श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “दीप जलाओ” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १३३ ☆ दीप जलाओ ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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लो फिर साँझ हुई मटमैली
तुम देहरी पर दीप जलाओ।
सूरज डूबा बुझी आग सा
लटका खूँटी पर दिन,
चिड़ियों के स्वर वापस लौटे
लेकर ख़ुशियाँ अनगिन,
रात आँख में लगे कसैली
तुम आकर मत नींद चुराओ।
मंदिर की सीढ़ी पर नदिया
ठहर आरती गाये,
पावन पूजा कर्म पुजारी
धर्म ध्वजा लहराये,
बहती नावें लहरें मैली
तुम तट की पीड़ा दुलराओ।
चुप्पी साधे पेड़ खड़े हैं
पसर गया सारा तम,
तारों की चादर पर लेटा
उजयारे का है भ्रम,
ख़ामोशी राहों में फैली
तुम यात्रा के अलख जगाओ।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
















