गया।

यहाँ पर भारत में युद्ध में होने वाले ट्रक,  गोला बारुद का निर्माण होता है। और यह निर्माण खमरिया फैक्ट्री जबलपुर में होता है। आज भी जब  सैनिक युद्ध के लिए निकलते हैं तो जबलपुर का ट्रक ट्रैक्टर और बड़ी-बड़ी तोप गाड़ी जबलपुर के ट्रेडमार्क से दिखाई देती है।

मध्य प्रदेश का हृदय स्थल बीच में होने के कारण जबलपुर सारी जगह से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर हमारे महाभारत काल के साम्राज्य को भी शताब्दी कलचुरी वंश से जोड़ा जाता है।  गौड़ शासको के समय संग्राम शाह का यहाँ पर अधीनस्थ ग्रह मंडल का निर्माण भी बताया गया है जो हमारे समृद्ध और प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं।

रेल मार्ग बस सेवा और वायु सेवा निरंतर चारों दिशा और चारों ओर जाने का मुख्य जंक्शन स्टेशन जबलपुर है। यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण किला मदन महल का किला है जो एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। 11वीं शताब्दी का गोंडवाना साम्राज्य के विरासत को आज भी दर्शाता है। इसका निर्माण गोड़ राजा मदन सिंह ने करवाया था।

यहाँ पर भेड़ाघाट में कई फिल्मों की शूटिंग पहले भी हुई अब भी होती है और लगातार फिल्मी दुनिया को भेड़ाघाट की संगमरमर की दुनिया पसंद आती है। यदा कदा छोटी बड़ी फिल्में यहाँ हमेशा बनती दिखाई देती है।

दुर्गावती का किला और दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर की शान को और भी बढ़ता है। यहाँ पर नित्य प्रति मां नर्मदा की आरती इतनी सुंदर होती है कि हजारों की संख्या में यहाँ के श्रद्धालु नियमित शामिल होते हैं और पुण्य के भागीदार होते हैं।

जबलपुर का क्षेत्रफल 5211 वर्ग किलोमीटर है और यह पूर्ण रूप से नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है। सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक विरासत, जबलपुर को माँ नर्मदा के कारण अत्यंत धरोहर के रूप में मिला है। आज भी यहां पर 64 योगिनी मंदिर अपनी कहानी 11वीं सदी के विरासत को दर्शाता है।

जबलपुर का खानपान रहन-सहन अत्यंत सादगी और रुचिकर है। दूसरे शहरों में आप दिनचर्या में ₹500 में आप दिन भर नहीं बिता सकते यहाँ पर खाने की इतनी अच्छी व्यवस्था है और साधु संतों के डेरो पर तो भोजन प्रसादी मुफ्त में। बस आप माँ नर्मदा की आश्रय में हो जाइए।

विदेशी पर्यटक का विशेष आकर्षण भेड़ाघाट की संगमरमर वादियाँ है। जहाँ सदैव नौका विहार होता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर चाँदनी रात का नौका विहार प्रसिद्धि और समृद्धि को दर्शाता है।

जबलपुर तीनो जल सेना थल सेना और वायु सेवा की टुकड़ी का केंद्र है। जहाँ पर आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर शानदार परेड और उनकी कलाकारी देखने को मिलती है।

वायुयान सेवा में सुविधाजनक यात्रा कर सकते है। जबलपुर की सबसे ऊंची इमारत कटंगा टीवी टावर के नाम से प्रसिद्ध है। जो 1992 में दूरदर्शन टेलीविजन नेटवर्क के लिए तैयार किया गया था और इसे ही  सैनिक को सलामी देने के लिए विशेष अवसरों पर इसे रोशन किया जाता है।

जबलपुर की रानी दुर्गावती यहाँ की गौड़ साम्राज्ञी थी। उनकी समाधि पर  भी श्रद्धा से गौड़ समाज ही नहीं वरन संपूर्ण जबलपुर वासी नतमस्तक होते हैं।

सदियों से इस शहर पर कई राजवंशों का शासन रहा है। जिसमें गोड़ मराठा और ब्रिटिश भी शामिल है। वास्तु कला खानपान संस्कृत साहित्य और सादगी से परिपूर्ण जबलपुर एक अनूठी छाप छोड़ता है।

जो एक बार आता है यहाँ का होकर ही रह जाता है। राजनीति से संबंधित इसे बीजेपी का गढ़ कहा जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान जबलपुर की धरती को जब भी आते हैं चंदन जैसा लगाना कहते हैं। जबलपुर का मौसम बहुत ही सुहाना होता है। जब बारिश होती है तो ताल तलैया नदी नाले सब भरे हुए और उस पर हमारा जबलपुर एक सीप की तरह दिखाई देता है।

भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है कहा जाता है यहाँ के तट से भी आप कंकर पत्थर उठाकर ले जाएं उसे विधिवत पूजा नहीं करना पड़ता उसे स्थापित कर – – – हर कंकर शंकर होता है। माँ नर्मदा जी के तट को भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है।

नगरी चुनाव उपनगरी चुनाव ग्राम पंचायत सांसद विधायक सभी जबलपुर की शान को और भी बढ़ा देते हैं। लिखने को तो बहुत सारी बातें हैं जबलपुर पर जितना लिखूं काम ही होगा। परसाई महादेवी वर्मा हिंदी के प्रसिद्धता को बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य योगदान और अमिट छाप छोड़ गए हैं। जिसके कारण जबलपुर को साहित्यिक धरोहर भी कहा जाता है। घर-घर में तीज त्यौहार उतने ही शौक से मनाया जाता है जितना मंदिर पर भगवान की आरती।

यहां का दशहरा यानी क्वार की नवरात्रि पर माँ भगवती दुर्गा की आराधना जो होती है अतुलनीय अद्भुत और स्मरणीय होती है।

हर बार बृहद और नया। कभी समय मिले या घूमने का मन बन जाए तो जबलपुर जरूर आईयेगा। हमारे जबलपुर की शान भंवर ताल गार्डन शंकर चौरा जहाँ पर भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। सप्त ऋषियों का मूर्ति गार्डन पर विराजित हुआ हुआ है।

और मेडिकल कॉलेज से लेकर, अस्पताल रेलवे अस्पताल मिलिट्री अस्पताल और सुख सुविधा पूर्ण सभी प्रकार के वातावरण से संपूर्ण हमारा जबलपुर बहुत ही शानदार जानदार ईमानदार और सबसे बड़ी बात मेहमान बाजी करने पर कभी भी कोई भी प्राणी चुकता नहीं है।

दिल खोलकर सभी को अपना मानते हैं और उसे हृदय पर बसाते हैं।

यह माँ भगवती की आराधना नर्मदा की सेवा दीपदान की सुंदरता और यहां के संस्कार की अमिट कहानी है जो शब्दों से नहीं केवल भाव से समर्पित की जा सकती है।

यहाँ पर खोवे की जलेबी जीवन पर्यन्त स्वाद याद रहता है।

पहाड़ी पर मां शारदा मैहर

त्रिपुर सुंदरी बसी तेवर

नारी को भाये है जेवर

भाभी का लाडला देवर

गुड़ की चाशनी सेवर

सेवा भाव संस्कारी मेयर

मिलता है घी प्योवर

जबलपुर महिमा लिखते मिलूँ

आप सभी को प्रणाम करते

सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जीवन भर, माँ नर्मदे हर

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३८ ⇒ पूत के पांव ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पूत के पांव।)

?अभी अभी # ९३८ ⇒ आलेख – पूत के पांव  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पूत, पुत्र को कहते हैं जो पंजाब में जाकर पुत्तर हो, जाता है। राज किसी का भी हो, अगर वह पूत राजस्थान के किसी रणबांकुरे के यहां पैदा हुआ है, तो राजपूत ही कहलाएगा। कल तक जो पूत सपूत तो क्यूं धन संचय, पूत कपूत तो क्यूं धन संचय, कहते नहीं थकते थे, वे ही आज बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के मार्ग को प्रशस्त करते नज़र आ रहे हैं।

जरूर वे लोग भविष्य दृष्टा होंगे, जो पूत के पांव पालने में पहचान जाते होंगे। काहे का पंचांग और काहे का काल निर्णय। कौन अखबारों में आज जन्म लिए बालक का भविष्य पढ़े, बस पूत के पांव पालने में देखे, और जन्म कुंडली बना दी। कितने पप्पू और कितने चाय वाले होंगे हमारे देश में, काश किसी ने उनके पांव पालने में तब देख लिए होते तो आज देश और वंश दोनों धन्य हो जाते।।

पुत्र को तो हम पूत कह देते हैं, लेकिन पुत्री के लिए हमारा शब्दकोश खामोश है। बनारस में जिसे छोरा, छोरी कहते हैं, वही बंगाल में जाकर छोकरा, छोकरी हो जाता है। कहीं मद्रासी और बंगाली छोकरा छोकरी मिलकर फिल्मी गाने गाते हैं तो कहीं लड़के को पोट्टा और लड़की को पोट्टी कहकर बुलाया जाता है। बुजुर्ग लोग आज भी अपनी तीसरी पीढ़ी, अर्थात पोता और पोती को आशीर्वाद देते, देखे जा सकते हैं। पूतना कृष्ण लीला का एक महत्वपूर्ण चरित्र है, जिसका उद्धार नंद के बाल गोपाल ने किया था। वैसे भी पूतना जैसी संतान से तो नि:संतान रहना ही भला।

हमारी लोकोक्तियां, कहावतें और मुहावरे कभी कभी गागर में सागर का काम कर जाती हैं। इनमें कहीं वक्रोक्ति है तो कहीं व्यंग्य, कहीं कोई गंभीर संदेश है तो कहीं कोई छुपा हुआ राज। नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है, क्या पूत के पांव पालने में, का लेटेस्ट वर्शन नहीं लगता ?

बस आज की व्याख्या अगर सकारात्मक है तो कल की कहावत में एक नहीं, कई अर्थ निहित हैं।।

कौन अपनी औलाद को अच्छी तरह नहीं पालता !

जन्म और कर्म दोनों के अपने सिद्धांत हैं। भाग्य और पुरुषार्थ का जरूर पालने से भी कुछ संबंध रहा होगा। जब कोई नि:संतान दंपत्ति किसी मासूम बच्चे/बच्ची को गोद लेता है तो क्या देखकर लेता है, पांव या और कुछ ? अब उस बालक को जहां पलना है, वही उसका पालना हुआ।

क्या पालक का पूत के पालने अर्थात् पालन पोषण करने से भी कोई संबंध है। पूत के पांव कब तक पालने में रहेंगे, वह पालने से जमीन पर भी आयेगा, घुटनों घुटनों चलेगा, ठुमक चलत रामचंद्र की तरह अपने पांवों पर खड़ा भी होगा। अपने कुल का नाम रोशन करेगा। कहीं नंद यशोदा तो कहीं माता कौशल्या और महाराज दशरथ। पूत के पांव सिर्फ पालने में ही नहीं नजर नहीं आते, अच्छी तरह पालने पोसने और संस्कारों से भी नजर आ जाते हैं। पालने के साथ जरा पालक पर भी गौर किया जाए।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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