सूचनाएँ/Information ☆ बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार पुरस्कृत हुए झीलों की नगरी भोपाल में ☆ साभार – सुश्री रानी सुमिता ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार पुरस्कृत हुए झीलों की नगरी भोपाल में ☆ साभार – सुश्री रानी सुमिता ☆

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“मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया”

प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच  का बारहवां राष्ट्रीय सम्मेलन एवं 25 वां हेमंत स्मृति कविता सम्मान  समारोह शनिवार, दिनांक 31 जनवरी, 2026 को भोपाल के “ला पर्ल” होटल में आयोजित किया गया | सुबह 10:30 से  संध्या 6 बजे तक तीन सत्रों,  “अलंकरण सत्र, “लघुकथा सत्र” और “काव्य सत्र” में सभी कार्यक्रम संपन्न हुए ।

कार्यक्रम का आरंभ दीप प्रज्वलन एवं महिमा श्रीवास्तव वर्मा द्वारा प्रस्तुत की गई सरस्वती वंदना से हुआ। 

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की संस्थापक,अध्यक्ष, वरिष्ठ लेखिका  संतोष श्रीवास्तव ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि भारतीय संस्कृति के मूल में स्वागत की परंपरा अतिथियों के चरण पखार कर की जाती है। मैं अपने शब्दों के जल से यह कार्य कर रही हूं। उन्होंने नवाज़ देवबंदी का शेर सुनाते हुए अपनी वाणी को विराम दिया

यह मत सोच राह के जख्म कितने गहरे हैं

 बस यह सोच कि मंजिल का सुकून कितना बड़ा है।

हेमंत फांउडेशन की संस्थापक – सचिव डा. प्रमिला वर्मा ने  “हेमंत परिचय” दिया। वहीं संस्था परिचय प्रदेश अध्यक्ष शेफालिका श्रीवास्तव एवं निर्णायक उद्बोधन उपाध्यक्ष डॉ. नीलिमा रंजन ने दिया।

इस सत्र में देश-विदेश से चयनित साहित्यकारों को साहित्य की विभिन्न विधाओं, कला, पर्यावरण और समाज सेवा के क्षेत्रों में सम्मानित किया गया। श्रीमती रूबी मोहंती  (25 वां हेमंत स्मृति कविता सम्मान) डॉ. अलका अग्रवाल सिगतिया, श्रीमती शकुंतला मित्तल, डॉ. विद्या सिंह, डॉ. रानी श्रीवास्तव, श्री सुनील दुबे वृक्षमित्र, श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव, श्री  शंकारानंद,  श्रीमती कुसुम भट्ट , श्रीमती रजनी गुप्त, श्रीमती जया आर्या, श्रीमती एकता अमित व्यास,श्रीमती रत्ना पांडेय, सुश्री आशा सिंह गौर, श्री देवेंद्र श्रीवास्तव, श्री बद्र वास्ती को प्रतीक चिन्ह, शॉल, श्रीफल एवं पुरस्कार राशि प्रदान कर सम्मानित किया गया ।

अलंकरण सत्र की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री श्री कैलाश चंद्र पंत ने संस्था एवं पुरस्कृत साहित्यकारों को अपने आशीर्वचनों से नवाजा।

मुख्य अतिथि प्रेम जनमेजय ने कहा – ‘ ऐसे समय में जब सम्मान विपरीत अर्थ दे रहा हो, सम्मान समारोह का आयोजन बड़े जोखिम का काम है। संस्था यह जोखिम प्रतिवर्ष उठाती है।

विशिष्ट अतिथि राम स्वरूप दीक्षित ने कहा – ‘आज जब साहित्य के लिए जगहें सिमटती , सिकुड़ती जा रही हैं, तब बिना किसी संसाधन और सरकारी या गैर सरकारी सहायता के ऐसा राष्ट्रीय आयोजन कर ले जाना बहुत मायने रखता है। ‘

हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार के अलावा साहित्य और समाज के लिए काम करने वाले लोगों को इस आयोजन में पुरस्कृत करना इसे एक बहुउद्देशीय और बहुअर्थी आयोजन बनाता है।’

विशिष्ट अतिथि ऋषि कुमार शर्मा ने कहा – ‘आज जब दुनिया अनेक विभाजनों, संघर्षों और असहमतियों से जूझ रही है, तब साहित्य मैत्री, संवाद और संवेदना का सेतु बन सकता है। विभिन्न देशों, भाषाओं और संस्कृतियों से आए रचनाकारों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि भावनाएँ सार्वभौमिक होती हैं और रचनात्मकता किसी सीमा में बंधी नहीं होती।

अपने बेहद भावपूर्ण एवं जीवंत वक्तव्य से संचालन करते हुए संस्था महासचिव मुजफ्फर इक़बाल सिद्दीकी ने समा बांधा एवं धन्यवाद ज्ञापन  जया केतकी ने किया।

द्वितीय सत्र, लघुकथा सत्र की अध्यक्षता श्रीमती कांता राय ने की। मुख्य अतिथि डॉ शरद सिंह  विशिष्ट अतिथि वन्या  जोशी एवं डॉ क्षमा पांडेय थी। श्री गोकुल सोनी,डॉ. विद्या सिंह,सुश्री शकुंतला मित्तल, सुश्री मनवीन कौर, डॉ. शुभ्रा ,सुश्री मनोरमा, श्री सत्येन्द्र सिंह, सुश्री मृदुल त्यागी, सुश्री सरोजलता सोनी,सुश्री लता तेजेश्वर, डॉ. अलका अग्रवाल सिग्तिया एवं ऋचा शर्मा ने लघुकथा पाठ किया । इस सत्र का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ साहित्यकार श्री घनश्याम मैथिल ने किया।

तीसरे और अंतिम, कविता  सत्र के मुख्य अतिथि डॉ संजीव कुमार, श्री इकबाल मसूद एवं श्री संजय सक्सेना थे। सारस्वत अतिथि के तौर पर कर्नल  गिरिजेश सक्सेना ने मंच को सुशोभित किया।

इस सत्र में कविताओं,गजल,गीतों के निर्झर मुग्ध भाव से झरे।

कविता सत्र में सुश्री आशा सिंह गौर,श्री विजयकांत वर्मा,श्री आबिद काजमी, श्री साकेत सुमन चतुर्वेदी,डॉ रत्ना पांडेय,सुश्री रूबी मोहंती, श्री मनोज अबोध, सुश्री  रमा त्यागी, श्री के पी गुप्ता, श्री विपिन पवार,सुश्री जया विलतकर, डॉ. रेणु श्रीवास्तव  सुश्री जया आर्य. सुश्री मधूलिका सक्सेना,सुश्री राजकुमारी चौकसे,श्री ब्रजभूषण मिश्र,श्री अशोक व्यग्र ने कविता पाठ किया। इस सत्र का संचालन डा. विनीता राहुरीकर और धन्यवाद ज्ञापन रानी सुमिता ने किया।

कविता पाठ एवं लघुकथा पाठ में प्रतिभागिता करने वाले रचनाकारों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।

श्री कैलाश चंद्र पंत को पद्मश्री घोषित किए जाने के उपलक्ष में एवं डॉ संजीव कुमार को इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज होने पर संस्था द्वारा उनका अभिनंदन किया गया ।

कार्यक्रम में भोपाल शहर के पत्रकारों साहित्यकारों एवं झांसी, दिल्ली, मुंबई, इंदौर, सतना, टीकमगढ़, देहरादून, पुणे, गुरुग्राम गाजियाबाद, नोएडा, अहिल्या नगर आदि विभिन्न शहरों से आए हुए  साहित्यकारों और पत्रकारों की उपस्थिति रही।

प्रस्तुति – सुश्री रानी सुमिता

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

? डाॅ. निशिकांत श्रोत्री – अभिनंदन ?

💐 संपादकीय निवेदन 💐

 !! हार्दिक अभिनंदन !! 

आपल्या समूहातील ज्येष्ठ लेखक / कवी डॉ. निशिकांत श्रोत्री यांची एकूण दहा पुस्तके सन २०२५ मध्ये प्रकाशित झाली आहेत, आणि विशेष म्हणजे ही पुस्तके वेगवेगळ्या प्रकाशकांनी प्रकाशित केली आहेत. हे त्यांचे काम खरोखरच फार मोठे आणि उल्लेखनीय आहे..

डॉ. श्रोत्री यांचे आपल्या समूहातर्फे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि त्यांच्या पुढील साहित्यिक वाटचालीसाठी हार्दिक शुभेच्छा… 

ती पुस्तके पुढीलप्रमाणे आहेत – – 

श्रीमद्भगवद्गीता सुलभ मराठी

ज्ञानसविता

परीसस्पर्श

शिर्डी ते पुट्टपर्ती

लेखनिका

सुवर्णपुष्कराज

कथा देवळांच्या 

महायोगी

सुरक्षित मातृत्व

कुटुंबनियोजन आणि वैद्यकीय गर्भपात

संपादक मंडळ

ई-अभिव्यक्ती (मराठी)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचनाएँ/Information ☆ ​विश्व पुस्तक मेला – २०२६ , पीढ़ियों को जोड़ने का बना माध्यम ☆ साभार -श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

विश्व पुस्तक मेला – २०२६ , पीढ़ियों को जोड़ने का बना माध्यम ☆ साभार -श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

माता-पिता के लिए विशेष संदेश:

संस्कारों और किताबों की खुशबू से महका विश्व पुस्तक मेला, पीढ़ियों को जोड़ने का बना माध्यम

नई दिल्ली: प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का दृश्य इस बार केवल किताबों की प्रदर्शनी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह परिवारों के लिए एक भावनात्मक और प्रेरक उत्सव बन गया। एशियन लिटरेचर सोसाइटी द्वारा आयोजित एक विशेष परिचर्चा ने यह सिद्ध कर दिया कि डिजिटल चकाचौंध के बीच भी शब्द ही वह डोर हैं, जो एक घर की तीन पीढ़ियों—बुजुर्गों, माता-पिता और बच्चों—को एक सूत्र में पिरोते हैं।

साहित्यिक मंच पर पीढ़ियों का संगम

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’, डॉ. नीतू सिंह राय और डॉ. अनिता चंद ने अपनी उपस्थिति से न केवल मंच की शोभा बढ़ाई, बल्कि उपस्थित अभिभावकों को जीवन का एक नया दृष्टिकोण दिया। सत्र का कुशल संचालन किरण बाबल ने किया। वक्ताओं ने बड़े ही मार्मिक ढंग से यह संदेश दिया कि एक घर में दादा-दादी के अनुभवों का खजाना, माता-पिता का मार्गदर्शन और बच्चों की नई ऊर्जा तभी सार्थक होती है, जब उनके बीच संवाद का माध्यम ‘किताबें’ बनती हैं।

डिजिटल युग में पाठक की बदलती भूमिका

चर्चा के दौरान यह बात प्रमुखता से उभरी कि आज के डिजिटल युग में पाठक अब केवल निष्क्रिय पाठक नहीं रह गया है। डॉ. प्रकाश और अन्य विद्वानों ने बताया कि तकनीक ने पढ़ने को बहुआयामी बना दिया है। अब पाठक सामग्री को साझा करता है, उस पर टिप्पणी करता है और सामुदायिक चर्चाओं का हिस्सा बनता है। जहाँ एक ओर यह सक्रियता सुखद है, वहीं वक्ताओं ने मैरिएन वुल्फ जैसे शोधकर्ताओं का हवाला देते हुए माता-पिता को सचेत भी किया। उन्होंने कहा कि स्क्रीन पर लगातार पढ़ने से बच्चों की गहन सोच और एकाग्रता प्रभावित हो रही है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे तकनीक का लाभ तो उठाएं, लेकिन बच्चों को गहराई से सोचने की आदत भी डालें।

प्रिंट किताबों का स्पर्श: एक भावनात्मक विरासत

आज के दौर में जब हर चीज़ ऑनलाइन उपलब्ध है, तब भी ‘प्रिंट किताबों’ की प्रासंगिकता पर विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने साझा किया कि कागज की खुशबू, पन्नों की सरसराहट और किताब को हाथ में पकड़ने का जो संवेदी अनुभव है, वह किसी भी स्क्रीन पर संभव नहीं है। शोध बताते हैं कि प्रिंट किताबों से सीखी गई बातें स्मृति में लंबे समय तक अंकित रहती हैं। यह बुजुर्गों के लिए अपनी विरासत को पोते-पोतियों तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम है।

अभिभावकों के लिए प्रेरक संदेश: कैसे विकसित करें पढ़ने की संस्कृति?

नई पीढ़ी, जो वीडियो और गेम्स की दुनिया में पली-बढ़ी है, उनमें पढ़ने की संस्कृति विकसित करने के लिए माता-पिता को कुछ बुनियादी और भावनात्मक कदम उठाने की सलाह दी गई:

 उदाहरण बनें: बच्चे वह नहीं करते जो हम कहते हैं, वे वह करते हैं जो हम करते हैं। यदि माता-पिता स्वयं किताब पढ़ेंगे, तो बच्चे भी उसे अपनाएंगे।

 पठन कोना (Reading Corner): घर में एक छोटा सा कोना किताबों के लिए समर्पित करें, जहाँ परिवार के सदस्य साथ बैठकर पढ़ें।

 चर्चा का माहौल: स्कूलों और घरों में कहानियों पर चर्चा करें, लेखकों से मिलें और पढ़ने को एक बोझ नहीं, बल्कि खेल की तरह मजेदार बनाएँ।

निष्कर्ष:

यह पूरा कार्यक्रम उपस्थित माता-पिता और बुजुर्गों के लिए एक प्रेरणादायक अनुभव रहा। अंत में यह संदेश दिया गया कि डिजिटल तकनीक और किताबों का स्पर्श मिलकर ही एक स्वस्थ और शिक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं। जैसा कि परिचर्चा का सार था—”किताबों के सानिध्य में बीता समय ही एक परिवार के लिए सबसे बड़ी और अनमोल पूंजी है।”

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆ महत्वाची सूचना !! ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

💐 संपादकीय निवेदन 💐

📖 महत्वाची सूचना !! 📖

कृपया सर्वांनी नोंद घ्यावी – – – 

यापुढे वाचतांना वेचलेले या सदरासाठीचे साहित्य फक्त सुश्री गौरी गाडेकर यांच्याकडेच पाठवावे.

त्यासाठी त्यांचा मोबा. नं. ९८२०२०६३०६ हा आहे.

सर्वांचे सहकार्य अपेक्षित आहे.

– संपादक मंडळ

ई – अभिव्यक्ती, मराठी विभाग

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचनाएँ/Information ☆ “व्यंग्य के रंग” पुस्तक का भव्य लोकार्पण एवं परिचर्चा ☆ साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹“व्यंग्य के रंग” पुस्तक का भव्य लोकार्पण एवं परिचर्चा ☆ साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 🌹

व्यंग्य साहित्य को समर्पित एक संकलन व्यंग्य के रंग

नई दिल्ली। हिंदी साहित्य के क्षेत्र में व्यंग्य विधा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में “व्यंग्य के रंग” नामक व्यंग्य-संकलन का लोकार्पण एवं परिचर्चा समारोह  17 जनवरी, शनिवार को राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र भारत मंडपम, प्रगति मैदान मे संपन्न हुई।

यह गरिमामय आयोजन ‘अद्विक पब्लिकेशन’ के तत्वावधान में आयोजित किया गया ।

इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव सहित देश और विदेश के 88 प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों की श्रेष्ठ रचनाएँ संकलित की गई हैं।

व्यंग्य साहित्य को अक्सर केवल हास्य का माध्यम समझा जाता है। वास्तव में यह समाज की विसंगतियों, विडम्बनाओं और विरोधाभासों को उजागर करने की सबसे सशक्त विधा है। “व्यंग्य के रंग” इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पाठकों को न केवल हँसने के लिए प्रेरित करता है बल्कि सोचने, आत्ममंथन करने और प्रश्न उठाने की चेतना भी प्रदान करता है।

आज के समय में समाज अनेक सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में व्यंग्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से व्यवस्था पर तीखे प्रहार करता है। इस पुस्तक में संकलित रचनाएँ आम आदमी की पीड़ा, सत्ता की विडम्बनाएँ, सामाजिक दिखावे, बदलते मूल्यों और आधुनिक जीवनशैली की विसंगतियों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

“व्यंग्य के रंग” एक ऐसा व्यंग्य-संग्रह है, जिसमें विविध विषयों, शैलियों और दृष्टिकोणों का अनूठा समावेश देखने को मिलता है। पुस्तक में शामिल 88 व्यंग्यकारों की रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि हिंदी व्यंग्य केवल एक शैली नहीं, बल्कि एक सशक्त वैचारिक आन्दोलन है।

पुस्तक की प्रमुख विशेषताएँ —

  • समाज और राजनीति पर तीखा किंतु सुसंस्कृत व्यंग्य
  • समकालीन जीवन की सच्चाइयों का यथार्थ चित्रण
  • हास्य के साथ गहरी वैचारिक दृष्टि
  • भाषा की सरलता और प्रभावशीलता
  • विविध पीढ़ियों के व्यंग्यकारों का समावेश

यह पुस्तक पाठकों को नवविचारों से साक्षात्कार कराने के साथ-साथ बौद्धिक संतुष्टि भी प्रदान करती है।

 साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ हिंदी चेतना शिखर–2026 : जयपुर की डॉ. निशा अग्रवाल को एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ☆

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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹हिंदी चेतना शिखर–2026 : जयपुर की डॉ. निशा अग्रवाल को एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड 🌹

नई दिल्ली/जयपुर। हिंदी भाषा, देवनागरी लिपि और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के वैश्विक उत्थान के उद्देश्य से धरा धाम इंटरनेशनल के तत्वावधान में 15 जनवरी 2026 को राजेंद्र भवन, नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मान समारोह “हिंदी चेतना शिखर–2026” ऐतिहासिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का सुव्यवस्थित, प्रभावशाली एवं ओजस्वी संचालन डॉ. निशा अग्रवाल द्वारा किया गया।

समारोह के दौरान जयपुर (राजस्थान) की प्रतिष्ठित शिक्षाविद, शोधकर्ता एवं पाठ्यपुस्तक लेखिका डॉ. निशा अग्रवाल को Asia Book of World Records द्वारा World Record Holder के रूप में सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें शोध के क्षेत्र में असाधारण, मौलिक एवं समाजोपयोगी योगदान के लिए प्रदान किया गया, जिसे विधिवत एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। डॉ. निशा अग्रवाल का यह विश्व-रिकॉर्ड जगत धर्म चक्रवर्ती, सौहार्द शिरोमणि संत डॉ. सौरभ पांडे जी के जीवन, दर्शन, विचारधारा एवं समकालीन प्रासंगिकता पर आधारित विस्तृत शोधग्रंथ के लिए स्थापित हुआ। यह शोधकार्य Divya Manavta Prerak Kahaniyan Anusandhan Kendra द्वारा प्रकाशित तथा प्रो. जनक प्रसाद के अकादमिक मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा इस शोध को आध्यात्मिक अनुसंधान, मानवीय मूल्यों, अंतरधार्मिक सौहार्द एवं समकालीन विचार नेतृत्व के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया गया।

कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। प्रमुख अतिथियों में रसायाचार्य डॉ. ई. माड़े धर्मयस (इंडोनेशिया), जनरल प्रो. जसवीर सिंह (आधिकारिक प्रतिनिधि – संयुक्त राष्ट्र | अमेरिका),डॉ. इंद्रजीत शर्मा (देवनागरी प्रवर्तक, अमेरिका),

डॉ. बी. एल. गौड़ (ख्यातिलब्ध साहित्यकार एवं उद्योगपति),डॉ. चिंगशुओं ‘जोया’ झांग,प्रो. (डॉ.) देवेश कुमार मिश्र (संस्कृत विभाग, इग्नू, नई दिल्ली), जगत धर्म चक्रवर्ती सौहार्द शिरोमणि डॉ. सौरभ पांडे जी (प्रमुख – धराधाम, गोरखपुर), डॉ नारायण यादव( M.D ऑफ ABWR) एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर डॉ. शंभू पंवार जी सम्मिलित रहे।

डॉ. निशा अग्रवाल अब तक 30 से अधिक पुस्तकों की रचना कर चुकी हैं। उनकी पुस्तकें कॉलेज शिक्षा, उत्तर प्रदेश बोर्ड एवं सीबीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित हैं। उनका लेखन हिंदी भाषा, शिक्षा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों को समर्पित है, जिसने उन्हें शिक्षा जगत में विशिष्ट पहचान दिलाई है।

“हिंदी चेतना शिखर–2026” न केवल एक सम्मान समारोह रहा, बल्कि यह हिंदी को राष्ट्र से विश्व तक, और भारतीय संस्कृति को वैश्विक संवाद से जोड़ने वाला एक सशक्त वैचारिक मंच सिद्ध हुआ।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन 31 जनवरी 2026 को संपन्न होगा ☆ साभार – सुश्री रानी सुमिता ☆

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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन 31 जनवरी 2026 को संपन्न होगा ☆ साभार – सुश्री रानी सुमिता ☆

प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच एवं हेमंत फाउंडेशन का राष्ट्रीय सम्मेलन एवं हेमंत स्मृति सम्मान समारोह शनिवार, दिनांक 31 जनवरी, 2026  को सुबह 10:30 से संध्या 5 बजे तक भोपाल में “ होटल ला पर्ल,प्लाट नंबर 138 -बी, बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय के सामने, होशंगाबाद रोड, भोपाल – 462026”  में आयोजित किया जा रहा है|

सम्मेलन की जानकारी देते हुए संस्था की संस्थापक अध्यक्ष श्रीमती संतोष श्रीवास्तव ने बताया- कार्यक्रम तीन सत्रों में संपन्न होगा “अलंकरण सत्र”, “काव्य सत्र” और “लघुकथा सत्र” ।

अलंकरण सत्र में  देश-विदेश से चयनित लेखकों रूबी मोहंती, डॉ. अलका अग्रवाल सिगतिया , शकुंतला मित्तल, डॉ. विद्या सिंह, डॉ. रानी श्रीवास्तव, सुनील दुबे वृक्षमित्र, विवेक रंजन श्रीवास्तव, शंकारानंद, कुसुम भट्ट ,रजनी गुप्त, जया आर्या, एकता अमित व्यास, रतना पांडेय, आशा सिंह गौर, देवेंद्र श्रीवास्तव, बद्र वास्ती को विभिन्न विधाओं में श्री गिरीश पंकज , श्री प्रेम जनमेजय, श्री ऋषि कुमार शर्मा श्री रामस्वरूप दीक्षित,  प्रो. राजेश श्रीवास्तव के कर कमलों द्वारा प्रतीक चिन्ह ,शॉल, श्रीफल एवं पुरस्कार राशि प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा।

कार्यक्रम के अन्य सत्रों में डॉ. नुसरत मेहदी, डॉ. संजीव कुमार, डॉ. संजय सक्सेना करनल गिरिजेश सक्सेना, डॉ. शरद सिंह, वन्या जोशी (फिल्म अभिनेत्री)  हरि भटनागर ,क्षमा पांडेय, कांता रॉय, इकबाल मसूद मंच की शोभा बढ़ाएंगे एवं देशभर से पधारे कवि ,लघुकथाकार, शायर अपनी अपनी रचनाएं प्रस्तुत करेंगे। कार्यक्रम के पश्चात सभी को  प्रमाण पत्र वितरण किया जाएगा।

तीनों सत्रों में संचालन की बागडोर संभालेंगे मुजफ्फर इकबाल सिद्दीकी, घनश्याम मैथिल, डॉ विनीता राहूरिकर एवं आभार जया केतकी, रानी सुमिता।

वरिष्ठ लेखिका संतोष श्रीवास्तव स्वागत वक्तव्य , डा. प्रमिला वर्मा “हेमंत परिचय”  संस्था परिचय शेफालिका श्रीवास्तव एवं निर्णायक उद्बोधन डॉ. नीलिमा रंजन , सरस्वती वंदना महिमा श्रीवास्तव वर्मा प्रस्तुत करेंगी ।

प्रस्तुति – सुश्री रानी सुमिता

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆  कविता – ती चार दैवी मुले – सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

‘सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

💐 संपादकीय निवेदन 💐

💐 ✒️ अभिनंदन! अभिनंदन! अभिनंदन! ✒️ 💐

तितिक्षा इंटरनॅशनल, पुणे यांनी आयोजित केलेल्या दशकपुर्ती सोहळा काव्यलेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती उज्ज्वला सहस्रबुद्धे यांना त्यांच्या ‘तितिक्षा’ या रचनेसाठी सर्वोत्कृष्ट काव्य पुरस्कार मिळाला आहे.

ई अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे त्यांचे मन: पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐 💐

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– आजच्या अंकात वाचूया त्यांचे एक पुरस्कार प्राप्त कविता – “ती चार दैवी मुले…”

– संपादक मंडळ

ई – अभिव्यक्ती, मराठी विभाग

पुरस्कार प्राप्त कविता

विषय – तितिक्षा 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ ती चार दैवी मुले ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

बालपणी हरवली,

छाया माथ्यावरची!

पोरकी झाली चौघे,

वाट धरी पैठणची!… १

*

ब्रम्ह वृंदास सामोरे,

प्रश्न केले अवघड!

शुध्दिपत्र मिळण्यास,

खूप केली धडपड!… २

*

ज्ञाना देई गुरूपद,

निवृत्तीस ते श्रध्देने!

चालले सोपान, मुक्ता,

मागुती त्यांच्या मायेने!.. ३

*

तितिक्षा सर्वास होती,

घेण्यास ज्ञान सखोल!

वृत्ती सर्वांच्याच होत्या,

तितिक्षेत समतोल!… ४

*

आकलन झाले सर्वां,

ही आहेत दैवी बाळे!

यांच्या अथांग ज्ञानात,

श्रीकृष्ण अंतरी खेळे!.. ५

*

जाणली त्यांची तितिक्षा,

योगेश्वराने अंतरी!

ज्ञानेश्वरी ही जन्मली,

या नेवाश्यात भूवरी!.. ६

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचनाएँ/Information ☆ न्यूयार्क से ~ विश्व हिंदी दिवस और हिंदी दिवस: भाषा के दो उत्सव ~ ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹 न्यूयार्क से ~ विश्व हिंदी दिवस और हिंदी दिवस: भाषा के दो उत्सव ~ 🌹 श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 🌹

भारत की आत्मा उसकी भाषाओं में बसती है, और उन सबमें हिंदी का स्थान केन्द्रीय है। हिंदी केवल राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान, संवेदना और अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसी गौरव को मनाने के लिए हर वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस और 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। दोनों का उद्देश्य एक ही है ,भाषा के प्रति सम्मान और उसके विस्तार के संकल्प को जन जन में जगाना, फिर भी इनके परिप्रेक्ष्य अलग हैं।

हिंदी दिवस का राष्ट्रीय संदर्भ 

14 सितंबर, 1949 को भारत की संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकृति दी थी। तभी से हिंदी दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई। यह दिन हिंदी को प्रशासन और शासन की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रतीक है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में आयोजित कार्यक्रम हिंदी के औपचारिक संवर्धन के प्रयासों को प्रेरणा देते हैं। 14सितंबर का  दिन इंगित करता है कि हिंदी केवल बोलचाल की नहीं, बल्कि शासन और संवाद की प्रमुख धारा है।

विश्व हिंदी दिवस का अंतरराष्ट्रीय अर्थ 

विश्व मंच पर हिंदी की पहचान को प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था। उसी घटना की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विदेशों में बसे भारतीय, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों के हिंदी प्रेमी  सभी मिलकर हिंदी के वैश्विक विस्तार का उत्सव मनाते हैं। यह केवल भाषा का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के विविध रंगों को साझा करने का अवसर है।

न्यूयॉर्क काउंसलेट में विश्व हिंदी दिवस का रंगारंग आयोजन 

विश्व हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीय वाणिज्य दूतावास, न्यूयॉर्क में एक भव्य और रंगारंग आयोजन हुआ। विदेश की धरती पर हिंदी की गूंज सुनना अपने आप में एक अनमोल अनुभव रहा। इस अवसर पर मैंने स्वयं अपनी हिंदी रचना प्रस्तुत की, जिसे उपस्थित जनों ने बड़े मनोयोग से सुना।

कविता यह रही…

विदेश की धरती पर हिंदी

हिंदी है अस्मिता ,पहचान भारतीय

परदेश में, जन गण की शान भारतीय

भारत की राष्ट्र भाषा है, अभिमान है

विदेश की धरती पर हिंदी,पूरा हिन्दुस्तान है

 

प्राची की वाणी, शब्दों की गंगा है

एकता का सूत्र, संस्कृति का डंका है

विदेश में शाश्वत भावों की धारा है

विदेश की धरती पर हिंदी व्यवहार हमारा है

 

गिरमिटिया संग, रामचरित मानस 

दुनियां भर में, बहती पुरवाई है

दूर देश में नई पीढ़ी की उड़ती पतंग है

विदेश की धरती पर हिंदी, मन की उमंग है

 

फिल्मी गीतों में, रुनझुन संगीत है

विदेशी धरती पर मनचाहा मीत है

प्रवासी मन का, देशी परिधान है

विदेश की धरती पर हिंदी देशज सम्मान है

 

यूनीकोड में हिंदी, स्क्रीन आसमान है

डिजिटल दुनियां में, हिंदी का वितान है

इंस्टा की रील डायस्पोरा की मुस्कान है,

विदेश की धरती पर हिंदी नेह प्रावधान है

 

एकता का सूत्र, शाश्वत संचार है

“वसुधैव कुटुंबकम्” का प्रसार है

भारत के भाल की बिंदी , श्रृंगार है

विदेश की धरती पर हिंदी,नेह का संसार है

 

मां बाप आते हैं मौसम की तरह

परदेश में बच्चों के पास

खुशनुमा मुकाम है

विदेश की धरती पर हिंदी

प्यार का पैगाम है

आरजू है, इल्तिज़ा है ,

दुआ है सलाम है !

कार्यक्रम में झिलमिल, हिंदी यूएसए, गुलमोहर, डॉ. सोनिया शर्मा अकादमी तथा अल्फ्रेड स्कूल जैसी संस्थाओं की सक्रिय सहभागिता रही, जिन्होंने अपनी प्रस्तुतियों से हिंदी प्रेम को स्वर दिया। सजीव मंचन, गीत-संगीत, और वक्तव्यों ने वातावरण को उत्सवमय बना दिया।

 

इस अवसर पर मेरे सुपुत्र अमिताभ और श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव भी सहभागी रहीं, जिनकी उपस्थिति ने इस क्षण को और भी आत्मीय बना दिया। रात्रिभोज के उपरांत यह प्रेरणादायक आयोजन सम्पन्न हुआ।

विदेश की भूमि पर हिंदी के प्रति ऐसा उत्साह देखकर मन में गर्व और भावुकता का संगम उमड़ पड़ा… जय हिंदी, जय भारती।

साभार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ई-अभिव्यक्ति, सम्पादक (हिन्दी)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ जबलपुर शहर ने ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया ☆ साभार – श्री हिमांशु राय  ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

🙏💐 स्मृतिशेष ज्ञानरंजन 💐🙏

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹 जबलपुर शहर ने ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया 🌹 साभार – श्री हिमांशु राय 🌹

(साभार – जबलपुर सफरनामा)

जबलपुर शहर के साहित्य जगत और कला जगत ने अपने ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया। ज्ञान जी का निधन 7 जनवरी को हुआ। 10 जनवरी को शाम 4 बजे अन्नपूर्णा होटल इन के सभागार में ज्ञानरंजन जी को याद करने के लिए शहर के लोग जमा हुए। चार बजे लोग आना शुरू हुए और कुछ ही देर में हॉल पूरा भरा हुआ था। लोग बाहर खड़े थे। इनमें वो सब थे जो किसी न किसी कारण ज्ञान जी से जुड़े हुए थे। ज्ञान जी एक सार्वजनिक व्यक्तित्व थे। उनका हर व्यक्ति और संस्था से व्यक्तिगत ताल्लुक था। इसीलिए ज्ञान जी की श्रद्धांजलि सभा में साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार और बड़ी संख्या में उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े व्यक्ति शामिल थे।

अवधेश बाजपेयी ने ज्ञान जी का एक बहुत सुंदर पोट्रेट बनाया था। विवेक चतुर्वेदी ने श्रद्धांजलि सभा का बैनर बनाया था। पंकज स्वामी ने पूरे कार्यक्रम को फेसबुक लाइव करने की व्यवस्था की थी। अजय धाबर्डे ने फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के द्वारा हर क्षण को कैद किया। सबसे पहले हिमांशु राय ने सभा की शुरूआत की और बांकेबिहारी ब्यौहार को संचालन के लिए आमंत्रित किया। बांकेबिहारी ब्यौहार ने ज्ञानरंजन जी के सन् 1961 से जी एस कॉलेज में साथ रहे वरिष्ठ साहित्यकार श्री कुंदनसिंह परिहार को आमंत्रित किया। परिहार जी ने कहा कि ज्ञानरंजन उस दौर में अपनी कहानियां और उनकी भाषा के कारण बहुत चर्चा में रहे। वे बहुत खिलंदड़े व्यक्ति थे। साहित्य के अतिरिक्त उन्होंने खूब मित्र बनाए। लोगों के सुखदुख में खूब साथ दिया। राजेन्द्र चंद्रकांत राय ने कहा कि कॉलेज के दिनों में ज्ञान जी से परिचय हो जाने के कारण उनका साहित्य से गहरा नाता बना। उनकी कहानियां परंपरागत कहानियां से बहुत अलग थीं। इंदौर से आए तरूण भटनागर ने कहा कि उनके बिलकुल शुरूआती दौर में ज्ञानजी की कहानियां ने प्रभावित किया। ज्ञानजी ने उन्हें कहानियां लिखने के प्रेरित किया और मार्गदर्शन किया। राजेन्द्र दानी ने भरे गले से ज्ञान जी के सान्निध्य को याद किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानजी जितने बड़े साहित्यकार थे उतने ही बड़े मनुष्य थे। वे हमारी और हमारे परिवार की व्यक्तिगत चिन्ता करते थे। उन्होंने पहल के सहयोगी के रूप में मुझे बहुत सिखाया और मुझ पर भरोसा किया। ज्ञान जी के निकट सहयोगी मनोहर बिल्लोरे ने कहा कि उनसे परिचय के बाद मेरा जीवन बदल गया। मैं न केवल साहित्य का अध्येता बना वरन उनके साथ पहल पत्रिका के लिए एक सहयोगी बन सका। उनके साथ प्रतिदिन बैठता था। राजीव शुक्ल ने बताया कि सन सत्तर के दशक में जबलपुर आकर जब ज्ञानजी से मुलाकात हुई तबसे आज तक गहरे संबंध बने हुए हैं जो साहित्य से लेकर व्यक्तिगत और पारिवारिक रहे हैं। पंकज स्वामी ने कहा कि ज्ञान जी ने समाज में हर किसी की चिंता करते थे। उन्होंने मेरे पुत्र से अलग से बातचीत की और उसकी परेशानियों को समझा। अपने यहां सब्जी देने आने वाले की लड़की को लैपटॉप खरीद कर दिया। कॉफी में बैठकर भी वो ये देखते थे कौन किस तरह से व्यवहार कर रहा है और उसकी व्यक्तिगत समस्या क्या है ?

हिमांशु राय ने याद करते हुए कहा कि सुदीप बैनर्जी के निधन पर उन्होंने कहा था कि मृत्यु को उत्सव के रूप में लिया जाना चाहिए। ज्ञान जी ने एक बहुत शानदान जीवन जिया। एक लेखक के रूप में वो अमर रहेंगे। उन्होंने अपने संपर्क में आए हर व्यक्ति से व्यक्तिगत संबंध बनाए और उसकी चिंता की। वो आलोचना करने और दंडित करने में भी पीछे नहीं रहते थे। उन्होंने सिखाया कि हर आयोजन को कितने सुनियोजित तरीके से किया जाना चाहिए। यहां तक कि इस उम्र में भी वे अपने कार्यक्रम का कार्ड बांटने घर घर जाया करते थे। पहल संगोष्ठी के रूप में उन्होंने एक बहुत शानदार परंपरा कायम की।

इंदौर से आए सुरेश पटेल ने भरे गले से बताया कि जीवन के शुरूआती दौर में ज्ञान जी ने उन्हें प्रेरणा दी कि तुम कबीर पर कार्य करो। आज कबीर समूह की अन्तर्राट्रीय स्तर की गतिविधि का कारण ज्ञान जी की प्रेरणा रही है। डा निशा तिवारी ने बताया कि प्रारंभ में उनके ज्ञान जी से संपर्क कालेज के कामों के कारण हुए। बाद में उन्होंने मेरे लेखन की प्रशंसा की। अवधेश बाजपेयी ने कहा कि मैं गांव से आया। जब ज्ञान जी से मिला तो ऐसा लगा मानो एक अभिभावक मिल गया जिसने मुझे कला की समझ और दृष्टि दी। विवेक चतुर्वेदी ने कहा कि ज्ञान जी ने हमेशा प्रोत्साहित किया और आलोचना के द्वारा रचनाओं का परिमार्जन किया। डा सुधीर तिवारी ने बताया कि उनके मेडिकल कॉलेज के दिनों में ज्ञानरंजन जी ने उनके नाटकों का निर्देशन किया था। श्रीमती गीता तिवारी ने ज्ञानरंजन जी से अपने पारिवारिक संबंधों को याद किया। डा स्मृति शुक्ला, श्रद्धा सुनील, कुंदन सिद्धार्थ, डा राधेश्याम सुहाने और डा अनामिका तिवारी ने उनके जीवन में ज्ञान जी के महत्व के बारे में बताया।

इस श्रद्धांजलि सभा में सैकड़ों लोग शामिल हुए। और अंत तक रूके रहे। किसी का जाने का मन नहीं कर रहा था। सभा के पश्चात् देर तक सभी लोगों ने मिलकर ज्ञान जी को लगातार याद किया। श्रद्धांजलि सभा में ज्ञानरंजन के पुत्र शांतनु, बहु, पोती ऋतुपर्णा और पुत्री वत्सला व नातिन सुकृति भी सीधे अस्पताल से आकर शामिल हुए। उल्लेखनीय है कि ज्ञान जी के निधन के उपरांत श्रीमती सुनयना ज्ञानरंजन अस्पताल में भरती हैं।

श्रद्धांजलि सभा में डा छाया राय, आकांक्षा सिंह, मदन तिवारी, मनु तिवारी, अजय यादव, देवेन्द्र सुरजन, प्रकाश दुबे, गंगाचरण मिश्रा, बसंत मिश्रा, पंकज कौरव, दिनेश चौधरी, विवेक श्रीवास्तव, रीना शुक्ला, तनु राय, डा भारती शुक्ला, नरेश जैन, रमेश सैनी, युनुस अदीब, तपन बैनर्जी, नवीन चौबे, मुरलीधर नागराज, डा एस के सिंह, सतीश रेड्डी, वेदप्रकाश अधौलिया, देवेन्द्र श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे। पहल परिवार, अन्विति, विवेचना, विवेचना रंगमंडल, समागम रंगमंडल, नाट्यलोक, रंगाभरण, सुरपराग, म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रगतिशील लेखक संघ, कालजयी अनिल कुमार श्रीवास्तव फाउंडेशन आदि के सदस्य उपस्थित रहे।

साभार –  श्री हिमांशु राय, जबलपुर, मध्यप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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