हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३३ ☆ दीप जलाओ ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “दीप जलाओ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३३ ☆ दीप जलाओ ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

लो फिर साँझ हुई मटमैली

तुम देहरी पर दीप जलाओ।

 

सूरज डूबा बुझी आग सा

लटका खूँटी पर दिन,

चिड़ियों के स्वर वापस लौटे

लेकर ख़ुशियाँ अनगिन,

रात आँख में लगे कसैली

तुम आकर मत नींद चुराओ।

 

मंदिर की सीढ़ी पर नदिया

ठहर आरती गाये,

पावन पूजा कर्म पुजारी

धर्म ध्वजा लहराये,

बहती नावें लहरें मैली

तुम तट की पीड़ा दुलराओ।

 

चुप्पी साधे पेड़ खड़े हैं

पसर गया सारा तम,

तारों की चादर पर लेटा

उजयारे का है भ्रम,

ख़ामोशी राहों में फैली

तुम यात्रा के अलख जगाओ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – प्रेम ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – प्रेम ? ?

हरेक ने किया प्रेम,

किसीने भोगी, व्यक्त न

कर पाने की पीड़ा,

कोई अभिव्यक्त होने की

वेदना भोगता रहा,

किसीका प्रेम होने से पहले

झोंके के संग बह गया,

किसीका प्रेम खिलने से

पहले मुरझा गया,

किसीका अधखिला रहा,

किसीका खिलकर भी

खिलखिलाने से

आजीवन वंचित रहा,

प्रेम का अनुभव

किसीके लिये मादक रहा,

प्रेम का अनुभव

किसीके लिये दाहक रहा,

जो भी हो पर

प्रेम सबको हुआ..,

प्रेम नित्य है, प्रेम सत्य है,

प्रेम कल्पनातीत, प्रेम तथ्य है,

पंचतत्व होते हैं, काया का आधार,

प्रेम होता है पंचतत्वों का सार ! 

?

© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४४ – लौट आया है वसंत… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – लौट आया है वसंत।)

✍ लौट आया है वसंत… ☆ श्री हेमंत तारे  

सुनी है,

एक साल बाद

फागुन की पदचाप,

गुम हुआ जाड़ा,

कुछ कुछ तपने लगे दिन,

एक साल बाद,

लौट आया है वसंत l

 

यहां वहां ठाडे

युवा – बूढे

सभी पेड़ों को

कर गया था नंगा

निर्लज्ज पतझड़

और

खड़े थे नंगे

यूँ ही

ये पेड़

बाट जोहते

वसंत की I

 

अब  फूट पड़ेगी

कोपलें नयी

आयेंगे पात नये

घुल रहीं मादकता

यहाँ – वहाँ,

चहुंओर

कि

लौट आया है वसंत

एक साल बाद।

 

घर से दूर,

जहाँ शुरू होती है

कच्ची – पक्की, पगडंडियाँ

वहाँ खिल रहे हैं

पलाश

चटख

लाल पीले फूल ओढ़े

यहाँ – वहाँ, चहुंओर

कि

लौट आया है वसंत

एक साल बाद।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३८ ☆ प्यार है, हम कहा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “प्यार है हम कहा नहीं करते“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३८ ☆

✍ प्यार है हम कहा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

शिकवे दिल में रखा नहीं करते

खातमा रब्त का नहीं करते

 *

प्यार है हम कहा नहीं करते

तुम ही चहरा पढा नहीं करते

कोई रस्मन वफ़ा नहीं करते

दिल लगाकर दग़ा नही करते

 *

जो नसीहत पे ध्यान  देते हैं

ठोकरों से गिरा नहीं करते

 *

हम गुमां पाल के न चुप बैठे

दिल मिले बिन खुला नहीं करते

 *

मौत जब आना होगी आएगी

उसके डर से भरा नहीं करते

 *

शमअ सा इश्क़ कर पिघलना क्यों

हम कभी रतजगा नहीं करते

 *

पाप ही बस गिनाते रहते हो

छू के तुम पारसा नहीं करते

 *

घाव भरता नहीं दिया उनका

हम ही इसकी दवा नहीं करते

 *

मसअलों को मज़ाक समझें जो

उनसे हम मशविरा नहीं करते

 *

पढ़के वन्नास वसवसों का बशर

जाने क्यूँ ख़ात्मा नहीं करते

 *

हमने अब तक ख़ुशी नहीं देखी

ज़िन्दगी से गिला नहीं करते

 *

अर्श को चूम गुमाँ जिनको अरुण

मुस्तकिल वो रहा नहीं करते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५२ ☆ कविता – रक्षा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आपकी एक विचारणीय कविता – “रक्षा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५२ ☆

✍ कविता – रक्षा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

*

मत घबराना साथी

जब तक साँस चले,

अपना साथ बना रहे

चाहे कोई न साथ चले।

*

सत्य राह पर डटकर रहना

संकल्प लिए चलते रहना,

दिल में प्यार बसाए साथी

सदा प्यार ही बाँटते चलना।

*

जिस धरती ने जन्म दिया

 उसे न कभी गंदा करना,

तन मन को खुश रखने वाले

आकाश को तुम साफ रखना।

*

जल और वायु को शुद्ध रख

उनकी पूजा कराना व करना।

स्वच्छ रहना स्वच्छ रखना

अपने जीवन की रक्षा करना

सच्ची राह चलते रहना

खुश रहना खुशी बाँटना,

सबको बनाकर अपना

सबके जीवन की रक्षा करना।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३६ – ऋचाएँ, प्रणय-पुराणों की ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण रचना “ऋचाएँ, प्रणय-पुराणों की।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३६ – ऋचाएँ, प्रणय-पुराणों की  ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

छूते ही हो गयी देह कंचन, पाषाणों की,

हैं कृतज्ञ धड़कनें, हमारे

पुलकित प्राणों की!

खंजन नयनों के नूपुर जब तुमने खनकाये,

तभी मदन के सुप्त पखेरू ने पर फैलाये।

कामनाओं में होड़ लगी

फिर उच्च उड़ानों की।

यौवन की फिर उमड़-घुमड़कर बरसी घनी घटा,

संकोचों के सभी आवरण हमने दिये हटा।

स्वतः सरकने लगी यवनिका

मदन-मचानों की।

अधरों से, अंगों पर, तुमने अगणित छन्द लिखे,

गीत, एक-दो नहीं, केलि के कई प्रबन्ध लिखे।

हुई निनादित मूक ऋचाएँ,

प्रणय-पुराणों की।

कभी मत्स्यगंधा ने पायी थी सुरभित काया,

रोमांचक अध्याय वही फिर तुमने दुहराया।

परिमलवती हुई कलियाँ

उजड़े उद्यानों की।

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ग्लेशियर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ग्लेशियर ? ?

कितने प्रवाह,

कितनी धाराएँ,

असीम पीड़ाएँ,

अनंत व्यथाएँ,

जटा में बंधी आशंकाएँ,

जटा में जड़ी संभावनाएँ,

हिमनद पिए खड़ा है,

महादेव-सा पग धरा है,

पंचतत्व की देन हो,

पंचतांडव से डरो,

मनुज सम आचरण करो,

घटक हो प्रकृति के,

प्रकृति का सम्मान करो,

केदारनाथ की आपदा

का स्मरण करो,

मनुज, इस पारदर्शी

ग्लेशियर से डरो!

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०९ – माँ की ममता है बड़ी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “माँ की ममता है बड़ी। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०९ – सजल – एक-एक कर बिछुड़े अपने ☆

माँ की ममता है बड़ी, जिसका ओर न छोर।

नव जीवन देकर यही, दिखलाती है भोर।।

*

संस्कार की वह घुटी, रोज पिलाती घोंट।

मानव बनकर ही रहे, कहीं न आये खोट।।

*

बचपन में देती रही, भले बुरे का ज्ञान ।

मन में जिसने गुन लिया, दूर हटा अज्ञान।।

*

बेटा कितना भी बड़ा, नजरों में नादान।

माँ तो नजर उतारती, वह चाहे कल्यान।।

*

ममता करुणा प्रेम की, शीतल भरी फुहार।

जीवन भर देती सदा, कुशल क्षेम उपहार।।

*

उसके आर्शीवाद से, बनते जग में भूप।

प्यार मिले माँ का जिसे, कभी चुभे ना धूप।।

*

किस्मत के होते धनी, जिसको मिलती छाँव।

कभी भटकते हैं नहीं, मिल जाती है ठाँव।।

*

उसका सँग जब तक रहा, सुख का था अंबार।

उसके जाते ही लगा, सूना सा घर द्वार।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३१७ ☆ झाड… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३१७ ?

☆ झाड… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

माणूस

धर्तीवर जन्मला आला

अंगा पिंडाने वाढता वाढता

रांगू लागला

आई-वडीलांचे बोट धरून

चालू लागला

पराक्रमाने

आकाशाला भिडला

चंद्रावर गेला

पाण्यात उतरला

समुद्राचा तळ गाठला

पण त्याला

झाड होता आलं नाही

 

झाड

माती खाली

जन्म घेतं

वर येतं

वाढू लागतं

पण मातीला

विसरत नाही

जेवढं वर वाढतं

तेवढंच ते

मातीच्या

पोटात घुसतं

झाडं

मातीला सोडत नाहीत

ग्रीष्मात,

शिशिरात

आणि पावसात देखील

माणूस मात्र

माती, घर, नाती

सारं सोडायला तयार होतो

माणसाला

वाढता येतं

पण

त्याची ओढ

मूळाकडे कधीच नसते…

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७१ – रिश्ता ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – रिश्ता।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७१ – रिश्ता ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

 

मेरा और तुम्हारा

यानि हमारा

रिश्ता

न तो खून का रिश्ता है

न कोई सम्बन्ध

फिर क्यों लगता है कि हम

जन्मान्तरों के संगी हैं

शायद

भावों के इसी सम्बन्ध ने हमें

ऐसा रिश्ता दिया है

जो अनाम अपरिभाषित और अव्यक्त है

गूँगे के गुड़ की तरह ।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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