हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२८ ☆ भावना के दोहे – इंतजार ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – इंतजार)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२८ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – इंतजार ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

खिड़की से नित झाँकती, नई नवेली नार ।

सपने मन में सज रहे, चलती मधुर बयार ।।

आकर खिड़की पर दिखी, उसकी मधु मुस्कान।

मन में उसके जग रहे, नये-नये अरमान।।

 *

नयन निहारे प्यार से, देख रही है राह।

आ जाओ मेरे सजन, बस इतनी-सी चाह।।

 *

रस्ता उनका देखती, कब आओगे श्याम।

इंतजार होता नहीं, मिले नहीं आराम।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१० ☆ संतोष के मुक्तक… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – संतोष के मुक्तक  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१० ☆

संतोष के मुक्तक☆ श्री संतोष नेमा ☆

औरों  को  जो  ज्ञान   बांटते

अपनी सीख से स्वयं भागते

देखें  गर  वो  अपना  अंतस

गुण अवगुण को स्वयं छांटते

*

रंग   बदलते   चेहरे   देखे

घाव  हृदय  पर  गहरे देखे

बहुरुपिया  है यहाँ आदमी

सच  पर हमने  पहरे  देखे

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆ राधेय ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  ‘राधेय’।)

☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆

? कविता – राधेय ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में, कल मुझे भी मरना है l

वध तो होगा ही है मेरा, अब फिर क्यूँ पीछे हटना है ll

*

भविष्य कहेगा मित्रता में, क्यों दिया दुर्योधन का साथ?

वचन बद्ध था रहा सदा मैं, सभी अपनों का छूटा हाथ ll

*

रश्मिरथि होकर भी जग में, बहुत हुआ बदनाम l

क्या गुनाह था माधव मेरे, नहीं  मिला पाण्डु पुत्र  नाम ll

*

था अर्जुन से शूरवीर पर, गुरु अहम ने किया दूर l

धर्म अधर्म के बीच धनंजय, आपका व्यवहार रहा सदा ही क्रूर ll

*

माता कुंती ने ममता की, छाँव कभी न डाली थी l

पांचो पुत्र रहे सदा सलामत, यही कसम उन्होंने खाली थी ll

*

आज धंस गया भू में पहिया, परशुराम का श्राप धरे l

तभी केशव ने आज्ञा दी थी, पार्थ गांडीव तीर भरे ll

*

धराशायी ये सूत पुत्र था, करके मैदिनी का आलिंगन l

सूर्यदेव भी देख वत्स को, अस्ताचल  करते चिंतन ll

*

कहती हूँ  जागो जगवालों, बच्चों को इतिहास सुनाओ l

सुर्य पुत्र की सुनो कहानी, क्या था राधेय यह बतलाओ ll

*

कहती हूँ अद्धभुत वीर तुम, अर्पित श्रद्धा सुमन तुम्हें l

द्रवित हुआ है मन मेरा, सदा करूँ मैं नमन तुम्हें ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २९ – कविता – कुछ पता नहीं… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता कुछ पता नहीं…।)

☆ शशि साहित्य # २९ ☆

? कविता – कुछ पता नहीं…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

इस छोर को तो थामा मैंने,

उस छोर का कुछ पता नहीं…

 

क्यों डर रही पतंग हवा में,

पकड़ कुछ ढीली,

कुछ पता नहीं…

 

थी अब तक खुशियां मेरी मुट्ठी में,

रेत की तरह फिसल रही,

कुछ पता नहीं…

 

जो मेरे भी इंतजार में तड़प उठे,

उन तरसती निगाहों का,

कुछ पता नहीं…

 

हम तो चले थे कदम ब कदम पीछे तेरे,

कब मिटा दिए निशां लहरों ने,

कुछ पता नहीं…

 

उतावली हो रही बहारें,

महकने को मचलने को…

मगर अब इंतजार…

कुछ पता नहीं…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२७) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२७)  ? ?

प्रलोभनों का

जख़ीरा उतरा है

ख़रीद-फरोख़्त के लिए,

मेरी चुप्पी

माँ की ममता

सिद्ध हुई!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 10:47 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “कुचलने को फूल भी थे और अरमान भी…” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – कुचलने को फूल भी थे और अरमान भी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

हरसिंगार के फूलों ने झर झर कर

ज़मीन पर ग़लीचा बना दिया था

इन पर कदम रखकर चले

नहीं नहीं, ये न हुआ उससे

सुंदर, आकर्षक, सुगंधित फूल, ऐसे कुचले जाएं

ये अन्याय न हो सका उससे

झुककर बीनने लगा फूलों को

और ढ़ेर सारे फूलों को लाकर

बरामदे में तन्हा बैठे बैठे ,वेणी बनाने लगा

फूलों की खुशबू और जागी भावनाओं का संगम हुआ

कुछ याद भी आया , अतीत में खोया यौवन

और उसने तैयार हुई वेणी को

अपनी वृद्धा पत्नी के सिरहाने रख दिया

यह सोचकर कि जब वो जागेगी

इसे देखकर कितनी खुश होगी

पर उस दिन वह फिर कभी जागी ही नहीं , नींद से

सोचने को विवश हुआ वह, कि शायद..

फूलों को उसने कुचलने से बचाया था पैरों से

सिर्फ़ अपने अरमानों को कुचलता देखने के लिये…!!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०१ ☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०१ ☆ 

☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

सुखद मृत्यु ही गीत सुनाए,

शुभ कर्मों को कर लेना।

मत करना अपमान साधु का,

ईश्वर से कुछ डर लेना।

 **

पैसा-पैसा खूब कमाया,

जोड़-जोड़ जीवन बीता।

नहीं किसी की करी भलाई,

जाता फिर रोता, रीता।

 *

मत घमंड पैसे का करना,

दान, पुण्य कर तर लेना।

 **

त्रुटियाँ तो सबसे हो जाएँ,

पर स्वीकार करो इनको।

क्षमा शक्ति है यहाँ अपरिमित,

कर लो तुम अच्छे कल को।

 *

हँसते और हँसाते रहना,

झरनों-सा तुम झर लेना।

 **

अंत समय में किए कर्म सब,

आ जाते मन, आँखों में।

दृश्य हजारों घूम-घूम कर,

दर्शाते हैं लाखों में।

 *

पश्चाताप न रहे किसी का,

हँसते-हँसते मर लेना।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५० ☆ ज़रूरतमंद ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆ —

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “ज़रूरतमंद” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५० ☆

☆ ज़रूरतमंद ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

शहर के हर चौराहे पर

आज भी इकट्ठे होते हैं लोग

काम की तलाश में

कहीं भटकते नहीं है

बस खड़े रहते है

इस आस में कि कोई ज़रूरतमंद

आकर उन्हें ले जाएगा

अपने साथ लेकर चलते हैं

दिन भर का भोजन पानी

जैसे-जैसे दिन ऊपर चढ़ता है

उनकी आस उसी तरह

कम होती जाती है

सर्वहारा वर्ग आज भी

आशाओं और व्यवस्था के बीच

झूलता लटकता अपना और

अपने परिवार का बोझ ढोता

ज़िंदा है इस कायनात में

इन असंगठित लोगों के लिए

सरकारों की प्रतिबद्धता

सिमट कर रह जाती है सिर्फ़ काग़ज़ों में

जो शायद ही कोई

साकार रूप ले पाती है

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२६) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२६)  ? ?

उच्चरित शब्द

अभिदा है,

शब्द की

सीमाएँ हैं,

संज्ञाएँ हैं,

आशंकाएँ हैं,

चुप्पी

व्यंजना है,

चुप्पी की

दृष्टि है,

सृष्टि है,

संभावनाएँ हैं!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 10:44 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५७ ☆ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५७ ☆

✍ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

हिस्से में  खेत  घर न ही खलिहान चाहिए

ख़िदमत को माँ पिता मेरे भगवान चाहिए

 *

रब रूठ जाए मुझसे तो परवाह कब मुझे

माँ जैसा सिर्फ़ एक निगहबान चाहिए

 *

सर जिसके सामने न  उठा उम्र भर सकूँ

ऐसे बशर का कोई न अहसान चाहिए

 *

हालात हों बुरे तो उसूलों पे ही रहूँ

क़ायम मुझे पहाड़ सा ईमान चाहिए

 *

हर रंग के गुलों से महकता जो  हर समय

दुनिया बने इक एक ऐसा ही गुलदान चाहिए

 *

मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों

इंसान को  हयात पै आसान चाहिए

 *

गद्दार है जो देश के माफिक न सोचते

हमको वतन परस्त ही इंसान चाहिए

 *

क्या अगले पल हो इसका भरोसा नहीं है पर

सौ वर्ष का बशर को है सामान चाहिए

 *

ग़ैरों का ग़मगुसार खुदाया मैं हो सकूँ

मालिक मेरे अरुण को ये इमकान चाहिए

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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