हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६३ ☆ जिधर भी जाती है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जिधर भी जाती है “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६३ ☆

✍ जिधर भी जाती है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जिधर भी जाती है फ़्ह्मो-नज़र तबाही है

ये कैसी आग की बरसात या इलाही है

सभी के सामने करते हो तुम ज़लील मुझे

ज़फ़ा की बात नहीं ये तो कम- निगाही है

 *

वतन के वास्ते सरहद पै जो खड़ा मुस्तैद

वो देशभक्त है इस देश का सिपाही है

 *

यहाँ पै शाहो-गदा में नहीं है कोई फ़र्क़

ये मयकदा यहाँ इक जाम इक सुराही है

 *

करूँ मैं जुर्म से कैसे बरी भला तुझको

फ़्ररेबकारों की इस जा भी बादशाही है

 *

हक़ीक़तों पै अमल कर रहा है कौन यहाँ

फ़ुज़ूल होठों पै लोगों के वाह- वाही है

 *

न बात दीन-धरम की “अरुण” अभी कर तू

ख़िलाफ़ तेरे बज़िद दिह्र की गवाही है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६७ – बारिश का इंतज़ार और पकौड़े… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बारिश का इंतज़ार और पकौड़े।)

☆ हेमंत साहित्य # ६७ ☆

✍ बारिश का इंतज़ार और पकौड़े… ☆ श्री हेमंत तारे  

दिल ने कहा था

जिस दिन उमड़ेंगे बादल,

घिरेंगे घनघोर,

बरसेंगे झमाझम,

उसी दिन तलेंगे पकौड़े

और होगी चाय के साथ

कुछ जुगत, कुछ चुहल

और नई पुरानी यादों की जुगाली

 

बेसन, हरी मिर्च, धनिया, प्याज़, आलू

सभी को कर दिया ताकीद

कि

हो जाए मुस्तैद,

एक आवाज पर कटने

खौलते तेल में गिरने के लिए

 

बादल आए भी कई बार,

काले-काले,

रोबदार,

सूरज की रोशनी को कर गए गटक,

और माहौल बनाया ऐसा

कि बस अब बरसे

कि तब बरसे।

 

मैंने भी खिड़की से पूछा—

भाई साहब, शुरू करें?

बादल गरजे

हाँ… हाँ… अभी आते हैं।

और फिर…

हो गए लापता यूं

कि ढूंढो हमे, गर खाना है पकौडे

 

बारिश भी नेताओं से कम नही,

घोषणा जोरदार,

अमल नदारद!

पकौड़ों का सामान

मुँह ताकता रहा,

तेल बेचारा ठंडा पड़ा रहा,

और मेरा मन

बारिश की राह देखता रहा।

 

लेकिन आज

दिल और दिमाग—

दोनों की छुट्टी कर दी मैंने।

 

सोचा,

बारिश आए तो भी पकौड़े,

न आए तो भी पकौड़े!

आखिर पकौड़ों का

बारिश से क्या लेना-देना?

और तभी याद आई

हुकूमत में बैठे

उस नेता की वह

अमर अर्थव्यवस्था,

जिसमें नौकरी न मिले,

काम न मिले,

तो नौजवानों से कहा गया था

पकौड़े तलो!

 

तेल चढ़ाया,

बेसन घोला,

प्याज़ डाला,

आलू मिलाए,

हरी मिर्च ने थोड़ी बहादुरी दिखाई

और मैंने…

 

तल डाले पकौड़े.

 

आज पहली बार

उस महान दर्शन की

गहराई समझ में आई।

बारिश नहीं आई

कोई बात नहीं,

रोजगार, हाथ न आए

कोई बात नही

पकौड़े तलो और

कर लो जुगाड

लल्ला – लल्ली के दूध की

मेहरारू की बिंदी, टिक्की लाली की

 

आज तल लिये हैं पकौड़े मैंने

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७५ ☆ कविता – प्रेम गीत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण  कविता – “प्रेम गीत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७५ ☆

✍ कविता ☆ प्रेम गीत☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

गाते जाओ, गाते जाओ, प्रेम के गीत गाते जाओ,

जो भी मिले दीन-दुखियारा, गले उसे लगाते जाओ।

*

नफरत की हर एक चिंगारी, मिलकर आज बुझानी है,

प्रेम-सुधा की गंग बहाकर, दुनिया नई सजानी है।

*

जो बाँटें मानव-मानव को, वे बंधन टूट जाने दो,

दिल से दिल का सेतु बनाकर, प्रेम-ध्वजा लहराने दो।

*

भूखे के घर रोटी पहुँचे, प्यासे को जल भी मिल जाए,

रोती हुई हर माँ की आँखों में,  नया तराना फिर से आए।

*

जिसके तन पर वस्त्र न हों, अपना आँचल बिछा देना

जिसके मन में दर्द भरा हो, अपना ही दिल  थमा देना।

*

मंदिर मस्जिद बाद में जाना, पहले मन को मंदिर कर,

ईश्वर वहीं विराजेगा जहाँ, प्रेम बहे निष्कलुष निर्झर।

*

पत्थर में भगवान खोजने वालों, इतना याद रख लेना,

रोते हुए इंसान के आँसू, पहले हँसकर पोंछ सुखा देना।

*

तलवारों से जग जीता है, यह इतिहास तो पुराना है,

प्रेम से जो दिल जीत सके, वही सच्चा वीर सयाना है।

*

क्रोध अगर अंगार बने तो, प्रेम उसे शीतल कर देगा

करुणा का एक दीप अकेला, युग का तम भी हर लेगा।

*

आओ ऐसा युग रच डालें, जहाँ रहे  न कोई पराया हो,

हर आँगन में प्रेम खिले, और हर चेहरा मुस्काया हो।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५८ – बुन्देली कविता – ”वे पथरा खों दूद पिवा रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – वे पथरा खों दूद पिवा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५८ ☆

☆  बुन्देली कविता – वे पथरा खों दूद पिवा रय ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

बे पथरा खों दूद पिबा रय

देखौ कैंसो भ्रम फैला रय

आइ महामारी, व्यापारी

रोज कफन कौ, रेट बढ़ा रय

 *

पंडत जी छप्पन भोगों की

ओ गरीब खें कथा सुना रय

 *

दिवता सें कम नइँ बे सेवक

जो भूखों के पेट भरा रय

 *

ऐड़ी-चोटी कर चुनाव में

नेता अपने दाँव लगा रय

 *

बम्म पटकबे बारे भग गय

घायल रिश्ते, घाव दिखा रय

 *

भगवतसाम्हूँ प्यासो तड़पत

बे नदिया कौ पता बता रय

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “ये अजीब इत्तेफाक़ है” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – ये अजीब इत्तेफाक़ है… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

दिल के प्याले में

स्याही भरी होती है

यादों में आए उबाल से

छलक कर बाहर निकल आती है

गीले हरुफ़ लिखती हुई

किसी इबारत, किसी तहरीर को

शक्ल देती है

कभी ये हरुफ़ जल्दी सूखते हैं

कभी एक लंबे अरसे को गीले

रह जाते हैं

छूना नहीं इन गीले हरुफ़ों को

रोशनाई फैल कर,

सफ़े को धुंधला कर देगी

ये धुंधलापन सालता रहेगा

कचोटता रहेगा

लिहाज़ा, स्याही के सूखने का इंतज़ार

तो करना ही होगा…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकाक्षी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – एकाक्षी ? ?

एकाक्षी होना चाहता हूँ,

आवश्यक नहीं

एक आँख बंद कर लूँ,

वांछित है; दोनों में

समत्व विकसित कर लूँ!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३० – बरगद बनकर छाँव बनाई… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई...। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३० ☆

☆  बरगद बनकर छाँव बनाई…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

(समांत—- पदांत -आना, मात्रा भार-16, (चौपाई छंद))

सोते को है सरल जगाना।

पर जगते को कठिन उठाना।।

*

जीवन दाँव लगाया फिर भी।

मात-पिता का लुटा खजाना।।

*

बरगद बनकर छाँव बनाई।

चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

*

उँगली थामे बड़े हुए पर।

सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

*

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।

पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

*

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।

कैसा आया नया जमाना।।

*

संस्कृति और सभ्यता रूठी।

जागो मानव क्यों पछताना।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९७ – प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९७ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

और

जो प्रायमरी का मास्टर है

वो तो है और भी अधिक असहाय।

 

कोई धनी धोरी नहीं है उसका

उससे ज्यादा रुतबेदार होता है

सिपाही पुलिस का।

 

जाने उसकी किस्मत में

क्या बदा है,

आज वो गुरू नहीं

सिर्फ गधा है

जिसके ऊपर अनावश्यक

आदेशों और प्रतिबन्धों का

भारी बोझा लदा है।

वो जाता है स्कूल

तपती दोपहर में

या कि फिर तड़के।

थोड़ी सी जगह में बैठकर

उससे कोई दीक्षा नहीं लेता,

वो किसी को शिक्षा नहीं देता।

वो तो बढ़ाता है भीड़ को।

 

पढ़ाता है वो पचास लड़के।

और आगे चलकर

वही भीड़ नष्ट करने लगती है

प्रजातांत्रिक नीड़ को।

 

छूटता है स्कूल

तो लगता है जैसे

छूटा हो कोई खिरका,

कोई ठेका नहीं ले सकता क्या

इनकी फिकर का ?

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९४ – “ताप रहे हैं दुख अपने सब…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत ताप रहे हैं दुख अपने सब...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “ताप रहे हैं दुख अपने सब...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

सहज उमीदों के आँगन में

पगड़ी लिये पिता ।

ताप रहे हैं दुख अपने सब

सिगड़ी लिये पिता ॥

 

रहा वेग आँसू का

तय फिर कैसे कर लेते ।

बाहों में आकार नदी का

कैसे कर लेते ।

 

ऊँचाई पर जा सकने की

चाह रही उनकी –

सुविधाओं की कितु नसेनी

लँगड़ी लिए पिता ॥

 

दर्द नहीं रोया कितना हो

आगे कठिन समय ।

पास नहीं फटका उनके ज्यों

अप्रत्याशित भय ।

 

जीवनराग रहे वे गाते

बस प्रसन्न होकर –

नये हौसलों की छोटी सी

खँजडी लिये पिता ॥

 

प्रतिभायें सब उनके

पद चिन्हो पर थीं चलती ।

सबकी आशायें प्रकाश में

थीं उनके पलती ।

 

उनके ही संदर्भ सभी को

रहे मार्ग दर्शक –

चलते रहे व्यवस्थायें

सब पिछड़ी लिये पिता ॥       

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

01-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७६ ☆ # “सावन आ गया है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता सावन आ गया है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७६

☆ # “सावन आ गया है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

 

यह सावन का मौसम

यह रिमझिम फुहारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारें

 

यह तरुवर से कैसी

लिपटती हुई बेलें

प्रीत का नया

सावन में खेल खेलें

यह अठखेलियां

कर रही तुमको इशारे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारें

 

वर्ष कि यह

लंबी लंबी झड़ियाँ

बूंदों की यह

लंबी-लंबी लड़ियाँ

यह लड़ियाँ यह झड़ियाँ

सब रंग है तुम्हारे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

सावन है मधुरस

पीने का मौसम

मदहोशी में गाफिल

जीने का मौसम

रस से भरे हैं

तुम्हारे नैन कटोरे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

सावन आ गया है

अब तुम भी आ जाओ

व्याकुल है मन

अब ना तरसाओ

भीगकर बारिश में

संग कुछ वक्त गुज़ारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

यह सावन का मौसम

यह रिमझिम फुहारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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