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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – * लंगोटी की खातिर * – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक    लंगोटी की खातिर              आदिवासी जिले में भ्रमण के दौरान बैगाओं की दयनीय स्थिति देख प्रशांत का मन द्रवित हो गया  । क्योंकि आदिवासी समाज के विकास एवं उन्नति हेतु सरकार के द्वारा आजादी के बाद से ही विभिन्न योजनाओं  के अंतर्गत करोड़ों रुपये खर्च किये जा चुके हैं । बैगाओं की इस स्थिति हेतु उसने वहां के आदिवासी विकास अधिकारी से पूछ ही लिया -- " आजादी के 65 वर्षों के बाद भी आदिवासियों के तन पर सिर्फ लंगोटी ही क्यों ? " अधिकारी ने जवाब दिया -- " यदि हम आदिवासियों को लंगोट के स्थान पर पेंट शर्ट पहना देंगे तो हममें और उनमें क्या अंतर रह जावेगा ? उनकी पहचान नष्ट हो  जावेगी , फिर हम विदेशी पर्यटकों को बैगा आदिवासी कैसे दिखावेंगे और वे उनकी लंगोटी वाली  वीडियो फ़िल्म , फ़ोटो कैसे उतारेंगे ? अतः उनकी पहचान बनाये रखने  उन्हें लंगोटी में ही रहने देने के लिए सरकार द्वारा करोड़ों रुपये...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – * वात्सल्य * – डॉ. मुक्ता

डा. मुक्ता वात्सल्य (डॉ . मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की एक लघुकथा   ‘वात्सल्य ’)   आठ माह पूर्व उसके बेटे कृष्ण का निधन हो गया था। उसकी मां निरंतर आंसू बहा रही थी, उस बेटे के लिये जो उससे बात नहीं करता था,उसे गालियां देने व उस पर हाथ उठाने से तनिक गुरेज़ नहीं करता था,जिसने कभी अपने घर में कदम नहीं रखने दिया। यह सब देख कर सपना हैरान थी।वह स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पायी और उसने उससे पूछ ही लिया...आप किसका मातम मना रही हैं?  वह बेटा...जिसने पिता के देहांत के पश्चात् अपनी विधवा मां की जायदाद हड़प कर रोने-बिलखने को छोड़ दिया और कभी बीमारी में भी  उसका हाल पूछने नहीं आया। वह बेटा जिसने अपने बच्चों को कभी उससे बात तक नहीं करने दी और उसकी ज़िन्दगी को बद से बदतर बना डाला। मां ने उस बेटे को कैसे माफ कर दिया... यह समझना उसके वश की बात नहीं थी। © डा. मुक्ता पूर्व...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – * अपराध बोध * – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक  अपराध बोध  रात के सन्नाटे में गुप्ता सर कोचिंग क्लास में  पढ़ाकर अपनी मोटरसाइकिल से घर जा रहे थे । अचानक एक मोड़ पर चार हथियारबंद युवकों ने सामने आकर उन्हें रोक लिया । एक युवक ने उन्हें छुरा पेट में अड़ाते हुए कहा " जो भी माल हो फौरन निकाल कर दे दो , वरना ......... " गुप्ता सर ने घबराई हुई आवाज में कुछ कहना चाहा, तभी उन्हें वह लड़का जाना पहचाना लगा । उन्होंने उसे गौर से देखा और आंखों में चमक लाते हुए बोले - " अरे......... विनोद बेटे तुम......... मुझे पहचाना नहीं, मैं तुम्हारा गुरूजी, तुम्हें मैंने 12 वीं कक्षा में पढ़ाया था........."  विनोद नें बात बीच में ही काटकर गुर्राते हुए कहा ......... "चुप......... अपनी गन्दी जुबान से गुरुजी जैसे पवित्र शब्द मत निकालिये। आप जैसे शिक्षा के व्यापारियों ने वास्तविक गुरूजी के ज्ञान को पीछे धकेल कर शिक्षा का मजाक बनाकर सिर्फ रुपया कमाना अपना उद्देश्य बना लिया है और हम जैसे...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – * तलाक की मिठाई * – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक  तलाक की मिठाई  "अंकल जी नमस्ते, आंटी कहां हैं ?" हमने नजर उठाकर देखा तो कालोनी के दुबे जी की लड़की सोनल खड़ी थी । सोनल की शादी अभी दो वर्ष पूर्व ही हुई थी, किंतु ससुराल वालों से किसी बात पर हुई खटपट एवं पति के दुर्व्यवहार के कारण वह एक माह के भीतर ही मायके लौट आई थी । "आंटी जी तो नहीं हैं, वे बाजार गई हैं ।" " ठीक है अंकल ये मिठाई रख लीजिये " " मिठाई .... किस ख़ुशी में ... " मैंने पूछा । सोनल ने कुछ शर्माते और मुस्कराते हुए कहा - "अंकल, वो मुझे तलाक मिल गया है ना, उसी की मिठाई है ।" सोनल चली गई, लेकिन मैं मिठाई का पैकिट हाथ में लिये सोच रहा था कि क्या जमाना इतनी तेजी से बदल रहा है ? विवाह की मिठाई तो खाई थी, अब तलाक की मिठाई - क्या आधुनिकता के मायने भी बदल रहे हैं ? ऐसे अनेकों प्रश्न मेरे मस्तिष्क में चक्कर काटने...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – * एक्सीडेंट  * – डॉ . प्रदीप शशांक 

डॉ . प्रदीप शशांक    एक्सीडेंट  "हुजूर, माई -- बाप मुझे बचा लीजिये, वरना जनता मुझे मार डालेगी ----" कहते हुए ट्रक ड्राइवर थाने में प्रवेश कर सब- इंस्पेक्टर के कदमों में गिर गया। सब - इंस्पेक्टर मेहरा ने कड़कदार आवाज में उसे गाली बकते हुए कहा --"किस को अपने ट्रक  की चपेट में ले लिया ?" "हुजूर, अम्बेडकर चौक पर अचानक एक कॉलेज की लड़की गाड़ी सहित ट्रक के नीचे आ गई । सच कह रहा हूँ हुजूर, मेरा कोई दोष नहीं है । में वहां से सीधा ट्रक लेकर आपके पास आ गया, पब्लिक के पहुंचने से पहले हुजूर ये एक हजार रुपए  रखिये और मामला निपटा दीजिये ।" "हूँ --"  सब इंस्पेक्टर ने चारों ओर देखा, दोपहर डेढ़ बजे का समय था, ड्यूटी पर तैनात सिपाही खाना खाने पीछे ही पुलिस लाइन के अपने क्वार्टर पर गए हुए थे और बड़े साहब भी नहीं थे, मौका अच्छा था । उसने सोचा - आज यह पूरी रकम उसकी है, किसी को भी हिस्सा नहीं...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – * जनरेशन गैप * – सुश्री ऋतु गुप्ता

सुश्री ऋतु गुप्ता जनरेशन गैप (प्रस्तुत है सुश्री ऋतु गुप्ता जी की  एक विचारणीय लघुकथा। ) मोहित जब भी अपने पिताजी से बात करता किसी बात का सीधा उत्तर न देता। पिता रामदास परेशान हो उठते सोचने लगते क्या तीन लड़कियों के बाद इसी दिन को देखने के लिए पैदा किया था इसको,न जाने परवरिश में क्या कमी रह गई? जब भी बात करो टेढ़ेपन से जवाब देता है।मेरी तो कोई भी बात अच्छी नहीं लगती। एक दिन जब वह मोहित से पूछने लगा कि घर लौटने में आज देर कैसे हो गई, कॉलेज में एक्सट्रा पीरियड था क्या? बस मोहित तो सुनते ही बस आगबबूला हो गया,"आपकी क्या आदत है,क्यूँ हर वक्त इन्क्वायरी करते रहते हैं?मैं कोई दूध पीता बच्चा थोड़े ही हूँ।अपना बुरा भला समझता हूँ।" रामदास तो उसको लेकर आज पहले ही परेशान था एक थप्पड़ झट से गाल पर जड़ चिल्लाने लगा,"बाप हूँ तेरा बोलने की तमीज नहीं है,माँ-बाप के लिए बच्चा कभी बड़ा नहीं होता है। हम चिन्ता नहीं करेंगे तो क्या...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – आत्मग्लानि – श्री कुलदीप सांखला

श्री कुलदीप सांखला आत्मग्लानि (श्री कुलदीप सांखला एक युवा लेखक हैं। इनकी चर्चित पुस्तक  "Believe in I" है। श्री कुलदीप जी ने अपना करियर शिक्षक के रूप में प्रारम्भ किया। इसके साथ ही वे युवाओं के लिए प्रेरणास्पद लेख लिखते हैं एवं एक प्रेरक वक्ता भी हैं। प्रस्तुत है  श्री कुलदीप जी की एक प्रेरक कथा। ) शर्मा जी को हमेशा से एक ही आदत ही रही है कि उनको कभी ये लगता ही नहीं कि जो भी उनके पास है वो काफी है। यूँ तो बहुत से लोगों को यही आदत है कि उनको दूसरों के पास ही हमेशा कुछ ज्यादा ही लगता है। शर्मा जी के पड़ोस में ही मेहता साहब भी रहते हैं। मेहता साहब बड़े ही खुशमिजाज इंसान हैं, जो मिला उसी में खुश, जितना मिला उसी में खुश। मेहता साहब का बड़ा अच्छा बिजनस था, उसी के सहारे अपने बेटे को पढ़ाया, उसे पढ़ने विदेश भी भेज दिया, उसी बिजनस से अच्छा मकान, गाड़ी सब ले लिया। यूँ...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – * “मैंने उस दर्द को सीने में छुपा रक्खा है” * – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय "मैंने उस दर्द को सीने में छुपा रक्खा है" (प्रस्तुत है श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी  की  एक सार्थक एवं मार्मिक -प्रेरणास्पद कथा।)  तुमने मुझसे पूछा है कि जब मैं 26 साल में विधवा हो गई थी तो फिर से प्रेम करके पुनर्विवाह क्यों नहीं कर लिया। संतान पैदा कर लेतीं, बुढ़ापे का सहारा हो जाता। चैन सुख से जीवन गुजर जाता। ये देशभक्ति, देश सेवा, समाजसेवा के चक्कर में क्यूं पड़ गईं ? तुम्हारे सवाल का जबाब देना थोड़ा मुश्किल सा है क्योंकि तुम नहीं समझ पाओगे, न्यायालय नहीं समझ पाया, जो अपने आपको देशभक्त कहते हैं ऐसे बड़े नेता नहीं समझ पाए। दरअसल 25 साल में मेरी शादी बीएसएफ के एक बड़े अधिकारी से हुई, शादी के बाद हम पति पत्नी ने तय किया था कि बच्चा दो साल बाद पैदा करेंगे, होने वाली संतान को ऐसे संस्कार देंगे कि वह बेईमानी, भ्रष्टाचार, लफ्फाजी का विरोध करे और उसके अंदर देशसेवा के लिए जुनून पैदा हो। शादी के बाद उनकी पोस्टिंग कुछ...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – * “गम” ले * – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक  "गम" ले  सिर पर रखी बड़ी टोकरी में तीन -चार गमले लिये एक  वृद्ध महिला कालोनी में " ले गमले .... ले गमले " की आवाज लगाती  हुई  आ रही थी । श्रीमती जी ने उसे आवाज देकर बुलाया ,उसके सर पर रखी टोकरी को अपने हाथों का सहारा देकर नीचे उतरवाया और उससे पूछा - "कितने के दिये ये गमले ?" उसने कहा- "ले लो बहन जी , 100 रुपये में एक गमला है ।" श्रीमतीजी ने महिला सुलभ स्वभाव वश मोलभाव करते हुए एक गमला 60 रुपये में मांगा । "बहिन जी , नही पड़ेगा । हम बहुत दूर से सिर पर ढोकर ला रहे हैं , धूप भी तेज हो रही है । जितनी जल्दी ये गमले बिक जाते तो हम घर चले जाते । आदमी बीमार पड़ा है घर पर ,उसके लिए दवाई भी लेकर जाना है । ऐसा करो बहिनजी ये तीनों गमले 250 रुपये में रख लो ।" श्रीमती जी ने कहा --"3 गमले रखकर क्या...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – कपूत / कुमाता ? – डॉ . प्रदीप शशांक 

डॉ . प्रदीप शशांक  कपूत / कुमाता ? (e-abhivyakti में डॉ प्रदीप शशांक जी का स्वागत है।) उत्कर्ष की  अवांछनीय हरकतें दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थीं । गलत दोस्तों की संगत में रहकर वह पूरी तरह बिगड़ चुका था । उत्कर्ष की हरकतों से वह बहुत परेशान रहती थी । वह उसे बहुत समझाने की कोशिश करती किन्तु उत्कर्ष के कानों में जूं तक  न रेंगती । उत्कर्ष के पिता की  मृत्यु के पश्चात उसने यह सोचकर अपने आप को संभाला था कि अब उसका 24 वर्षीय पुत्र ही उसके बुढ़ापे का सहारा बनेगा , किन्तु वह सहारा बनने की जगह उसके शेष जीवन में दुखों का पहाड़ खड़ा करता जा रहा था । जुआ ,सट्टा एवं शराब की बढ़ती लत के कारण आये दिन घर पर उधार वसूलने आने वालों से वह बेहद परेशान हो गई थी । आखिर उसने उत्कर्ष के व्यवहार से परेशान होकर अपने ह्रदय को कड़ा करते हुए  एक कठोर निर्णय लिया । कुछ दिन बाद समाचार पत्रों में आम...
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