(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “अफसोस… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३१ ☆
लघुकथा – अफसोस… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
राज कमल किसी काम से अहमदाबाद गए तो काम पूरा होने के बाद अपनी बेटी के यहां चले गए। उनकी बेटी श्वेता का विवाह अहमदाबाद में एक सुशील कुमार के साथ हुई थी। सुशील एक होनहार इंजीनियर थे और सूरत में तैनात थे। अहमदाबाद में उनका अपना घर था। घर में माता पिता के साथ उनकी पत्नी श्वेता व पुत्री रहती थी। श्वेता पढ़ी लिखी थी और विवाह से पहले शिक्षिका थी। पर विवाह होने के बाद उसने नौकरी नहीं की। सास ससुर की सेवा और अपनी तीन वर्षीय बेटी के लालन पालन को अधिक महत्व दिया। उसकी सास उसके सेवा कार्य से बहुत खुश थीं और खुशी खुशी श्वेता की दिनचर्या बता दी कि वह सुबह अपनी बेटी को स्कूल पहुंचा कर दूध लेती आती है। आकर चाय बनाती है और सास ससुर के लिए नहाने के पानी गरम करती है। खुद नहा धोकर नाश्ता बनाती है। सास ससुर को नाश्ता कराकर बेटी को स्कूल से लेने जाती है और लौटते हुए सब्जी वगैरह भी लेती आती है। फिर घर आकर खाना बनाती है और सास ससुर को खाना खिला कर बेटी का होमवर्क पूरा कराती है।
बेटी का होमवर्क पूरा कराते और उसे खिलाते पिलाते शाम के चार बज जाते हैं जो चाय का समय होता है। चाय पिलाकर बेटी को पार्क में खेलने के लिए ले जाती है। बेटी खेलते खेलते थक जाती है तो उसे घर लेकर आती है और उसके सोने से पहले खाना खिला देती है। फिर घर का भोजन बनाती है और समय पर सास ससुर को भोजन कराकर दवा वगैरह खिला देती है। फिर स्वयं भोजन करती है। भोजन के बाद सवेरे की तैयारी करके सोने का समय मिल पाता है। रसोई झाड़ू पोंछा बर्तन साफ करने के बाद दिन में समय मिलता है तो मशीन में कपड़े डालती है और रात में सोने से पहले सुखाने डाल देती है। उसके नाश्ते भोजन और आराम का कोई समय नहीं है। बहुत मेहनत करती है।
राज कमल से बेटी की सास बोली, “समधी जी, आपने श्वेता को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। हमारा बेटा बाहर नौकरी करता है पर श्वेता के कारण हमें उसकी कमी महसूस नहीं होती।” राज कमल मुस्कुरा कर रह गए। दूसरे दिन उन्होंने श्वेता की दिनचर्या देखी तो परेशान हो गए। क्योंकि दिनचर्या वैसी ही थी जैसा सास ने बताया। बेटी को बिल्कुल आराम न मिल पाने पर उन्हें बहुत दुख हुआ। वे सोचने लगे कि सुशील को अच्छा वेतन मिलता होगा। कम से कम झाड़ू पोंछा और बर्तन मांजने के लिए कामवाली रख सकते हैं। अपनी बेटी को नौकरानी जैसी स्थिति में देख कर दुखी होते रहे। ऊपर से उसकी सास के बोल, “अरे श्वेता बेटी थोड़ा आराम कर लो और अपने पिताजी के पास थोड़ा बैठ लो” उनके घाव पर नमक छिड़कने लगे, क्योंकि श्वेता तो मशीन की तरह लगी रहती, उसके आराम की बात तो किसी के मन में आती ही नहीं। वे बेटी को दिए संस्कारों पर मन ही मन अफसोस करने लगे। राज कमल बेटी के यहां एक दिन और रुक गए। शाम को बाहर से आए तो उनके साथ एक औरत थी। उसकी ओर इशारा करते हुए श्वेता से बोले, “बेटी कल से ये तुम्हारे यहां झाड़ू पोंछा और बर्तन साफ किया करेंगी। कुछ और भी मदद ले सकती हो। इनका वेतन मैं दिया करूंगा।” श्वेता “पापा” कह कर उनसे लिपट गई और सास ससुर मूक दर्शक बने खड़े थे। राज कमल का अफसोस धीरे धीरे पिघलने लगा।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – समझदारी।)
मेरे पड़ोस में शिवानी आंटी रहती है। किसी के घर का कोई भी सामान देखती हैं और उन्हें अच्छा लगता है तो वह अपने घर जरूर खरीद कर ले आती। मेरी मां सविता जो कि दिखावेपन से बिल्कुल बहुत दूर रहती हैं और उनका सारा वक्त उनके बालकनी में लगे हुए फूलों के पौधों में ही जाता है। उन्हें फूल लगाने का बहुत शौक है। भगवान को भी चढ़ाने के लिए मिल जाता है और बालकनी में पूरे समय महक बनी रहती है। मोगरा, चमेली, गुलाब, गुड़हल आदि उन्होंने फूलों को गमले में ही लगा कर रखे थे। बालकनी भी बहुत सुंदर लगती थी।
मां की पड़ोस की कुछ सहेलियां उस दिन मिलने के लिए आई। उन्होंने कहा कि सविता हम तुम्हारी बालकनी में ही बैठ कर चाय पिएंगे। ऐसा लगता है कि किसी बगीचे में बैठे हैं और हम कुछ सेल्फी भी खींच लेंगे यहां पर फोटो बहुत अच्छी आएगी। उन्होंने शिवानी आंटी को आवाज दिया – शिवानी क्या कर रही हो? हम सब यहाँ मिलकर सेल्फी भी खींच रहे हैं तुम भी आओ देखो सविता की बालकनी कितनी सुंदर है यह सुनते हुए उनको बहुत बुरा लगा। उन्होंने कहा- मुझे बहुत काम है अभी मुझे बाहर जाना है। ऐसा कह कर वह अंदर चली गई और कुछ देर बाद वे कहीं जाने के लिए तैयार हो गई फिर वे कहीं चली गई। मेरी मां की सहेलियां भी चली गई। शिवानी आंटी ने बालकनी में बहुत सारे प्लास्टिक के फूलों को लगा लिया। बालकनी सजा कर मेरी मां को सविता ओ सविता आओ दोपहर में तुम अपनी बालकनी मुझे दिखा रही थी सुंदर फूल यहां देखो तुम्हारी फूलों से भी सुंदर मेरे पास फूल है और इन्हें पानी देने की भी जरूरत नहीं है और यह फूल कभी मुरझाएंगे नहीं। हमेशा यह फूल हरे भरे रहेंगे और किसी बात का कोई टेंशन ही नहीं रहेगी। मेरी बालकनी हमेशा फूलो से भरी रहेगी तुम्हारी बालकनी में तो कभी कभी फूल खिलते भी नहीं है। फालतू के काम करने पड़ते हैं मेरी मां ने कहा शिवानी सचमुच तुम्हारी बालकनी बहुत सुंदर लग रही है मेरी बालकनी से बहुत अच्छी है, और यह फूल अच्छे हैं कभी नहीं मर जाएंगे। पर क्या वह आनंद भी दे पाएंगे जो जीवित फूल मुझे देते हैं? शिवानी आंटी निरुत्तर होकर मेरी मां को एकटक देखती रह गई।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अनंत शुभकामनाएं”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३८ ☆
🌻लघुकथा🌻 अनंत शुभकामनाएं 🌻
सोशल मीडिया पर वायरल बधाईयाँ, फूल- पत्ती, भगवान के चित्र, फिल्मी गाने के बोल – – – क्यों कि बधाईयाँ और शुभ मंगल भाव, ह्रदय से नहीं केवल डिलीट और फारवर्ड पर टिका है।
चरण स्पर्श कर दीर्घायु हों, स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद अब सपना हो गया। किसी को मिला भी तो डिलीट और फारवर्ड 🙏
अब सिर्फ किस्से कहानियों पर ही सिमट चला। सारी बधाईयाँ और मंगल भाव।
Congratulations for both of you. God bless you. बस यही देखते रह गये।
सोहन मेसेज लिख रहा था – – पत्नी ने खूब सारा प्यार और दुलार के साथ आशीर्वाद लिखवा रही थी बेटा बहु को।
क्या? मैने जैसा कहा – आपने वो सब लिख दिया। सोहन इसके पहले कुछ बोलता बेटे का मेसेज आया – – – Happy Ganesh!!
चुपचाप लिखे मेसेज को डिलीट कर सोहन लिख दिए – – – Same to you
ऐ जी खूब सारा आशीर्वाद लिखे कि नहीं? जैसा तुम चाहती थी मैने वो सब लिख दिया।
आप कितने अच्छे हैं, चरण छूते भगवती ने पति से कहा-पति देव गले लगाते, अश्रु छुपाते बोले–तुम्हारी सारी इच्छाएं पूर्ण हो।
वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री गिरिमा हार्दिक घारेखान जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. ३० साल विदेश में रहकर, वहाँ की इंडियन स्कूल में शिक्षिका रह चूकी सुश्री गिरिमा घारेखान जी ने भारत वापस आने के बाद अपना पुराना शौक जागृत किया और कहानियाँ लिखना शुरू किया. १० साल में उनकी 17 किताबें प्रकाशित हुई हैं जिन में चार कहानी संग्रह के अतिरिक्त दो उपन्यास, लघुकथा संग्रह, बालसाहित्य की किताबें, चरित्र लेखन और संशोधन आधारित पुस्तकें भी हैं. उनको मात्र तीन साल में गुजरात साहित्य अकादमी के पांचो पुरस्कार मिल चुके हैं. साथ में किताबों और कहानियों को मिले पुरस्कार मिलाकर उनको लगभग २५ अलग अलग पुरस्कार प्राप्त हुए हैं. उनकी कृतियाँ गुजराती भाषा के सारे नामी सामयिकों में नियमित प्रकाशित होती रहती है. उनके दोनों उपन्यास का हिंदी में अनुवाद हुआ है और अनूदित कहानियों का संग्रह उड़िया में भी हुआ है. कहानियाँ मराठी, अंग्रेजी और मैथीली में अनुदित हुई हैं. वे गुजराती भाषा के तीन सामयिकों में संपादक के रूप में कार्यरत है. केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित फेस्टिवल ऑफ़ लेटर्स, २०२५ में उनको कहानी पठन के लिए आमंत्रित किया गया था.
“यदि तुम्हें कहानी को ऐसे अधूरी ही रखना हो तो लिखना शुरू ही क्यों करते हो?’’ मेरी कहानी की पहली पाठक और विवेचक मेरी पत्नी ने थोड़ी चिढ़ के साथ कहा।
“पर उसका अंत ही मुझे मालूम नहीं हो तो मैं क्या करूँ?’’
“तो लिखो ही मत।’’
“तुम्हारे लिए ऐसा कहना आसान है। पर जब कहानी का भीतर से बाहर आने का दबाव हो तब उसे रोका ही नहीं जा सकता। क्या तुम सागर की लहरों को उछलने से रोक सकती हो?’’
“तो फिर चाहे जो अंत लिख दो न?’’
“ना, यह तो हरे-भरे पौधे पर प्लास्टिक का फूल रखने जैसा लगेगा।
“तो फिर तुम जानो और तुम्हारे पाठक जाने।’’
वह वहाँ से उठकर चली गई।
अब मेरी इस कहानी को पढ़कर आप लोग उसके अंत के बारे में निर्णय करना कि मेरी बात सही है या गलत है।
* * *
हम उस घर में नए नए रहने के लिए गए थे। तीन मंज़िला घर के पहले माले पर। जाने के बाद कुछ ही दिनों में माया ने उसका स्त्रीसहज एन्टेना को काम पर लगा दिया और रात को खाना खाते वक्त उसे प्राप्त जानकारी की ऑडियो मुझे सुनाने लगी। एक दिन उसने मुझे कहा, “हमारे नीचे जो परिवार रहता है, उसमें पुरुष का स्वभाव बहुत ही खराब है। सोसायटी में सबके साथ झगड़ा करता रहता है। उसकी इस आदत के कारण उसकी पत्नी और उसकी बेटी भी किसीसे मिलजुल नहीं पा रहे। बिटिया कुसुम को उसने बारहवीं कक्षा तक पढाकर पढ़ाई छुड़वा दी है। हमें तो उन लोगों से दूर ही रहना है।’’
माया की बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ,“हमारे नीचेवाले? बगीचेवाले! मैं तो मानता था कि ऐसे सुंदर फूल उगानेवाले व्यक्ति का स्वभाव बहुत कोमल होगा। जो व्यक्ति वनस्पति को प्यार करे वह इन्सानों को तो करेगा ही ना!’’
नीचे के फ्लेटवाले को उनके घर के आगेवाली जमीन मिली थी और उसमें उन लोगों ने सुंदर बगीचा तैयार किया था। वह मुझे मेरी बाल्कनी से अच्छे से दिखाई दे रहा था।
जवाब में माया ने मात्र उसके कंधे ही उछाले थे।
नीचेवाले बगीचे का सबसे सुंदर फूल मुझे कुछ दिनों के बाद देखने को मिला। एक दिन बड़े
तड़के मेरी आँख खुल गई और मैं बाल्कनी में जाकर खड़ा रहा। ऐसे भी मुझे बगीचे का बहुत शौक है और ताजा खिले हुए रंगबिरंगी फूलों को देखकर मेरे हृदय से सुगंध के फव्वारे छूटते हैं। उस दिन भी मैं अपनी आँखों में फूलों के रंगों का अंजन करता हुआ खड़ा था। उस वक्त घर में से एक लड़की बाहर निकली। वही कुसुम ही होगी। पहले तो मुझे उसकी पीठ पर फैले हुए काले, रेशमी बाल ही दिखे, क्योंकि वह हरएक पौधे पर झुककर उसके कानों में कुछ बातें कर रही थी। कभी किसी पत्ते को हाथ से सहलाती थी और यदि पत्ता सूख गया हो तो धीरे से उसे खींच लेती थी, पवन जिस प्रकार फूल से सुगंध खींचे ऐसे। फिर उसने एक थोड़े ऊंचे खिले हुए गुलाब के एकदम निकट अपने होंठ ले जाकर उसे चूमने जैसी चेष्टा की। उस वक्त मैंने उसके चेहरे को ठीक से देखा। मैं तय नहीं कर पाता था कि उसका चेहरा ज्यादा सुंदर था या वह पूरी तरह खिला हुआ गुलाब। वह ज्यादा गुलाबी था या उसे चूम रहे होंठ! उसी वक्त उसने भी ऊपर देखा। वह थोड़ी शरमाई। नक्काशी में नजाकत जुड़ गई। मुझे लगा कि उसकी बुआ को तो एवोर्ड देना चाहिए। उसका नाम कुसुम के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता!
मुझे उसके साथ बात करने की इच्छा हुई पर माया द्वारा कही गई बात को याद करके कुछ अनिर्णीत सा था, कि घर में से एक पुरुष बाहर आया। उसे देखते ही कुसुम चपला की चमक की भांति अंदर चली गई। वह पुरुष ने मुझे बाल्कनी में खडा पाया और चिल्लाया,“क्या है?’’ उसके बाद उसके होठ कुछ फड़फड़ाए। शायद एक-दो गालियाँ बोला होगा ऐसा लगा। यदि उसकी चलती तो उसकी कौड़े जैसी आँखों के डोरों को ऊपर तक भेज देता। मुझे अपनी अच्छे से उगी हुई सुबह को खराब नहीं करना था। मैं बिना कुछ बोले अंदर आ गया। अंदर जाकर मैंने माया से बात की। उसने कहा,“अच्छा हुआ आप कुछ बोले नहीं। कीचड़ में पत्थर फेंककर क्यों हम खुद को खराब करें। अब उस लड़की की ओर देखना नहीं। और क्या?’’
“पर माया उसे मेरी उम्र तो….’’
“सुंदर जवान बेटी का बाप किसी पर भरोसा नहीं कर सकता। कल ही ऊपरवाली लताबहन कह रही थीं कि उस कुसुम की बड़ी बहन किसी नीची जाति के व्यक्ति के साथ भाग गई थी। फिर वहाँ उसने आत्महत्या कर ली। उसके बाद ही यह आदमी ऐसा हो गया है। हमें क्या? जिस गाँव जाना नहीं उस गाँव का नाम लेना ही नहीं।’’
वैसे मेरे लिए तो वह बड़ा मुश्किल था। मैंने नाम लिए बिना उस गाँव जाने का रास्ता खोज लिया। मैं बड़े सवेरे बाल्कनी में तो खडा ही रहता, पर अंदर की ओर, रेलिंग पर झुककर नहीं। सूरज की ताजा जन्मी किरणों की तरह कुसुम बगीचे में टहलती रहती। वह हर पौधे को सहलाती, फूल खिला हो तो झुककर `थेंक यू’ कहती और कलियों को नजरों से पीती रहती। वह हर पौधे को बारी बारी अच्छी तरह से नहलाती थी। जब वह झुकी हुई हो तब वह भी एक झुकी हुई लता सी लगती थी। उसके सुन्दर चेहरे को छूकर उसके लंबे खुले बाल फूलों को गुदगुदाने के लिए पहुँच जाते थे मानों देखना चाहते हो कि कौन सबसे ज्यादा मुलायम है! कभी किसीकी ईर्षा नहीं करनेवाला मैं मन ही मन इस कुसुम के पापा की ईर्षा करने लगा था। कईंबार मुझे उस लड़की से बात करने का मन होता पर उसके पापा की उस माँ-बेटी पर चीख-चिल्लाहट बारबार सुनाई देती थी l मेरे कानों में घुसी हुई ये आवाजें मुझे ऐसा करने से रोकती थीं।
एक दिन तो मानो चमत्कार ही हो गया। मैं शाम को ऑफिस से लौटा तब नीचेवाले बगीचे को मैंने मेरे घर में बैठे हुए देखा! मेरे चेहरे के हावभाव देखकर माया ने मैं पूछूं उससे पहले ही बता दिया: “कुसुम को उसके फियान्स ने मोबाइल फोन भेजा है, इस लिए आयी है।’’
“फ़ीयान्स ने!’’ मैंने आश्चर्य अनुभव करते हुए कुसुम की ओर देखा। अभी तो मुश्किल से वह बीस साल की होगी। आज के जमाने में यह जल्दी नहीं कहलाए!
माया ने आगे कहा,`उसने तो कभी ऐसे मोबाइल का उपयोग किया नहीं है। इसलिए उसकी मम्मी ने उसे मेरे पास सीखने के लिए भेजा है। मैंने उसे कहा, कि मैं मोबाइल का उपयोग करती तो हूँ लेकिन डाउनलोड करना आदि मुझे आता नहीं है। इसलिए आपका इंतजार करती हुई बैठी है l’
“पर उसके पापा!’’
“वे दो दिन के लिए बाहर गए हुए हैं।’’ माया ने मेरी ओर सूचक दृष्टि से देखकर कहा।
“पापा के पास भी सादा मोबाइल है, अंकल। वे भी मुझे सीखा नहीं सकेंगे।’’ उस पुष्प में से सुरभि महक उठी।
माया चाय चढाने के लिए अंदर गई। मैंने कुसुम का मोबाइल लेकर उसमें सिमकार्ड रखा, चार्जर के साथ जोड़ा और उसे चालू किया। इतने नजदीक से मैंने कुसुम को पहली बार देखा था और मेरे घर में उसकी मौजूदगी से एक बेटी के पिता होने की मेरी अतृप्त इच्छा मुझे ज्यादा दंशित कर रही थी। मैं उसे मोबाइल के अलग अलग फीचर्स समझा रहा था कि माया चाय लेकर आयी।
“उसे तो आप सबसे पहले वोटस्एप डाउनलोड कर दीजिये। अभी तो उसके लिए इतने की ही जरूरत है।’’
“और अंकल, फोटो खींचना भी सीखा दीजिएगा। उन्हें मेरी फ़ोटोज़ चाहिएl ”
मैंने कुसुम की ओर देखा। उसकी आवाज ऐसे सिकुड़ क्यों गई? ऐसे वक्त तो `उनको’ बोलते वक्त शब्दों में रेशम नहीं बिछाया जाए? या फिर मन ने मुझे ऐसा महसूस नहीं होने दिया? वह शादी करके चली जाएगी- यह विचार हृदय में घुसी हुई फांस की भांति मुझे क्यों पीड़ा दे रहा था?
मैंने कुसुम को वोट्सएप का उपयोग करना, फोटो और सेल्फी कैसे ली जाए –यह सब सिखाया l उसके फोन में मेरा नंबर सेव करके लिए हुए फोटोज अन्य को किस प्रकार भेजे जाए आदि भी सिखाया। मैंने उसे उसके फ़ीयान्स के बारे में पूछा पर वह तो जवाब दिये बिना नीचे देखती हुई खामोश बैठी रही। उसके चेहरे पर अचानक धुंद छा गई हो ऐसा मुझे लगा। माया ने मुझे टोका,“एक तो लड़की पहलीबार इस प्रकार विवशतावश अकेली किसीके घर आयी है, और तुम ऐसे प्रश्न पूछकर उसे ज्यादा लजाते हो।’’
सब अच्छे से समझकर कुसुम नीचे गई। मुझे लगा कि उस वक्त उसकी आँखों में दो ओसकण झलक रहे थे।
उसके बाद कुसुम मेरे घर आयी नहीं। पर एक बदलाव आया। अब मैं बाल्कनी में खडा होऊँ तब पहले एक नजर घर में देखकर ऊपर देखकर थोड़ा मुस्कुरा लेती थी- दूज के चाँद सा, थोड़ा, क्षणिक, और हाँ, अब रोज सवेरे वह उसके बगीचे के किसी एक फूल की फोटो निकालकर मुझे भेजती थी….महदांश गुलाब ही। एक दिन उसने मुझे श्वेत सदाप्रसून(बारहमासी) की फोटो भेजी थी…..एक खुशबू रहित फूल! उसे और उसके पापा की सुबहवेला में सुनायी देनेवाली चीखचील्लाहटों से कोई संबंध होगा? एक सुबह मैंने देखा कि उसके गाल पर पाँच उँगलियों के निशान थे। उस दिन उसने मुझे सूरजमुखी की फोटो भेजी थी। मुझे उसमें उसके पापा का गुस्से से तमतमाता हुआ चेहरा नजर आता रहता था। कभी उसकी गुलाबी पलकोंवाली आँखें सूजी हुई लगती थी और कमल की पंखुरी की भांति उभर आती थी। ऐसे वक्त उसने फोटो में भेजे डाली पर रहे गुलाब की कोरें धूप के कारण झुलसकर काली पड गई हो ऐसा मुझे लगता था। एकबार तो उसने मुझे एक छोटे फूल पर पर बैठे हुए काले भौंरे की फोटो भेजी थी और एकबार फिर दो डालियों के बीच बंधे हुए मकड़ी के जाले का। ऐसी फोटो देखकर मुझे कुछ फिक्र होती थी, उसे मेसेज करने का मन करता था, पर फिर विचार आता था कि हो सकता है, उसका जल्लाद बाप उसका फोन भी देखता हो और मैं अपने विचार को अपने मन में ही रहने देता था। माया मुझे कहती रहती कि “फूलों की फोटो देखकर इतनी फिक्र क्यों करनी? कुसुम के मन में तो जैसा आप सोचते हो वैसा कुछ होगा भी नहीं।’’
मैं भी चाहता था कि माया सही हो।
हम लोग गर्मियों में एक टूअर में एक महीने के लिए परदेश गए थे। पहले ही दिन मेरा फोन पानी में गिरकर खराब हो गया। टूअर में तो रिपेर करने का वक्त भी किसके पास होगा? इसलिए उसे रख दिया बेग में। माया का फोन था इसलिए काम चल गया।
टूअर से हम लोग रात को घर वापस लौट आए थे। दूसरे दिन सवेरे उठकर मैं सीधे बाल्कनी में गया। मुझे मेरे घर से ज्यादा विरह तो मानो उस बगीचे के फूलों का हो गया था। पर मैंने नीचे जो देखा उसे मानने के लिए आँखें तैयार नहीं थीं। सारा बगीचा सूख गया था! सूखी हुई डालियाँ किसीको खोज रही हो ऐसे हवा में यहाँ वहाँ व्यर्थ कोशिशें करती हिल रही थीं। उसकी प्रत्येक जोड़ के गड्ढे में मानो आँखें फूटी हुई थीं और उनमें फंसे हुए ओसकण पौधे के आँसू होकर दु:ख व्यक्त करते थे। क्या हुआ होगा? कुसुम कहाँ गई होगी? मेरा मन अनेक शंका कुशंकाओं से भर गया। अनेक सवालिये सांप मेरे मन में उगी हुई घाँस में फूत्कारने लगे। मैं विचलित हो गया। मोबाइल में कुसुम का कोई मेसेज होगा? ऑफिस गया पर काम में दिल लगा नहीं। ऑफिस जाते वक्त फोन रिपेर करने के लिए दिया था। उसे लेकर मैं वापस घर आ गया।
कपड़े बदल रहा था तब माया ने एक ही सांस में सारे समाचार सुना दिये। “कुसुम की तो
शादी हो गई। सोसायटी के कॉमन प्लॉट में ही रखी गई थी। लताबहन ने कुसुम के वर को देखा। उससे तो वह बहुत बड़ा लगता था। बड़े बडे गलमूच्छों जैसी मूछें और हबसी सा काला कलूटा। कहते थे कि विवाह के वक्त दो समधियों के बीच लेन-देन को लेकर झगड़ा भी हुआ था। कुसुम बहुत रो रही थी। ससुरालवालों ने पगफेराई के लिए भी भेजा नहीं।’’
मेरे हृदय से हरेभरे बगीचे को भी सूखा दे ऐसा निश्वास निकल गया। अरर! बेचारी लड़की! उसके बाप ने ऐसा क्यों किया होगा? पैसेवाले होंगे? तो भी क्या? सोने की चमक-दमक फूलों की ताजगी को थोडे ही बचा सकेगी? फूल को तो चाहिए नर्म जमीन और हार्दिक सेवा टहल। क्या करती होगी कुसुम? मेरा उतरा हुआ चेहरा देखकर माया ने कहा:“अब आप दु:खी नहीं होना। उसके पापा ने उसे पूछकर ही तो संबंध जोड़ा होगा न?’’
मैं बिना कुछ बोले हमारी पाँच वर्षीया फोरम के माला चढ़ायी हुई फोटो की ओर देखता रहा। स्कूल की फेन्सी ड्रेस स्पर्धा में फूलपरी बनी थी। कितनी सुंदर लग रही थी!
माया कुछ देर तक मेरा हाथ पकड़े बैठी रही। फिर चाय चढाने के लिए रसोई में गई।
मैंने अपना मोबाइल चालू किया और कुसुम की प्रोफाइल देखने लगा। उसने कभी कभी मुझे घर में रखे हुए मनीप्लांट की फोटो भेजी थी, बस। क्या उसके नए घर में बगीचा या फूलपौधे नहीं होंगे? वैसे पिछले कईं दिनों से तो मनीप्लांट की भी फोटो नहीं थी। उसे कुछ हुआ तो नहीं होगा? वह खुश तो होगी ही न? उसके बारे में सोच-सोचकर मेरा हृदय क्यों खालीपन अनुभव कर रहा था। शरीर में लहू के साथ फिक्र भी घुली जा रही हो ऐसा मुझे लग रहा था l
अब सुबह वेला में मैंने बाल्कनी में जाना बंद कर दिया था, क्योंकि जब नीचे देखूँ तब बगीचे में जड़ें डालकर बैठे हुए खालीपन के साथ कहीं कोने में पड़े हुए, सूखकर झडे हुए फूलों में मुझे कुसुम का चेहरा नजर आता था और सूखी डालियों के बीच चमक रहे ओसबिन्दुओं में उसकी आँखों के आँसू। सूरज की किरणें उन आंसुओं को भी वहाँ टिकने नहीं देती थीं। वर्षाकाल से पहले के वातावरण की उमस से भी ज्यादा उमस मेरे मन को अनुभव होती रहती थी। नीचे जाकर उसके बाप से कुसुम की खबर पूछने का मन करता था। पर किस हक से? क्या पूछूं? ऐसा भी नहीं पूछ सकते न कि आप अपने बगीचे को पानी क्यों नहीं दे रहे? सोसायटी के लोगों के साथ वह जिस तरह से गाली-गलौज करता था, यह सुनकर तो उसके सामने खड़े रहने का भी मन करता नहीं था।
बहुत इंतजार कराने के बाद बरसात होने लगी। माया ने मुझे कहा;“अब हो सकता है बगीचा ताजगी से भर जाए। किसी पौधे में जान होगी तो फिर खिल उठेगा। कईंबार ऐसा होता है कि ऊपर से सूखा नजर आए लेकिन भीतर से ताजा हो।’’
“अब एक भी पौधे में जान बची हो ऐसा तुम्हें लगता भी है?’’
“आप आजकल ऐसे क्यों हो गए हो? मेरी समझ से परे हो गया है।’’ मेरे शब्द सुनकर माया का उत्साह पत्ते पर से पानी सरक जाए ऐसे खत्म हो गया। वह उसका फोन लेकर बैठ गई।
मैं फोरम की फोटो को देखता हुआ बैठा रहा।
एक दिन सुबह अचानक कुसुम के वोट्स एप में मैंने एक मेसेज देखा। उल्लसित होकर मैंने उसे खोला और….यह क्या? सूखकर कांटा हुए कैक्टस की फोटो थी! कैक्टस के कांटे फोटो में से निकलकर सीधे मेरे हृदय में गड़े जा रहे थे। मैं मोबाइल रखकर दो-दो सीढ़ियाँ उतरता हुआ सीधे नीचे गया। आज तो पूछ ही लेता हूँ। क्या कर लेगा उसका बाप मेरा?
बारबार दो बार बेल बजाया फिर भी किसीने जब दरवाजा नहीं खोला तो मेरी नजर नीचे की ओर गई। दरवाजे के बाहर तो बड़ा ताला लगा हुआ था।
बरसात के पानी से नीचे पड़े सडे हुए पत्तों की दुर्गंध मेरे अस्तित्व में फैल गई।
* * * *
अब आप ही कहो, इस कहानी का क्या अंत दिया जा सकता है?
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– महाजनी…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ७४ — महाजनी —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
महाजन ने जहाँ – जहाँ पैसा दिया था बीमारी और बुढ़ापे से त्रस्त होने पर मूल और सूद यथाशीघ्र समेटा। एक दिन शायद उसने सपने में पत्नी से कहा, “मुझसे पैसा लेती हो। अरी पगली, मूल न लौटाओ, लेकिन सूद तो देना।” एकदम अशक्त हो जाने पर महाजन दिनों पलंगजीवी बना रहा कि पत्नी ने अचानक ही कहा, “लो जी मैं सूद देती हूँ।” आश्चर्य, महाजन को बहुत सुकून पहुँचा। शायद उसका प्राणांत होने में अब आसानी होती।
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा आत्म-बोध।
☆ लघुकथा – आत्म-बोध☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त और ऐश्वर्यवान प्रसन्ना के जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि एक दिन अचानक उसके जीवन से शांति ग़ायब हो गई। उसकी अच्छी-ख़ासी ज़िंदगी में उथल-पुथल मच गई। वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर शांति उसे बिना बताए कहाँ छोड़कर चली गई है। आज के माहौल को देखते हुए बार-बार उसके मन में यह संदेह पैदा हो रहा था कि कहीं किसी दुष्ट-दुर्जन ने उसका अपहरण तो नहीं कर लिया है।
प्रसन्ना ने थाने में जाकर शांति के ग़ायब हो जाने की रपट लिखवाई। पर जैसाकि आमतौर पर होता है पुलिस ने उसको ढाढ़स बँधाते हुए आश्वस्त किया कि हम अपनी ओर से शांति को खोजने का भरसक प्रयास करेंगे और जैसे ही कहीं से कोई सूचना मिलेगी श्रीमान को सूचित कर दिया जाएगा। दूसरी ओर प्रसन्ना ने अपनी ओर से जान-पहचान वालों और नाते रिश्तेदारों को फ़ोन कर शांति के बारे में पूछताछ की, अख़बारों में शांति के ग़ायब हो जाने के इश्तहार छपवाए, पर शांति का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। उधर साल भर बीत जाने के बाद भी पुलिस की ओर से कोई सूचना नहीं मिली।
आखिर एक दिन थक-हारकर प्रसन्ना ने ईश्वर के समक्ष अपनी ओर से शांति की खोज के तमाम हथियार डाल दिए। उसी रात प्रसन्ना के सपने में शांति प्रकट हुई और उससे बोली- ‘मेरे प्रिय प्रसन्ना ! मेरा ना तो किसी ने अपहरण किया था और न ही मैं तुम्हें कहीं छोड़कर गई थी। पर जब मैंने देखा कि तुम मुझे और अपने बच्चों को छोड़कर अपने नाम, व्यवसाय, प्रसिद्धि और धन-दौलत को प्यार करने लगे, बात-बात पर मुझे अपमानित और उपेक्षित करने लगे, तो दरअसल तुम्हारे भीतर आत्मबोध जाग्रत हो इसलिए कुछ समय के लिए तुमको अकेला छोड़कर अंतर्ध्यान हो गई थी ताकि तुम्हें इस बात का अहसास हो सके कि जीवन में धन-दौलत अहम है अथवा अपने आत्मीय और सुख-शांति…!
प्रसन्ना मैं चाहती हूँ कि तुम सदैव प्रसन्न रहो। तुम कल भी मेरे आत्मीय थे, आज भी हो और आगे भी रहोगे। मैं अनादि काल से तुम्हारे ह्रदय में मौजूद हूँ। वो तो एक तुम ही थे, जो मुझे विस्मृत कर बैठे थे।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “बचपन”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
मेरे छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था । इसलिए ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर आया । घर के अंदर खूब रौनक और,खुशी के माहौल । बाहर क्या देखता हूं हमारी कामवाली का छोटा सा बेटा बर्तन मांज रहा है और रोते रोते मां से कह रहा है -मुझे भी केक दिलवाओ । मुझे भी जन्मदिन मनाने है । मां बेबस । झांक रही अपने अंदर । मैं सोच रहा हूं कि जन्मदिन किसका मनाऊं ?
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘थाप‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 154 ☆
☆ लघुकथा – थाप☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
दिन-भर मशीन की मानिंद वह एक के बाद एक, घर के काम निबटाती जा रही थी। उसका चेहरा भावहीन दिख रहा था। बातचीत भले ही कर रही थी लेकिन स्वभाव में कुछ उदासी थी। मन ही मन वह झुँझला भी रही थी। छोटे भाई की शादी थी। घर में हँसी मजाक का माहौल था। किन्तु उसमें वह शामिल नहीं हो रही थी। वह शायद वहाँ पर रहना भी नहीं चाह रही थी।
“कुमुद ऐसी तो नहीं थी, क्या हो गया इसे?” उसकी उम्र ढ़ली अविवाहित बड़ी बहन से मैंने पूछा।
“अरे कोई बात नहीं, थोड़ी मूडी है।” कहकर उसने भी बात टाल दी।
मुझे खटक रहा था कि शादी लायक दो बड़ी बहनों के रहते, छोटे भाई की शादी की जा रही है? लड़कियाँ खुद ही शादी करना ना चाहें, सो अलग बात है लेकिन जानते-बूझते उनकी उपेक्षा करना सही नहीं है।
“खैर छोड़ो, दूसरे के फटे में पैर क्यों अड़ाना !”
शादी के घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा था। महिला संगीत चल रहा था। साथ में स्त्रियों की शोख अदाएँ और फुसफुसाहट भी जारी थी। किसी एक ने कहा–“बिनब्याही जवान दो बहनें घर बैठी हैं और कई साल छोटे भाई की शादी की जा रही है?” दूसरी बोली–“बड़ी तो अधेड़ दिखने लगी है। कुमुद के लिए भी नहीं सोचा जा रहा।” ढ़ोलक की थाप पर नाच-गाना तो चल ही रहा था, निंदारस भी खुलकर बरस रहा था।
“अरे कुमुद ! अबकी तू उठ, बहुत दिनों से तेरा नाच नहीं देखा। ससुराल जाने के लिए थोड़ी प्रैक्टिस कर ले।” बुआ ने हँसी में व्यंग्य बाण छोड़ दिया–“अब कुमुद के लिए भी लड़का देख लो, नहीं तो यह भी कोमल की तरह बुढ़ा जाएगी। फिर कोई दूल्हा इसे नहीं मिलेगा।” ढ़ोलक की थाप थम गई। बात हिय में चटाख से लगी।
नाचने के लिए उठे कुमुद के कदम, वहीं थम गए। लेकिन चेहरा खिल गया–“किसी ने तो दिल की बात कही। फिर वह उठी और दिल खोलकर नाचने लगी।
कुमुद की माँ ननद रानी से उलझ गई–“बहन जी ! आपको रायता फैलाने की क्या जरूरत है। सबके सामने ये बातें छेड़कर। इत्ता दान-दहेज कहाँ से लाएँ? दो-दो लड़कियों के हाथ पीले करना, कोई आसान है? ऐरे-गैरों के घर जाकर किसी दूसरे की जी-हुजूरी करने से तो अच्छा है, अपने छोटे भाई का परिवार ही पालें। छोटे को सहारा भी रहेगा? उसकी नौकरी भी पक्की नहीं है। कोमल तो समझ गई लेकिन कुमुद के दिमाग से शादी का फितूर उतर नहीं रहा। खैर…जाने दो !”
ढ़ोलक की थाप, सुर में गाती औरतों की आवाजें और तालियों के बीच, इन बातों से अनजान कुमुद मगन-मन नाच रही थी।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – सर्व धर्म प्रार्थना
सर्व धर्म प्रार्थना का एक अनूठा आयोजन एक दुर्गम ग्लेशियर के निकट रखा गया था। विभिन्न धर्मों के देश-विदेश में बसे चुनिंदा अनुयायियों को इसमें सम्मिलित किया गया था। इन यात्रियों का दल दुर्गम हिमनद की ओर बढ़ रहा था। एकाएक हिम की सतह दरक गई और खाईनुमा गहरा गढ्ढा बन गया। दल गढ्ढे में गिर पड़ा।
हाहाकार मच गया। फिर कुछ समय के लिए यात्रियों के गढ्ढे में गिरने पर चर्चा चली। तत्पश्चात पर्वतारोहियों में हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, पारसी, यहूदी, बौद्ध, जैन, ताओ, शिंटो, कन्फ्यूशियिस्ट गिने जाने लगे।
फिर भी मन ना भरा तो विभिन्न धर्मों के यात्रियों के संप्रदाय, जातिगत वर्ग गिने जाने लगे। कुछ ने सवर्ण, दलित, अगड़ा, पिछड़ा, आदिवासी की माइक्रो काउंटिंग शुरू की तो कुछ ने मूल निवासी, आक्रमणकारी, आर्य-अनार्य की गणना भी कर डाली।
अपनी-अपनी जगह बैठे लोग मनुष्य और मनुष्य के बीच की खाई को चौड़ा करते रहे। उधर खाई में पड़े पर्वतारोहियों ने मानव शृंखला बनाई, एक दूसरे का हाथ पकड़ा और बाहर निकल आए।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गोविन्द साधना शुक्रवार 15 अगस्त से गुरुवार 21 अगस्त तक चलेगी।
इस साधना मेंॐ गोविंदाय नमः का मालाजप होगा साथ ही वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित मधुराष्टकम् का पाठ भी करेंगे।
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – उपहार।)
“आज पार्टी में जाना है। मैं तो तैयार हूं, तुम भी तैयार हो जाओ। बाहर से लाने को कहा था क्या कुछ लाये हो?”
“हाँ रागिनी में लेकर आया हूं यह पांच सुंदर फूलों के पौधे हैं, इनमें से जो चाहे तुम घर में रख लो और एक दो पौधे उपहार में दे देते हैं।”
“सुंदर पौधे लाये हो ना ..? या जैसे सब्जी वाले से दया खाकर सब्जियां ले लेते हो, या कुछ भी?” गुस्सा होते हुए जोर से रागिनी ने कहा।
“उपहार में तो फूलों का गुलदस्ता ही अच्छा लगता है।”
“कोई बात नहीं मेरे पास एक सुंदर सा पर्स रखा है उसको पैक करके और गुलाब, मोगरा, गेंदा गुड़हल और रजनीगंधा फूलों के पौधे दे देती हूँ, इन्हें कौन रखेगा फालतू की झंझट अपनी अलग डालो?”
“क्यों .. ऐसे क्यों कह रही हो ?”
“पूजा के लिए फूल तो तुम्हें मिलेंगे साथ ही साथ बाल में भी लगा सकती हो” अरुण ने मुस्कुराते हुए कहा।
“गुलदस्ते तो सूख जाते हैं तो हम इधर-उधर फेंक देते हैं फूल तो हमारे सच्चे साथी हैं। फूलों की खुशबू के साथ बालकनी में बैठकर चाय पियेंगे और भीनी- भीनी महक पूरे घर में रहेगी।”
“अरे लेकिन तुम्हारी बहन तो मुझे चार बातें सबके सामने सुना कर बेज्जती करेगी।”
“ठीक है मैं तैयार होने जाता हूँ तुम्हारी जो समझ में आए वह करो।”
“जब दोनों उपहार लेकर गए तो फूल देखकर उनकी बहन बहुत खुश हुई। बोली – “बहुत ही सुंदर उपहार लाई हो भाभी।”
सारे लोग देखकर खुश हो गए और जोर से ताली भी बजाने लगे। आपस में सभी ने यही प्रण किया, कि हम एक दूसरे को माला और गुलदस्ते के बजाय एक पौधा गिफ्ट किया करेंगे।
रागिनी ने कहा- “हां मैंने इसीलिए तुम्हारे भैया से मंगवाई यह उपहार हम आपके लिए लाये हैं।”
अरुण मुस्कुराते हुए अपनी बहन को देखा और बोला चलो केक काटते हैं।
पौधों का उपहार देना हमारे जीवन के लिए बहुत अच्छा है मन भी खुश रहता है और घर की भी सौंदर्यता बढ़ती है।