(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अपनी माटी से जुड़ाव का पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २५६ ☆अपनी माटी से जुड़ाव का पर्व… ☆
लंबोदर अर्थात बड़े पेट वाला, भारतीय संस्कृति में गणेश जी के लिए यह शब्द प्रयुक्त होता है। इस वर्ष 27 अगस्त 2025 को गणेश चतुर्थी का उत्सव मनाया गया। घर- घर में मिट्टी से बनें गणेश जी की मूर्ति स्थापित हुयी। इसी के साथ दस दिवसीय पर्व शुरू हुआ। नित्य सुबह शाम आरती, चंदन, वंदन साथ ही मोदक मिष्ठान का भोग लगाना। दूब घास, गुड़हल पुष्प की माला आपको प्रिय है। रिद्धि- सिद्धि, शुभ- लाभ सहित गजानन हमारे घर विराजित हैं। 06 सितंबर 2025, अनन्त चौदस के दिन पूजा, आरती, भोग, हवन पश्चात जल के कुंड में विसर्जन किया जाता है। पर्यावरण की सुरक्षा हेतु हम घर में विसर्जन करें, उसके पश्चात जो मिट्टी व जल बचेगा उसे गमले में रखकर उसमें पौधा लगाएँ जिससे पूरे वर्ष भर हमें बप्पा का साथ मिलता रहे। अगले बरस तू जल्दी आ इसी उद्घोष के साथ विघ्नहर्ता, गजानन, एकदन्त, दयावंत, प्रथमेश, प्रथम पूज्य, गणराज, मंगलमूर्ति, गौरीसुत आपकी कृपा दृष्टि सभी भक्तों पर सदैव बनीं रहे।
मित्रता दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच का एक स्नेहपूर्ण बंधन है| यह एक ऐसा अक्षय पात्र है, जिसमें प्रेम, विश्वास और अपनेपन की भावनाएं भरी हैं| यह शक्ति आपकी संकटमोचक बनकर हर आपत्ति में आपकी रक्षा करती है| प्रकृति का दान यज्ञ आदिकाल से शुरू है| सूर्य जिस प्रकार अपनी ऊर्जा और प्रकाश देता है, पेड़ जिस तरह धूप से त्रस्त पथिक को शीतल छाया देते हैं, या नदी जिस तरह प्यासे को जल प्रदान करती है, ठीक उसी प्रकार मित्रता भी निरपेक्ष भाव से की जाती है| यहाँ किसी शर्त या स्वार्थ के लिए स्थान नहीं होता|
“जौ चाहत, चटकन घटे, मैलो होई न मित्त।
राज राजसु न छुवाइ तौ, नेह चीकन चित्त।।“
अर्थ- इस दोहे में कवि बिहारी जी कहते हैं कि,यदि आप चाहते हैं कि मित्रता की चटक / चमक ना घटे और मित्रता मैली ना हो, तो अपने मन में अभिमान, अहंकार और दिखावे की धूल मत जमने दो| जिस प्रकार तेल लगी हुई वस्तु की सतह चिकनी हो जाती है और उसपर धूल के स्पर्श मात्र से भी उसकी चमक घट कर वह मैली हो जाती है, उसी प्रकार अभिमान और दिखावे से मित्रता में दरार आ जाती है। आप अपने
रिश्तेदारों का चयन नहीं कर सकते| परन्तु समाजप्रिय इंसान मित्र का चयन अपने आप करता है| एक बार मित्रता का बीज तो बोया, परन्तु उसे परम विश्वास के जल, श्रद्धा की खाद और प्रेम का सूर्यप्रकाश न मिले तो वह अंकुरित नहीं होगा| धन-दौलत, जाति, धर्म, शिक्षा, लिंग जैसे अंतर मित्रता के अंतर्मन को छू नहीं पाते| आखिर माता पिता, भाई बहन पत्नी, पुत्र पुत्री और अन्य कई सम्बन्धी जनों से हम घिरे होकर और उनका प्रेम पाकर भी हम सच्चे मितवा की खोज में क्यों कर निकल पड़ते हैं? वह इसलिए कि मन की गहराई में छुपे हर विचार और भावनाओं को हम अपने सम्बन्धियों से बंधन में उलझने के कारण प्रकट नहीं कर पाते| हमें समझने वाला एक मित्र ही होता है| इसलिए अगर एक भी सच्चा मित्र जीवन में में प्राप्त हो तो हमें मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है| मित्र हमारी कमियों को नजरअंदाज करके हमें हमारी त्रुटियों सहित गले लगाता है| उसे पता है कि सुन्दर गुलाब के साथ उसे एकाध बार कांटे भी चुभेंगे|
फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस)
इसकी उत्पत्ति का सबसे प्रचलित कारण प्रथम विश्व युद्ध के बाद की निराशाजनक स्थिति से उबरने हेतु और मित्रता के माध्यम से वैश्विक एकता, मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध और शांति को प्रोत्साहित करने की इच्छा के साथ जोड़ा जाता रहा है। हॉलमार्क कार्ड्स के संस्थापक जॉयस हॉल ने १९१९ में अगस्त माह के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस) मनाने का विचार दिया था, ताकि लोग एक-दूसरे को धन्यवाद कह सकें और दोस्ती का जश्न मना सकें|१९३५ में अमेरिकी कांग्रेस ने इस दिन को ‘राष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे’ घोषित किया था| वैसे भी सप्ताह का अंतिम दिन जश्न मनाने के लिए एकदम उपयुक्त ही है, जो समय के साथ एक लोकप्रिय संस्कृति बन गई है| हमारे देश में भी यह दिन मित्रों के प्रति आत्मीयता प्रकट करने के लिए बड़े उत्साह से मनाया जाता है|
आज की तारीख में हम भले ही वर्ष के एक दिन मित्रता दिवस मनाते हैं, परन्तु मित्रता मानव की सामाजिक प्रवृत्ति एवं संस्कृति रही है| सच्ची मित्रता में कई सिद्धांत लागू होते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हैं, पारस्परिक विश्वास और निष्ठा, आपसी समझ, सम्मान, सही दिशा का समर्थन और सहानुभूति! प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु (३८४- ३२२ ईसा पूर्व) के अनुसार, मित्रता तीन प्रकार की होती है: उपयोगिता, आनंद और सद्गुण। उपयोगिता पर आधारित मित्रता लाभ और फायदे पर आधारित होती है, जैसे स्कूल के सहपाठी या कार्यस्थल के सहकर्मी की मित्रता| आनंद पर आधारित मित्रता एक-दूसरे की संगति का आनंद लेने पर आधारित होती है, जैसे कि साथ में पिकनिक मनाना और सैर सपाटा में मौज-मस्ती करना! सद्गुण पर आधारित मित्रता सर्वोत्कृष्ट एवं स्थायी होती है, क्योंकि यह एक-दूसरे के चरित्र के प्रति पारस्परिक सम्मान और प्रशंसा पर आधारित होती है। यह सबसे उत्कृष्ट प्रकार की मित्रता मानी जाती है क्योंकि इसमें दोनों मित्र एक-दूसरे के व्यक्तित्व को और अधिक निखारने में मदद करते हैं। अरस्तू का मानना था कि सद्गुण मित्रता दुर्लभ है, क्योंकि इसके लिए उच्च कोटि के चरित्र और सद्गुणों की आवश्यकता होती है।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में सच्ची मित्रता के कई अनुकरणीय उदाहरण हैं| चिरंतन महाकाव्य रामायण को ही लें तो पुरुषोत्तम राम की मित्रता किसी जाति विशेष या कुल की मर्यादा से परे है| राम के वनवास के काल में उनके प्रिय मित्र ऋंगवेरपुर के राजा निषाद राज आदिवासी समाज के थे| वे अपना समूचा राज्य राम को अर्पण करना चाहते थे| पंचवटी में रावण ने जब सीता का अपहरण किया तब सर्वप्रथम रावण से युद्ध करने वाले गिद्ध पक्षीराज जटायु महाराज दशरथ के परममित्र थे| इस संघर्ष में जटायु ने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए| किष्किंधा के युवराज वानर सुग्रीव ने सीता की खोज में निकले श्रीराम से मित्रता की| इसके बदले में राम ने अपनी मित्रता का मोल चुकाने के लिए बाली और सुग्रीव के द्वंदयुद्ध में सुग्रीव को पिछड़ता देख वृक्ष की ओट से तीर मारा| अपनी मित्रता को निभाने हेतु अपने निष्कलंक चरित्र पर इस लांछन का कलंक उन्होंने बड़े ही आनंद से स्वीकार किया| दयानिधान राम ने रावण के अनुज विभीषण से मित्रता की और ‘यह घर का भेदी लंका को ढह गया’| स्वर्णिम लंका के सिंहासन पर श्रीराम को बिठाने के लिए आतुर विभीषण को श्रीराम ने ऐसा करने से मना किया|
महाभारत में मित्रता के कई पहलू हैं| कृष्ण चरित्र में कृष्ण और उनके गुरु बंधु सुदामा की मित्रता बहुत प्रचलित है| दरिद्री ब्राह्मण सुदामा के मुट्ठीभर चावल के एवज में द्वारकाधीश कृष्ण अपने बालसखा को राजमहल एवं समस्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं| कृष्ण और अर्जुन समवयस्क हैं, बंधु कम और सखा अधिक! श्रीकृष्ण अपने सखा की बात मान कर कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन के सारथी बन जाते हैं| भावनाओं के उद्रेक में में बह कर जब अर्जुन कुरुक्षेत्र में अपने सगे सम्बन्धियों को समक्ष देख अपने शस्त्र डाल देता है, तब उसके परम मित्र कृष्ण उन्हें ‘गीता’ का अमर उपदेश कर युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं| पितामह भीष्म को अर्जुन से अधिक प्रभावशाली होते देख अपनी प्रतिज्ञा तोड़ रथ का चक्का उठाकर वे भीष्म को मारने दौड़ते हैं| वे अर्जुन द्वारा कुशलतापूर्वक जयद्रथ का वध करवाते है, एवं निःशस्त्र भीष्म और कर्ण का वध करने को प्रेरित करते हैं| यह दिव्य मित्रता वे आजीवन निभाते हैं| कृष्णसखी कृष्णा यानि श्यामला द्रौपदी का कृष्ण के साथ रिश्ता स्त्री और पुरुष के उत्कट भावनात्मक अशरीरी और अपार स्नेहिल के नाते का अनुपम उदाहरण है| द्रौपदी वस्त्रहरण के प्रसंग पर श्रीकृष्ण ने ही उस पर आये संकट का निवारण किया| जब बाद में द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से पूछा कि उसने आने में इतनी देर क्यों लगा दी, तो श्रीकृष्ण ने उससे कहा, “तुमने जैसे ही बुलाया, वैसे ही मैं आया”| लज्जा से बोझिल द्रौपदी को याद आया कि, उसे अपने पतियों, हस्तिनापुर दरबार में बैठे महाराज धृतराष्ट्र, गुरुजन एवं समस्त योद्धाओं से की प्रार्थना विफल होने के पश्चात् ही सबसे अंत में सखा कृष्ण का स्मरण हुआ| महाभारत में घनिष्ट स्वार्थी मित्रता का एक अन्य उदाहरण हमें अलग ही सीख देता है| दुर्योधन अपने स्वार्थ के लिए सूतपुत्र का लांछन लगे हुए कर्ण को अंगदेश का राजमुकुट पहना देता है| इसी उपकार के तले दबकर अच्छा स्वभाव और सद्गुणों के होते हुए भी दानवीर कर्ण दुर्योधन के गलत पक्ष का हर बार समर्थन करता है| वह दुर्योधन की मित्रता में अँधा होकर दुर्योधन की हर कुटिल योजना, यहाँ तक कि द्रौपदी वस्त्रहरण के घृणास्पद प्रसंग में भी सहभागी होता है| श्रीकृष्ण एवं कर्ण की माता कुंती कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताते हैं कि, वह जेष्ठ पांडव है और उसे पांडवों के पक्ष में आना चाहिए| लेकिन उसके लिए दुर्योधन से मित्रता सर्वोपरि है| इसी कुसंगति के कारण अंत में वह जेष्ठ पांडव होकर भी अपने ही अनुज अर्जुन के हाथों मारा जाता है|
इन दो महाकाव्यों के अतिरिक्त मुझे दो ग्रन्थ याद आते हैं, ईसप नीति और पंचतंत्र! उनमें पशु पक्षियों की अनोखी मित्रता की कई नैतिक कहानियां हैं| ईसप नीति की एक शेर और मानव की मित्रता की कहानी मुझे बहुत ही अच्छी लगती है| एक गुलाम एंड्रोक्लीज़ अपने मालिक से भागकर जंगल में छिप जाता है। वहां उसे एक घायल शेर मिलता है। एंड्रोक्लीज़ शेर के पैर से कांटा निकालता है। बाद में एंड्रोक्लीज़ पकड़ा जाता है और उसे एक शेर के सामने मरने के लिए अखाड़े में फेंक दिया जाता है। सभी को आश्चर्यचकित करते हुए शेर एंड्रोक्लीज़ को पहचान लेता है, कि यह वही इंसान है, जिसने उसकी मदद की थी और उससे प्रेम से लिपट जाता है| सम्राट यह अनोखी मित्रता देखकर द्रवित हो जाता है और एंड्रोक्लीज़ और शेर दोनों को मुक्त कर देता है|
प्रिय पाठकगण, हमें अपने मित्र के स्नेह को एक हीरे जवाहरात से भरी संदूक की भांति सहेजकर रखना चाहिए| हीरे जवाहरात चोरी हो गए तो शायद वापस मिल जाएंगे, लेकिन एक बार किसी भी कारणवश आपका मित्र आपसे दूर चला जाए तो वापस नहीं आएगा|
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परी जाय।”
अर्थ- प्रेम का धागा महीन होता है, उसे झटका देकर नहीं तोड़ना चाहिए। यदि वह टूट गया तो फिर जुड़ता नहीं और जुड़ भी जाए तो गांठ पड़ जाती है।”
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख – “मुख्य धारा के व्यंग्य लेखन में अधिनायकवादी वर्चस्व का प्रतिरोध” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६८ ☆
आलेख – मुख्य धारा के व्यंग्य लेखन में अधिनायकवादी वर्चस्व का प्रतिरोध श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
“मुख्यधारा” की परिभाषा क्या है? क्या वह है जो सरकारी पुरस्कार पाती है और बड़े अखबारों की सुर्खियाँ बनती है? या वह है जो जनता के बीच सीधे संवाद करती है, पाठकों के दिलों में उतरती है और एक सूक्ष्म परंतु दीर्घकालिक परिवर्तन की ओर ले जाती है? क्या वह लेखन जो नएपन के नाम पर या यथार्थ के नाम पर समाज के स्याह हिस्से को विषय बनाकर लिखने में विशिष्ट होने का दंभ भरते दिखता है?
साहित्य में वास्तविक प्रतिरोध हमेशा से कथित मुख्यधारा की चकाचौंध से ज्यादा उसकी परिधियों पर ही पनपा और प्रभावी हुआ है। आज भी ऐसा ही है। जब उस प्रतिरोध का प्रभाव परिलक्षित होता है, तब ही वह स्वयं केंद्र में आ पाता है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदि इसी तरह की यात्रा से पनपे है। हिंदी लेखन में नई लकीरें खींचने का साहस मौजूद है, बस उसे समझने के लिए मुख्यधारा के परे भी देखने की आवश्यकता है। व्यंग्य, ललित निबंध, लघुकथा, आदि विधाएं कभी हाशिए पर थी, पाठकों ने समय के संग उन्हें साहित्य की मुख्य धारा में स्थापित किया। अनुवाद, व्यंग्य, अकविता, नाटक, एकांकी, समीक्षा आदि के लिए अब स्वतंत्र पुरस्कार दिखते हैं, ज्यादा पुरानी बात नहीं जब ये सब किनारे ही उपेक्षा के शिकार होते रहे हैं।
वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य और साहित्य की भूमिका पर गहन चिंतन आवश्यक है। विश्व अधिनायकवादी और विस्तारवादी ताकतों के दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे परिदृश्य में, साहित्य का एक मूलभूत दायित्व शोषित को जगाना है। प्रतिरोध का मार्ग स्वतंत्र लेखन की विवशता कहा जा सकता है। एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो स्थापित सत्ता तंत्रों, सरकारी संस्थानों, पुरस्कार समितियों, मीडिया घरानों आदि से जुड़ाव रखता है। यह जुड़ाव एक ‘सुविधा-क्षेत्र’ (Comfort Zone) बना देता है, जो उनके साहित्य को विभ्रमित करता है। ऐसे रचनाकारों में
विवादों और असहमति से बचने की प्रवृत्ति देखी जाती है। सीधा विरोध करने के बजाय, प्रतीकों, रूपकों और इतिहास के पन्नों में छिपकर बात करने की प्रवृत्ति होती है। यह एक साहित्यिक व्यंग्य तकनीक भी है, कई बार यह सुविधा का ही रूपक बन जाती है। साहित्य जगत भी वैचारिक खेमों में बंटा है। कई बार प्रतिरोध ‘दूसरे खेमे’ के विरोध तक सीमित हो जाता है, न कि मूलभूत अधिनायक वादी सत्ता के ढांचे के प्रश्नों पर केंद्रित रह पाता है। यह कहना पूरी तरह से अन्याय होगा कि सभी लेखक सुविधा के पथ पर हैं।
मुख्यधारा के प्रकाशन तंत्र से इतर, सोशल मीडिया, छोटे स्वतंत्र प्रकाशन, लिटफेस्ट और वेब पत्रिकाओं ने एक नई तरह की बेबाकी के लिए जगह बनाई है। यहाँ युवा और वरिष्ठ, दोनों तरह के रचनाकार सीधे और बिना लाग लपेट के अपनी बात कह रहे हैं। उपन्यास, कविताएँ और नाटक ऐसे भी लिखे जा रहे हैं जो सीधे तौर पर वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों की पड़ताल करते हैं। ये रचनाएँ मीडिया की सुर्खियाँ भले नहीं बनतीं, पर साहित्यिक चर्चा में अपनी जगह बनाती हैं। आज के दौर में बेबाक होने का मतलब है सोशल मीडिया पर हेट कैम्पेन, मानहानि के मुकदमे, और सांस्थानिक उपेक्षा का सामना करना। ऐसे में जो लेखक अपनी बात कह रहे हैं, वे निजी जोखिम उठा रहे हैं।
इस प्रकार हिंदी साहित्य में प्रतिरोध की एक मजबूत, सक्रिय और जीवंत धारा मौजूद है। यह धारा हमेशा संगम में लुप्त सरस्वती सी उपस्थित रहती है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मिच्छामि दुक्कड़म…“।)
अभी अभी # ७७४ ⇒ आलेख – मिच्छामि दुक्कड़म श्री प्रदीप शर्मा
तपस्या और आत्मशुद्धि का पर्व पर्युषण पर्व कहलाता है। आप चाहें तो इसे संतों का चातुर्मास भी कह सकते हैं। मन, वचन और कर्म की शुद्धि के बिना आत्म शुद्धि संभव नहीं। संस्कारों की ही शुद्धि को आत्म शुद्धि से जोड़ा गया है।
मनुष्य गलतियों का पुतला है। Man is a bundle of mistakes. गलती करना मनुष्य का काम, क्षमा करे सो भगवान ! To err is human. हम सुबह अपना मुंह तो आईने में देख लेते हैं, लेकिन हमारा आचरण हम किस आईने में देखें।
जब भी हम ज्ञान बांटने की कोशिश करते हैं, कबीर साहब जरूर बीच में आ टपकते हैं ;
बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा ना मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना
मुझसे बुरा ना कोय।।
आज का मनोविज्ञान तो कुछ और ही कहता है।
व्यक्तित्व निर्माण और मोटिवेशनल स्पीच में तो आपको अपनी खूबियों का ही प्रदर्शन करना है, अपनी कमजोरियां अगर किसी को जाहिर हो गई तो समझो हो गया इंटरव्यू !
आदमी गलतियों से महान बनता है, लेकिन एक बार महान बन जाने के बाद उसकी गलतियों का भी महिमा मंडन होने लगता है।
जो कार्य हमें अकेले में करने में संकोच होता हो, अगर वह सामूहिक रूप से किया जाए तो हमारा उत्साह तो बढ़ता ही है, हमारा संकोच भी टूट जाता है। अकेले सड़क पर झंडा लेकर कौन नारा लगाता है। जिंदाबाद मुर्दाबाद भी अकेले में नहीं होता। समूह में जान है वर्ना इंसान बेजान है।।
अक्सर हम वही करते हैं, जो हमसे बड़े करते हैं, क्योंकि हम सीखते तो उनसे ही हैं। कुछ पर्व और उत्सव मिलने जुलने के होते हैं तो कुछ गिले शिकवे दूर करने के। बुरा न मानो होली है। आओ साल भर के करे कराए पर पानी फेरें। भैया, होली पर तो गले मिल लो। एक प्यार का रंग सभी रंगों पर भारी होता है।
बचपन में हमें बात बात पर डांट पड़ती थी। स्कूल में किसी ने मास्टर जी से चुगली कर दी तो मार भी खाओ और माफी भी मांगो। बड़े छोटे में घर में झगड़ा हुआ, तो गलती छोटे की ही मानी जाती थी। मांगो माफी। दफ्तर में थोड़ी अनियमितता हुई अथवा देर से पहुंचे तो say sorry !
वैसे आजकल बोलचाल की भाषा में सॉरी इतना आम हो गया है कि लोग छींकने, डकारने और खांसने पर भी सॉरी बोलने लग गए हैं। लेकिन हमारे अहं पर चोट तब पहुंचती है जब हमें बिना कारण कभी कभी माफी मांगने पर बाध्य होना पड़ता है।
कभी अपने किये पर, तो कभी अपने कहे पर। अगर हमें अपनी गलती का अहसास हुआ तो शायद हम माफी मांग भी लें, वर्ना अपमान का घूंट पीना कौन पसंद करता है।
राजनीति में मानहानि और माफीनामे बहुत चलते हैं।
आम आदमी का अहं ऐसे भी इतना बड़ा नहीं होता। उसकी तो पूरी जिंदगी ही माफी मांगने और माफ करने में गुजर जाती है।।
जिंदगी के लेखा जोखा की हम बात नहीं करते, लेकिन साल भर का लेखा जोखा तो एक व्यापारी भी रखता है। साल में एक बार लोग इनकम टैक्स का रिटर्न भी फाइल करते हैं। आय व्यय और लाभ हानि जीवन के हर क्षेत्र में होती है। साल भर में कम से कम एक बार घर की सफाई, दिवाली के बहाने ही, हो ही जाती है। हमारी उपलब्धियों का भी लेखा जोखा हमारे पास होता है, लेकिन क्या गलतियों का भी कुछ हिसाब किताब रखा जाता है अथवा सब गंगा जी में बहा दिया जाता है।
देखिए साहब हम धार्मिक भी हैं और समय के हिसाब से ईमानदार भी। दान पुण्य भी हैसियत के हिसाब से कर ही लेते हैं।
बाकी भूल चूक लेनी देनी तो चलती ही रहती है जीवन में। बस यही समझकर अगर इस पर्युषण पर्व पर सबसे माफी मांग ली जाए तो क्या बुरा है।।
माफी मांगना भी गंगा नहाने जैसा ही है। अगर चित्त ही मलिन हो तो कैसा गंगा स्नान ! जिस गलती को ईसाई चर्च में कन्फेशन बॉक्स में जाकर कुबूल करते हैं, हम उसे खुले आम स्वीकार कर, उसके लिए माफी मांगते हैं। जाने अनजाने में हमसे कई गलतियां होती हैं, सबका सामूहिक माफीनामा है मिच्छामि दुक्कड़म।
आत्म शुद्धि से बड़ा कोई पर्व नहीं। हमारे सभी समुदायों के पर्व यही संदेश देते हैं। रिद्धि सिद्धि के प्रदाता गजानन श्रीगणेश की दस दिन तक समारोह पूर्वक पूजा अर्चना, पूर्वजों को समर्पित श्राद्ध कर्म, और नवरात्रि में माता की आराधना भी हमारी आत्म शुद्धि का प्रयास ही है। आइए, माफ करें, और माफी मांगें। मिच्छामि दुक्कड़म।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कांच और कैमरा…“।)
अभी अभी # ७७३ ⇒ आलेख – कांच और कैमरा श्री प्रदीप शर्मा
जिसे दुनिया आइना, शीशा अथवा दर्पण कहती है, हमारे घर में उसे कांच कहा जाता था। तब साधारण घरों में आईने वाली स्टील की आलमारी और दहेज वाली, कांच लगी, ड्रेसिंग टेबल भी नहीं होती थी, ना तो कोई अटैच बाथ होता था और ना ही कोई बैडरूम। हां घरों के आले में एक जगह कांच, कंघा और एक छोटी लोहे की डब्बी, अथवा कांच की शीशी में खोपरे का तेल रखा जाता था। ठंड में खोपरे का तेल ठरक जाता था, यानी जम जाता था। स्कूल जाने की जल्दी में उसे नहाने के गर्म पानी में डुबकी दी जाती थी, वह बेचारा, इस उपकार के फलस्वरूप, अंदर से पिघल जाता था। कभी कभी आपातकाल में सरसों का तेल ही बालों में चुपड़ लिया जाता था। कुछ संपन्न घरों में दीवारों पर फ्रेम में किसी तस्वीर की तरह टंगा, आइना भी नजर आ जाता था।
मुझे कैमरे का शौक ना तब था, न आज है। एक समय था, जब अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन आते थे, जापानी कैमरा, वीपीपी डाक से मंगाइए, मात्र ५० रुपए में।
सत्तर और अस्सी के दशक में शादियों के एल्बम धड़ाधड़ बनते थे। जिसके घर भी मिलने जाओ, वह शादी का एल्बम जरूर चाव से दिखाता था। कुछ श्वेत श्याम तस्वीरें तो बाबा आदम के जमाने की लगती थी। लेकिन कितना रंगीन होता था न, शादी का एल्बम। ।
गर्मी की छुट्टियां हों अथवा एलटीसी लिया हो, शिमला मसूरी के साथ साथ तीरथ भी हो जाता था। बहती गंगा में कौन हाथ नहीं धोता। बैडिंग अथवा होल्डाल के साथ साथ एक अदद कैमरे की व्यवस्था भी की जाती थी। बाद में तो कैमरे के रोल भी रंगीन मिलने लग गए थे। यात्रा के बाद कैमरे के रोल धुलवाने पड़ते थे, अच्छा खासा इंतजार हुआ करता था। आज की तरह नहीं कि, लिया मोबाइल और खचाखच बीस पच्चीस एक जैसी तस्वीर खींच डाली। कुछ प्रिंट खराब भी निकल जाती थी। यानी बड़ा महंगा शौक था, फोटोग्राफी का।
कुछ टूरिस्ट स्पॉट्स पर तो पेशेवर फोटोग्राफर घूमा करते थे, आपके फोटो खींचकर बाद में डाक से भिजवा दिया करते थे।
अब तो खुदखेंच का जमाना है, आप चाहो तो मोदी जी के साथ सेल्फी हो जाए।।
अगर दर्पण झूठ नहीं बोलता, तो कैमरा भी कड़वा सच नहीं छुपाता। कुछ दिनों से मुझे अपना चेहरा बदला बदला, और सिर के बाल उड़े उड़े, यानी उजाड़ फसल, और बचे खुचे बाल, मानो धूप में सफेद किये हुए, नजर आने लगे हैं।
अपनों से तो आप नजर छुपा सकते हो, लेकिन अपने आपको कैसे छुपाओगे। कैमरा तो दर्पण का भी बाप है। अगर खुद की सूरत से इतना ही प्यार है, तो बालों को डाई करो, अमिताभ की तरह दाढ़ी रख लो, सफेदी वरदान बन जाएगी। ।
यही तो फर्क है, सूरत और सीरत में। पुरानी मशहूर अभिनेत्रियों को ही देख लीजिए, कहां गया उन हूरों का नूर। लेकिन सब कितनी मशहूर। जीवन का अध्यात्म अपने अंदर झांकने में है, आईने और कैमरे से शिकायत करने में नहीं। बाहर सब कांच ही कांच है, असली हीरा तो हमारे अंदर ही मौजूद है।
शैलेन्द्र ने शायद आज से बहत्तर वर्ष पूर्व, यानी सन् १९५३ में ही मेरे लिए यह गीत लिखा होगा, फिल्म शिकस्त का, जो मुझे आज भी प्रेरणा दे रहा है, मेरी आंखें खोल रहा है ;
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १४५ ☆ देश-परदेश – माननीय हमारी भी सुनो लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆
देश के सर्वोच्च न्यायालय के कुत्तों के मामले में यू टर्न लेकर जो साहसिक निर्णय लिया है, पूरे विश्व भर के कुत्ते उसकी “तारीफ़ के पुल” बांध रहें हैं। हालांकि इन पुलों के नीचे देश भर की लाखों बिल्लियां दब गई है। उनकी आवाज़ भी सुननी चाहिए। बढ़ती हुई कुत्तों की आबादी ने इन कोमल और कमसिन बिल्लियों का जीना तक दूभर कर रखा हैं।
बिल्लियों की कम संख्या से कबूतरों की मौज हैं। उनकी आबादी ने तो पूरा आसमान ही पाट दिया हैं। कबूतरों को बचाने में बहुत से धर्मांबली भी आगे आए हैं। बढ़ते हुए कबूतरों से हमारे देश के डॉक्टर बहुत प्रसन्न हैं, रोगियों की संख्या बढ़ाने में कबूतरों के सहयोग को नकारा नहीं जा सकता हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने कुत्तों के बाद हाथियों पर हो रहे अन्याय पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। कुत्तों और हाथी का पुराना संबंध है, सड़क पर जब हाथी मस्ती भरी चाल से निकलता है, तो ये गली के कुत्ते उस पर खूब भौंकते है, मगर क्या मजाल अकेले हाथी पर उसका कोई प्रभाव पड़ता हो। ये भी हो सकता है, इन गली के कुत्तों ने सर्वोच्च न्यायालय से इस बाबत कोई शिकायत की होगी, कि दस कुत्तों के झुंड से भी हाथी उनकी बात नहीं सुनता है, हाथी के कान सर्वोच्च न्यायालय को खींचने चाहिए।
देश का न्यायालय जितनी तत्परता से मानव प्राणी को छोड़ कर अन्य जीवों के लिए साहसिक कदम उठा रहा है, बहुत जल्दी अन्य प्राणियों जैसे कि हजारों वर्षों से मंद बुद्धि (अपमान) का घूंट पीकर कर जीवन व्यतीत कर रहे गधे, गन्दगी के प्रतीक माने जाने वाले सुअर, उछल कूद की पहचान बन चुके बन्दर आदि के लिए भी कुछ साहसिक कदम लेकर निर्णय सुनाए जाएंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंगड़ाई…“।)
अभी अभी # ७७२ ⇒ आलेख – अंगड़ाई श्री प्रदीप शर्मा
(Pandiculation)
करवटबदली,
अंगड़ाई ली
सोया हिंदुस्तान उठा…
हिंदुस्तान तो कब का उठकर और जागकर विकास के रास्ते विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है, और इधर हम एक सूर्यवंशी हैं,जो सूरज से आँखें मिलाने के बजाय बिस्तर पर पड़े पड़े अंगड़ाई ले रहे हैं। वैसे देखा जाए तो हम इतने आलसी हैं कि अंगड़ाई लेने में भी हमें जोर आता हैं। काश, हमारी अंगड़ाई भी कोई और ले लेता,तो हम तो हाथ पाँव भी नहीं हिलाते।
लेकिन वह कहावत है न, “न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः”,इसलिए उबासी लेने से अंगड़ाई लेने तक का काम भी हमें खुद ही करना पड़ता है। वह भी अगर पत्नी गर्मागर्म चाय का प्याला लेकर,सर पर खड़ी नहीं हो जाती,तो हमारे अंग का कोई भी भाग अंगड़ाई में भाग नहीं लेता। ।
हमारी पत्नी की आंख हम पर गड़ी हुई है और हमारी आँखें उनके कोमल हाथों में मौजूद चाय के प्याले पर टिकी हुई है। सुबह सुबह जो चाय के लिए नटे,उसका पुण्य घटे। हमने भी आखिर प्याला उनके हाथों से लेकर मुंह को लगा ही लिया। चाय की चुस्की में ऐसा क्या है, कि बदन की सुस्ती तुरंत हवा हो जाती है। रात भर के अलसाए अंग का एकाएक कायाकल्प हो जाता है।
शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया है अंगड़ाई जो आलस्य या थकावट के कारण होती है और जिसके फलस्वरूप सारा शरीर कुछ पलों के लिए ऐंठ, तन या फैल जाता है।
अंग्रेजी में इसके लिए सही शब्द “पैंडिक्यूलेशन” है। इसके साथ जम्हाई भी आ सकती है और नहीं भी। इसे “विशेष रूप से धड़ और हाथ-पैरों में खिंचाव और अकड़न (जैसे थकान और नींद आने पर या नींद से जागने के बाद)” के रूप में परिभाषित किया गया है। ।
शरीर सबका टूटता है,अंगड़ाई सब लेते हैं।
हमने तो कुत्ते बिल्लियों तक को अंगड़ाई लेते देखा है। बच्चे जब तक पूरी तरह खेलकर थकते नहीं,सोते नहीं और एक बार सो गए,तो पूरी नींद लेने के बाद ही उठते हैं।
वे इतनी जल्दी बिस्तर नहीं छोड़ सकते।
वैसे शायर लोग अंगड़ाई को हुस्न और जवानी से जोड़ देते हैं। बिना अंगड़ाई के कोई हसीना जवान नहीं होती। उम्र की एक दहलीज पर अंगड़ाई ली जाती है,और जवानी की ओर कदम उठ जाता है। अंगड़ाई,शायरों की जुबानी ;
🟢 शिक्षाविद्, लोक-विज्ञानी स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव 🟢☆ श्री प्रभातचंद श्रीवास्तव ☆
(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)
लोक विज्ञान के मूर्धन्य, आधिकारिक विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का अवतरण 1 सितम्बर 1916 को कटनी-कन्वारा-विजयराघवगढ़ मार्ग पर ग्राम पिपरहटा, जिला कटनी में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रामीण परिवेश में हुई, पहले ग्राम कन्वारा में शिक्षा ली फिर साधूराम स्कूल, कटनी से मैट्रिक पास किया। कालांतर में आपने जबलपुर का रुख किया। उन्होंने अपनी जीविका एक स्कूल शिक्षक के रूप में हितकारिणी सभा से प्रारम्भ की और उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए एम. ए. हिंदी नागपुर विश्वविद्यालय से मैरिट में स्थान बनाते हुए किया। हितकारिणी महाविद्यालय में क्रमशः शिक्षक, असिस्टेंट प्रोफेसर, रीडर, प्रोफेसर और महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में कार्य किया। आपने विश्वविद्यालय के अनेक शोधार्थियों के निर्देशक के रूप में भी कार्य किया।
सम्पूर्ण जीवन लोक साहित्य के लिए समर्पित रहे डॉ. श्रीवास्तव ने जबलपुर विश्वविद्यालय से “बुन्देली का भाषा विज्ञान और आलोचनात्मक अध्ययन” विषय पर शोध किया जो बुन्देली पर किया गया प्रथम शोध रहा। बुन्देली के शब्द भंडार का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, शब्दों के स्रोत एवं शब्दकोष पर काम किया तथा पर्यावरण, पेड़-पौधों की पूजा आदि पर पांडित्यपूर्ण लेखन किया। विभिन्न विषयों पर आपके लेख देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित और आकाशवाणी व दूरदर्शन केंद्रों से प्रसारित होते रहे। आपने चेतन का बोध कराने वाली आत्मकथाएं जैसे तुलसी, सातवां मील, वर्षा मेघ, चिड़ियाँ, सठिया कुँआ आदि लिखीं जो अपनी जीवन कथा स्वयं कहते हैं। शिक्षण काल के दौरान उन्होंने सामान्य भू ज्ञान, प्राकृतिक भू ज्ञान, आर्थिक भू ज्ञान एवं सामाजिक अध्ययन पर छात्रोपयोगी पुस्तकें लिखीं जिनमें से कुछ का महाराष्ट्र के लिए मराठी में भी अनुवाद हुआ।
डॉ. श्रीवास्तव के बहुउपयोगी साहित्य सृजन और हिंदी-बुन्देली की मधुर सन्देश प्रधान कविताओं को देखते हुए अनेक साहित्यिक, सामाजिक संस्थाओं ने इनका नागरिक अभिनन्दन किया जिनमें प्रमुख हैं- मिलन, गुंजन कला सदन, सेठ गोविन्ददास आयोजन समिति, हमसी, रानी दुर्गावती बलिदान दिवस पर म. प्र. के तत्कालीन मुख्य मंत्री अर्जुन सिंह द्वारा संग्रामपुर में, म. प्र. आंचलिक साहित्यकार परिषद् द्वारा कटंगी में आदि।
डॉ. श्रीवास्तव के साहित्य में ग्राम्य जीवन का सजीव चित्रण है। उनकी जन्म स्थली ग्राम पिपरहटा उस समय पूर्णतः नदी-नालों और पहाड़ियों के वेष्टिक परिवेश वाला गांव था। उनकी एक लम्बी बुन्देली कविता “भौंरहा पीपर” में गांव का पीपल स्वयं अपनी और बदलते युग की कहानी सुनाता है-
मैं पीपर को बिरछ-
गांव में अब लौं एक खड़ो हों,
बहुत दिना भए बीरन सें-
अकबर सें तनक बड़ो हों।
बड़ी डारैयाँ लाखन कनखा, लाखन के लाख-लाख पत्ता,
गीधन के दो सौ आठ घोंचुआ,
डार-डार भौंरन छत्ता।
इतना ही नहीं डॉ. श्रीवास्तव की लेखनी गांव के तत्कालीन व्यक्तियों और परिस्थितियों का उल्लेख भी करती है-
अब तौ करिया चैतू कुम्हार है
ई खेरे को ठाकुर,
थानेदारन सें मिलजुर बो,
खाय-खबाय घी-गुर।
परमोला रतनसींग कारिंदा की
पांचउ अब घी में,
पंडा बाबा छिरिया लैकें,
नित जाओ करत पहरैं,
ढारैं महादेव मुरलीधर,
चौथे पहर सकारें।
जिरिया दाई मंहतैंन सयानी,
दांत घुरे से जी के,
मालगुजारन कक्को सबकी,
दएं गुदनहा टीके।
इसी प्रकार बैलों एवं बैलगाड़ी को संबोधित एक बुन्देली गीत में पर्यावरण परिवेश का वर्णन दृष्टव्य है- (इसमें बैलों को छैल-छबीले कहा गया है)
चले चलौ रे छैल-छबीले
थोड़ी और कसर है।
रपटा चढ़ें मुरें पूरब खों,
होय सड़क जा आड़ी,
पटपर-पथरा पै मचकै फिर
जजर-मजर जा गाड़ी।
खैर-करौंदा और मकुइया-
के जरवा दोई बगलें,
क्विइल तलैया बड़ी पुरानी,
बढ़ें पार पै लगलें।
आंगें तनक चलें फिर पर है
चित्तावर की मढ़िया,
बिजराघोगढ़ के राजा की
गिरी-परी सी गढ़िया।
“पीपर बारो गांव हमारो”, डॉ. श्रीवास्तव की एक लंबी कविता है जिसके प्रारम्भ में उन्होंने लिखा है-
पीपर बारो गांव हमारो
कुल तीनक सौ घर बारो
पिपरहटा कहाउत है
कभऊं उतै पीपरई- पीपर हते
अब पीपर-ईपर नैयां।
डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने 1950 के आसपास श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं “युगारम्भ” एवं “धरती” का संपादन भी किया। इनमें उन्होंने “पूर्णेन्दु” नाम से अनेक लेख और कविताएं लिखीं। वे एक अच्छे चित्रकार भी थे, उन्होंने अनेक पत्रिकाओं और पुस्तकों की लिए चित्र और रेखा चित्र बनाए। “देशबंधु और “स्वतंत्रमत” समाचार पत्रों में उन्होंने बुन्देली में वर्षों “अपनी बोली में अपनी बात” शीर्षक से एक कॉलम लिखा को काफी लोकप्रिय हुआ। “बुन्देली लोकायन में राम” में उनके सृजित पद अद्भुत हैं-
अकल-विकल हैं प्रान राम के,
बिन संगिनि बिन गुंइयां।
फिरैं नाँय सें माँय बिसूरत,
करैं झांवरी मुइयाँ।
पूँछत फिरैं सिंसुपा साल्हें,
बरसज साज बहेरा।
धवा सिहारू महुआ-कहुआ,
पाकर बाँस लमेरा।
डॉ. श्रीवास्तव ने बुन्देली में एक खंड काव्य “वीरांगना रानी दुर्गावती” का सृजन भी किया, जिस पर देश के सभी आकाशवाणी केंद्रों से लगभग 1 घंटे का संगीत रूपक प्रसारित किया गया। रानी दुर्गावती की वीरता का एक शब्द चित्र-
चली प्रलय सें जूझन रानी,
रन चण्डी अकुलाई।
गंग जमुन उत उठीं हिलोरें,
इत रेवा उमड़ाई।
“डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव लोकविज्ञान शोध संस्थान” द्वारा डॉ. श्रीवास्तव रचित पुस्तकों के द्वितीय/तृतीय संस्करणों के प्रकाशन भी किए जा रहे हैं। प्रति वर्ष 1 सितम्बर को स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का जन्मोत्सव समारोह जबलपुर व आसपास के क्षेत्रों में “बुन्देली दिवस” के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिन देश के विविध क्षेत्रों के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वानों को सम्मानित किया जाता है। बुंदेलखंड के साहित्य, कला, संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम होते हैं। उन्हें सादर श्रद्धान्जलि।
(डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख “बुंदेली के प्रकांड विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव”।)
☆ बुंदेली के प्रकांड विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ☆ डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’ ☆
सभी जानते हैं कि संस्कारधानी ही नहीं अपितु पूरे बुंदेल क्षेत्र में जब भी बुंदेली भाषा एवं साहित्य की बात आती है तो स्व. डॉ. पूरन चंद श्रीवास्तव जी के नाम और उनके द्वारा किये गए कार्यों का उल्लेख अवश्य ही होता है।
पितृतुल्य स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव जी का जन्म 1 सितंबर 1916 में कटनी के पिपरहटा गाँव में हुआ था। एम. ए. (हिन्दी) तथा पी-एच. डी. की शैक्षिक अर्हता उनकी अध्ययनशीलता का प्रतीक है। शिक्षकीय जीवन जीते हुए ये सन 1976 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। इनका बाल्यकाल प्रकृति की गोद में बीता, जहाँ प्रकृति भरपूर प्यार लुटाती है। पेड़-पर्वत, झरने-नदियाँ, करौंदे, बेर, मकोये, आम, जामुन, महुआ, अमरूद आदि खाने को मिलते थे। अंतहीन हरियाली से सजी वसुंधरा में खरगोश, मोर, गौरैया आदि पशु-पक्षी दिखाई देते थे। इन सबके बीच रहने वाले डॉ. श्रीवास्तव जी का प्रकृति प्रेम भला उनके साहित्य में कैसे नहीं आता। इनकी तो एक कृति का नाम ही हमें प्रकृति से जोड़ने हेतु पर्याप्त है। वह है बुंदेली काव्य कृति “भौंरहा पीपर”।
डॉ. पूरनचंद जी श्रीवास्तव बुंदेली के प्रति आजीवन समर्पित रहे। वे एक संवेदनशील, अध्ययनशील एवं वरिष्ठ बुन्देली भाषा मर्मज्ञ तो थे ही, बुंदेली गुणज्ञता के विरले व्यक्तित्व भी थे। सन 1984 में प्रकाशित अपने बुंदेली काव्य संग्रह भौंरहा पीपर के संबंध में इन्होंने कहा है कि इस संग्रह की सारी रचनाएँ मेरे ग्राम्यांचल में बिताए वक्त की देन है, जिससे उनका ग्रामीण जगत से अतीव जुड़ाव परिलक्षित होता है। इसके आगे वे कहते हैं कि उन दिनों गाँव में पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों का निर्वहन ईमानदारी और निष्ठा के साथ किया जाता था।
संस्कारधानी एवं बाहरी साहित्यकारों को सदैव मार्गदर्शन देने वाले डॉ. श्रीवास्तव जी के निष्णात एवं यशस्वी शिष्यों की एक लंबी फेहरिस्त है। अंतरराष्ट्रीय प्रज्ञा मिशन नई दिल्ली के संस्थापक ख्यातिलब्ध ब्रह्मलीन स्वामी प्रज्ञानंद जी ने डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव जी के बारे में लिखा है कि उनके समक्ष होने पर मुझे उनका सौम्य तथा गुरु गाम्भीर्य रूप साकार होने लगता था। जब मैं एक छात्र के रूप में उनके द्वारा कराए जाने वाले लोक साहित्य का बोध करते समय करता था।
डॉ. श्रीवास्तव की कालजयी कृतियों में बुंदेली काव्य संग्रह “भौंरहा पीपर” एवं सन 1958 में सृजित खंडकाव्य “वीरांगना रानी दुर्गावती” प्रमुख हैं। इसके इतर इनका हिन्दी एवं बुन्देली सृजन का व्यापक साहित्य सागर है। निबंध आत्मकथाएँ, शैक्षणिक साहित्य की रचनाएँ और बुंदेली शब्दकोश आदि इनके द्वारा रचे गये हैं। वर्ष 1990 के पूर्व तक ऐसे विद्वत मनीषी का जन्मदिवस गुंजन कला सदन द्वारा प्रतिवर्ष 1 सितंबर को मनाया जाता रहा। इनकी सक्रिय बुन्देली भाषा सेवा तथा समर्पण से प्रेरित होकर सन 1990 से इनके जन्मदिवस को गुंजन ने “बुन्देली दिवस” के रूप में मनाना शुरू किया। इसमें संस्कारधानी के लोगों तथा साहित्यकारों का भी योगदान मिलना प्रारंभ हो गया।
इनके 90 वें जन्मदिवस की तैयारियाँ जोरों से चल ही रहीं थी तभी इस बुन्देली दिवस के 12 दिन पूर्व ही अर्थात 20 अगस्त 2005 को संस्कारधानी का यह प्रकांड बुंदेली मर्मज्ञ हमें छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गया। संस्कारधानी की यह अपूर्णीय क्षति थी। सबको मात्र इस बात का संतोष है कि उनके जीवन काल में ही सन 1990 से इनका जन्म दिवस “बुंदेली दिवस” के रूप में मनाया जाने लगा था। इस तरह वर्तमान वर्ष 2025 में हम 36 वाँ बुंदेली दिवस और उनका 109 वाँ जन्मदिवस मना रहे हैं, जो प्रतिवर्ष 1 सितम्बर के 30 दिन पूर्व से मनाया जाने लगता है। जबलपुर और आसपास की समस्त साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाएं अपने अगस्त माह के कार्यक्रम स्व. डॉ. पूरनचंद जी को समर्पित करती हैं। यहां अगस्त माह बुंदेली मास कहलाता है।
ऐसे प्रसिद्धि प्राप्त बुंदेली भाषा विज्ञानी की स्मृति में हम बुंदेली दिवस विगत 35 वर्ष से व्यापक स्तर पर मना रहे हैं और इसमें हमें पूरे बुन्देली भाषायी क्षेत्र से सहयोग तथा समर्थन मिल रहा है। इन सभी तथ्यों व उपलब्धियों के आधार पर हम मध्य प्रदेश शासन व संस्कृति विभाग से माँग करते हैं कि इस “बुन्देली दिवस” को शासकीय मान्यता प्रदान कर शासकीय स्तर पर बुंदेली दिवस घोषित किया जाये।
☆ “बुंदेली के सुप्रसिद्ध साहित्यकार – डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
किसी भी विषय पर कोई लेखन अगर उससे संबंधित क्षेत्रीय भाषाओं में किया जाता है तो उसकी सार्थकता और उपयोगिता दोनों ही बढ़ जाती है। हिन्दी साहित्य में ऐसा ही सार्थक सृजन सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव का भी रहा है। वैसे तो उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी भाषा दोनों ही में अत्यंत ज्ञानवर्धक लेखन किया लेकिन बुंदेली भाषा में किये गये साहित्य सृजन के लिए वे अपेक्षाकृत अधिक चर्चित रहे। बुंदेली भाषा में किया गया उनका सृजन बुंदेलखंड के क्षेत्रों में पठनीय और लोकप्रिय दोनों ही सिद्ध हुआ। डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव द्वारा बुंदेली भाषा में रचा गया वीरांगना रानी दुर्गावती पर आधारित खंड काव्य साहित्यिक क्षेत्र में एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी माना जाता है। इस संबंध में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. गार्गीशरण मिश्रा मराल ने अपने एक लेख में लिखा है कि डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव एक सिद्धहस्त साहित्यकार हैं। उनकी अनेक कृतियां- साहित्य खड़ी बोलीं में है किन्तु वीरांगना रानी दुर्गावती खंड काव्य बुंदेली भाषा में है। संभवतः बुंदेलखंड की वीरांगना रानी दुर्गावती का यशोगान बुंदेली भाषा में करना कवि को अधिक समीचीन लगा होगा ताकि बुंदेलखंड की जनता अपनी ही भाषा में महिमा मंडित रानी दुर्गावती की वीरगाथा सुनकर आल्हादित हो। सकें। कवि डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव ने बुंदेली जैसी लोक भाषा को काव्य भाषा का रुप देकर उसे कलात्मक सौंदर्य प्रदान किया है। श्रीवास्तव जी ने वीरांगना रानी दुर्गावती की महिमा का जो यशोगान बुंदेली भाषा में किया है, वह अत्यंत प्रभावी और पठनीय है। एक जगह वे लिखते हैं –
चली प्रलय से जूझन रानी, रणचंडी अकुलाई।
गंगा – जमुन उत उठीं हिलोरें, इत रेवा उमड़ाई।
डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव जी का मानना था कि बुंदेली भाषा के विकास और प्रचार के लिए यह जरूरी है कि इसका दैनिक जीवन में अधिकाधिक उपयोग किया जाये और इसे बोलने में हम गर्व महसूस करें। एक बार साहित्यकार एवं शिक्षाविद श्री अभय तिवारी जी से साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा था कि- “आज हमें जरुरत ए की है कि मुहावरों और लोकोक्तियो खों आगे लायें। ओमें लोगन के बीच में जो कहनातें हैं ऊखों आगे लायें।”
पितृ तुल्य डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव मेरे पूज्य पिता स्व. पं. भगवती प्रसाद जी पाठक के अत्यंत आत्मीय मित्र थे। इसी के साथ वे मेरे अग्रज स्व. श्री हर्षवर्धन जी पाठक के गुरु भी थे। पारिवारिक आत्मीयता होने के कारण मैं भी उन्हें श्रद्धा से चाचा जी के रुप में संबोधित और सम्मानित करता। चूंकि उनका निवास मेरे गलगला स्थित निवास के समीप था, इसलिए प्रायः रविवार को श्रीवास्तव जी मेरे घर आते और फिर चाय नाश्ता करके पिताजी के साथ पास ही सब्जी खरीदने बाजार जाते। घर पर मैं दोनों की बौद्धिक चर्चाओं को बड़े ध्यान से सुना करता। इस दौरान मैंने अनेक बार श्रद्धेय श्रीवास्तव जी की ओज और मस्ती का साक्षात्कार किया है। घर पर जब वे बुंदेली कविताएं सुनाते तो हम सब उन्हें घेर कर बैठ जाया करते।
यह उल्लेखनीय है कि डा . पूरनचन्द श्रीवास्तव देश के हिन्दी साहित्य और बुंदेली लोक साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान थे। उनका जन्म 1 सितंबर 1916 को कटनी के ग्राम पिपरहटा में। हुआ था। शिक्षा तो उन्होंने नागपुर और जबलपुर में प्राप्त की लेकिन कर्म क्षेत्र उनका जबलपुर रहा। हितकारिणी महाविद्यालय में अपने शिक्षकीय दायित्वों का निर्वाह करते हुए श्रीवास्तव जी 1976 में सेवानिवृत्त हुए। बुंदेली भाषा और साहित्य में उनके सक्रिय योगदान के कारण ही अनेक वर्षों से गुंजन कला सदन विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के साथ बुंदेली दिवस के रूप में उनके जन्म दिवस का व्यापक आयोजन करती आ रही है और मेरे विचार से बुंदेली दिवस के रूप में याद करना ही उनके प्रति हमारा सच्चा श्रद्धा भाव है।
ऐसे प्रेरणास्रोत और प्रणम्य साहित्यकार और शिक्षाविद डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव जी के विषय में शायद किसी कवि ने सही लिखा है –