हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३१२ ☆ गीत – भारती को मान देना… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३१२ ☆ 

☆ गीत – भारती को मान देना…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

भूल कर ना  भूल जाऊँ,

हे प्रभु! तुम ज्ञान देना।

जिंदगी पावन बनाना,

भारती को मान देना।

* 

हर तरफ अज्ञान ने,

निज धर्म को दूषित किया है।

छोड़ गीता, वेद ग्रंथों,

शूल को भूषित किया है।

 *

पूर्वजों का मान रखना,

सर्वदा सम्मान देना।

 **

स्वार्थ का धंधा बड़ा है,

देश हित कब सोचते?

वोट को ही आज शातिर,

देश को भी नौचते।

 *

बालकों को तुम बचाना,

सत्य का परिधान देना।

 **

जाति, भाषा, क्षेत्रीयता,

तोड़ते यह रीढ़ को हैं।

देश को कमजोर करते,

जोड़ते यह भीड़ को हैं।

 *

दंड देकर शत्रुओं को,

साधु को परित्राण देना।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ चला हे ही बरेच झाले… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ चला हे ही बरेच झाले… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

☆

ओळखलेस नाही मजला

चला हेही बरे झाले.

 

पाठमोरी झालीस अलगद

चला हेही बरे झाले.

 

लपवलेस थेंब अनावर

चला हेही बरे झाले.

 

पाऊसही आला अचानक

चला हेही बरे झाले.

 

स्वप्नातले वास्तव समजले

चला हेही बरे झाले.

 

वास्तवातले स्वप्न कळाले

चला हेही बरे झाले.

 

पानगळीचे ऋतू उमजले

चला हेही बरे झाले.

 

आणि डोळे स्वच्छ झाले

चला हेही बरेच झाले.

 ☆

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १६३ ☆ बेचकर ईमान आया हूँ… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बेचकर ईमान आया हूँ…”।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६३ ☆

☆ बेचकर ईमान आया हूँ… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

फिर भँवर में फँस गई कश्ती हमारी

हो गई है ज़िंदगी सस्ती हमारी।

*

उठ रहा है हर तरफ़ अब तो धुआँ सा

मिल गई है ख़ाक में बस्ती हमारी ।

*

रोटी कपड़ा एक छप्पर के लिए

घुट के मन में रह गई मस्ती हमारी।

*

बेचकर ईमान आया हूँ अभी मैं

झूठ के हाथों लुटी हस्ती हमारी।

*

किसने सूरज रख दिया है सामने ये

बूँद बन खोई है तर-दस्ती हमारी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

२७.१.२६

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ जनप्रतिनिधि जी से एक छोटी-सी विनम्र शिकायत… 📱 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌈📱 जनप्रतिनिधि जी से एक छोटी-सी विनम्र शिकायत… 📱🌈

(अभी एक स्थानीय समस्या को लेकर कुछ छोटी-सी माँगें व्हॉट्सऐप के माध्यम से हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों तक पहुँचाने का प्रयास किया।)

📱

सोचा था—

लोकतंत्र में संवाद होगा,

शायद कोई उत्तर आएगा,

शायद कोई आश्वासन मिलेगा…

या कम-से-कम “देखते हैं” ही सुनने को मिलेगा। 😄

 

परन्तु…

पूर्ण मौन! 🤐

 

न कोई उत्तर,

न कोई प्रतिक्रिया,

न कोई “Received”…

मानो संदेश व्हॉट्सऐप पर नहीं, हिमालय की किसी गुफा में रख दिया गया हो! 🏔️😄

 

अब हम भी सोच में पड़ गए—

अरे भई, उत्तर देना कठिन था तो एक इमोजी ही लगा देते! 😂

 

🙏 हाथ जोड़ने में संकोच हो तो कोई बात नहीं…

👍 अंगूठा ही दिखा देते!

 

😊 मुस्कुराता हुआ चेहरा भेज देते,

👀 दो आँखें भेज देते,

या फिर आधुनिक लोकतंत्र का सबसे सुरक्षित उत्तर—

“Seen” ही कर देते! 😜

 

आखिर आजकल डिजिटल युग है।

एक इमोजी में भावनाएँ व्यक्त हो जाती हैं,

एक क्लिक में सरकारें चल जाती हैं,

तो एक 👍 से नागरिक को यह भरोसा भी तो मिल सकता है कि

उसका संदेश कम-से-कम मोबाइल तक तो पहुँचा! 📱😂

 

व्यंग्य अपनी जगह है,

पर प्रश्न छोटा-सा है—

 

जनता जब अपनी समस्या लेकर दरवाज़ा खटखटाती है,

तो दरवाज़ा खोलना सम्भव न हो,

कम-से-कम भीतर से “कौन है?” तो पूछा जा सकता है! 🚪🙂

 

🙏 संवाद ही लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है।

और यदि संवाद के लिए शब्द कम पड़ जाएँ,

तो आज के युग में इमोजी तो हैं ही! 😄🌸

 

🌿 एक 👍 भी बहुत कुछ कह देता है।

बस वह दिखाई तो दे! 😉

📱

#लोकतंत्र #जनसंवाद #जनप्रतिनिधि #जनता_की_आवाज़ #व्हॉट्सऐप_लोकतंत्र #एक_इमोजी_तो_बनता_था #व्यंग्य #हास्यव्यंग्य #संवाद_जरूरी_है #Indore

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विरोधाभास ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विरोधाभास… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

सम्बंधों में खाई चोट का

दोष  किसीको दूँ भी तो कैसे,

बटोरना उनका तंत्र रहा,

बाँटना मेरा मंत्र रहा,

पलड़े के एक ओर

दोनों साथ तुलते भी तो कैसे?

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 💥

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १७० ☆ कभी कभी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “कभी कभी…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १७० ☆

✍ कभी कभी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

दौलत का न दे काम पिटारा कभी कभी

पानी को पी पी दिन है गुज़ारा कभी कभी

*

आया न बचाने को ज़रूरत पै कोई फ़िर

इमदाद परखने जो पुकारा कभी कभी

*

सूली पे चढ़ा दूँ उसे क्या इतनी ख़ता पर

दिल पर है दिया ठेस जो प्यारा कभी कभी

*

गर्दिश में पड़ा कबसे निकलता नहीं मेरा

किस्मत का सुना पलटे सितारा कभी कभी

*

सब इश्क़ के ये सूदो-ज़िया जानता हूँ मैं

मैंने भी उठाया है खसारा कभी कभी

*

बे-अज़्म को आसान नहीं पाना हो सका

जो पास नज़र आया किनारा कभी कभी

*

बर्बादी का इल्जाम मेरी वक़्त पर मगर

लेते हैं बशर नाम तुम्हारा कभी कभी

*

अब तक हो पहेली की तरह एक तुम मुझे

होता नहीं बर्ताव गँवारा कभी कभी

*

दिलकश है फ़लक पर ये धनक आप देखिए

क़ुदरत ये दिखाती है नज़ारा कभी कभी

*

मिलने पे लगी हद से ज़ियादा ही बंदिशें

महताब को मैं छत पे उतारा कभी कभी

*

तौबा किये हैं जिससे बशर मानते नहीं

करते हैं मुहब्बत को दुबारा कभी कभी

*

हम उसको अरुण दोस्त कहें या कि मतलबी

देता वो नहीं साथ हमारा कभी कभी

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७४ – बदलते मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बदलते मौसम…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७४ ☆

✍ बदलते मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

एक पेड़ की

किसी डगाल पर

कुुछ पत्तियाँ हो चली है जर्द,

और उसी के सिरहाने

नई कोंपलें

खोल रही है स्वप्नील आँखें अपनी।

 

गिरने को तत्पर जर्द पत्तियाँ

जानती हैं, हवा की भाषा

वहीं,

कोंपलों ने अभी

शुरू की है अपनी भाषा गढ़नी ।

आँगन वही है,

चूल्हे की आँच वही,

बस धुएँ की दिशा

बदलती जान पडती है।

 

वो पगडंडियाँ,

जो बनी थी

दादा की आवक- जावक से,

पोता उन पर चलता तो है,

पर उसकी आँखें

खोजती है कोई नई राह

थके, सुस्त कदम

उसे पसंद नही

वो मुंतज़िर है सरपट दौड का।

नदी भी कहाँ

एक ही घाट से रहती है बंधी

युग- युगांतर तक।

 

सूरज अपनी जगह

अब भी अडिग है,

धरती अब भी

उसके चारों ओर घूम रही है;

और

अनंत काल से

होता आ रहा है

ॠतु परिवर्तन ।

यही तो है शाश्वत सत्य,

यही है प्रकृति का नियम।

 

पीढ़ियाँ भी

ऋतुओं की सगी है

एक जाती है,

तो दूसरी आती है,

पेड़ वही रहता है,

बस उसकी छाँव कि

भाषा बदल जाती है

ॠतुओं के साथ,

पीढियों के साथ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८२ ☆ कविता – सुबह सवेरे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “सुबह सवेरे…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८२ ☆

✍ कविता ☆ सुबह सवेरे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे कमरे की खिड़की पर

एक बुलबुल गाती है

सुबह सवेरे, एकदम सवेरे

पेड़ की डाली पर आती है

एक बुलबुल गाती है।

 

सूरज जब उगने को होता है

अंधेरा जब छँटने को होता है

जैसे ही घड़ी सुबह का आगाज़ देती है

तभी उसका गान शुरू होता है ।

तभी बुलबुल गाती है।

 

मुझे लगता है कभी-कभी

विट्ठल विट्ठल गा रही है

कभी लगता है ट्विंकल ट्विंकल

कभी कृष्ण कृष्ण  गा रही है ।

बहुत मीठी आवाज में

एक बुलबुल गाती है।

 

मेरी आँख खुलती हैं उसे सुनकर

मन में एक खुशी होती है उसे सुनकर

सुबह हो गई मैं सोचता हूँ

समय का भान होता है उसे सुनकर।

तय समय पर रोज गाती है।

एक बुलबुल गाती है।

 

बुलबुल को सुबह होने का ज्ञान

पता नहीं कैसे होता है

बादलों की ओट से लालिमा लिए

पर सूरज को होता है।

सूरज को जगा कर

बुलबुल उड़ जाती है

एक बुलबुल गाती है।

हर रोज गाती है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६५ – बुन्देली कविता – ”साँसों के हत्यारे हैं” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “साँसों के हत्यारे हैं “।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६५ ☆

☆  बुन्देली कविता – “साँसों के हत्यारे हैं “ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

साँसों के हत्यारे हैं 

जंगल काटन बारे हैं 

* 

भये ईंधेरी रातों में 

जुगनू हितू हमारे हैं 

 *

बीज डार दय आशा के 

अँकुराये उजयारे  हैं 

 *

बे डर रये उजालों से 

ई मशाल में नारे हैं 

 *

बात प्यार की ने करियो 

भड़क जात अंगारे हैं 

 *

बाहुबली बो जीत गओ 

सहमे फिर गलियारे हैं 

 *

‘भगवत’ निकर रये बाहर 

जितने नोट डकारे हैं

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बैर को भुलाकर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – बैर को भुलाकर…!

☆ ॥ कविता॥ बैर को भुलाकर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆

हक़ीक़त की ज़मीं पर,

सपनो के बीज बोएँ हम।

कितने भी संकट आएँ,

पर धीरज  ना  खोएँ हम।

*

माना  सबके जीवन में,

दुख आते- जाते रहते हैं।

पर जवाँ- मरद हमेशा,

हरदम मुस्काते  रहते हैं।

असफलता  का  दाग,

गंगा-जल  से धोएँ हम।

*

चाहे पथ में शूल बिछें,

चाहे पथ में फूल खिलें।

पर कभी ना रुकना है,

चाहे  भू की  चूल हिलें।

पर  हार कभी ना मानें,

हँसकर दुख  ढोएँ हम।

*

चिंता से ऊपर उठकर,

खुशियों  से  यारी करें।

अंबर  में  पतंग उड़ाएँ,

मेघों  की  सवारी  करें।

बैर-भाव को भुलाकर,

नींद  सुखद  सोएँ हम।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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