हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 740 ⇒ पैदा होने का सुख ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पैदा होने का सुख।)

?अभी अभी # 740 ⇒ आलेख – पैदा होने का सुख ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदा होने वाले से, पैदा करने वाला बड़ा होता है। पैदा होना, जीव की नियति है, इसमें सुख और दुःख का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। पैदा होना, किसी का जन्मसिद्ध अधिकार भी नहीं। जो हो गया, सो हो गया। जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ। कहीं सिंगल चाइल्ड, तो कहीं वर्ल्ड इलेवन।

वैसे यह शीर्षक बड़ा भ्रामक है। असली समस्या पैदा होने में नहीं, पैदा करने में है। सृजन सुख जिसे हम मातृत्व सुख भी कह सकते हैं, इसमें पैदा होने वाला तो एक तरह से अकर्ता ही हुआ। सुख दुःख और प्रारब्ध की गठरी अपने सर पर लिए उसे तो बस, इस संसार में प्रवेश करना है। वह एक तरफ पड़ा रोता रहेगा, लोग उसके जन्म की खुशियां मनाते रहेंगे।।

सृजन, सृष्टि का विधान है, नियम है, चक्र है, नियति है। आज अगर हम पैदा नहीं होते, तो कहां होते, जैसे बेतुके और बेबुनियाद प्रश्नों का कोई जवाब नहीं होता। जो हो गया, सो हो गया, जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ। कहीं कोई निःसंतान है तो कहीं संतानों की कतार खड़ी है। इसमें होने वाले का कोई दोष नहीं, जिसके कोई संतान नहीं, उसके लिए भी कोई सहानुभूति नहीं, जिसने पैदा किया, उस पर जरूर आज नहीं तो कल गाज गिरने वाली है, क्योंकि आदमी पर जनसंख्या भारी है।

जो अच्छे संपन्न घरानों में पैदा हुए, चंदन के पालने में झूले, वे अपने आपको सुखी और भाग्यशाली मान सकते हैं, लेकिन रोहिंग्या शरणार्थी, जो न घर का है, न घाट का, कहीं घुसपैठिया है, तो कहीं आतंकवादी, उसके पैदा होने अथवा जिंदा रहने का क्या औचित्य ?

कंट्रोल, कंट्रोल, पेस्ट कंट्रोल !

मेरे घर में आजकल कॉकरोच और छिपकली का सामूहिक सत्संग चल रहा है। पूरा घर कीट पतंग प्रसूति गृह बना हुआ है। जनसंख्या अधिनियम के भरोसे मैं नहीं बैठ सकता। पेस्ट कंट्रोल मेरा अधिकार है। कीड़े मकोड़ों को जीने का अधिकार किसने दिया। अगर कण कण में भगवान है, तो इन्हें भगवान के पास पहुंचाने में ही समझदारी है।

करे कौन भरे कौन ! किसी लेखक की अच्छी रचना को नाम मिल जाता है, प्रसिद्धि मिल जाती है, लेखक और रचना अमर हो जाते हैं तो कुछ रचनाएं ऐसी भी होती हैं, जो पढ़ने के बाद संपादक द्वारा रद्दी की टोकरी में फेंक दी जाती है। उनकी भ्रूण हत्या हो जाती है, उन्हें इस संसार में आने ही नहीं दिया जाता। वे क्या जानें, किसी लेखक की रचना होने का सुख क्या होता है।।

जो पैदा हो गया, सो हो गया, जो रह गया सो रह गया ! किसी जैविक हथियार अथवा पेस्ट कंट्रोल से जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। अभी तो हम अपने चुने हुए सांसद और विधायक को ही वापस नहीं बुला सकते, जिन्हें भगवान ने इस संसार में भेज दिया, उनका तो भगवान ही मालिक है लेकिन आइंदा अब पैदा होने का सुख इतना आसान भी नहीं होगा ! First come first serve! दो के बाद वैक्सीन ख़त्म।

कुछ कथित सेलिब्रिटीज लिव इन रिलेशन में रहकर दिखावे के लिए ही सही, अनाथ बच्चों को गोद ले रहे हैं। जो पैदा हो गए हैं, उन्हें बेहतर जिंदगी नसीब हो सके इसलिए जनसंख्या नियंत्रण का पालन करते हुए संपन्न लोग भी अगर कुछ have not बच्चों को पालने का संकल्प ले लें, तो शायद सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी। पैदा तो हो गए, पैदा होने का सुख भी अगर उन्हें नसीब हो, तो क्या बुरा है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 739 ⇒ । गुड़ गोबर। ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “। गुड़ गोबर।।)

?अभी अभी # 739 ⇒ आलेख – । गुड़ गोबर। ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गुड़ – गोबर में अगर गुड़ का गोबर होना है तो प्यार में परिश्रम के बावजूद शिकस्त ही हाथ लगना है। एक समय था, जब करे कराए पर पानी फिर जाता था, आजकल लोग सीधे फ्लश चला देते हैं। रायता फैलाने में तो हम आजकल बहुत आगे निकल गए हैं।

अगर अंगूर को सुखाकर किशमिश और सड़ाकर शराब बनाई जा सकती है, तो गुड़ बेचारे ने ऐसा क्या बिगाड़ा है कि उसकी नियति गोबर होना है।

गूंगे का गुड़ होगा बेचारा, क्या बोले। वैसे आयुर्वेद में पुराने गुड़ का बहुत महत्व बताया गया है, नीबू का अचार और असली घी जितना पुराना होता है, उतना फायदेमंद होता है, लेकिन स्वास्थ्य के मान से आजकल सभी खाद्य पदार्थों की एक्सपायरी डेट होने लग गई है। ऐसे में गुड़ को गोबर होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।।

अनुवाद की अपनी समस्या है। शब्दानुवाद के साथ साथ अगर भाषानुवाद ना हो, तो अर्थ का अनर्थ होने से कोई नहीं रोक सकता। भाषा भाव को पकड़ती है, शब्द अर्थ को। बिमल मित्र एक बंगाली लेखक हुए हैं, जिनके कई उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद हुआ है। इतनी रोचक भाषा, किस्सागोही और घटनाओं का तारतम्य पाठकों को इतना बाँध लेता है, मानो लेखक स्वयं सामने मौजूद हो। बेगम मेरी बिस्वास, इकाई दहाई सैकड़ा, खरीदी कौड़ियों के मोल, और हां, साहब बीवी और गुलाम। इन सभी उपन्यासों का अनुवाद दिनेश आचार्य ने किया है, लेकिन वे बीच में कहीं नहीं हैं। बिमल मित्र ही आपके रूबरू हैं।

हमारे व्याकरण के मास्टर जी को अनुवाद का बड़ा शौक था। वे स्वयं wren के ग्रामर और Roget के थिसारस थे। उनके हाथ में कभी पुस्तक नहीं होती थी। साक्षात सरस्वती उनके मुख में विराजमान थी। बस बोल दिया, कल गुड़ गोबर का अंग्रेजी में अर्थ और एक वाक्य बनाकर लाना। बेचारे बच्चे डिक्शनरी में से jaggery और dung शब्द निकालते और वाक्य बनाते।

दूसरे दिन उनकी क्लास ली जाती। लो कर दिया न गुड़ गोबर !

Love’s Labour Lost अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर का एक सुखांत नाटक है। अंग्रेजी में सुख को कॉमेडी और दुख को ट्रेजेडी कहते हैं। उनकी एक और कॉमेडी का नाम है,

All is well that ends well.

वे यहीं नहीं रुकते। अपने सुखांत नाटकों का अंत भी As you like it नामक play से करते हैं। हमारा नाटक उनके लिए खेल तमाशा ही तो है।।

शेक्सपियर की पूरी कॉमेडी का सीधा प्रसारण तो नहीं हो सकता, लेकिन पर्दे के पीछे उसका आनंद अवश्य लिया जा सकता है। इसके लिए शेक्सपियर को पढ़ना जरूरी नहीं, बस अपने टॉयलेट के कमोड को ही उनकी कॉमेडी मान लेना है। क्योंकि वहां तो वैसे भी सब गुड़ गोबर ही होना है।

रात को बड़े प्यार से छप्पन में विजय चाट का पेटिस और खमण, और बाद में मधुरम स्वीट्स की रसमलाई ! और तो और मोनिका गैलेक्सी की आइसक्रीम भी कोई काम नहीं आई। सुबह सब खाया पीया निकल गया। हुआ न Love’s Labour Lost. चलो इतने दिनों की कब्जियत से छुटकारा तो मिला। शेक्सपीयर ने गलत नहीं कहा, All is well that ends well. अच्छा ही हुआ, करे कराए पर फ्लश जो फिर गया। As you like it. अब आपको जैसा भी लगे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #285 ☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख दर्द की इंतहा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 285 ☆

☆ दर्द की इंतहा… ☆

‘दर्द को भी आधार कार्ड से जोड़ दो/ जिन्हें मिल गया है दोबारा ना मिले’ बहुत मार्मिक उद्गार,क्योंकि दर्द हमसफ़र है; सच्चा जीवन-साथी है; जिसका आदि-अंत नहीं। ‘दु:ख तो अपना साथी है’ गीत की ये पंक्तियां मानव में आस्था व विश्वास जगाती हैं; मन को ऊर्जस्वित व संचेतन करती है। वैसे तो रात्रि के पश्चात् भोर,अमावस्या के पश्चात् पूर्णिमा व दु:ख के पश्चात् सुख का आना निश्चित है; अवश्यंभावी है। सुख-दु:ख दोनों मेहमान हैं और एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा दस्तक देता है।

समय निरंतर अबाध गति से चलता रहता है; कभी रुकता नहीं। सो! जो आया है अवश्य जाएगा। इसलिए ऐ मानव! तू किसी के आने की ख़ुशी व जाने का मलाल मत कर। ‘कर्म-गति अति न्यारी/ यह टारे नहीं टरी।’ इसके मर्म को आज तक कोई नहीं जान पाया। परंतु यह तो निश्चित् है कि ‘जैसा कर्म करता,वैसा ही फल पाता इंसान’ के माध्यम से मानव को सदैव सत्कर्म करने की सीख दी गयी है।

अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अनिश्चित् है। परंतु भविष्य सदैव वर्तमान के रूप में दस्तक देता है। वर्तमान ही शाश्वत् सत्य है,शिव है और सुंदर है। मानव को सदैव वर्तमान के महत्व को स्वीकारते हुए हर पल को ख़ुशी से जीना चाहिए। चारवॉक दर्शन में भी ‘खाओ-पीओ,मौज उड़ाओ’ का संदेश निहित है। आज की युवा पीढ़ी भी इसका अनुसरण कर रही है। शायद! इसलिए ‘वे यूज़ एंड थ्रो’ में विश्वास रखते हैं और ‘लिव इन’ व ‘मी टू’ की अवधारणा के पक्षधर हैं। वे पुरातन जीवन मूल्यों को नकार चुके हैं,क्योंकि उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी है। वे अहंनिष्ठ क्षणवादी सदैव हर पल को जीते हैं। संबंध-सरोकारों का उनके जीवन में कोई मूल्य नहीं तथा रिश्तों की अहमियत को भी वे नकारने लगे हैं,जिसका प्रतिफलन पति-पत्नी में बढ़ते अजनबीपन के एहसास के परिणाम-स्वरूप तलाक़ों की बेतहाशा बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं,जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा उनके आत्मज भुगत रहे हैं। वे मोबाइल व मीडिया में आकण्ठ डूबे रहते हैं और नशे की लत के शिकार हो रहे हैं जिसका विकराल रूप मूल्यों के विघटन व सामाजिक विसंगतियों के रूप में हमारे समक्ष है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं,रिश्तों की अहमियत रही नहीं और अपहरण,फ़िरौती,दुष्कर्म व हत्या के हादसों में निरंतर इज़ाफा हो रहा है। चहुंओर संशय व अविश्वास का वातावरण व्याप्त है,जिसके कारण इंसान पल भर के लिए भी सुक़ून की साँस नहीं ले पाता।

दूसरी ओर अमीर-गरीब की खाई सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जा रही है और हमारा देश इंडिया व भारत दो रूपों में विभाजित परिलक्षित हो रहा है। एक ओर मज़दूर,किसान व मध्यमवर्गीय लोग,जो दिन-भर परिश्रम करने के पश्चात् दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते और आकाश की खुली छत के नीचे अपना जीवन बसर करने को विवश हैं। दूसरी ओर बाल श्रमिक शोषण व बाल यौन उत्पीड़न का घिनौना रूप हमारे समक्ष है। एक घंटे में पांच बच्चे दुष्कर्म का शिकार होते हैं; बहुत भयावह व चिंतनीय स्थिति है। दूसरी ओर धनी लोग और अधिक धनी होते जा रहे हैं,जिनके पास असंख्य सुख-सुविधाएं हैं और वे निष्ठुर,संवेदनहीन,आत्मकेंद्रित व निपट स्वार्थी हैं। शायद! इसी कारण गरीब लोग दर्द को आधार-कार्ड से जोड़ने की ग़ुहार लगाते हैं,ताकि छल-कपट से लोग पुन: वे सुविधाएं प्राप्त न कर सके। उनके ज़हन में यह भाव दस्तक देता है कि यदि ऐसा हो जायेगा तो उन्हें जीवन में पुन: अभाव व असहनीय दर्द सहन नहीं करना पड़ेगा,क्योंकि वे अपने हिस्से का दर्द झेल चुके हैं। परंतु इस संसार में यह नियम लागू नहीं होता। भाग्य का लिखा निश्चित् होता है,अटूट होता है,कभी बदलता नहीं। सो! उन्हें इस तथ्य को सहर्ष क़ुबूल कर लेना चाहिए कि कृत-कर्मों का फल जन्म-जन्मांतर तक मानव के साथ-साथ चलता है और उसे अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए सुंदर भविष्य की प्राप्ति हेतू सदैव अच्छे कर्म करें ताकि भविष्य उज्ज्वल व मंगलमय हो सके।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अब तक 2192!. ✍☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अब तक 2192 !.✍️ ? ?

(दैनिक लेखन का सातवाँ वर्ष)

(ई-अभिव्यक्ति की ओर से इस साहित्यिक यात्रा के सहयात्री श्री संजय भारद्वाज जी को २१९२ साहित्यिक रचनाओं के सहयोग के लिए हृदय से आभार. यह इस यात्रा के मील का एक पत्थर है. इस कीर्तिमान के लिए — अभिनन्दन 💐🙏) 

आज 25 जुलाई है। इस दिनांक के साथ मेरे लेखकीय जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है।

प्रसंग यह है कि लेखन करते हुए लगभग चार दशक से अधिक बीत चुके। उसमें गत आठ-नौ वर्ष से लिखना नियमित-सा रहा। कविता, लघुकथा, आलेख, संस्मरण, व्यंग्य और ‘उवाच’ के रूप में अभिव्यक्ति जन्म लेती रही। 15 जून 2019 से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने ‘संजय उवाच’ को साप्ताहिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। 

फिर संपादक आदरणीय बावनकर जी का एक पत्र मिला। पत्र में उन्होंने लिखा था, “आपकी रचनाएँ इतनी हृदयस्पर्शी हैं कि मैं प्रतिदिन उदधृत करना चाहूँगा। जीवन के महाभारत में ‘संजय उवाच’ साप्ताहिक कैसे हो सकता है?” 

संजयकोश’ में यूँ भी लिखना और जीना पर्यायवाची हैं। फलत: इस पत्र की निष्पत्तिस्वरूप 25 जुलाई 2019 से सोमवार से शनिवार ‘संजय दृष्टि’ के अंतर्गत ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने इस अकिंचन के ललित साहित्य को दैनिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। रविवार को ‘संजय उवाच’ प्रकाशित होता रहा।

इस दैनिक यात्रा ने आज सातवें वर्ष में चरण रखा है।

आज पीछे मुड़कर देखने पर पाता हूँ कि इन  वर्षों ने बहुत कुछ दिया। ‘नियमित-सा’ को नियमित होना पड़ा। अलबत्ता नियमित दैनिक लेखन की अपनी चुनौतियाँ और संभावनाएँ भी होती हैं। नियमित होना अविराम होता है। हर दिन शिल्प और विधा की नई संभावना बनती है तो पाठक को प्रतिदिन कुछ नया देने की चुनौती भी मुँह बाए खड़ी रहती है। अनेक बार पारिवारिक, दैहिक, भावनात्मक कठिनाइयाँ भी होती हैं जो शब्दों के उद्गम पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि यह कुंडली, भीतर की कुंडलिनी को कभी प्रभावित नहीं कर पाई। माँ शारदा की अनुकम्पा ऐसी रही कि लेखनी हाथ में आते ही पथ दिखने लगा और शब्द पथिक बन गए।

अनेक बार यात्रा के बीच पोस्ट लिखी और भेजी। कभी किसी आयोजन में मंच पर बैठे-बैठे रचना भीतर किल्लोल करने लगी, तभी लिखी और भेजी। ड्राइविंग में कुछ रचनाओं ने जन्म पाया तो कुछ ट्रैफिक के चलते प्रसूत ही नहीं हो पाईं।

तब भी जो कुछ जन्मा, पाठकों ने उसे अनन्य नेह और अगाध ममत्व प्रदान किया। कुछ टिप्पणियाँ तो ऐसी मिलीं कि लेखक नतमस्तक हो गया।

नतमस्तक भाव से ही कहना चाहूँगा कि लेखन का प्रभाव रचनाकार मित्रों पर भी देखने को मिला। अपनी रचना के अंत में दिनांक और समय लिखने का आरम्भ से स्वभाव रहा। आज प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक रचनाकारों ने अपनी रचना का समय और दिनांक लिखना आरम्भ कर दिया है। अनेक मित्रों ने इसका श्रेय दिया तो अनेक कंजूसी भी बरत गए। इतना अवश्य है कि  रेकॉर्डकीपिंग की यह आदत भविष्य में मित्रों को अपनी रचनाधर्मिता के पड़ाव खंगालने में सहायक सिद्ध होगी।

विनम्रता से एक और आयाम की चर्चा करना चाहूँगा। लेखन की इस नियमितता से प्रेरणा लेकर अनेक मित्र नियमित रूप से लिखने लगे। किसी लेखक के लिए यह अनन्य और अद्भुत पारितोषिक है।

आदरणीय भाई हेमंत बावनकर जी इस नियमितता के प्रथम कारण और कारक बने। ‘दक्षिण भारत राष्ट्रमत’ के सम्पादक श्रीकांत पाराशर जी विगत पाँच चार वर्ष से साप्ताहिक उवाच को बैंगलुरू और चेन्नई दोनों संस्करणों में स्थान दे रहे हैं। भिवानी से दैनिक ‘चेतना’ के सम्पादक श्रीभगवान वसिष्ठ जी भी साढ़े चार वर्ष से ‘उवाच’ और ‘दृष्टि’ दोनों स्तम्भ नियमित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं। आप तीनों महानुभावों को हृदय की गहराइयों से अनेकानेक धन्यवाद। नियमित रूप से मेरे लेखन को पढ़नेवाले और अपनी प्रतिक्रिया देनेवाले पाठकों के प्रति आभारी हूँ। ‘आप हैं सो मैं हूँ।’ मेरा अस्तित्व आपका ऋणी है।

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© संजय भारद्वाज  

 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 738 ⇒ ||•• गं ध ••|| ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – ||•• गं ध ••||।)

?अभी अभी # 738 ⇒ आलेख – ||•• गं ध ••|| ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

~~ smell ~~

आप सुगंध कहें या खुशबू, किसे महकता वातावरण पसंद नहीं। बात चाहे वादियों और फिज़ाओं की हो, अथवा गंधमादन पर्वत की, सुंदरता और मादकता को न तो आप परिभाषित कर सकते हैं, और न ही उसे किसी तस्वीर में उतार सकते हैं। किसी बदन की खुशबू और किसी गुलाब की महक किसी नुमाइश की मोहताज नहीं। कब ‘आंख ‘ सूंघ ले, और कब ” नाक ‘ देख ले, कुछ कहा नहीं जा सकता। एक सस्ता सा शेर भी शायद यही बात दोहरा रहा है ;

सच्चाई छुप नहीं सकती

बनावट के उसूलों से।

कि खुशबू आ नहीं सकती

कभी काग़ज़ के फूलों से।।

सभी प्राणियों में सूंघने की शक्ति होती है, किसी में कम, किसी में ज्यादा। जिस तरह लोग स्वाद के शौकीन होते हैं, उसी तरह कई लोग खुशबू के भी शौकीन होते हैं। कजरा अगर सुंदरता का प्रतीक है तो गजरा खुशबू का। रसिकों का क्या है, वे तो सुनने के भी शौकीन होते हैं ;

पायल वाली देखना,

यहीं तो कहीं दिल है ;

पग तले आए ना।।

रस और गंध का गुण धर्म राजसी है। स्वर्ग में राजसी सुख है, वैभव है, नृत्य और संगीत है। हम मंदिर में अपने इष्ट को पुष्प और गंध दोनों अर्पित करते हैं। धूप बत्ती और कर्पूर आरती का भी प्रावधान है। गंध से आसुरी शक्तियां पास नहीं फटकती। सुगंधित पदार्थों और जड़ी बूटियों से ही यज्ञ और हवन संपन्न होते हैं।

पुष्प समर्पयामि। गंधं समर्पयामि ! चित्त का शांत होना ही शांति का प्रतीक है।

सूंघने का विभाग नाक का है। एक विभाग के भी दो भाग हैं, जिनमें वेंटिलेटर्स लगे हैं। हमारे फेफड़ों में प्राणवायु का प्रवेश और कार्बन डाइऑक्साइड की निकासी भी तो इसी नाक से होती है। नस नाड़ियों का जाल हमारे शरीर का नेटवर्क है। सूर्य चंद्र नाड़ी का अनुपात शरीर को गर्म ठंडा रखता है। संत कबीर तो इड़ा पिंगला की बात करते करते सीधे सुषुम्ना यानी सहज समाधि तक पहुंच जाते हैं।।

यह हमारा शरीर भले ही हाड़ मांस का पुतला हो, लेकिन अगर किसी के बदन में खुशबू है तो किसी के शरीर में बदबू भी हो सकती है, क्योंकि हमारी प्रवृत्ति भी सात्विक, राजसी और तामसिक होती है तामसी पदार्थों के सेवन से बदन में खुशबू नहीं, बदबू ही आती है। जैसा अन्न वैसा मन ;

फूल सब बगिया खिले हैं

मन मेरा खिलता नहीं क्यों।

फूल तो खुशबू बिखेरें

मैं रहा बदबूऍं क्यों।।

हमारे ही शरीर में आभा भी है और ओज भी, जिसे विज्ञान की भाषा में aura कहते हैं। किसी के आने पर सजना, धजना, संवरना भी प्रसन्नता का ही द्योतक होता है। बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है। खुशी से हमारा चेहरा खिलता क्यों है, जब उदास होते हैं, तो मुरझाता क्यों है।

चमन में बहार है तो खुशबू है। जिस घर में महक और खुशबू जैसी बहनें हों, वहां तो बहार ही बहार है। किसी के पड़ोसी अगर मिस्टर गंधे हैं तो किसी के समधी श्री सुगंधी हैं। एक सुगंधा मिश्रा है, जो आज तक यह तय नहीं कर पा रही, कि वह एक अच्छी गायिका है या मिमिक्री आर्टिस्ट।।

अक्सर, जब सर्दी जुकाम हो जाता है, तो हमारी सूंघने की शक्ति काम नहीं करती। हम समझते हैं, रसोई में अभी दाल ही नहीं गली, जब कि दाल जलकर खाक हो चुकी होती है। पेट में जब चूहे कूदने लगते हैं, तो दूर किसी झोपड़ी से चूल्हे की आग में सिक रही रोटी की महक, छप्पन भोग को मात कर देती है।

हमारी माटी की गंध का भी जवाब नहीं। तपती गर्मी के बाद, जब बारिश की कुछ बूंदें, धरती पर पड़ती है, तो वह सौंधी सौंधी खुशबू, बड़ी प्यारी लगती है। नेकी ही खुशबू का झोंका है और बदी, असह्य बदबू।

षडयंत्र की बू सभी को आ जाती है लेकिन अच्छाई कभी अपना प्रचार नहीं करती। फूल कभी नहीं कहता, मुझे सूंघो, उसकी खुशबू चलकर आपके पास आती है। हमारा स्वभाव ही हमारी असली पहचान है, डियोड्रेंट और आर्टिफिशियल फ्रेगरेंस ( कृत्रिम सुगंध ) नहीं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 252 ☆ उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 252 ☆ उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व

सावन मास सुहावन लागे । हरियाली के साथ भगवा रंग को धारण किये हुए श्रद्धा व विश्वास की शक्ति को काँधे पर लिए भक्त गंगा जल या नगर ,ग्राम में जो भी नदियाँ हैं उनके जल को काँवर  में भरकर बांस की छड़ी  जिसके दोनों ओर जल से भरे घड़े लटके रहते हैं ।

आस्था ,संस्कार की पूर्णता,ब्रह्मचर्य नियम का पालन, पद यात्रा, बम- बम भोले का  जाप करते हुए शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं ।

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कांवड़िया चलते हैं आगे

भाव भावना भगवन जागे

भोले की भक्ति को धारे

बम बम बम का नाम पुकारे ।

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भगवा वस्त्र धार कर रहते

शिव शंकर को गुरुवर कहते

जलाभिषेक करें  पावनता

बिगड़े काम सकल जन बनता ।।

*

बारिश की बूंदों में भींगते हुए, बिना रुके, कदम से कदम मिलाते हुए पूरे जुलूस के साथ, झांझ, मंजीरा, भजन, जयकारे, मंत्र जाप की अनुगूँज । महिलाएँ गोद में बच्चों को लिए, उँगली पकड़े, व सखी सहेलियों के साथ, पूरे परिवार, समाज के संग भोलेनाथ को मनाने शिव मंदिर पहुँचती हैं । यही सब तो  अपनी संस्कृति से जुड़ने व समझने के लिए मार्ग तैयार करता है।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख वो भी क्या दिन थे।)

☆ आलेख – राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

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राष्ट्रीय प्रसारण दिवस का इतिहास:

भारत में पहला रेडियो प्रसारण बॉम्बे स्टेशन से 23 जुलाई 1927 को किया गया था। तब स्टेशन का स्वामित्व इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी नामक एक निजी कंपनी के पास था।

सरकार ने 1 अप्रैल 1930 को प्रसारण का कार्यभार संभाला और इसका नाम बदलकर भारतीय राज्य प्रसारण सेवा (आईएसबीएस) कर दिया ।

यह शुरू में प्रायोगिक आधार पर था।  बाद में यह स्थायी रूप से 1932 में सरकारी नियंत्रण में आ गया।

8 जून, 1936 को भारतीय राज्य प्रसारण सेवा ऑल इंडिया रेडियो बन गई । 1956 में इसका नाम आकाशवाणी रखा गया।

वर्तमान में, आकाशवाणी दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है।

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(प्रसारण दिवस की सभी साथियों को बधाई। मुझे अपने स्कूल समय की एक रोचक घटना याद आ रही है जो मैं आपसे साझा करना चाहता हूं। – श्री अजीत सिंह)

एक रेडियो उद्घोषक ने रेलवे स्टेशन मंज़ूर करवा लिया… 

राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर, मुझे उस समय की याद आती है जब एक रेडियो उद्घोषक अपने गांव के लिए एक रेलवे स्टेशन मंजूर करवा सकता था । यह साल 1956 या 57 के आसपास की बात है।जब मैं छठी या सातवीं क्लास का स्कूल छात्र था ।

उस समय हरियाणा पंजाब राज्य का हिस्सा था। जिला करनाल  में सरकारी हाई स्कूल कैमला में हमारे शिक्षक ने हमें एक दिन पास के गांव कोहंड तक पैदल मार्च करने के लिए कहा, जहां एक मंत्री को एक जनसभा को संबोधित करना था।  हम यात्रा का आनंद लेने के लिए बहुत खुश थे और लगभग तीन किलोमीटर की दूरी कोई बड़ी बात नहीं थी।

रेल राज्य मंत्री श्री शाहनवाज कुछ समय बाद पंडित हिरदे राम के साथ आए, जो कि कोहंड गांव के रहने वाले आकाशवाणी दिल्ली के देहाती कार्यक्रम के एक लोकप्रिय कंपीयर थे।

अपने स्वागत भाषण में हिरदे राम ने रेलवे स्टेशन की मांग की और बदले में मंत्री ने मांग स्वीकार कर ली।  हम सभी ने ताली बजाई।  ऐसा लग रहा था कि हिरदे राम पहले से ही दिल्ली में मंत्री के साथ डील कर चुके थे।

एक दो महीने के बाद, हम फिर से कोहंड के लिए मार्च कर रहे थे जब पहली ट्रेन वहां रुकी थी। यह एक उत्सव का समय था। इसमें ग्रामीण बैंड बाजे के साथ शामिल हुए।  सरपंच और उसके आदमियों ने मिठाई से भरी  टोकरियां हर डिब्बे में डाली।  बर्फी का एक डब्बा स्टेशन मास्टर के लिए और दूसरा इंजन ड्राइवर के लिए था। पतासों के साथ हमने भी अपनी जेबें भरी थीं।

ट्रेन उस दिन करीब दस मिनट के लिए रुकी। स्टेशन मास्टर ने घोषणा की कि आगे से रेलगाड़ी का ठहराव केवल एक मिनट के लिए होगा ।

असल में, स्टेशन को ट्रैफिक की मात्रा के आधार पर परीक्षण के तौर पर शुरू किया गया था।  ट्रैफिक ज्यादा नहीं था।  स्थानीय पंचायत ने एक रास्ता तैयार किया: पहला, कोई भी बिना टिकट यात्रा नहीं करेगा और दूसरा, पंचायत निर्धारित न्यूनतम कोटा पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रतिदिन रेलवे टिकट खरीदेगी।

कोहंड रेलवे स्टेशन अभी भी एक छोटा स्टेशन है।  जाहिर है, अब टिकटों की आवश्यक बिक्री को पूरा करने के लिए पर्याप्त ट्रैफिक है।   मुश्किल से एक या दो ट्रेनें वहां रुकती हैं।  पानीपत और करनाल के लिए यात्री यहां से ट्रेनें लेते हैं।

हमारे गांव में एक सामुदायिक रेडियो सेट था और लोग हर्षोल्लास के साथ देहाती कार्यक्रम सुनते थे। कभी कभी  कोई कहता सुनाई पड़ता कि साहब  के रूप में बोल रहा आदमी वही व्यक्ति है जिसने अपने गांव कोहंड के लिए रेलवे स्टेशन  मंजूर करा लिया था।

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जब मैं अस्सी के दशक में आकाशवाणी जम्मू में संवाददाता के तौर पर काम कर रहा था तो  एक सहयोगी ने मुझे एक श्रोता से मिली चिट्ठी दिखाई जिस पर पता लिखा था, “स्टेशन मास्टर, रेडियो कश्मीर, जम्मू” । अक्सर पत्र डायरेक्टर के नाम से आते थे। मैंने कहा इसमें श्रोता की कोई खास गलती नहीं है। अगर रेलवे स्टेशन  का मुखिया स्टेशन मास्टर हो सकता है तो रेडियो स्टेशन का मुखिया भी स्टेशन मास्टर क्यों नहीं हो सकता ?

हा हा!

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 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.01.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 737 ⇒ घोड़ा, घास और यारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घोड़ा, घास और यारी।)

?अभी अभी # 737 ⇒ आलेख – घोड़ा, घास और यारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घोड़ा घास से यारी नहीं करता ! घोड़े पर अक्सर सवारी की जाती है। आप गाय और कुत्ते की तरह घोड़े को नहीं पाल सकते। घोड़ा बिना घुड़सवार के शोभा नहीं देता। गाय और कुत्ता तो कोई भी रहम दिल इंसान पाल सकता है, घोड़े को पालने के लिए शारीरक बल के अलावा एक अस्तबल की भी आवश्यकता होती है।

युद्ध की कलाओं में घोड़े का विशिष्ट स्थान है। अश्वारोही सेना के बिना कोई भी युद्ध अधूरा होता था। महाराणा प्रताप हों, छत्रपति शिवाजी हों या फिर रानी लक्ष्मीबाई, घोड़ा ही इनकी पहचान थी। अश्व – विश्व में चेतक का नाम अमर है।।

फ़ौज में आज भी कैवेलरी यूनिट, अश्ववाहिनी सेना होती है। कर्फ्यू के वक्त कुछ बीएसएफ के जवान सड़कों पर मार्च करते देखे जा सकते हैं। कभी इंदौर शहर भी ताँगों का शहर हुआ करता था। आज शहर से घोड़ा और घास दोनों गायब हैं।।

घुड़सवारी अगर एक शौक है, तो घुड़दौड़ एक जुनून। मुम्बई का महालक्ष्मी रेस कोर्स घुड़दौड़ के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ घोड़ों पर दाँव लगाया जाता है। यह एक तरह का जुआ है, जिसमें कई रईस अपनी दौलत लुटा बैठते हैं। पुरानी हिंदी फिल्मों में कई राय साहब बने चरित्र अभिनेता किसी नंबर के घोड़े पर दाँव लगाकर अपना सब कुछ हार जाते हैं, और दिल के दौरे में अपनी जान गँवा बैठते हैं। तब हीरो रायसाहब की लड़की और माँ को सहारा देता है। अंग्रेजों का यह एक प्रिय खेल था, इसलिए हर छोटे-बड़े शहर में रेस कोर्स रोड और पोलोग्राउंड आज भी देखे जा सकते हैं।

कभी घोड़े तांगा और बग्घी में जोते जाते थे। महाभारत काल में कृष्ण जिस अर्जुन के रथ के सारथी बने थे, उसमें भी घोड़े ही शोभायमान होते थे। जब घोड़े को घास मिलनी बंद हो गई, तो ताँगों का स्थान सायकल रिक्शा और ऑटो रिक्शा ने ले लिया। एक आम इंसान ने भले ही ज़िन्दगी में कभी कोई घोड़ा न खरीदा हो, सोते वक्त वह अक्सर घोड़े बेचकर ही सोता है।।

जो लोग धंधे-व्यवसाय को यारी से अधिक महत्व देते हैं, वे दोस्ती के लिहाज में एक पैसा नहीं छोड़ते। उनका यह तकिया कलाम होता है, भैया ! घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खायेगा क्या ? उन्हें यारी से ज़्यादा घास प्यारी है। उसूल अपना अपना।

अब तो घोड़ा बस बारात में देखा जा सकता है। माफ़ कीजिये, वह भी शायद घोड़ी ही होती है। घोड़ी पे हो के सवार … गाना चला करता है। दूल्हे राजा घोड़े पर बैठे हैं। एक रस्म में घोड़े को आग्रहपूर्वक एक पात्र में भीगी हुई चने की दाल खिलाई जाती है। बस शायद यही एक मौका होता है, जब घोड़ा घास से नहीं, चने की दाल से भी यारी कर लेता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ || देखो शिव सावन आ गया || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ || देखो शिव सावन आ गया || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

साइकोलोजी की पढ़ाई करते हुए कभी सोचा ही नहींं, बस मुट्ठी भर ख्वाब लिए तरक्की के लिए बढती रही। उम्र  के साथ साथ माँ की थपकी ना जाने कब हिदायत में बदल गई और कपड़ों का पहनावा समाजिक सम्मान से जुड़ गया मालूम ना चला।

गणित कमज़ोर रहा अतः दुनियाँदारी में हमेशा ठगी गई फिर भी साइकोलोजी की पढ़ाई पूरी हूई और  नाते रिश्तेदारों में फुसफुसाहट होने लगा बिटिया सयानी हो गई फिर देरी कहाँ हुई और पिता जी ने थमा दिया हाथ पिया के देहरी से।

अजीब है न ! स्त्री अर्धांगिनी बनते ही पूर्णता दर्शाने की कोशिश करने के लिए कदम ताल मिलाने की भरपूर कोशिश करतीं हैं और पुरुष समाज यह समझ लेता है कि स्त्री उसका अधिपत्य है।

मकान से घर और घर से पिहर – माया का के बीचों बीच फंसी स्त्री मन हमेशा कोशिश करता रहा कि उसके घर की खिड़की दरवाजे भले लकड़ी के हो लेकिन उसके जीवन साथी का हृदय विस्थापित जंगल हो जहाँ उसके लिए कोई रोक टोक ना हो बिल्कुल माता पार्वती जी के जैसे वह केवल अपने शिव रुपी पति की संगनी रहना चाहतीं है उसके लिए सम्पति तो केवल उसका पति होता है।

अनगिनत भ्रम में जीवित रहतीं स्त्रियाँ केवल ऊपरी सतह के परतों में लिप्त हाथों में  हरी – हरी चुड़ियाँ डालकर कहती है –

शिव का सावन आ गया जबकि सच्चाई तो यह है कि उनके मन के अंदर एक घुटन ढूढ़ती हैं एक विस्थापित जंगल जिस जंगल में वह अपने शिव के साथ बैठीं केवल शिवमय होकर अनंत में मिलने से पहले खिल खिलाकर बोले –

“देखो शिव सावन आ गया”

~ अभिव्यक्ति की स्याही ~

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 736 ⇒ भूरि भूरि प्रशंसा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भूरि भूरि प्रशंसा।)

?अभी अभी # 736 ⇒ आलेख – भूरि भूरि प्रशंसा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Panegyrize)

जब हम किसी की तारीफ करते हैं, तो खुलकर करते हैं, और जब बुराई करते हैं तो जमकर। याने जो भी काम करते हैं, तबीयत से करते हैं। इन दोनों के मिले जुले स्वरूप को ही निंदा स्तुति भी कहते हैं। राजनीति में कड़ी निंदा की जाती है और ईश्वर की स्तुति आंख बंद करके की जाती है। वह स्तुति, जिसे चापलूसी कहते हैं, वह तो जी खोलकर की जाती है।

तारीफ शब्द थोड़ा उर्दू और थोड़ा फिल्मी है, जब कि प्रशंसा शब्द शुद्ध और सात्विक रूप से हिंदी शब्द है। इतना सात्विक कि इस प्रशंसा को भूरि भूरि प्रशंसा भी कहा जाता है। यानी किसी की जब बुराई करने का मन हो, तो उसे खरी खोटी सुनाना, और प्रशंसा करने का मन किया तो भूरि भूरि प्रशंसा।।

निंदा स्तुति अथवा बुराई और भूरि भूरि प्रशंसा एक ही मुंह से की जाती है। लेकिन प्रशंसा में चाशनी घोलने के लिए यह जरूर कहा जाता है, आपकी प्रशंसा किस मुंह से करूं ! अरे भाई, उसी मुंह से करो, जिस मुंह से कल बुराई कर रहे थे। कल जो कलमुंहा था, आज उसका चेहरा चांद सा कैसे हो गया।

चलिए, हमें इससे क्या, हमारा मन तो आज भूरि भूरि प्रशंसा करने का हो रहा है, इसलिए आज हम गुस्से से लाल पीले नहीं होने वाले। प्रशंसा लाल नहीं होती, नीली, पीली, हरी नहीं होती यह भूरि ही क्यों होती है।

स्तुति और प्रशस्ति के करीब, भूरि’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है बहुत, प्रचुर मात्रा में और बार-बार। जैसे भूरि दान =प्रचुर मात्रा में दिया गया दान। भूरि-भूरि प्रशंसा का अर्थ है बहुत-बहुत प्रशंसा, बारम्बार प्रशंसा।।

अंग्रजी भाषा इतनी संपन्न नहीं। आप किसी की अंग्रेजी में brown brown praise नहीं कर सकते, उसके लिए उनके पास एकमात्र शब्द पेनिगराइज़ (panegyrize) है। यह शब्द हमें अपोलोज़ाइज

(apologize) का करीबी लगता है, , लेकिन इसका और panegyrize का छत्तीस का आंकड़ा है, जहां भूरि भूरि प्रशंसा नहीं होती, उल्टे माफी मांगी जाती है।

ईश्वर की प्रशंसा नहीं की जाती, गुणगान किया जाता है। हमें तो भूरि भूरि प्रशंसा में चापलूसी अथवा चाटुकारिता की कतई बू नहीं आती। सज्जनों, मनीषियों, अथवा विद्वत्जनों की भूरि भूरि प्रशंसा करने में कोई दोष नहीं, अतिशयोक्ति नहीं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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