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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सामाजिक चेतना #91 – कफन तिरंगा दे जाओ ☆ डॉ. निशा नंदिनी भारतीय

डॉ. निशा नंदिनी भारतीय  (सुदूर उत्तर -पूर्व भारत की प्रख्यात लेखिका/कवियित्री डॉ.निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की अगली कड़ी में  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता कफन तिरंगा दे जाओ….।आप प्रत्येक सोमवार सुश्री निशा नंदिनी जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना  # 91 ☆    कफन तिरंगा दे जाओ (यह एक रचना मात्र नहीं...हमारे हृदय के सच्चे उद्गार है... हमारी प्रतिदिन की प्रार्थना का अंश है।) चाह नहीं प्रभु महलों की तुम सैर कराओ। चाह नहीं प्रभु पुष्प रथ पर तुम चढ़ाओ। चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी कफन तिरंगा दे जाओ। मैं तो लघुकण इस धरती का दुर्लभ जीवन पाया है। कर्ज बहुत बड़ा धरा का असीम सुख पाया है। आ सकूं प्रभु इसके काम ऐसा कुछ करवा जाओ चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी कफन तिरंगा दे जाओ। बोझ बड़ा भारी है सिर पर कर्मबोध न जानूँ मैं। भारत माँ के ध्यान में मत्स्य सम डुबूँ-तैरु मैं। हरेक कतरा लहू का इसपे न्यौछावर करवा जाओ चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी कफन तिरंगा दे जाओ। © डॉ. निशा नंदिनी भारतीय  तिनसुकिया, असम राष्ट्रीय मार्ग दर्शक, इंद्रप्रस्थ लिटरेचर फेस्टिवल, नई दिल्ली मो 9435533394 ≈ संपादक...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # 96 ☆ नकली इंजेक्शन ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता  ‘नकली इंजेक्शन’)   ☆ कविता # 96 ☆ नकली इंजेक्शन ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय☆ ये कविता उन बहती लाशों के लिए जिन्हें बहना था बेहिसाब,   ये कविता उस बच्चे के लिए जिसके चले गए मां बाप,   ये कविता हर उसके लिए जो नकली इंजेक्शन के बने शिकार,   ये कविता दूषित सांसों के लिए जिससे हुए घर बर्बाद,   ये कविता जवान कलयुग के लिए जो कर रहा है अट्टहास,   © जय प्रकाश पाण्डेय 416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #40 ☆ # तुम जुगनू बनके —- # ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे  (श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है महामारी कोरोना से ग्रसित होने के पश्चात मनोभावों पर आधारित एक अविस्मरणीय भावप्रवण कविता “# तुम जुगनू बनके ---- #”।)  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 40 ☆ ☆ # तुम जुगनू बनके ---- # ☆  तुम जुगनू बनके मेरे जीवन में आये हो तम के काले बादलों से किरण लाये हो   पतझड़ में उजड़ गई थी जो मेरी बगीया तुम ने सींचा तो हर फूल में तुम मुस्कुराये हो   हर कली तक रही है कब से राह तुम्हारी इस उपवन में जबसे तुम भ्रमर बनकर आये हो   हम भी मरन्नासन्न थे महामारी की लहर में तुम ही तो दवा पिलाकर हमें होश में लाये हो   ये तपता हुआ तन ये प्यासा प्यासा मन तुम रिमझिम फुहार बनकर ये अगन बुझाये हो   कल का क्या भरोसा रहे ना रहे हम कुछ पल आंखें मूंद लो बहुत सताये हो   अभी ना करो जिद   जाने की "श्याम" तुम मुद्दत के बाद तो पहलू में आये हो    © श्याम खापर्डे  11/06/2021 फ्लेट न –...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 1 (56-60) ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 1 (56-60) ॥ ☆ अरून्धिती गुरू देव के सन्धया वन्दन बाद दर्शन पायें यों यथा स्वाहा - हविभुज साथ ॥ 56॥   राजा रानी ने किया उनको चरण प्रणाम गुरू - गुरूपत्नो ने दिया आर्शीवाद ललाम ॥ 57॥   नुप से, पा आतिथ्य यो जिसकी मिटी थकान मुनि ने पूंछी राज्य कुशल - क्षेम दे मान ॥ 58॥   धर्म पंथ पालक नृप शत्रु - विजेता शूर तब गुरू से बोले वचन आदर से भरपूर ॥ 59॥   गुरूवर है सब कुशलता प्रभु के पुण्य प्रताप मुझ जिसके हर कष्ट के प्रतिहर्ता हैं आप ॥ 60॥   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 53 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 53 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 53) ☆  Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’. Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 54 ☆ बुंदेली ग़ज़ल – काय रिसा रए… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ (आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताeह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा रचित बुंदेली ग़ज़ल    ‘काय रिसा रए…’। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 54 ☆  ☆ बुंदेली ग़ज़ल – काय रिसा रए ☆  काय रिसा रए कछु तो बोलो दिल की बंद किवरिया खोलो   कबहुँ न लौटे गोली-बोली कओ बाद में पैले तोलो   ढाई आखर की चादर खों अँखियन के पानी सें धो लो   मिहनत धागा, कोसिस मोती हार सफलता का मिल पो लो   तनकउ बोझा रए न दिल पे मुस्काबे के पैले रो लो   ©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 1 (51-55) ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 1 (51-55) ॥ ☆ मुनिकन्यायें सींच तरू उन्हें गई झट त्याग जिससे निर्भय हो विहंग पान करें जल भाग ॥ 51॥   रोमन्थन करते हनिण प्रांगण में मिल साथ जहाँ दिन ढले अन्न को रहे समेट निषाद ॥ 52॥   आहूति गंधी पवन से धूम जहाँ गतिवान अग्नि शिखा शुचि अतिथि ने आश्रम को पहचान ॥ 53॥   अश्वों को तब थामनें दे सारथि को हाथ राजा रथ से उतर गये रानी को ले साथ ॥ 54॥   सपत्नीक उस न्यायी से, जो रक्षक विख्यात सभी जितेन्द्रिय मुनियों ने की स्वागत कर बात ॥ 55॥   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 41 ☆ शिक्षा ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  (आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा  शिक्षा के क्षेत्र पर लिखी गई विशेष कविता  “शिक्षा  “।  हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। )  ☆ काव्य धारा # 41 ☆ शिक्षा  ☆ पैसा जिसके पास है दे सकता जो दान उसको यूनिवर्सिटी की हर डिगरी आसान शिक्षा, सर्विस, मान के भी हैं वे हकदार बहुत प्रदूषित हो गया शिक्षा का संसार   बिना शुल्क यद्यपि सुलभ शिक्षा का अधिकार तदपि प्रवेश की प्राप्ति का बहुत कठिन आधार यदि प्रवेश  भी मिल सका तो मुश्किल है खर्च कोई गरीब कैसे करे जीवन बेडा पार ?   पुस्तक, कापी, ड्रेस और फीस के विविध प्रकार निर्धन पालक को कठिन लेना राशि उधार शिक्षा कम शालाओ का टीम टाम पर जोर दुखी पालकों पर बढ रहा है आर्थिक भार   ऊँची अभिलाषाओं का मन में भरा गुबार इससे कोचिंग क्लास का बढा हुआ व्यापार लेते उॅंची फीस सब एडमीशन के साथ किंतु सफल परिणाम हो, कोई न जिम्मेदार   शासन और समाज को शायद नहीं यह ध्यान शुभ शिक्षा...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – भेड़िया ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – भेड़िया भेड़िया उठा ले गया झाड़ी की ओट में, बर्बरता से उसका अंग-प्रत्यंग भक्षण किया, कुछ दिन बाद देह का सड़ा-गला अवशेष बरामद हुआ, भेड़ियों का ग्राफ निरंतर बढ़ता गया, फिर यकायक दुर्लभ होते प्राणियों में भेड़िये का नाम पाकर मेरा माथा ठनक गया, अध्ययन से यह तथ्य स्पष्ट हुआ, चौपाये भेड़िये जिस गति से घट रहे हैं, दोपाये भेड़िये उससे कई गुना अधिक गति से बढ़ रहे हैं...! ©  संजय भारद्वाज (प्रातः 3.45 बजे, 26.4.2019) अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य–...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 1 (46-50) ॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 1 (46-50) ॥ ☆   चलते पथ शुचि वेश में होते थे यों भास जैसे चित्रा - चन्द्र हों, शुचि निरभ्र आकाश ॥ 46॥   दिखलाते पथ में मिले प्रिय को रम्य स्थान सारा पथ यों कट गया, रहा न नृप को ध्यान ॥ 47॥   कीर्तिमान भूपाल तब थके हुये बेहाल पहुंचे रानी सहित, मुनि - आश्रम सायंकाल ॥ 48॥   समिधा कुश फल आदि ले लौटे वन से लोग देखा ताप सवृंद का अग्नि प्रज्वलन योग ॥ 49॥   उरज द्वार को रोककर मुनि पत्नी के पास बाल मृगों को पुत्रवत चरते कोमल घास ॥ 50॥   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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